Hindi Page 848

ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਪ੍ਰਭ ਭੇਟਿਐ ਨਾਨਕ ਸੁਖੀ ਹੋਤ ਇਹੁ ਜੀਉ ॥੧॥
सुख सागर प्रभ भेटिऐ नानक सुखी होत इहु जीउ ॥१॥
हे नानक ! यदि सुख-सागर प्रभु से भेंट हो जाए तो यह जिन्दगी सुखी हो जाती है।॥ १॥

ਛੰਤ ॥
छंत ॥
छंद ॥

ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਈਐ ਜਬ ਹੋਵੈ ਭਾਗੋ ਰਾਮ ॥
सुख सागर प्रभु पाईऐ जब होवै भागो राम ॥
जब भाग्योदय हो तो सुख-सागर प्रभु की प्राप्ति हो जाती है।

ਮਾਨਨਿ ਮਾਨੁ ਵਞਾਈਐ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਲਾਗੋ ਰਾਮ ॥
माननि मानु वञाईऐ हरि चरणी लागो राम ॥
अपना मान-अभिमान त्याग कर भगवान के चरणों में लीन हो जाओ।

ਛੋਡਿ ਸਿਆਨਪ ਚਾਤੁਰੀ ਦੁਰਮਤਿ ਬੁਧਿ ਤਿਆਗੋ ਰਾਮ ॥
छोडि सिआनप चातुरी दुरमति बुधि तिआगो राम ॥
अपनी अक्लमंदी एवं चतुराई को छोड़कर खोटी मति वाली बुद्धि को त्याग दीजिए।

ਨਾਨਕ ਪਉ ਸਰਣਾਈ ਰਾਮ ਰਾਇ ਥਿਰੁ ਹੋਇ ਸੁਹਾਗੋ ਰਾਮ ॥੧॥
नानक पउ सरणाई राम राइ थिरु होइ सुहागो राम ॥१॥
नानक का कथन है कि हे जीवात्मा ! राम की शरण में आने से तुम्हारा सुहाग अटल हो जाएगा ॥ १॥

ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਤਜਿ ਕਤ ਲਾਗੀਐ ਜਿਸੁ ਬਿਨੁ ਮਰਿ ਜਾਈਐ ਰਾਮ ॥
सो प्रभु तजि कत लागीऐ जिसु बिनु मरि जाईऐ राम ॥
जिसके बिना जीना मौत के बराबर है, उस प्रभु को त्याग कर किसी अन्य को कैसे अपनाया जा सकता है ?

ਲਾਜ ਨ ਆਵੈ ਅਗਿਆਨ ਮਤੀ ਦੁਰਜਨ ਬਿਰਮਾਈਐ ਰਾਮ ॥
लाज न आवै अगिआन मती दुरजन बिरमाईऐ राम ॥
नासमझ जीव को शर्म तो आती नहीं अपितु दुर्जन लोगों के साथ ही प्रवृत्त रहता है।

ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਪ੍ਰਭੁ ਤਿਆਗਿ ਕਰੇ ਕਹੁ ਕਤ ਠਹਰਾਈਐ ਰਾਮ ॥
पतित पावन प्रभु तिआगि करे कहु कत ठहराईऐ राम ॥
पतितपावन प्रभु को त्याग कर कैसे शान्ति मिल सकती है।

ਨਾਨਕ ਭਗਤਿ ਭਾਉ ਕਰਿ ਦਇਆਲ ਕੀ ਜੀਵਨ ਪਦੁ ਪਾਈਐ ਰਾਮ ॥੨॥
नानक भगति भाउ करि दइआल की जीवन पदु पाईऐ राम ॥२॥
हे नानक ! दयालु परमात्मा की भक्ति करके ही जीव मोक्ष प्राप्त कर सकता है॥ २॥

ਸ੍ਰੀ ਗੋਪਾਲੁ ਨ ਉਚਰਹਿ ਬਲਿ ਗਈਏ ਦੁਹਚਾਰਣਿ ਰਸਨਾ ਰਾਮ ॥
स्री गोपालु न उचरहि बलि गईए दुहचारणि रसना राम ॥
ऐसी दुश्चरित रसना को जल जाना चाहिए जो परमात्मा का नाम उच्चारण नहीं करती।

ਪ੍ਰਭੁ ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਨਹ ਸੇਵਹੀ ਕਾਇਆ ਕਾਕ ਗ੍ਰਸਨਾ ਰਾਮ ॥
प्रभु भगति वछलु नह सेवही काइआ काक ग्रसना राम ॥
यदि भक्तवत्सल प्रभु की भक्ति न की तो इस काया को कौए ने अपना ग्रास बना लेना है।

ਭ੍ਰਮਿ ਮੋਹੀ ਦੂਖ ਨ ਜਾਣਹੀ ਕੋਟਿ ਜੋਨੀ ਬਸਨਾ ਰਾਮ ॥
भ्रमि मोही दूख न जाणही कोटि जोनी बसना राम ॥
भ्रम में भूला हुआ प्राणी इन दुखों को नहीं जानता जो करोड़ों योनियों में कष्ट भोगता है।

ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਅਵਰੁ ਜਿ ਚਾਹਨਾ ਬਿਸਟਾ ਕ੍ਰਿਮ ਭਸਮਾ ਰਾਮ ॥੩॥
नानक बिनु हरि अवरु जि चाहना बिसटा क्रिम भसमा राम ॥३॥
हे नानक ! ईश्वर के बिना किसी अन्य वस्तु की अभिलाषा करना विष्ठा के कीड़े की तरह मरकर भस्म हो जाने के तुल्य है॥ ३॥

ਲਾਇ ਬਿਰਹੁ ਭਗਵੰਤ ਸੰਗੇ ਹੋਇ ਮਿਲੁ ਬੈਰਾਗਨਿ ਰਾਮ ॥
लाइ बिरहु भगवंत संगे होइ मिलु बैरागनि राम ॥
दुनिया से वैराग्यवान बनकर भगवंत के संग प्रेम बढाकर उससे मिल जाओ।

ਚੰਦਨ ਚੀਰ ਸੁਗੰਧ ਰਸਾ ਹਉਮੈ ਬਿਖੁ ਤਿਆਗਨਿ ਰਾਮ ॥
चंदन चीर सुगंध रसा हउमै बिखु तिआगनि राम ॥
चंदन, सुन्दर वस्त्र, सुगन्धियों, स्वादिष्ट पदार्थ एवं अहंत्व रूपी विष को त्याग दीजिए।

ਈਤ ਊਤ ਨਹ ਡੋਲੀਐ ਹਰਿ ਸੇਵਾ ਜਾਗਨਿ ਰਾਮ ॥
ईत ऊत नह डोलीऐ हरि सेवा जागनि राम ॥
भगवान की भक्ति में जाग्रत रहो,इधर उधर मर डोलो।

ਨਾਨਕ ਜਿਨਿ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਆ ਆਪਣਾ ਸਾ ਅਟਲ ਸੁਹਾਗਨਿ ਰਾਮ ॥੪॥੧॥੪॥
नानक जिनि प्रभु पाइआ आपणा सा अटल सुहागनि राम ॥४॥१॥४॥
है नानक जिन्होंने अपना प्रभु पा लिया है, वही अटल सुहागिन बन गई ॥४॥१॥४॥

ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥

ਹਰਿ ਖੋਜਹੁ ਵਡਭਾਗੀਹੋ ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਸੰਗੇ ਰਾਮ ॥
हरि खोजहु वडभागीहो मिलि साधू संगे राम ॥
हे भाग्यशालियो ! साधुओं के संग मिलकर भगवान की खोज करो।

ਗੁਨ ਗੋਵਿਦ ਸਦ ਗਾਈਅਹਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੈ ਰੰਗੇ ਰਾਮ ॥
गुन गोविद सद गाईअहि पारब्रहम कै रंगे राम ॥
परब्रह के रंग में तल्लीन होकर सदैव उसका गुणगान करो।

ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਦ ਹੀ ਸੇਵੀਐ ਪਾਈਅਹਿ ਫਲ ਮੰਗੇ ਰਾਮ ॥
सो प्रभु सद ही सेवीऐ पाईअहि फल मंगे राम ॥
सो ऐसे प्रभु की सदा ही उपासना करनी चाहिए, जिससे मनोवांछित फल मिल जाते हैं।

ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਗਤੀ ਜਪਿ ਅਨਤ ਤਰੰਗੇ ਰਾਮ ॥੧॥
नानक प्रभ सरणागती जपि अनत तरंगे राम ॥१॥
हे नानक ! प्रभु की शरण में आकर उसका ही जाप करो, जो जीवन रूपी अनंत लहरें खेल रहा है।१॥

ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਪ੍ਰਭੂ ਨ ਵੀਸਰੈ ਜਿਨਿ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਦੀਨਾ ਰਾਮ ॥
इकु तिलु प्रभू न वीसरै जिनि सभु किछु दीना राम ॥
जिसने मुझे सबकुछ दिया है, वह प्रभु मुझे एक पल मात्र समय के लिए भी नहीं भूलता।

ਵਡਭਾਗੀ ਮੇਲਾਵੜਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਿਰੁ ਚੀਨੑਾ ਰਾਮ ॥
वडभागी मेलावड़ा गुरमुखि पिरु चीन्हा राम ॥
बड़े भाग्य से मेरा उससे मिलाप हुआ है, गुरु के माध्यम से मैंने अपने प्रभु को पहचान लिया है।

ਬਾਹ ਪਕੜਿ ਤਮ ਤੇ ਕਾਢਿਆ ਕਰਿ ਅਪੁਨਾ ਲੀਨਾ ਰਾਮ ॥
बाह पकड़ि तम ते काढिआ करि अपुना लीना राम ॥
उसने बाँह पकड़ कर मुझे अज्ञानता के अंधेरे से निकालकर अपना बना लिया है।

ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਨਾਨਕ ਜੀਵੈ ਸੀਤਲੁ ਮਨੁ ਸੀਨਾ ਰਾਮ ॥੨॥
नामु जपत नानक जीवै सीतलु मनु सीना राम ॥२॥
हे नानक ! उसका नाम जपकर ही जीवन पा रहा हूँ और मेरा मन एवं हृदय शीतल हो गया है॥ २॥

ਕਿਆ ਗੁਣ ਤੇਰੇ ਕਹਿ ਸਕਉ ਪ੍ਰਭ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਰਾਮ ॥
किआ गुण तेरे कहि सकउ प्रभ अंतरजामी राम ॥
हे अन्तर्यामी प्रभु! मैं भला तेरे गुणों का क्या कथन कर सकता हूँ।

ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਨਾਰਾਇਣੈ ਭਏ ਪਾਰਗਰਾਮੀ ਰਾਮ ॥
सिमरि सिमरि नाराइणै भए पारगरामी राम ॥
उस नारायण का सिमरन करके भवसागर से पार हो गया हूँ।

ਗੁਨ ਗਾਵਤ ਗੋਵਿੰਦ ਕੇ ਸਭ ਇਛ ਪੁਜਾਮੀ ਰਾਮ ॥
गुन गावत गोविंद के सभ इछ पुजामी राम ॥
गोविन्द का गुणगान करने से मेरी सब कामनाएँ पूरी हो गई हैं।

ਨਾਨਕ ਉਧਰੇ ਜਪਿ ਹਰੇ ਸਭਹੂ ਕਾ ਸੁਆਮੀ ਰਾਮ ॥੩॥
नानक उधरे जपि हरे सभहू का सुआमी राम ॥३॥
हे नानक ! जो सबका स्वामी है, उस हरि का जाप करने से उद्धार हो गया है॥ ३॥

ਰਸ ਭਿੰਨਿਅੜੇ ਅਪੁਨੇ ਰਾਮ ਸੰਗੇ ਸੇ ਲੋਇਣ ਨੀਕੇ ਰਾਮ ॥
रस भिंनिअड़े अपुने राम संगे से लोइण नीके राम ॥
वे नेत्र शुभ हैं, जो अपने राम के नाम-रस से भीगे रहते हैं।

ਪ੍ਰਭ ਪੇਖਤ ਇਛਾ ਪੁੰਨੀਆ ਮਿਲਿ ਸਾਜਨ ਜੀ ਕੇ ਰਾਮ ॥
प्रभ पेखत इछा पुंनीआ मिलि साजन जी के राम ॥
साजन प्रभु को मिलकर उसके दर्शन करके मेरी सब इच्छाएँ पूरी हो गई हैं।

ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ਬਿਖਿਆ ਰਸ ਫੀਕੇ ਰਾਮ ॥
अम्रित रसु हरि पाइआ बिखिआ रस फीके राम ॥
मैंने हरि का अमृत-रस पा लिया है, जिससे माया रूपी विष के स्वाद फीके हो गए हैं।

ਨਾਨਕ ਜਲੁ ਜਲਹਿ ਸਮਾਇਆ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮੀਕੇ ਰਾਮ ॥੪॥੨॥੫॥੯॥
नानक जलु जलहि समाइआ जोती जोति मीके राम ॥४॥२॥५॥९॥
हे नानक ! जैसे जल जल में मिल गया है, वैसे ही आत्मज्योति परम-ज्योति में विलीन होकर एक हो गई है।॥४॥२॥५॥९॥

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