ਮੋਹ ਪਸਾਰ ਨਹੀ ਸੰਗਿ ਬੇਲੀ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਗੁਰ ਕਿਨਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥
मोह पसार नही संगि बेली बिनु हरि गुर किनि सुखु पाइआ ॥४॥
समूचे जगत् में मोह ही फैला हुआ है और कोई किसी का साथी एवं शुभचिन्तक नहीं, फिर गुरु परमेश्वर के बिना किसने सुख हासिल किया है॥ ४॥
ਜਿਸ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥
जिस कउ नदरि करे गुरु पूरा ॥
पूर्ण गुरु जिस पर कृपा-दृष्टि करता है,
ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਏ ਗੁਰਮਤਿ ਸੂਰਾ ॥
सबदि मिलाए गुरमति सूरा ॥
वह शूरवीर गुरुमत द्वारा शब्द से मिला देता है।
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਨ ਸਰੇਵਹੁ ਜਿਨਿ ਭੂਲਾ ਮਾਰਗਿ ਪਾਇਆ ॥੫॥
नानक गुर के चरन सरेवहु जिनि भूला मारगि पाइआ ॥५॥
हे नानक ! गुरु-चरणों की अर्चना करो, जिसने भूले हुए जीव को सन्मार्ग लगा दिया है॥ ५॥
ਸੰਤ ਜਨਾਂ ਹਰਿ ਧਨੁ ਜਸੁ ਪਿਆਰਾ ॥
संत जनां हरि धनु जसु पिआरा ॥
संतजनों को हरि-यश रूपी धन प्राणों से भी प्रिय है।
ਗੁਰਮਤਿ ਪਾਇਆ ਨਾਮੁ ਤੁਮਾਰਾ ॥
गुरमति पाइआ नामु तुमारा ॥
हे परमात्मा ! गुरु-उपदेशानुसार तुम्हारा नाम ही प्राप्त किया है।
ਜਾਚਿਕੁ ਸੇਵ ਕਰੇ ਦਰਿ ਹਰਿ ਕੈ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਜਸੁ ਗਾਇਆ ॥੬॥
जाचिकु सेव करे दरि हरि कै हरि दरगह जसु गाइआ ॥६॥
याचक हरि के दर पर उपासना करता है और उसने दरबार में प्रभु का ही यशोगान किया है।॥६॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਮਹਲਿ ਬੁਲਾਏ ॥
सतिगुरु मिलै त महलि बुलाए ॥
जिसे सतगुरु मिल जाता है, परमात्मा उसे अपने महल में बुला लेता है।
ਸਾਚੀ ਦਰਗਹ ਗਤਿ ਪਤਿ ਪਾਏ ॥
साची दरगह गति पति पाए ॥
उसे सच्चे दरबार में ही मुक्ति एवं शोभा प्राप्त होती है।
ਸਾਕਤ ਠਉਰ ਨਾਹੀ ਹਰਿ ਮੰਦਰ ਜਨਮ ਮਰੈ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੭॥
साकत ठउर नाही हरि मंदर जनम मरै दुखु पाइआ ॥७॥
पदार्थवादी जीव को हरि के मन्दिर में ठिकाना नहीं मिलता और वह जन्म-मरण में ही दुख भोगता है॥ ७॥
ਸੇਵਹੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸਮੁੰਦੁ ਅਥਾਹਾ ॥
सेवहु सतिगुर समुंदु अथाहा ॥
सतगुरु की सेवा करो, वह तो प्रेम का अथाह समुद्र है और
ਪਾਵਹੁ ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਧਨੁ ਲਾਹਾ ॥
पावहु नामु रतनु धनु लाहा ॥
उससे नाम-रत्न रूपी धन पाकरलाभ प्राप्त करो।
ਬਿਖਿਆ ਮਲੁ ਜਾਇ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰਿ ਨਾਵਹੁ ਗੁਰ ਸਰ ਸੰਤੋਖੁ ਪਾਇਆ ॥੮॥
बिखिआ मलु जाइ अम्रित सरि नावहु गुर सर संतोखु पाइआ ॥८॥
नामामृत के सरोवर में स्नान करने से विषय-विकारों की मैल दूर हो जाती है और गुरु रूपी सरोवर में ही संतोष प्राप्त होता है॥ ८॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਹੁ ਸੰਕ ਨ ਕੀਜੈ ॥
सतिगुर सेवहु संक न कीजै ॥
सतगुरु की सेवा करो; कोई संकोच मत करो और
ਆਸਾ ਮਾਹਿ ਨਿਰਾਸੁ ਰਹੀਜੈ ॥
आसा माहि निरासु रहीजै ॥
आशा (भरे जीवन) में रहते हुए आशाहीन रहो।
ਸੰਸਾ ਦੂਖ ਬਿਨਾਸਨੁ ਸੇਵਹੁ ਫਿਰਿ ਬਾਹੁੜਿ ਰੋਗੁ ਨ ਲਾਇਆ ॥੯॥
संसा दूख बिनासनु सेवहु फिरि बाहुड़ि रोगु न लाइआ ॥९॥
संशय एवं दुख विनाशक परमात्मा की उपासना करो; इससे पुनः कोई रोग नहीं लग सकता॥ ९॥
ਸਾਚੇ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਵਡੀਆਏ ॥
साचे भावै तिसु वडीआए ॥
यदि सत्यस्वरूप को मंजूर हो तो उसे ही यश प्रदान करता है।
ਕਉਨੁ ਸੁ ਦੂਜਾ ਤਿਸੁ ਸਮਝਾਏ ॥
कउनु सु दूजा तिसु समझाए ॥
अन्य कोई इस लायक नहीं जो उसे समझा सकता है।
ਹਰਿ ਗੁਰ ਮੂਰਤਿ ਏਕਾ ਵਰਤੈ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਰ ਭਾਇਆ ॥੧੦॥
हरि गुर मूरति एका वरतै नानक हरि गुर भाइआ ॥१०॥
परमात्मा एवं गुरु एक ही रूप हैं और एकमात्र वही सर्वव्यापक है, हे नानक ! गुरु परमेश्वर ही मन को भाया है॥ १०॥
ਵਾਚਹਿ ਪੁਸਤਕ ਵੇਦ ਪੁਰਾਨਾਂ ॥
वाचहि पुसतक वेद पुरानां ॥
पण्डित वेद-पुराण को पढ़ते हैं,
ਇਕ ਬਹਿ ਸੁਨਹਿ ਸੁਨਾਵਹਿ ਕਾਨਾਂ ॥
इक बहि सुनहि सुनावहि कानां ॥
कुछ बैठकर कानों से सुनते सुनाते हैं।
ਅਜਗਰ ਕਪਟੁ ਕਹਹੁ ਕਿਉ ਖੁਲ੍ਹ੍ਹੈ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਤਤੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥੧੧॥
अजगर कपटु कहहु किउ खुल्है बिनु सतिगुर ततु न पाइआ ॥११॥
बताओ, अजगर जैसा कठोर कपाट कैसे खुल सकता है और गुरु के बिना परम तत्व प्राप्त नहीं होता।॥ ११॥
ਕਰਹਿ ਬਿਭੂਤਿ ਲਗਾਵਹਿ ਭਸਮੈ ॥
करहि बिभूति लगावहि भसमै ॥
कुछ व्यक्ति शरीर पर भस्म लगाते और विभूति करते हैं परन्तु
ਅੰਤਰਿ ਕ੍ਰੋਧੁ ਚੰਡਾਲੁ ਸੁ ਹਉਮੈ ॥
अंतरि क्रोधु चंडालु सु हउमै ॥
उनके मन में चाण्डाल रूप क्रोध एवं अहम् ही रहता है।
ਪਾਖੰਡ ਕੀਨੇ ਜੋਗੁ ਨ ਪਾਈਐ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਅਲਖੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥੧੨॥
पाखंड कीने जोगु न पाईऐ बिनु सतिगुर अलखु न पाइआ ॥१२॥
ऐसा पाखंड करने से योग प्राप्त नहीं होता और न ही गुरु के बिना प्रभु प्राप्त होता है। १२॥
ਤੀਰਥ ਵਰਤ ਨੇਮ ਕਰਹਿ ਉਦਿਆਨਾ ॥
तीरथ वरत नेम करहि उदिआना ॥
कई मनुष्य तीर्थ-स्नान, व्रत-उपवास, नेम का पालन करते हैं और वनों में भी रहते हैं।
ਜਤੁ ਸਤੁ ਸੰਜਮੁ ਕਥਹਿ ਗਿਆਨਾ ॥
जतु सतु संजमु कथहि गिआना ॥
कई ब्रह्मचार्य, त्याग, संयम एवं ज्ञान की बातें करते हैं।
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭਰਮੁ ਨ ਜਾਇਆ ॥੧੩॥
राम नाम बिनु किउ सुखु पाईऐ बिनु सतिगुर भरमु न जाइआ ॥१३॥
लेकिन राम नाम के बिना क्योंकर सुख प्राप्त हो सकता है, गुरु के बिना भ्रम दूर नहीं होता॥ १३॥
ਨਿਉਲੀ ਕਰਮ ਭੁਇਅੰਗਮ ਭਾਠੀ ॥
निउली करम भुइअंगम भाठी ॥
कोई न्योली कर्म करता है, कोई कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करता,
ਰੇਚਕ ਕੁੰਭਕ ਪੂਰਕ ਮਨ ਹਾਠੀ ॥
रेचक कु्मभक पूरक मन हाठी ॥
कोई मन के हठ से प्राणायाम की रेचक, पूरक, कुम्भक क्रियाओं का अभ्यास करता है।
ਪਾਖੰਡ ਧਰਮੁ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨਹੀ ਹਰਿ ਸਉ ਗੁਰ ਸਬਦ ਮਹਾ ਰਸੁ ਪਾਇਆ ॥੧੪॥
पाखंड धरमु प्रीति नही हरि सउ गुर सबद महा रसु पाइआ ॥१४॥
ये सभी धर्म कर्म निरा पाखण्ड ही हैं और इससे परमात्मा से प्रेम उत्पन्न नहीं होता, अपितु गुरु के शब्द से ही नाम के महारस को पाया जा सकता है॥ १४॥
ਕੁਦਰਤਿ ਦੇਖਿ ਰਹੇ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
कुदरति देखि रहे मनु मानिआ ॥
उसकी कुदरत को देखकर मन संतुष्ट हो जाता है,
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਭੁ ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਨਿਆ ॥
गुर सबदी सभु ब्रहमु पछानिआ ॥
गुरु के शब्द द्वारा सबमें व्याप्त ब्रह्म की पहचान होती है।
ਨਾਨਕ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਸਬਾਇਆ ਗੁਰ ਸਤਿਗੁਰ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਆ ॥੧੫॥੫॥੨੨॥
नानक आतम रामु सबाइआ गुर सतिगुर अलखु लखाइआ ॥१५॥५॥२२॥
हे नानक ! सतगुरु ही आत्मा में व्याप्त अदृष्ट प्रभु के दर्शन करवाने वाला है॥ १५॥ ५॥ २२॥
ਮਾਰੂ ਸੋਲਹੇ ਮਹਲਾ ੩
मारू सोलहे महला ३
मारू सोलहे महला ३
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਹੁਕਮੀ ਸਹਜੇ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਈ ॥
हुकमी सहजे स्रिसटि उपाई ॥
ईश्वर ने अपने हुक्म में स्वाभाविक ही सृष्टि को उत्पन्न किया और
ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਅਪਣੀ ਵਡਿਆਈ ॥
करि करि वेखै अपणी वडिआई ॥
रचना कर-करके खुद ही अपनी कीर्ति को देख रहा है।
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਆਪੇ ਹੁਕਮੇ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੧॥
आपे करे कराए आपे हुकमे रहिआ समाई हे ॥१॥
करता करवाता वही है और अपने हुक्म में ही लीन है॥ १॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਜਗਤੁ ਗੁਬਾਰਾ ॥
माइआ मोहु जगतु गुबारा ॥
मोह-माया का अन्धेरा समूचे जगत् में फैला हुआ है परन्तु
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਕੋ ਵੀਚਾਰਾ ॥
गुरमुखि बूझै को वीचारा ॥
कोई विरला गुरमुख ही तथ्य को बूझता हैं।
ਆਪੇ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸੋ ਪਾਏ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੨॥
आपे नदरि करे सो पाए आपे मेलि मिलाई हे ॥२॥
जिस पर ईश्वर अपनी कृपा-दृष्टि करता है, वही उसे पा लेता है और वह स्वयं ही साथ मिला लेता है ॥२॥