ਨਲੵ ਕਵਿ ਪਾਰਸ ਪਰਸ ਕਚ ਕੰਚਨਾ ਹੁਇ ਚੰਦਨਾ ਸੁਬਾਸੁ ਜਾਸੁ ਸਿਮਰਤ ਅਨ ਤਰ ॥
नल्य कवि पारस परस कच कंचना हुइ चंदना सुबासु जासु सिमरत अन तर ॥
कवि नल्ह का कथन है कि गुरु रामदास रूपी पारस के स्पर्श से कंचन सरीखा हो गया हूँ, ज्यों चंदन की खुशबू से अन्य पेड़-पौधे खुशबूदार हो जाते हैं।
ਜਾ ਕੇ ਦੇਖਤ ਦੁਆਰੇ ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਹੀ ਨਿਵਾਰੇ ਜੀ ਹਉ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਉ ਸਤਿਗੁਰ ਸਾਚੇ ਨਾਮ ਪਰ ॥੩॥
जा के देखत दुआरे काम क्रोध ही निवारे जी हउ बलि बलि जाउ सतिगुर साचे नाम पर ॥३॥
जिसके दर्शनों से काम-क्रोध का निवारण हो जाता है, उस सतिगुरु रामदास के सच्चे नाम पर मैं हरदम बलिहारी जाता हूँ॥३॥
ਰਾਜੁ ਜੋਗੁ ਤਖਤੁ ਦੀਅਨੁ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ॥
राजु जोगु तखतु दीअनु गुर रामदास ॥
गुरु रामदास जी को (तीसरे गुरु अमरदास जी ने) राज योग (अर्थात् गुरुगद्वी) के सिंहासन पर स्थापित किया।
ਪ੍ਰਥਮੇ ਨਾਨਕ ਚੰਦੁ ਜਗਤ ਭਯੋ ਆਨੰਦੁ ਤਾਰਨਿ ਮਨੁਖੵ ਜਨ ਕੀਅਉ ਪ੍ਰਗਾਸ ॥
प्रथमे नानक चंदु जगत भयो आनंदु तारनि मनुख्य जन कीअउ प्रगास ॥
सर्वप्रथम चन्द्रमा के रूप में गुरु नानक देव जी संसार में प्रगट हुए, उनके आगमन से संसार को आनंद प्राप्त हुआ, मनुष्यों को संसार के बन्धनों से मुक्त करने के लिए उन्होंने हरिनाम का प्रकाश किया।
ਗੁਰ ਅੰਗਦ ਦੀਅਉ ਨਿਧਾਨੁ ਅਕਥ ਕਥਾ ਗਿਆਨੁ ਪੰਚ ਭੂਤ ਬਸਿ ਕੀਨੇ ਜਮਤ ਨ ਤ੍ਰਾਸ ॥
गुर अंगद दीअउ निधानु अकथ कथा गिआनु पंच भूत बसि कीने जमत न त्रास ॥
तदन्तर गुरु अंगद देव जी को सुखनिधान नाम प्रदान किया, जिन्होंने प्रभु की अकथ कथा का ज्ञान प्रदान किया, उन्होंने पाँच विकारों को वश में किया और मौत भी उनको डरा न सकी।
ਗੁਰ ਅਮਰੁ ਗੁਰੂ ਸ੍ਰੀ ਸਤਿ ਕਲਿਜੁਗਿ ਰਾਖੀ ਪਤਿ ਅਘਨ ਦੇਖਤ ਗਤੁ ਚਰਨ ਕਵਲ ਜਾਸ ॥
गुर अमरु गुरू स्री सति कलिजुगि राखी पति अघन देखत गतु चरन कवल जास ॥
फिर श्री गुरु अमरदास ने महामहिम परम सत्य ईश्वर की सत्ता को स्वीकार किया, कलियुग में जीवों की लाज बचाई। उनके दर्शन एवं चरण-कमल के स्पर्श से शिष्यों के पाप दूर हुए।
ਸਭ ਬਿਧਿ ਮਾਨੵਿਉ ਮਨੁ ਤਬ ਹੀ ਭਯਉ ਪ੍ਰਸੰਨੁ ਰਾਜੁ ਜੋਗੁ ਤਖਤੁ ਦੀਅਨੁ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ॥੪॥
सभ बिधि मान्यिउ मनु तब ही भयउ प्रसंनु राजु जोगु तखतु दीअनु गुर रामदास ॥४॥
उसके बाद उन्होंने अपने शिष्य भाई जेठा को सब प्रकार से ज्ञान, भक्ति, सेवा के योग्य माना तो उनका मन बहुत प्रसन्न हुआ, श्री गुरु अमरदास जी ने (गुरु नानक की गद्दी) राज-योग के सिंहासन पर गुरु रामदास जी को आसीन कर दिया ॥४॥
ਰਡ ॥
रड ॥
रड ॥
ਜਿਸਹਿ ਧਾਰੵਿਉ ਧਰਤਿ ਅਰੁ ਵਿਉਮੁ ਅਰੁ ਪਵਣੁ ਤੇ ਨੀਰ ਸਰ ਅਵਰ ਅਨਲ ਅਨਾਦਿ ਕੀਅਉ ॥
जिसहि धारि्यउ धरति अरु विउमु अरु पवणु ते नीर सर अवर अनल अनादि कीअउ ॥
जिस परमपिता परमेश्वर ने धरती और आकाश को धारण किया, वायु, पानी, सरोवर, अग्नि एवं अन्न-भोजन इत्यादि को उत्पन्न किया है,
ਸਸਿ ਰਿਖਿ ਨਿਸਿ ਸੂਰ ਦਿਨਿ ਸੈਲ ਤਰੂਅ ਫਲ ਫੁਲ ਦੀਅਉ ॥
ससि रिखि निसि सूर दिनि सैल तरूअ फल फुल दीअउ ॥
रात को दिखाई देने वाले चन्द्रमा एवं तारे बनाए, दिन में निकलने वाला सूर्य, पहाड़ों की रचना की, पेड़-पौधे, फल-फूल दिए हैं।
ਸੁਰਿ ਨਰ ਸਪਤ ਸਮੁਦ੍ਰ ਕਿਅ ਧਾਰਿਓ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਜਾਸੁ ॥
सुरि नर सपत समुद्र किअ धारिओ त्रिभवण जासु ॥
देवता, मनुष्य, सात समुद्रों की सृजना करके तीन लोकों को जिस प्रभु ने धारण किया हुआ है।
ਸੋਈ ਏਕੁ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਤਿ ਪਾਇਓ ਗੁਰ ਅਮਰ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ॥੧॥੫॥
सोई एकु नामु हरि नामु सति पाइओ गुर अमर प्रगासु ॥१॥५॥
वह परम सत्य अद्वितीय हरिनाम गुरु रामदास ने अपने सच्चे गुरु अमरदास से प्राप्त किया ॥ १॥ ५ ॥
ਕਚਹੁ ਕੰਚਨੁ ਭਇਅਉ ਸਬਦੁ ਗੁਰ ਸ੍ਰਵਣਹਿ ਸੁਣਿਓ ॥
कचहु कंचनु भइअउ सबदु गुर स्रवणहि सुणिओ ॥
जिसने गुरु का वचन कानों से सुना है, वह काँच से स्वर्ण हो गया है।
ਬਿਖੁ ਤੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹੁਯਉ ਨਾਮੁ ਸਤਿਗੁਰ ਮੁਖਿ ਭਣਿਅਉ ॥
बिखु ते अम्रितु हुयउ नामु सतिगुर मुखि भणिअउ ॥
जिसने अपने मुँह से सतिगुरु का नाम उच्चारण किया है, वह जहर से अमृत हो गया है।
ਲੋਹਉ ਹੋਯਉ ਲਾਲੁ ਨਦਰਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਜਦਿ ਧਾਰੈ ॥
लोहउ होयउ लालु नदरि सतिगुरु जदि धारै ॥
जब सतिगुरु की कृपा-दृष्टि होती है तो लोहे सरीखा व्यक्ति भी लाल समान गुणवान् हो जाता है।
ਪਾਹਣ ਮਾਣਕ ਕਰੈ ਗਿਆਨੁ ਗੁਰ ਕਹਿਅਉ ਬੀਚਾਰੈ ॥
पाहण माणक करै गिआनु गुर कहिअउ बीचारै ॥
गुरु के ज्ञान का चिंतन करने से पत्थर सरीखा व्यक्ति अमूल्य मोती बन जाता है।
ਕਾਠਹੁ ਸ੍ਰੀਖੰਡ ਸਤਿਗੁਰਿ ਕੀਅਉ ਦੁਖ ਦਰਿਦ੍ਰ ਤਿਨ ਕੇ ਗਇਅ ॥
काठहु स्रीखंड सतिगुरि कीअउ दुख दरिद्र तिन के गइअ ॥
सतिगुरु के चरण स्पर्श से लकड़ी चन्दन हो जाती है और दुख-दर्द सब दूर हो जाते हैं।
ਸਤਿਗੁਰੂ ਚਰਨ ਜਿਨੑ ਪਰਸਿਆ ਸੇ ਪਸੁ ਪਰੇਤ ਸੁਰਿ ਨਰ ਭਇਅ ॥੨॥੬॥
सतिगुरू चरन जिन्ह परसिआ से पसु परेत सुरि नर भइअ ॥२॥६॥
जिन्होंने सतिगुरु रामदास का चरण-स्पर्श किया है, वे पशु प्रेत से देवता समान भले मनुष्य हो गए हैं।॥२॥६॥
ਜਾਮਿ ਗੁਰੂ ਹੋਇ ਵਲਿ ਧਨਹਿ ਕਿਆ ਗਾਰਵੁ ਦਿਜਇ ॥
जामि गुरू होइ वलि धनहि किआ गारवु दिजइ ॥
जब गुरु सहाई हो जाए तो व्यक्ति धन-दौलत के बावजूद अभिमान नहीं करता।
ਜਾਮਿ ਗੁਰੂ ਹੋਇ ਵਲਿ ਲਖ ਬਾਹੇ ਕਿਆ ਕਿਜਇ ॥
जामि गुरू होइ वलि लख बाहे किआ किजइ ॥
जब गुरु सहायक बन जाता है तो लाखों लोग भी बुरा नहीं कर पाते।
ਜਾਮਿ ਗੁਰੂ ਹੋਇ ਵਲਿ ਗਿਆਨ ਅਰੁ ਧਿਆਨ ਅਨਨ ਪਰਿ ॥
जामि गुरू होइ वलि गिआन अरु धिआन अनन परि ॥
जब गुरु साथ हो तो ज्ञान और ध्यान पाकर जीव प्रभु के सिवा किसी को नहीं मानता।
ਜਾਮਿ ਗੁਰੂ ਹੋਇ ਵਲਿ ਸਬਦੁ ਸਾਖੀ ਸੁ ਸਚਹ ਘਰਿ ॥
जामि गुरू होइ वलि सबदु साखी सु सचह घरि ॥
जब गुरु साथ हो जाता है तो जिज्ञासु को शब्द-गुरु का दर्शन होता है और वह सच्चे घर में टिक जाता है।
ਜੋ ਗੁਰੂ ਗੁਰੂ ਅਹਿਨਿਸਿ ਜਪੈ ਦਾਸੁ ਭਟੁ ਬੇਨਤਿ ਕਹੈ ॥
जो गुरू गुरू अहिनिसि जपै दासु भटु बेनति कहै ॥
दास नल्ह भाट विनती करता है कि जो व्यक्ति दिन-रात गुरु का नाम जपता है,
ਜੋ ਗੁਰੂ ਨਾਮੁ ਰਿਦ ਮਹਿ ਧਰੈ ਸੋ ਜਨਮ ਮਰਣ ਦੁਹ ਥੇ ਰਹੈ ॥੩॥੭॥
जो गुरू नामु रिद महि धरै सो जनम मरण दुह थे रहै ॥३॥७॥
जो गुरु (रामदास) के नाम को हृदय में धारण करता है, वह जन्म-मरण दोनों से मुक्त हो जाता है।॥ ३ ॥ ७ ॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਘੋਰੁ ਅੰਧਾਰੁ ਗੁਰੂ ਬਿਨੁ ਸਮਝ ਨ ਆਵੈ ॥
गुर बिनु घोरु अंधारु गुरू बिनु समझ न आवै ॥
गुरु के बिना दुनिया में अज्ञान का अन्धेरा ही अन्धेरा है, गुरु के बिना समझ नहीं आती।
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਸੁਰਤਿ ਨ ਸਿਧਿ ਗੁਰੂ ਬਿਨੁ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਵੈ ॥
गुर बिनु सुरति न सिधि गुरू बिनु मुकति न पावै ॥
गुरु बिना ज्ञान, सफलता एवं मुक्ति भी प्राप्त नहीं होती।
ਗੁਰੁ ਕਰੁ ਸਚੁ ਬੀਚਾਰੁ ਗੁਰੂ ਕਰੁ ਰੇ ਮਨ ਮੇਰੇ ॥
गुरु करु सचु बीचारु गुरू करु रे मन मेरे ॥
हे मेरे मन ! सच्ची बात यही है कि गुरु का यशोगान करो, उसी का नामोच्चारण करो।
ਗੁਰੁ ਕਰੁ ਸਬਦ ਸਪੁੰਨ ਅਘਨ ਕਟਹਿ ਸਭ ਤੇਰੇ ॥
गुरु करु सबद सपुंन अघन कटहि सभ तेरे ॥
गुरु का शब्द जीवन सम्पन्न करने वाला है, वह तेरे सब पाप-दोष काटने वाला है।
ਗੁਰੁ ਨਯਣਿ ਬਯਣਿ ਗੁਰੁ ਗੁਰੁ ਕਰਹੁ ਗੁਰੂ ਸਤਿ ਕਵਿ ਨਲੵ ਕਹਿ ॥
गुरु नयणि बयणि गुरु गुरु करहु गुरू सति कवि नल्य कहि ॥
गुरु को आँखों में बसाओ, गुरु का नामोच्चारण करो, गुरु की स्तुति करो, कवि नल्ह का कथन है कि गुरु ही सत्य है।
ਜਿਨਿ ਗੁਰੂ ਨ ਦੇਖਿਅਉ ਨਹੁ ਕੀਅਉ ਤੇ ਅਕਯਥ ਸੰਸਾਰ ਮਹਿ ॥੪॥੮॥
जिनि गुरू न देखिअउ नहु कीअउ ते अकयथ संसार महि ॥४॥८॥
जिसने गुरु के दर्शन नहीं किए, न ही शरण ली, उस अभागे का संसार में जन्म व्यर्थ हो रहा ॥४॥८ ॥
ਗੁਰੂ ਗੁਰੂ ਗੁਰੁ ਕਰੁ ਮਨ ਮੇਰੇ ॥
गुरू गुरू गुरु करु मन मेरे ॥
हे मेरे मन ! गुरु (रामदास) का स्तुतिगान करो,