ਅਨਿਕ ਭਗਤ ਅਨਿਕ ਜਨ ਤਾਰੇ ਸਿਮਰਹਿ ਅਨਿਕ ਮੁਨੀ ॥
अनिक भगत अनिक जन तारे सिमरहि अनिक मुनी ॥
अनेक भक्त, अनेक संतजन एवं अनेक मुनि उसका सिमरन करते हुए भवसागर से तर गए हैं।
ਅੰਧੁਲੇ ਟਿਕ ਨਿਰਧਨ ਧਨੁ ਪਾਇਓ ਪ੍ਰਭ ਨਾਨਕ ਅਨਿਕ ਗੁਨੀ ॥੨॥੨॥੧੨੭॥
अंधुले टिक निरधन धनु पाइओ प्रभ नानक अनिक गुनी ॥२॥२॥१२७॥
हे नानक ! प्रभु गुणों का गहरा सागर है और उसकी प्राप्ति तो ऐसे है, जैसे अंधे ने छड़ी तथा निर्धन ने धन पा लिया हो ॥ २ ॥ २॥ १२७ ॥
ਰਾਗੁ ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੧੩ ਪੜਤਾਲ
रागु बिलावलु महला ५ घरु १३ पड़ताल
रागु बिलावलु महला ५ घरु १३ पड़ताल
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਮੋਹਨ ਨੀਦ ਨ ਆਵੈ ਹਾਵੈ ਹਾਰ ਕਜਰ ਬਸਤ੍ਰ ਅਭਰਨ ਕੀਨੇ ॥
मोहन नीद न आवै हावै हार कजर बसत्र अभरन कीने ॥
हे प्रभु ! तेरे बिना मुझे नींद नहीं आती और आहें भरती रहती हूँ। मैंने अपने गले में हार, आँखों में काजल, वस्त्र एवं आभूषणों से श्रृंगार किया हुआ है।
ਉਡੀਨੀ ਉਡੀਨੀ ਉਡੀਨੀ ॥
उडीनी उडीनी उडीनी ॥
लेकिन फिर भी तेरे इन्तजार में उदास ही रहती हूँ।
ਕਬ ਘਰਿ ਆਵੈ ਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
कब घरि आवै री ॥१॥ रहाउ ॥
अरी सखी ! वह कब घर आएगा।॥ १॥ रहाउ॥
ਸਰਨਿ ਸੁਹਾਗਨਿ ਚਰਨ ਸੀਸੁ ਧਰਿ ॥
सरनि सुहागनि चरन सीसु धरि ॥
मैं सुहागिन की शरण में आकर उसके चरणों में शीश रखती हूँ।
ਲਾਲਨੁ ਮੋਹਿ ਮਿਲਾਵਹੁ ॥
लालनु मोहि मिलावहु ॥
अरी सखी ! मेरे प्रिय प्रभु से मिला दो,
ਕਬ ਘਰਿ ਆਵੈ ਰੀ ॥੧॥
कब घरि आवै री ॥१॥
वह कब घर आएगा।॥ १॥
ਸੁਨਹੁ ਸਹੇਰੀ ਮਿਲਨ ਬਾਤ ਕਹਉ ॥ ਸਗਰੋ ਅਹੰ ਮਿਟਾਵਹੁ ਤਉ ਘਰ ਹੀ ਲਾਲਨੁ ਪਾਵਹੁ ॥
सुनहु सहेरी मिलन बात कहउ ॥ सगरो अहं मिटावहु तउ घर ही लालनु पावहु ॥
“(उत्तर है) हे सहेली ! ध्यानपूर्वक सुनो; मैं तुझे प्रिय प्रभु से मिलन की बात कहती हूँ, अपना सारा अहंत्व मिटा दो, इस तरह हृदय-घर में प्रभु को पा लो।
ਤਬ ਰਸ ਮੰਗਲ ਗੁਨ ਗਾਵਹੁ ॥
तब रस मंगल गुन गावहु ॥
तब मिलन की खुशी में उसका मंगल गुणगान करो।
ਆਨਦ ਰੂਪ ਧਿਆਵਹੁ ॥
आनद रूप धिआवहु ॥
आनंद रूप पति-प्रभु का ध्यान करो।
ਨਾਨਕੁ ਦੁਆਰੈ ਆਇਓ ॥
नानकु दुआरै आइओ ॥
नानक का कथन है कि अरी सखी ! जब पति-प्रभु द्वार पर आया
ਤਉ ਮੈ ਲਾਲਨੁ ਪਾਇਓ ਰੀ ॥੨॥
तउ मै लालनु पाइओ री ॥२॥
तो मैंने उस प्रिय को पा लिया ॥ २॥
ਮੋਹਨ ਰੂਪੁ ਦਿਖਾਵੈ ॥
मोहन रूपु दिखावै ॥
हे सखी ! प्रभु अपना रूप दिखा रहा है और
ਅਬ ਮੋਹਿ ਨੀਦ ਸੁਹਾਵੈ ॥
अब मोहि नीद सुहावै ॥
अब मुझे अच्छी नींद आ रही है।
ਸਭ ਮੇਰੀ ਤਿਖਾ ਬੁਝਾਨੀ ॥
सभ मेरी तिखा बुझानी ॥
इस तरह मेरी सारी तृष्णा बुझ गई है और
ਅਬ ਮੈ ਸਹਜਿ ਸਮਾਨੀ ॥
अब मै सहजि समानी ॥
अब मैं सहज ही समाई रहती हूँ।
ਮੀਠੀ ਪਿਰਹਿ ਕਹਾਨੀ ॥
मीठी पिरहि कहानी ॥
मेरे प्रिय की कहानी बड़ी मीठी है,
ਮੋਹਨੁ ਲਾਲਨੁ ਪਾਇਓ ਰੀ ॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੧॥੧੨੮॥
मोहनु लालनु पाइओ री ॥ रहाउ दूजा ॥१॥१२८॥
मैंने अपने प्रिय प्रभु को पा लिया है॥ रहाउ दूसरा ॥ १॥ १२८ ॥
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਮੋਰੀ ਅਹੰ ਜਾਇ ਦਰਸਨ ਪਾਵਤ ਹੇ ॥
मोरी अहं जाइ दरसन पावत हे ॥
प्रभु के दर्शन पाकर ही मेरा अहंत्व दूर हो जाता है।
ਰਾਚਹੁ ਨਾਥ ਹੀ ਸਹਾਈ ਸੰਤਨਾ ॥
राचहु नाथ ही सहाई संतना ॥
संतजनों के सहायक नाथ के साथ लीन रहो।
ਅਬ ਚਰਨ ਗਹੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
अब चरन गहे ॥१॥ रहाउ ॥
अब मैंने उनके चरण पकड़ लिए हैं।॥ १॥ रहाउ॥
ਆਹੇ ਮਨ ਅਵਰੁ ਨ ਭਾਵੈ ਚਰਨਾਵੈ ਚਰਨਾਵੈ ਉਲਝਿਓ ਅਲਿ ਮਕਰੰਦ ਕਮਲ ਜਿਉ ॥
आहे मन अवरु न भावै चरनावै चरनावै उलझिओ अलि मकरंद कमल जिउ ॥
जैसे भंवरा कमल फूल के रस से उलझा रहता है, वैसे ही मेरा मन प्रभु-चरणों से लिपटना चाहता है, अन्य उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
ਅਨ ਰਸ ਨਹੀ ਚਾਹੈ ਏਕੈ ਹਰਿ ਲਾਹੈ ॥੧॥
अन रस नही चाहै एकै हरि लाहै ॥१॥
मेरा मन हरि रस का ही अभिलाषी है, इसे कोई अन्य रस नहीं चाहिए ॥ १ ॥
ਅਨ ਤੇ ਟੂਟੀਐ ਰਿਖ ਤੇ ਛੂਟੀਐ ॥
अन ते टूटीऐ रिख ते छूटीऐ ॥
मन का दूसरों से नाता टूट गया है और वह इन्द्रियों से भी छूट गया है।
ਮਨ ਹਰਿ ਰਸ ਘੂਟੀਐ ਸੰਗਿ ਸਾਧੂ ਉਲਟੀਐ ॥
मन हरि रस घूटीऐ संगि साधू उलटीऐ ॥
मेरा मन दुनिया की तरफ से उलटकर साधु-संगति में हरि-रस पीता रहता है।
ਅਨ ਨਾਹੀ ਨਾਹੀ ਰੇ ॥
अन नाही नाही रे ॥
अन्य उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰੀਤਿ ਚਰਨ ਚਰਨ ਹੇ ॥੨॥੨॥੧੨੯॥
नानक प्रीति चरन चरन हे ॥२॥२॥१२९॥
हे नानक ! उसकी प्रीति प्रभु-चरणों से ही लगी रहती है ॥ २॥ २॥ १२६ ॥
ਰਾਗੁ ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੯ ਦੁਪਦੇ
रागु बिलावलु महला ९ दुपदे
रागु बिलावलु महला ९ दुपदे
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਦੁਖ ਹਰਤਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪਛਾਨੋ ॥
दुख हरता हरि नामु पछानो ॥
हे जीवों ! दुख नाशक हरि-नाम को पहचान लो।
ਅਜਾਮਲੁ ਗਨਿਕਾ ਜਿਹ ਸਿਮਰਤ ਮੁਕਤ ਭਏ ਜੀਅ ਜਾਨੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
अजामलु गनिका जिह सिमरत मुकत भए जीअ जानो ॥१॥ रहाउ ॥
जिसका सिमरन करने से अजामल एवं गणिका जैसे पापी भी मुक्त हो गए, उसकी महत्ता अपने हृदय में जान लो॥ १॥ रहाउ॥
ਗਜ ਕੀ ਤ੍ਰਾਸ ਮਿਟੀ ਛਿਨਹੂ ਮਹਿ ਜਬ ਹੀ ਰਾਮੁ ਬਖਾਨੋ ॥
गज की त्रास मिटी छिनहू महि जब ही रामु बखानो ॥
गजिन्द्र हाथी का दर्द एक क्षण में ही मिट गया था, जब उसने राम-नाम का बखान किया।
ਨਾਰਦ ਕਹਤ ਸੁਨਤ ਧ੍ਰੂਅ ਬਾਰਿਕ ਭਜਨ ਮਾਹਿ ਲਪਟਾਨੋ ॥੧॥
नारद कहत सुनत ध्रूअ बारिक भजन माहि लपटानो ॥१॥
नारद मुनि का उपदेश सुनकर बालक ध्रुव भी भगवान के भजन में लीन हो गया था ॥ १॥
ਅਚਲ ਅਮਰ ਨਿਰਭੈ ਪਦੁ ਪਾਇਓ ਜਗਤ ਜਾਹਿ ਹੈਰਾਨੋ ॥
अचल अमर निरभै पदु पाइओ जगत जाहि हैरानो ॥
उसने अटल, अमर एवं निर्भय पद पा लिया, जिसे देखकर सारा जगत् हैरान हो गया।
ਨਾਨਕ ਕਹਤ ਭਗਤ ਰਛਕ ਹਰਿ ਨਿਕਟਿ ਤਾਹਿ ਤੁਮ ਮਾਨੋ ॥੨॥੧॥
नानक कहत भगत रछक हरि निकटि ताहि तुम मानो ॥२॥१॥
नानक कहते हैं कि परमात्मा भक्तों का रक्षक है, तुम भी उसे निकट ही मानो ॥ २॥ १॥
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੯ ॥
बिलावलु महला ९ ॥
बिलावलु महला ९ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਦੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥
हरि के नाम बिना दुखु पावै ॥
प्रभु के नाम-स्मरण बिना मनुष्य बड़ा दुखी होता है।
ਭਗਤਿ ਬਿਨਾ ਸਹਸਾ ਨਹ ਚੂਕੈ ਗੁਰੁ ਇਹੁ ਭੇਦੁ ਬਤਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
भगति बिना सहसा नह चूकै गुरु इहु भेदु बतावै ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु ने यह भेद बताया है कि भगवान की भक्ति के बिना मन का संशय समाप्त नहीं होता। १॥ रहाउ ॥
ਕਹਾ ਭਇਓ ਤੀਰਥ ਬ੍ਰਤ ਕੀਏ ਰਾਮ ਸਰਨਿ ਨਹੀ ਆਵੈ ॥
कहा भइओ तीरथ ब्रत कीए राम सरनि नही आवै ॥
जो व्यक्ति राम की शरण में नहीं आता, उसे तीर्थों पर स्नान करने एवं व्रत-उपवास रखने का कोई लाभ नहीं।