Hindi Page 1330

ਆਪੇ ਖੇਲ ਕਰੇ ਸਭ ਕਰਤਾ ਐਸਾ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥੩॥
आपे खेल करे सभ करता ऐसा बूझै कोई ॥३॥
इस सच्चाई को समझ लो कि परमात्मा स्वयं ही लीला करता है।॥ ३॥

ਨਾਉ ਪ੍ਰਭਾਤੈ ਸਬਦਿ ਧਿਆਈਐ ਛੋਡਹੁ ਦੁਨੀ ਪਰੀਤਾ ॥
नाउ प्रभातै सबदि धिआईऐ छोडहु दुनी परीता ॥
दुनिया का मोह-प्रेम छोड़कर प्रभातकाल ब्रह्म-शब्द का ध्यान करो।

ਪ੍ਰਣਵਤਿ ਨਾਨਕ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸਾ ਜਗਿ ਹਾਰਿਆ ਤਿਨਿ ਜੀਤਾ ॥੪॥੯॥
प्रणवति नानक दासनि दासा जगि हारिआ तिनि जीता ॥४॥९॥
गुरु नानक विनती करते हैं कि ईश्वर का सेवक जीत गया है और जगत उसके सन्मुख हार गया है॥ ४॥ ९॥

ਪ੍ਰਭਾਤੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
प्रभाती महला १ ॥
प्रभाती महला १ ॥

ਮਨੁ ਮਾਇਆ ਮਨੁ ਧਾਇਆ ਮਨੁ ਪੰਖੀ ਆਕਾਸਿ ॥
मनु माइआ मनु धाइआ मनु पंखी आकासि ॥
मन मायावादी है, चलायमान है और आकाश के पक्षी की मानिंद उड़ता है।

ਤਸਕਰ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਰਿਆ ਨਗਰੁ ਵੁਠਾ ਸਾਬਾਸਿ ॥
तसकर सबदि निवारिआ नगरु वुठा साबासि ॥
जब जीव शब्द द्वारा कामादिक लुटेरों का निवारण करता है तो शरीर रूपी नगरी का सुशील नागरिक बन जाता है।

ਜਾ ਤੂ ਰਾਖਹਿ ਰਾਖਿ ਲੈਹਿ ਸਾਬਤੁ ਹੋਵੈ ਰਾਸਿ ॥੧॥
जा तू राखहि राखि लैहि साबतु होवै रासि ॥१॥
हे परमेश्वर ! जिसे तू मोह-माया से बचा लेता है, उसी की नाम-राशि सार्थक होती है।॥ १॥

ਐਸਾ ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਨਿਧਿ ਮੇਰੈ ॥
ऐसा नामु रतनु निधि मेरै ॥
हरिनाम रूपी रत्नों का मेरे पास सुखों का भण्डार है।

ਗੁਰਮਤਿ ਦੇਹਿ ਲਗਉ ਪਗਿ ਤੇਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुरमति देहि लगउ पगि तेरै ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु ने यही शिक्षा दी है कि तेरे चरणों में लीन रहूँ॥ १॥रहाउ॥

ਮਨੁ ਜੋਗੀ ਮਨੁ ਭੋਗੀਆ ਮਨੁ ਮੂਰਖੁ ਗਾਵਾਰੁ ॥
मनु जोगी मनु भोगीआ मनु मूरखु गावारु ॥
मन योगी एवं भोगी है तथा मन मूर्ख एवं गंवार भी है।

ਮਨੁ ਦਾਤਾ ਮਨੁ ਮੰਗਤਾ ਮਨ ਸਿਰਿ ਗੁਰੁ ਕਰਤਾਰੁ ॥
मनु दाता मनु मंगता मन सिरि गुरु करतारु ॥
यह मन ही दानी और भिखारी है। मन पर गुरु परमेश्वर नियंता है।

ਪੰਚ ਮਾਰਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਐਸਾ ਬ੍ਰਹਮੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥੨॥
पंच मारि सुखु पाइआ ऐसा ब्रहमु वीचारु ॥२॥
ब्रह्म का चिंतन करके कामादिक पाँच दुष्टों को मारकर ही सुख प्राप्त करता है॥ २॥

ਘਟਿ ਘਟਿ ਏਕੁ ਵਖਾਣੀਐ ਕਹਉ ਨ ਦੇਖਿਆ ਜਾਇ ॥
घटि घटि एकु वखाणीऐ कहउ न देखिआ जाइ ॥
घट घट में एक परमेश्वर के व्यापक होने की बात की जाती है, पर कहने मात्र से देखा नहीं जाता।

ਖੋਟੋ ਪੂਠੋ ਰਾਲੀਐ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਪਤਿ ਜਾਇ ॥
खोटो पूठो रालीऐ बिनु नावै पति जाइ ॥
खोटे लोगों को उलटा लटका कर गर्भ योनि के दुखों में धकेल दिया जाता है और प्रभु नाम के बिना प्रतिष्ठा नहीं रहती।

ਜਾ ਤੂ ਮੇਲਹਿ ਤਾ ਮਿਲਿ ਰਹਾਂ ਜਾਂ ਤੇਰੀ ਹੋਇ ਰਜਾਇ ॥੩॥
जा तू मेलहि ता मिलि रहां जां तेरी होइ रजाइ ॥३॥
हे परमेश्वर ! जब तेरी रज़ा होती है तो तू स्वयं ही मिला लेता है॥ ३॥

ਜਾਤਿ ਜਨਮੁ ਨਹ ਪੂਛੀਐ ਸਚ ਘਰੁ ਲੇਹੁ ਬਤਾਇ ॥
जाति जनमु नह पूछीऐ सच घरु लेहु बताइ ॥
ईश्वर के घर में जाति-धर्म की पूछ-पड़ताल नहीं होती।

ਸਾ ਜਾਤਿ ਸਾ ਪਤਿ ਹੈ ਜੇਹੇ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥
सा जाति सा पति है जेहे करम कमाइ ॥
मनुष्य जैसे कर्म करता है, वैसे ही जाति एवं प्रतिष्ठा का हकदार बनता है।

ਜਨਮ ਮਰਨ ਦੁਖੁ ਕਾਟੀਐ ਨਾਨਕ ਛੂਟਸਿ ਨਾਇ ॥੪॥੧੦॥
जनम मरन दुखु काटीऐ नानक छूटसि नाइ ॥४॥१०॥
गुरु नानक का फुरमान है कि ईश्वर के नाम स्मरण से मुक्ति मिलती है और जन्म-मरण के सब दुख कट जाते हैं।॥ ४॥ १०॥

ਪ੍ਰਭਾਤੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
प्रभाती महला १ ॥
प्रभाती महला १ ॥

ਜਾਗਤੁ ਬਿਗਸੈ ਮੂਠੋ ਅੰਧਾ ॥
जागतु बिगसै मूठो अंधा ॥
अज्ञान में अंधा बना हुआ मनुष्य स्वयं को जाग्रत मानकर खुशी महसूस करता है।

ਗਲਿ ਫਾਹੀ ਸਿਰਿ ਮਾਰੇ ਧੰਧਾ ॥
गलि फाही सिरि मारे धंधा ॥
काम-धंधों में लीन रहकर इसके गले में मोह-माया का फन्दा पड़ जाता है।

ਆਸਾ ਆਵੈ ਮਨਸਾ ਜਾਇ ॥
आसा आवै मनसा जाइ ॥
अनेक आशाएँ लेकर आता है और मन में ही लेकर संसार से चला जाता है।

ਉਰਝੀ ਤਾਣੀ ਕਿਛੁ ਨ ਬਸਾਇ ॥੧॥
उरझी ताणी किछु न बसाइ ॥१॥
इसकी जीवन-डोर उलझी रहती है और इसका कोई वश नहीं चलता॥ १॥

ਜਾਗਸਿ ਜੀਵਣ ਜਾਗਣਹਾਰਾ ॥
जागसि जीवण जागणहारा ॥
हे जीवनदाता ! एकमात्र तू ही जाग्रत है,

ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਭੰਡਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सुख सागर अम्रित भंडारा ॥१॥ रहाउ ॥
तू सुखों का सागर है और तेरे नामामृत के भण्डार भरे हुए हैं।॥ १॥रहाउ॥

ਕਹਿਓ ਨ ਬੂਝੈ ਅੰਧੁ ਨ ਸੂਝੈ ਭੋਂਡੀ ਕਾਰ ਕਮਾਈ ॥
कहिओ न बूझै अंधु न सूझै भोंडी कार कमाई ॥
अन्धा मनुष्य कोई शिक्षा नहीं समझता, उसे कोई होश नहीं रहती और कुटिल कर्म ही करता है।

ਆਪੇ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪ੍ਰੇਮ ਪਰਮੇਸੁਰੁ ਕਰਮੀ ਮਿਲੈ ਵਡਾਈ ॥੨॥
आपे प्रीति प्रेम परमेसुरु करमी मिलै वडाई ॥२॥
ईश्वर स्वयं ही प्रेम भक्ति प्रदान करता है और उसकी कृपा से ही शोभा मिलती है।॥ २॥

ਦਿਨੁ ਦਿਨੁ ਆਵੈ ਤਿਲੁ ਤਿਲੁ ਛੀਜੈ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਘਟਾਈ ॥
दिनु दिनु आवै तिलु तिलु छीजै माइआ मोहु घटाई ॥
जिन्दगी के दिन आकर चले जाते हैं, उम्र कम हो जाती है, लेकिन फिर भी माया का मोह नहीं घटता।

ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਬੂਡੋ ਠਉਰ ਨ ਪਾਵੈ ਜਬ ਲਗ ਦੂਜੀ ਰਾਈ ॥੩॥
बिनु गुर बूडो ठउर न पावै जब लग दूजी राई ॥३॥
जब तक द्वैतभाव रहता है, गुरु के बिना जीव डूबता है और उसे कोई ठौर-ठिकाना प्राप्त नहीं होता॥ ३॥

ਅਹਿਨਿਸਿ ਜੀਆ ਦੇਖਿ ਸਮ੍ਹ੍ਹਾਲੈ ਸੁਖੁ ਦੁਖੁ ਪੁਰਬਿ ਕਮਾਈ ॥
अहिनिसि जीआ देखि सम्हालै सुखु दुखु पुरबि कमाई ॥
ईश्वर रात-दिन रोजी देकर जीवों का पोषण करता है और कर्मानुसार सुख दुख देता है।

ਕਰਮਹੀਣੁ ਸਚੁ ਭੀਖਿਆ ਮਾਂਗੈ ਨਾਨਕ ਮਿਲੈ ਵਡਾਈ ॥੪॥੧੧॥
करमहीणु सचु भीखिआ मांगै नानक मिलै वडाई ॥४॥११॥
नानक विनती करते हैं कि हे परमेश्वर ! मैं बदनसीब तो सच्चे-नाम की भिक्षा मांगता हूँ, जिससे मुझे बड़ाई मिल जाए॥ ४॥ ११॥

ਪ੍ਰਭਾਤੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
प्रभाती महला १ ॥
प्रभाती महला १ ॥

ਮਸਟਿ ਕਰਉ ਮੂਰਖੁ ਜਗਿ ਕਹੀਆ ॥
मसटि करउ मूरखु जगि कहीआ ॥
अगर मैं चुप रहता हूँ तो दुनिया मुझे मूर्ख कहती है,

ਅਧਿਕ ਬਕਉ ਤੇਰੀ ਲਿਵ ਰਹੀਆ ॥
अधिक बकउ तेरी लिव रहीआ ॥
परन्तु अधिक बोलने से तेरा ध्यान दूटता है।

ਭੂਲ ਚੂਕ ਤੇਰੈ ਦਰਬਾਰਿ ॥
भूल चूक तेरै दरबारि
भूल-चूक तो तेरे दरबार में क्षमा होगी,

ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਕੈਸੇ ਆਚਾਰ ॥੧॥
नाम बिना कैसे आचार ॥१॥
नाम-स्मरण बिना कोई आचरण क्योंकर योग्य माना जा सकता है॥ १॥

ਐਸੇ ਝੂਠਿ ਮੁਠੇ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ऐसे झूठि मुठे संसारा ॥
झूठ में संसार लुट रहा है।

ਨਿੰਦਕੁ ਨਿੰਦੈ ਮੁਝੈ ਪਿਆਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
निंदकु निंदै मुझै पिआरा ॥१॥ रहाउ ॥
निंदक जिसकी निंदा करता है, वह मुझे प्यारा लगता है॥ १॥रहाउ॥

ਜਿਸੁ ਨਿੰਦਹਿ ਸੋਈ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ॥
जिसु निंदहि सोई बिधि जाणै ॥
जिसकी निंदा करता है, वही असल में जीवन-युक्ति जानता है।

ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਦਰਿ ਨੀਸਾਣੈ ॥
गुर कै सबदे दरि नीसाणै ॥
वह गुरु के उपदेश द्वारा प्रभु के द्वार पर मान्य होता है और

ਕਾਰਣ ਨਾਮੁ ਅੰਤਰਗਤਿ ਜਾਣੈ ॥
कारण नामु अंतरगति जाणै ॥
अन्तर्मन में परमात्मा को मानता है।

ਜਿਸ ਨੋ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸੋਈ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ॥੨॥
जिस नो नदरि करे सोई बिधि जाणै ॥२॥
जिस पर ईश्वर की करुणा-दृष्टि होती है, वही जीवन-युक्ति को समझता है॥ २॥

ਮੈ ਮੈਲੌ ਊਜਲੁ ਸਚੁ ਸੋਇ ॥
मै मैलौ ऊजलु सचु सोइ ॥
मैं पापों से मलिन हूँ, केवल ईश्वर ही पावन है।

ਊਤਮੁ ਆਖਿ ਨ ਊਚਾ ਹੋਇ ॥
ऊतमु आखि न ऊचा होइ ॥
उत्तम कहने से कोई बड़ा नहीं हो जाता।

ਮਨਮੁਖੁ ਖੂਲ੍ਹ੍ਹਿ ਮਹਾ ਬਿਖੁ ਖਾਇ ॥
मनमुखु खूल्हि महा बिखु खाइ ॥
स्वेच्छाचारी विकारों का जहर सेवन करता है।

ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ਸੁ ਰਾਚੈ ਨਾਇ ॥੩॥
गुरमुखि होइ सु राचै नाइ ॥३॥
पर जो गुरुमुख बन जाता है, वह परमात्मा के नाम स्मरण में लीन रहता है॥ ३॥

ਅੰਧੌ ਬੋਲੌ ਮੁਗਧੁ ਗਵਾਰੁ ॥
अंधौ बोलौ मुगधु गवारु ॥
मूर्ख एवं गंवार व्यक्ति बुरे वचन ही बोलता है।

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