ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੧
भैरउ महला ५ घरु १
भैरउ महला ५ घरु १
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਸਗਲੀ ਥੀਤਿ ਪਾਸਿ ਡਾਰਿ ਰਾਖੀ ॥
सगली थीति पासि डारि राखी ॥
सब तिथियों (पूर्णिमा, एकादशी इत्यादि) को लोगों ने दरकिनार कर दिया और
ਅਸਟਮ ਥੀਤਿ ਗੋਵਿੰਦ ਜਨਮਾ ਸੀ ॥੧॥
असटम थीति गोविंद जनमा सी ॥१॥
अष्टमी तिथि को (श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी पर) ईश्वर का जन्म मानने लग गए॥१॥
ਭਰਮਿ ਭੂਲੇ ਨਰ ਕਰਤ ਕਚਰਾਇਣ ॥
भरमि भूले नर करत कचराइण ॥
भ्रम में भूले हुए ऐसे लोग निरर्थक बातें ही करते हैं और
ਜਨਮ ਮਰਣ ਤੇ ਰਹਤ ਨਾਰਾਇਣ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जनम मरण ते रहत नाराइण ॥१॥ रहाउ ॥
उन्हें यह ज्ञान नहीं कि ईश्वर तो जन्म-मरण से रहित है॥१॥ रहाउ॥
ਕਰਿ ਪੰਜੀਰੁ ਖਵਾਇਓ ਚੋਰ ॥
करि पंजीरु खवाइओ चोर ॥
जन्माष्टमी के पर्व पर लोग पंजीरी बनाकर कृष्ण की मूर्ति को भोग लगा देते हैं,
ਓਹੁ ਜਨਮਿ ਨ ਮਰੈ ਰੇ ਸਾਕਤ ਢੋਰ ॥੨॥
ओहु जनमि न मरै रे साकत ढोर ॥२॥
अरे मायावी पशु ! परमेश्वर तो अमर है, वह न ही जन्म लेता है और न ही मरता है॥२॥
ਸਗਲ ਪਰਾਧ ਦੇਹਿ ਲੋਰੋਨੀ ॥
सगल पराध देहि लोरोनी ॥
लोरियां देते हो, यह सब अपराध का कारण है।
ਸੋ ਮੁਖੁ ਜਲਉ ਜਿਤੁ ਕਹਹਿ ਠਾਕੁਰੁ ਜੋਨੀ ॥੩॥
सो मुखु जलउ जितु कहहि ठाकुरु जोनी ॥३॥
वह मुँह जल जाना चाहिए, जो कहता है कि ठाकुर जी का जन्म होता है॥३॥
ਜਨਮਿ ਨ ਮਰੈ ਨ ਆਵੈ ਨ ਜਾਇ ॥
जनमि न मरै न आवै न जाइ ॥
हे जीवो ! वह जन्मता-मरता नहीं और न आता है, न जाता है।
ਨਾਨਕ ਕਾ ਪ੍ਰਭੁ ਰਹਿਓ ਸਮਾਇ ॥੪॥੧॥
नानक का प्रभु रहिओ समाइ ॥४॥१॥
नानक का मत है कि प्रभु सबमें व्याप्त है॥४॥१॥
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ॥
भैरउ महला ५ ॥
भैरउ महला ५॥
ਊਠਤ ਸੁਖੀਆ ਬੈਠਤ ਸੁਖੀਆ ॥
ऊठत सुखीआ बैठत सुखीआ ॥
उठते-बेठते सुख ही उपलब्ध होता है और
ਭਉ ਨਹੀ ਲਾਗੈ ਜਾਂ ਐਸੇ ਬੁਝੀਆ ॥੧॥
भउ नही लागै जां ऐसे बुझीआ ॥१॥
उसे कोई भय नहीं लगता जो इस तथ्य को बूझ लेता है कि ईश्वर अमर एवं सर्वरक्षक है॥१॥
ਰਾਖਾ ਏਕੁ ਹਮਾਰਾ ਸੁਆਮੀ ॥
राखा एकु हमारा सुआमी ॥
हमारा स्वामी प्रभु ही रक्षा करने वाला है,
ਸਗਲ ਘਟਾ ਕਾ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सगल घटा का अंतरजामी ॥१॥ रहाउ ॥
वह सब के मन की भावना को जानने वाला है॥१॥ रहाउ॥
ਸੋਇ ਅਚਿੰਤਾ ਜਾਗਿ ਅਚਿੰਤਾ ॥
सोइ अचिंता जागि अचिंता ॥
सोते-जागते वहाँ कोई चिंता नहीं,”
ਜਹਾ ਕਹਾਂ ਪ੍ਰਭੁ ਤੂੰ ਵਰਤੰਤਾ ॥੨॥
जहा कहां प्रभु तूं वरतंता ॥२॥
हे प्रभु! जहाँ कहाँ तू कार्यशील है॥२॥
ਘਰਿ ਸੁਖਿ ਵਸਿਆ ਬਾਹਰਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
घरि सुखि वसिआ बाहरि सुखु पाइआ ॥
घर-बाहर उसे सुख ही मिला है,
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਮੰਤ੍ਰੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ॥੩॥੨॥
कहु नानक गुरि मंत्रु द्रिड़ाइआ ॥३॥२॥
हे नानक ! गुरु ने यही मंत्र दृढ़ करवाया है॥३॥२॥
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ॥
भैरउ महला ५ ॥
भैरउ महला ५॥
ਵਰਤ ਨ ਰਹਉ ਨ ਮਹ ਰਮਦਾਨਾ ॥
वरत न रहउ न मह रमदाना ॥
न ही व्रत-उपवास रखता हूँ और न ही रमज़ान के महीने में रोज़े रखता हूँ
ਤਿਸੁ ਸੇਵੀ ਜੋ ਰਖੈ ਨਿਦਾਨਾ ॥੧॥
तिसु सेवी जो रखै निदाना ॥१॥
अपितु जन्म से मृत्यु तक रक्षा करने वाले ईश्वर की ही अर्चना करता हूँ॥१॥
ਏਕੁ ਗੁਸਾਈ ਅਲਹੁ ਮੇਰਾ ॥
एकु गुसाई अलहु मेरा ॥
एक मालिक प्रभु ही मेरा अल्लाह है और
ਹਿੰਦੂ ਤੁਰਕ ਦੁਹਾਂ ਨੇਬੇਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हिंदू तुरक दुहां नेबेरा ॥१॥ रहाउ ॥
हिन्दू-मुसलमानों दोनों से नाता तोड़ लिया है॥१॥रहाउ॥
ਹਜ ਕਾਬੈ ਜਾਉ ਨ ਤੀਰਥ ਪੂਜਾ ॥
हज काबै जाउ न तीरथ पूजा ॥
मैं हज्ज के लिए काबा और पूजा के लिए तीर्थों पर भी नहीं जाता।
ਏਕੋ ਸੇਵੀ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ॥੨॥
एको सेवी अवरु न दूजा ॥२॥
एक ईश्वर की उपासना करता हूँ और किसी को नहीं मानता॥२॥
ਪੂਜਾ ਕਰਉ ਨ ਨਿਵਾਜ ਗੁਜਾਰਉ ॥
पूजा करउ न निवाज गुजारउ ॥
न ही मन्दिर में पूजा करता हूँ और न ही मस्जिद में नमाज पढ़ता हूँ,
ਏਕ ਨਿਰੰਕਾਰ ਲੇ ਰਿਦੈ ਨਮਸਕਾਰਉ ॥੩॥
एक निरंकार ले रिदै नमसकारउ ॥३॥
हृदय में केवल निरंकार की वंदना करता हूँ॥३॥
ਨਾ ਹਮ ਹਿੰਦੂ ਨ ਮੁਸਲਮਾਨ ॥
ना हम हिंदू न मुसलमान ॥
हम हिन्दू अथवा मुसलमान भी नहीं हैं,
ਅਲਹ ਰਾਮ ਕੇ ਪਿੰਡੁ ਪਰਾਨ ॥੪॥
अलह राम के पिंडु परान ॥४॥
यह शरीर प्राण तो उस अल्लाह राम के अपने हैं।॥४॥
ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਇਹੁ ਕੀਆ ਵਖਾਨਾ ॥
कहु कबीर इहु कीआ वखाना ॥
पाँचवें नानक गुरु अर्जुन देव जी कबीर के हवाले से कहते हैं कि हमने यही बखान किया है,
ਗੁਰ ਪੀਰ ਮਿਲਿ ਖੁਦਿ ਖਸਮੁ ਪਛਾਨਾ ॥੫॥੩॥
गुर पीर मिलि खुदि खसमु पछाना ॥५॥३॥
गुरु पीर को मिलकर खुद ही अपने मालिक को पहचान लिया है॥५॥३॥
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ॥
भैरउ महला ५ ॥
भैरउ महला ५॥
ਦਸ ਮਿਰਗੀ ਸਹਜੇ ਬੰਧਿ ਆਨੀ ॥
दस मिरगी सहजे बंधि आनी ॥
दस इन्द्रिय रूपी मृग सहज ही बाँध लिए हैं और
ਪਾਂਚ ਮਿਰਗ ਬੇਧੇ ਸਿਵ ਕੀ ਬਾਨੀ ॥੧॥
पांच मिरग बेधे सिव की बानी ॥१॥
पाँच कामादिक विकार रूपी मृगों को शिव-बाण से भेद दिया है॥१॥
ਸੰਤਸੰਗਿ ਲੇ ਚੜਿਓ ਸਿਕਾਰ ॥
संतसंगि ले चड़िओ सिकार ॥
सत्संग में जब शिकार के लिए निकला तो
ਮ੍ਰਿਗ ਪਕਰੇ ਬਿਨੁ ਘੋਰ ਹਥੀਆਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
म्रिग पकरे बिनु घोर हथीआर ॥१॥ रहाउ ॥
बिन हथियारों के ही पाँच मृग पकड़ लिए॥१॥ रहाउ॥
ਆਖੇਰ ਬਿਰਤਿ ਬਾਹਰਿ ਆਇਓ ਧਾਇ ॥
आखेर बिरति बाहरि आइओ धाइ ॥
आखेट की वृति पहले बाहर वन इत्यादि से दौड़ रही थी
ਅਹੇਰਾ ਪਾਇਓ ਘਰ ਕੈ ਗਾਂਇ ॥੨॥
अहेरा पाइओ घर कै गांइ ॥२॥
मगर हृदय-घर के गांव में ही शिकार को पा लिया॥२॥
ਮ੍ਰਿਗ ਪਕਰੇ ਘਰਿ ਆਣੇ ਹਾਟਿ ॥
म्रिग पकरे घरि आणे हाटि ॥
जब मृग पकड़कर घर लौट आए तो
ਚੁਖ ਚੁਖ ਲੇ ਗਏ ਬਾਂਢੇ ਬਾਟਿ ॥੩॥
चुख चुख ले गए बांढे बाटि ॥३॥
सत्संगियों को भी थोड़ा-थोड़ा हिस्सा बांट दिया॥३॥
ਏਹੁ ਅਹੇਰਾ ਕੀਨੋ ਦਾਨੁ ॥
एहु अहेरा कीनो दानु ॥
यह शिकार तो दान कर दिया है,
ਨਾਨਕ ਕੈ ਘਰਿ ਕੇਵਲ ਨਾਮੁ ॥੪॥੪॥
नानक कै घरि केवल नामु ॥४॥४॥
पर नानक के हृदय-घर में केवल हरिनाम ही है॥४॥ ४॥
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ॥
भैरउ महला ५ ॥
भैरउ महला ५॥
ਜੇ ਸਉ ਲੋਚਿ ਲੋਚਿ ਖਾਵਾਇਆ ॥ ਸਾਕਤ ਹਰਿ ਹਰਿ ਚੀਤਿ ਨ ਆਇਆ ॥੧॥
जे सउ लोचि लोचि खावाइआ ॥ साकत हरि हरि चीति न आइआ ॥१॥
चाहे सैकड़ों बार चाह से खिलाया जाए, फिर भी मायावी जीव को ईश्वर याद नहीं आता॥१॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਲੇਹੁ ਮਤੇ ॥
संत जना की लेहु मते ॥
हे जीवो ! संतजनों की शिक्षा ग्रहण करो और
ਸਾਧਸੰਗਿ ਪਾਵਹੁ ਪਰਮ ਗਤੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
साधसंगि पावहु परम गते ॥१॥ रहाउ ॥
साधुओं की संगत में परमगति पा लो॥१॥ रहाउ॥
ਪਾਥਰ ਕਉ ਬਹੁ ਨੀਰੁ ਪਵਾਇਆ ॥ ਨਹ ਭੀਗੈ ਅਧਿਕ ਸੂਕਾਇਆ ॥੨॥
पाथर कउ बहु नीरु पवाइआ ॥ नह भीगै अधिक सूकाइआ ॥२॥
कठोर (इन्सान) पत्थर को बहुत जल भी डाला (समझाया) जाए मगर इतना अधिक शुष्क होता है कि वह भीगता ही नहीं॥२॥