Hindi Page 1325

ਮਹਾ ਅਭਾਗ ਅਭਾਗ ਹੈ ਜਿਨ ਕੇ ਤਿਨ ਸਾਧੂ ਧੂਰਿ ਨ ਪੀਜੈ ॥
महा अभाग अभाग है जिन के तिन साधू धूरि न पीजै ॥
जो महा बदनसीब होते हैं, उनको साधुओं की चरण-धूल नहीं मिलती।

ਤਿਨਾ ਤਿਸਨਾ ਜਲਤ ਜਲਤ ਨਹੀ ਬੂਝਹਿ ਡੰਡੁ ਧਰਮ ਰਾਇ ਕਾ ਦੀਜੈ ॥੬॥
तिना तिसना जलत जलत नही बूझहि डंडु धरम राइ का दीजै ॥६॥
वे तृष्णाग्नि में जलते रहते हैं, उनकी तृष्णाग्नि नहीं बुझती और वे यमराज से दण्ड के भागीदार बनते हैं।॥ ६॥

ਸਭਿ ਤੀਰਥ ਬਰਤ ਜਗੵ ਪੁੰਨ ਕੀਏ ਹਿਵੈ ਗਾਲਿ ਗਾਲਿ ਤਨੁ ਛੀਜੈ ॥
सभि तीरथ बरत जग्य पुंन कीए हिवै गालि गालि तनु छीजै ॥
लोग तीर्थ यात्रा करते हैं, व्रत-उपवास रखते हैं, यज्ञ करवाते हैं एवं दान-पुण्य करते हैं, बर्फ में शरीर को गला-गला कर कष्ट पहुँचाते हैं,

ਅਤੁਲਾ ਤੋਲੁ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਹੈ ਗੁਰਮਤਿ ਕੋ ਪੁਜੈ ਨ ਤੋਲ ਤੁਲੀਜੈ ॥੭॥
अतुला तोलु राम नामु है गुरमति को पुजै न तोल तुलीजै ॥७॥
परमात्मा का नाम अतुलनीय है, ये कर्म-धर्म गुरु की शिक्षा की बराबरी नहीं कर सकते और न ही इनकी नाम से तुलना हो सकती है॥ ७॥

ਤਵ ਗੁਨ ਬ੍ਰਹਮ ਬ੍ਰਹਮ ਤੂ ਜਾਨਹਿ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਰਨਿ ਪਰੀਜੈ ॥
तव गुन ब्रहम ब्रहम तू जानहि जन नानक सरनि परीजै ॥
हे ब्रह्म ! तेरे गुण अपार हैं, तू ही जानता है। दास नानक तेरी शरण में पड़ा है।

ਤੂ ਜਲ ਨਿਧਿ ਮੀਨ ਹਮ ਤੇਰੇ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਸੰਗਿ ਰਖੀਜੈ ॥੮॥੩॥
तू जल निधि मीन हम तेरे करि किरपा संगि रखीजै ॥८॥३॥
तू सागर है, हम तुम्हारी मछलियां हैं, कृपा करके अपने साथ ही रखो॥ ८॥ ३॥

ਕਲਿਆਨ ਮਹਲਾ ੪ ॥
कलिआन महला ४ ॥
कलिआन महला ४ ॥

ਰਾਮਾ ਰਮ ਰਾਮੋ ਪੂਜ ਕਰੀਜੈ ॥
रामा रम रामो पूज करीजै ॥
हे सज्जनो ! राम हर जगह पर विद्यमान है, राम की ही अर्चना करो।

ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਰਪਿ ਧਰਉ ਸਭੁ ਆਗੈ ਰਸੁ ਗੁਰਮਤਿ ਗਿਆਨੁ ਦ੍ਰਿੜੀਜੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
मनु तनु अरपि धरउ सभु आगै रसु गुरमति गिआनु द्रिड़ीजै ॥१॥ रहाउ ॥
मन, तन सर्वस्व उसके आगे अर्पण कर दो, गुरु-उपदेशानुसार ज्ञान दृढ़ करो॥ १॥रहाउ॥

ਬ੍ਰਹਮ ਨਾਮ ਗੁਣ ਸਾਖ ਤਰੋਵਰ ਨਿਤ ਚੁਨਿ ਚੁਨਿ ਪੂਜ ਕਰੀਜੈ ॥
ब्रहम नाम गुण साख तरोवर नित चुनि चुनि पूज करीजै ॥
ब्रह्म नाम एक ऐसा वृक्ष है, जिसके अपार गुण शाखाएँ हैं, नित्य उसकी अर्चना करो।

ਆਤਮ ਦੇਉ ਦੇਉ ਹੈ ਆਤਮੁ ਰਸਿ ਲਾਗੈ ਪੂਜ ਕਰੀਜੈ ॥੧॥
आतम देउ देउ है आतमु रसि लागै पूज करीजै ॥१॥
आत्मा पूज्य देव है और पूज्य देव ही आत्मा है, प्रेम से इसकी अर्चना करो॥ १॥

ਬਿਬੇਕ ਬੁਧਿ ਸਭ ਜਗ ਮਹਿ ਨਿਰਮਲ ਬਿਚਰਿ ਬਿਚਰਿ ਰਸੁ ਪੀਜੈ ॥
बिबेक बुधि सभ जग महि निरमल बिचरि बिचरि रसु पीजै ॥
विवेक बुद्धि समूचे जगत में निर्मल है, चिंतन करके नाम रस पान करो।

ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਇਆ ਸਤਿਗੁਰ ਕਉ ਇਹੁ ਮਨੁ ਦੀਜੈ ॥੨॥
गुर परसादि पदारथु पाइआ सतिगुर कउ इहु मनु दीजै ॥२॥
गुरु की कृपा से नाम पदार्थ प्राप्त हुआ है, यह मन सतगुरु को न्यौछावर कर दो॥ २॥

ਨਿਰਮੋਲਕੁ ਅਤਿ ਹੀਰੋ ਨੀਕੋ ਹੀਰੈ ਹੀਰੁ ਬਿਧੀਜੈ ॥
निरमोलकु अति हीरो नीको हीरै हीरु बिधीजै ॥
प्रभु नाम रूपी हीरा अमूल्य एवं सर्वोत्तम है, मन रूपी हीरे को नाम हीरे से बिंध लो।

ਮਨੁ ਮੋਤੀ ਸਾਲੁ ਹੈ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਜਿਤੁ ਹੀਰਾ ਪਰਖਿ ਲਈਜੈ ॥੩॥
मनु मोती सालु है गुर सबदी जितु हीरा परखि लईजै ॥३॥
मन रूपी मोती गुरु के शब्द द्वारा जौहरी बन जाता है, जिससे नाम रूपी हीरे की परख होती है।३॥

ਸੰਗਤਿ ਸੰਤ ਸੰਗਿ ਲਗਿ ਊਚੇ ਜਿਉ ਪੀਪ ਪਲਾਸ ਖਾਇ ਲੀਜੈ ॥
संगति संत संगि लगि ऊचे जिउ पीप पलास खाइ लीजै ॥
संतों की संगत में साधारण व्यक्ति महान् बन जाता है, ज्यों पीपल का वृक्ष पलाश के वृक्ष को स्वयं में विलीन कर लेता है।

ਸਭ ਨਰ ਮਹਿ ਪ੍ਰਾਨੀ ਊਤਮੁ ਹੋਵੈ ਰਾਮ ਨਾਮੈ ਬਾਸੁ ਬਸੀਜੈ ॥੪॥
सभ नर महि प्रानी ऊतमु होवै राम नामै बासु बसीजै ॥४॥
सब जीवों में मनुष्य सबसे उत्तम है, उस से राम नाम की महक आती है॥ ४॥

ਨਿਰਮਲ ਨਿਰਮਲ ਕਰਮ ਬਹੁ ਕੀਨੇ ਨਿਤ ਸਾਖਾ ਹਰੀ ਜੜੀਜੈ ॥
निरमल निरमल करम बहु कीने नित साखा हरी जड़ीजै ॥
वह अनेक निर्मल कर्म करता है, अतः उसके सत्कर्मों की शाखाएँ हरी भरी रहती हैं।

ਧਰਮੁ ਫੁਲੁ ਫਲੁ ਗੁਰਿ ਗਿਆਨੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ਬਹਕਾਰ ਬਾਸੁ ਜਗਿ ਦੀਜੈ ॥੫॥
धरमु फुलु फलु गुरि गिआनु द्रिड़ाइआ बहकार बासु जगि दीजै ॥५॥
गुरु ने ज्ञान देकर समझाया है कि धर्म ही फल फूल है अतः इसकी खुशबू जगत में फैलाओ॥ ५॥

ਏਕ ਜੋਤਿ ਏਕੋ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਸਭ ਬ੍ਰਹਮ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਇਕੁ ਕੀਜੈ ॥
एक जोति एको मनि वसिआ सभ ब्रहम द्रिसटि इकु कीजै ॥
एक परम ज्योति मन में अवस्थित है, सब में एक ब्रह्म ही दृष्टिगोचर होता है।

ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਸਭ ਏਕੈ ਹੈ ਪਸਰੇ ਸਭ ਚਰਨ ਤਲੇ ਸਿਰੁ ਦੀਜੈ ॥੬॥
आतम रामु सभ एकै है पसरे सभ चरन तले सिरु दीजै ॥६॥
आत्मा-परमात्मा अभिन्न है, सबमें एक वही व्याप्त है, अतः सबके चरणों में सिर झुकाना चाहिए॥ ६॥

ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਨਕਟੇ ਨਰ ਦੇਖਹੁ ਤਿਨ ਘਸਿ ਘਸਿ ਨਾਕ ਵਢੀਜੈ ॥
नाम बिना नकटे नर देखहु तिन घसि घसि नाक वढीजै ॥
हरिनाम के बिना मनुष्य बेशर्म हैं, उन्होंने अपनी नाक ही काट ली है।

ਸਾਕਤ ਨਰ ਅਹੰਕਾਰੀ ਕਹੀਅਹਿ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਧ੍ਰਿਗੁ ਜੀਵੀਜੈ ॥੭॥
साकत नर अहंकारी कहीअहि बिनु नावै ध्रिगु जीवीजै ॥७॥
निरीश्वरवादी मनुष्य अहंकारी कहलाते हैं, हरिनाम के बिना इनका जीना धिक्कार है॥ ७॥

ਜਬ ਲਗੁ ਸਾਸੁ ਸਾਸੁ ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਤਤੁ ਬੇਗਲ ਸਰਨਿ ਪਰੀਜੈ ॥
जब लगु सासु सासु मन अंतरि ततु बेगल सरनि परीजै ॥
जब तक जीवन-साँसें हैं, तत्क्षण प्रभु की शरण में पड़ो।

ਨਾਨਕ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਿ ਧਾਰਹੁ ਮੈ ਸਾਧੂ ਚਰਨ ਪਖੀਜੈ ॥੮॥੪॥
नानक क्रिपा क्रिपा करि धारहु मै साधू चरन पखीजै ॥८॥४॥
नानक विनती करते हैं कि हे परमेश्वर ! मुझ पर कृपा करो, ताकि मैं साधु-पुरुषों के चरण धोता रहूं॥ ८॥ ४॥

ਕਲਿਆਨ ਮਹਲਾ ੪ ॥
कलिआन महला ४ ॥
कलिआन महला ४ ॥

ਰਾਮਾ ਮੈ ਸਾਧੂ ਚਰਨ ਧੁਵੀਜੈ ॥
रामा मै साधू चरन धुवीजै ॥
हे राम ! मैं साधु-पुरुषों के चरण धोना चाहता हूँ।

ਕਿਲਬਿਖ ਦਹਨ ਹੋਹਿ ਖਿਨ ਅੰਤਰਿ ਮੇਰੇ ਠਾਕੁਰ ਕਿਰਪਾ ਕੀਜੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
किलबिख दहन होहि खिन अंतरि मेरे ठाकुर किरपा कीजै ॥१॥ रहाउ ॥
हे मेरे ठाकुर ! ऐसी कृपा करो कि पल में पाप-दोष नष्ट हो जाएँ॥ १॥रहाउ॥

ਮੰਗਤ ਜਨ ਦੀਨ ਖਰੇ ਦਰਿ ਠਾਢੇ ਅਤਿ ਤਰਸਨ ਕਉ ਦਾਨੁ ਦੀਜੈ ॥
मंगत जन दीन खरे दरि ठाढे अति तरसन कउ दानु दीजै ॥
भिखारी दीनता से तेरे द्वार पर खड़े हैं, इन तरस रहे जीवों को नाम-दान दो।

ਤ੍ਰਾਹਿ ਤ੍ਰਾਹਿ ਸਰਨਿ ਪ੍ਰਭ ਆਏ ਮੋ ਕਉ ਗੁਰਮਤਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜੀਜੈ ॥੧॥
त्राहि त्राहि सरनि प्रभ आए मो कउ गुरमति नामु द्रिड़ीजै ॥१॥
हे प्रभु ! तेरी शरण में आया हूँ, मुझे बचा लो और गुरु की शिक्षा द्वारा नाम ही दृढ़ करवाओं॥ १॥

ਕਾਮ ਕਰੋਧੁ ਨਗਰ ਮਹਿ ਸਬਲਾ ਨਿਤ ਉਠਿ ਉਠਿ ਜੂਝੁ ਕਰੀਜੈ ॥
काम करोधु नगर महि सबला नित उठि उठि जूझु करीजै ॥
शरीर रूपी नगरी में काम क्रोध सशक्त हैं, जो नित्य लड़ते रहते हैं।

ਅੰਗੀਕਾਰੁ ਕਰਹੁ ਰਖਿ ਲੇਵਹੁ ਗੁਰ ਪੂਰਾ ਕਾਢਿ ਕਢੀਜੈ ॥੨॥
अंगीकारु करहु रखि लेवहु गुर पूरा काढि कढीजै ॥२॥
हे पूर्णगुरु ! अपना बनाकर बचा लो और इन दुष्टों को निकाल दो॥ २॥

ਅੰਤਰਿ ਅਗਨਿ ਸਬਲ ਅਤਿ ਬਿਖਿਆ ਹਿਵ ਸੀਤਲੁ ਸਬਦੁ ਗੁਰ ਦੀਜੈ ॥
अंतरि अगनि सबल अति बिखिआ हिव सीतलु सबदु गुर दीजै ॥
अन्तर्मन में विषय-विकारों की प्रचंड अग्नि ताकतवर है, अतः बर्फ समान शीतल शब्द-गुरु प्रदान करो।

error: Content is protected !!