ਕਹਤਿਅਹ ਕਹਤੀ ਸੁਣੀ ਰਹਤ ਕੋ ਖੁਸੀ ਨ ਆਯਉ ॥
कहतिअह कहती सुणी रहत को खुसी न आयउ ॥
इनके बड़े-बड़े उपदेश तो सुनने को मिले परन्तु इनके जीवन-आचरण से मन खुश नहीं हुआ (अर्थात् ये बातें तो बड़ी-बड़ी करते थे मगर इनके आचरण से दिल दुखी ही हुआ)।
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਛੋਡਿ ਦੂਜੈ ਲਗੇ ਤਿਨੑ ਕੇ ਗੁਣ ਹਉ ਕਿਆ ਕਹਉ ॥
हरि नामु छोडि दूजै लगे तिन्ह के गुण हउ किआ कहउ ॥
जो हरिनाम को छोड़कर द्वैतभाव (संसारिक मोह) में लीन हैं, जो गुणों के लायक नहीं, उन लोगों के गुण मैं क्या कहूँ।
ਗੁਰੁ ਦਯਿ ਮਿਲਾਯਉ ਭਿਖਿਆ ਜਿਵ ਤੂ ਰਖਹਿ ਤਿਵ ਰਹਉ ॥੨॥੨੦॥
गुरु दयि मिलायउ भिखिआ जिव तू रखहि तिव रहउ ॥२॥२०॥
भाट भिक्खा का कथन है कि ईश्वर ने सच्चे गुरु अमरदास से मिला दिया है, (हे गुरु !) जैसे तू रखना चाहता है, वैसे ही मैं रहने को तैयार हैं।॥ २॥ २० ॥
ਪਹਿਰਿ ਸਮਾਧਿ ਸਨਾਹੁ ਗਿਆਨਿ ਹੈ ਆਸਣਿ ਚੜਿਅਉ ॥
पहिरि समाधि सनाहु गिआनि है आसणि चड़िअउ ॥
समाधि रूपी कवच धारण करके ज्ञान रूपी घोड़े पर गुरु अमरदास जी ने आसन लगाया हुआ है।
ਧ੍ਰੰਮ ਧਨਖੁ ਕਰ ਗਹਿਓ ਭਗਤ ਸੀਲਹ ਸਰਿ ਲੜਿਅਉ ॥
ध्रम धनखु कर गहिओ भगत सीलह सरि लड़िअउ ॥
धर्म का धनुष हाथ में लेकर और भक्तों वाले शील रूपी तीर से विकारों से मुकाबला कर रहे हैं।
ਭੈ ਨਿਰਭਉ ਹਰਿ ਅਟਲੁ ਮਨਿ ਸਬਦਿ ਗੁਰ ਨੇਜਾ ਗਡਿਓ ॥
भै निरभउ हरि अटलु मनि सबदि गुर नेजा गडिओ ॥
प्रभु-भय के कारण ये निर्भय है, उन्होंने अपने मन में अटल हरि को बसाया हुआ है और शब्द गुरु का नेजा उन्होंने स्थापित किया हुआ है।
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਲੋਭ ਮੋਹ ਅਪਤੁ ਪੰਚ ਦੂਤ ਬਿਖੰਡਿਓ ॥
काम क्रोध लोभ मोह अपतु पंच दूत बिखंडिओ ॥
काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार- इन पाँच दुष्टों का उन्होंने संहार कर दिया है।
ਭਲਉ ਭੂਹਾਲੁ ਤੇਜੋ ਤਨਾ ਨ੍ਰਿਪਤਿ ਨਾਥੁ ਨਾਨਕ ਬਰਿ ॥
भलउ भूहालु तेजो तना न्रिपति नाथु नानक बरि ॥
तेजभान जी के सुपुत्र हे गुरु अमरदास ! तू भल्ला वंश में महान् है और गुरु नानक देव जी के वर से बादशाह के रूप में प्रख्यात हो गए हो।
ਗੁਰ ਅਮਰਦਾਸ ਸਚੁ ਸਲੵ ਭਣਿ ਤੈ ਦਲੁ ਜਿਤਉ ਇਵ ਜੁਧੁ ਕਰਿ ॥੧॥੨੧॥
गुर अमरदास सचु सल्य भणि तै दलु जितउ इव जुधु करि ॥१॥२१॥
भाट सल्ह का कथन है कि हे गुरु अमरदास ! तुमने इस प्रकार युद्ध करके विकारों के दल को जीत लिया है ।॥१॥२१॥
ਘਨਹਰ ਬੂੰਦ ਬਸੁਅ ਰੋਮਾਵਲਿ ਕੁਸਮ ਬਸੰਤ ਗਨੰਤ ਨ ਆਵੈ ॥
घनहर बूंद बसुअ रोमावलि कुसम बसंत गनंत न आवै ॥
बादलों की तमाम बूंदों, धरती की समस्त वनस्पति, वसंत के फूलों की गणना नहीं हो सकती।
ਰਵਿ ਸਸਿ ਕਿਰਣਿ ਉਦਰੁ ਸਾਗਰ ਕੋ ਗੰਗ ਤਰੰਗ ਅੰਤੁ ਕੋ ਪਾਵੈ ॥
रवि ससि किरणि उदरु सागर को गंग तरंग अंतु को पावै ॥
सूर्य-चन्द्रमा की किरणों, सागर के उदर एवं गंगा की लहरों का कोई अंत नहीं पा सकता।
ਰੁਦ੍ਰ ਧਿਆਨ ਗਿਆਨ ਸਤਿਗੁਰ ਕੇ ਕਬਿ ਜਨ ਭਲੵ ਉਨਹ ਜੋੁ ਗਾਵੈ ॥
रुद्र धिआन गिआन सतिगुर के कबि जन भल्य उनह जो गावै ॥
कवि भल्ह का कथन है कि शिवशंकर की तरह ध्यान लगाकर अथवा सतगुरु के ज्ञान द्वारा बेशक उपरोक्त पर कोई व्यक्ति वर्णन कर भी ले परन्तु
ਭਲੇ ਅਮਰਦਾਸ ਗੁਣ ਤੇਰੇ ਤੇਰੀ ਉਪਮਾ ਤੋਹਿ ਬਨਿ ਆਵੈ ॥੧॥੨੨॥
भले अमरदास गुण तेरे तेरी उपमा तोहि बनि आवै ॥१॥२२॥
भला वंश के शिरोमणि हे गुरु अमरदास! तेरे बेअन्त गुणों का कथन नहीं किया जा सकता, यदि तेरी उपमा की जाए तो तेरे जैसा तु आप ही है ॥१॥२२॥
ਸਵਈਏ ਮਹਲੇ ਚਉਥੇ ਕੇ ੪
सवईए महले चउथे के ४
सवईए महले चउथे के ४
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
वह परब्रह्म केवल एक (ओंकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है।
ਇਕ ਮਨਿ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਧਿਆਵਉ ॥
इक मनि पुरखु निरंजनु धिआवउ ॥
मैं दत्तचित होकर मोह-माया की कालिमा से रहित सर्वशक्तिमान परमेश्वर की वन्दना करता हूँ और
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਸਦ ਗਾਵਉ ॥
गुर प्रसादि हरि गुण सद गावउ ॥
गुरु की कृपा से सर्वदा उस प्रभु के गुणों का गान करता हूँ।
ਗੁਨ ਗਾਵਤ ਮਨਿ ਹੋਇ ਬਿਗਾਸਾ ॥
गुन गावत मनि होइ बिगासा ॥
उसके गुणगान से ही मेरे मन को खुशी प्राप्त होती है।
ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰਿ ਜਨਹ ਕੀ ਆਸਾ ॥
सतिगुर पूरि जनह की आसा ॥
पूर्ण गुरु अपने सेवकों की हर आशा पूरी करता है।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਯਉ ॥
सतिगुरु सेवि परम पदु पायउ ॥
सतगुरु अमरदास जी की सेवा करके गुरु रामदास जी ने परमपद प्राप्त किया और
ਅਬਿਨਾਸੀ ਅਬਿਗਤੁ ਧਿਆਯਉ ॥
अबिनासी अबिगतु धिआयउ ॥
अविनाशी अटल परमात्मा का भजन किया।
ਤਿਸੁ ਭੇਟੇ ਦਾਰਿਦ੍ਰੁ ਨ ਚੰਪੈ ॥
तिसु भेटे दारिद्रु न च्मपै ॥
उस गुरु रामदास को मिलने से दुख-दारिद्र समाप्त हो जाते हैं,
ਕਲੵ ਸਹਾਰੁ ਤਾਸੁ ਗੁਣ ਜੰਪੈ ॥
कल्य सहारु तासु गुण ज्मपै ॥
भाट कलसहार उसी के गुण गा रहा है।
ਜੰਪਉ ਗੁਣ ਬਿਮਲ ਸੁਜਨ ਜਨ ਕੇਰੇ ਅਮਿਅ ਨਾਮੁ ਜਾ ਕਉ ਫੁਰਿਆ ॥
ज्मपउ गुण बिमल सुजन जन केरे अमिअ नामु जा कउ फुरिआ ॥
मैं उस महापुरुष के (गुरु रामदास जी) के पावन गुणों का गान कर रहा हूँ, जिसे अमृतमय नाम की अनुभूति हुई है।
ਇਨਿ ਸਤਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਬਦ ਰਸੁ ਪਾਯਾ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨ ਉਰਿ ਧਰਿਆ ॥
इनि सतगुरु सेवि सबद रसु पाया नामु निरंजन उरि धरिआ ॥
उसने सतगुरु अमरदास जी की सेवा में तल्लीन रहकर शब्द का रस प्राप्त किया है और पावन नाम को ही हृदय में धारण किया।
ਹਰਿ ਨਾਮ ਰਸਿਕੁ ਗੋਬਿੰਦ ਗੁਣ ਗਾਹਕੁ ਚਾਹਕੁ ਤਤ ਸਮਤ ਸਰੇ ॥
हरि नाम रसिकु गोबिंद गुण गाहकु चाहकु तत समत सरे ॥
वे हरिनाम के रसिया हैं, गोविन्द के गुणों के सच्चे ग्राहक हैं, ईश्वर के अटूट प्रेमी एवं समदृष्टि का सरोवर हैं।
ਕਵਿ ਕਲੵ ਠਕੁਰ ਹਰਦਾਸ ਤਨੇ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਸਰ ਅਭਰ ਭਰੇ ॥੧॥
कवि कल्य ठकुर हरदास तने गुर रामदास सर अभर भरे ॥१॥
कवि कलसहार का कथन है कि ठाकुर हरदास जी के सुपुत्र गुरु रामदास जी दिल रूपी खाली सरोवरों को नाम जल से भरने वाले हैं ॥१॥ ।
ਛੁਟਤ ਪਰਵਾਹ ਅਮਿਅ ਅਮਰਾ ਪਦ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰੋਵਰ ਸਦ ਭਰਿਆ ॥
छुटत परवाह अमिअ अमरा पद अम्रित सरोवर सद भरिआ ॥
गुरु रामदास जी नामामृत का वह सरोवर हैं, जो सदैव भरा रहता है, जिसमें से मुक्ति प्रदान करने वाली अमृत की धारा बह रही है।
ਤੇ ਪੀਵਹਿ ਸੰਤ ਕਰਹਿ ਮਨਿ ਮਜਨੁ ਪੁਬ ਜਿਨਹੁ ਸੇਵਾ ਕਰੀਆ ॥
ते पीवहि संत करहि मनि मजनु पुब जिनहु सेवा करीआ ॥
संतपुरुष इसी का पान करते हैं और मन में तीर्थ-स्नान करते हैं, परन्तु स्नान वही भाग्यशाली करते हैं, जिन्होंने पूर्व जन्म सेवा की है।
ਤਿਨ ਭਉ ਨਿਵਾਰਿ ਅਨਭੈ ਪਦੁ ਦੀਨਾ ਸਬਦ ਮਾਤ੍ਰ ਤੇ ਉਧਰ ਧਰੇ ॥
तिन भउ निवारि अनभै पदु दीना सबद मात्र ते उधर धरे ॥
गुरु रामदास जी ने उनका भय दूर करके अभय पद प्रदान किया है और शब्द मात्र सुनाकर उद्धार कर दिया है।
ਕਵਿ ਕਲੵ ਠਕੁਰ ਹਰਦਾਸ ਤਨੇ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਸਰ ਅਭਰ ਭਰੇ ॥੨॥
कवि कल्य ठकुर हरदास तने गुर रामदास सर अभर भरे ॥२॥
कवि कलसहार का कथन है कि ठाकुर हरदास के सुपुत्र गुरु रामदास जी दिल रूपी खाली सरोवरों को नाम जल से भरने वाले हैं ॥ २॥
ਸਤਗੁਰ ਮਤਿ ਗੂੜ੍ਹ੍ਹ ਬਿਮਲ ਸਤਸੰਗਤਿ ਆਤਮੁ ਰੰਗਿ ਚਲੂਲੁ ਭਯਾ ॥
सतगुर मति गूड़्ह बिमल सतसंगति आतमु रंगि चलूलु भया ॥
सतगुरु रामदास जी की बुद्धि गहन-गंभीर है, उनकी सच्ची संगत भी निर्मल है और उनकी आत्मा ईश्वर के रंग में लीन रहती है।
ਜਾਗੵਾ ਮਨੁ ਕਵਲੁ ਸਹਜਿ ਪਰਕਾਸੵਾ ਅਭੈ ਨਿਰੰਜਨੁ ਘਰਹਿ ਲਹਾ ॥
जाग्या मनु कवलु सहजि परकास्या अभै निरंजनु घरहि लहा ॥
उनका मन सदा जाग्रत रहता है, हृदय कमल स्वाभाविक ही खिला हुआ है, उन्होंने पावनस्वरूप परमेश्वर को हृदय घर में पा लिया है।