Hindi Page 1092

ਬਿਨੁ ਕਰਮਾ ਕਿਛੂ ਨ ਪਾਈਐ ਜੇ ਬਹੁਤੁ ਲੋਚਾਹੀ ॥
बिनु करमा किछू न पाईऐ जे बहुतु लोचाही ॥
यदि बहुत कामना भी की जाए, परन्तु भाग्य के बिना कुछ भी पाया नहीं जा सकता।

ਆਵੈ ਜਾਇ ਜੰਮੈ ਮਰੈ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਛੁਟਾਹੀ ॥
आवै जाइ जमै मरै गुर सबदि छुटाही ॥
मनुष्य आवागमन में जन्मता-मरता रहता है लेकिन इसका छुटकारा शब्द-गुरु से ही होता है।

ਆਪਿ ਕਰੈ ਕਿਸੁ ਆਖੀਐ ਦੂਜਾ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥੧੬॥
आपि करै किसु आखीऐ दूजा को नाही ॥१६॥
परमात्मा स्वयं ही करने वाला है, किसी अन्य को क्यों कहा जाए, उसके सिवाय अन्य कोई नहीं॥ १६॥

ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
सलोकु मः ३ ॥
श्लोक महला ३॥

ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਸੰਤੀ ਧਨੁ ਖਟਿਆ ਜਿਨਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਆਇ ॥
इसु जग महि संती धनु खटिआ जिना सतिगुरु मिलिआ प्रभु आइ ॥
इस जगत् में संतों ने ही नाम-धन उपार्जित किया है, जिन्हें सतगुरु मिला, प्रभु की स्मृति उनके मन में बस गई है।

ਸਤਿਗੁਰਿ ਸਚੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ਇਸੁ ਧਨ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥
सतिगुरि सचु द्रिड़ाइआ इसु धन की कीमति कही न जाइ ॥
सतगुरु ने सत्य ही दृढ़ करवाया है और इस धन सही कीमत ऑकी नहीं जा सकती।

ਇਤੁ ਧਨਿ ਪਾਇਐ ਭੁਖ ਲਥੀ ਸੁਖੁ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਆਇ ॥
इतु धनि पाइऐ भुख लथी सुखु वसिआ मनि आइ ॥
इस धन को पाने से सारी भूख दूर हो जाती है और मन सुख अवस्थित हो जाता है।

ਜਿੰਨੑਾ ਕਉ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਤਿਨੀ ਪਾਇਆ ਆਇ ॥
जिंन्हा कउ धुरि लिखिआ तिनी पाइआ आइ ॥
जिनके भाग्य में प्रारम्भ से ही लिखा है, जगत् में आकर उन्होंने यह धन पा लिया है।

ਮਨਮੁਖੁ ਜਗਤੁ ਨਿਰਧਨੁ ਹੈ ਮਾਇਆ ਨੋ ਬਿਲਲਾਇ ॥
मनमुखु जगतु निरधनु है माइआ नो बिललाइ ॥
स्वेच्छाचारी जगत् में निर्धन है, जो धन के लिए रोता-चिल्लाता एवं तड़पता रहता है।

ਅਨਦਿਨੁ ਫਿਰਦਾ ਸਦਾ ਰਹੈ ਭੁਖ ਨ ਕਦੇ ਜਾਇ ॥
अनदिनु फिरदा सदा रहै भुख न कदे जाइ ॥
वह प्रतिदिन इधर-उधर भटकता रहता है, लेकिन उसकी धन की भूख कदापि दूर नहीं होती।

ਸਾਂਤਿ ਨ ਕਦੇ ਆਵਈ ਨਹ ਸੁਖੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
सांति न कदे आवई नह सुखु वसै मनि आइ ॥
उसे कभी शान्ति नहीं मिलती और न ही मन में सुख बसता है।

ਸਦਾ ਚਿੰਤ ਚਿਤਵਦਾ ਰਹੈ ਸਹਸਾ ਕਦੇ ਨ ਜਾਇ ॥
सदा चिंत चितवदा रहै सहसा कदे न जाइ ॥
वह सदा चिन्ता-परेशानियों में पड़ा रहता है और उसका संशय कभी दूर नहीं होता।

ਨਾਨਕ ਵਿਣੁ ਸਤਿਗੁਰ ਮਤਿ ਭਵੀ ਸਤਿਗੁਰ ਨੋ ਮਿਲੈ ਤਾ ਸਬਦੁ ਕਮਾਇ ॥
नानक विणु सतिगुर मति भवी सतिगुर नो मिलै ता सबदु कमाइ ॥
हे नानक ! सतगुरु के बिना उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है, यदि उसे सतगुरु मिल जाए तो ही शब्द की कमाई करता है।

ਸਦਾ ਸਦਾ ਸੁਖ ਮਹਿ ਰਹੈ ਸਚੇ ਮਾਹਿ ਸਮਾਇ ॥੧॥
सदा सदा सुख महि रहै सचे माहि समाइ ॥१॥
इस प्रकार सदा सुखी रहता है और सत्य में ही विलीन हो जाता है।॥ १॥

ਮਃ ੩ ॥
मः ३ ॥
महला ३॥

ਜਿਨਿ ਉਪਾਈ ਮੇਦਨੀ ਸੋਈ ਸਾਰ ਕਰੇਇ ॥
जिनि उपाई मेदनी सोई सार करेइ ॥
जिसने यह पृथ्वी पैदा की है, वही इसकी संभाल करता है।

ਏਕੋ ਸਿਮਰਹੁ ਭਾਇਰਹੁ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
एको सिमरहु भाइरहु तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥
हे प्यारे भाइयो ! एक परमेश्वर को ही स्मरण करो, क्योंकि उसके सिवा अन्य कोई रखवाला नहीं।

ਖਾਣਾ ਸਬਦੁ ਚੰਗਿਆਈਆ ਜਿਤੁ ਖਾਧੈ ਸਦਾ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਹੋਇ ॥
खाणा सबदु चंगिआईआ जितु खाधै सदा त्रिपति होइ ॥
शब्द का चिन्तन एवं अच्छाईयों को अपना भोजन बनाओ, जिसे खाने से मन सदा तृप्त रहता है।

ਪੈਨਣੁ ਸਿਫਤਿ ਸਨਾਇ ਹੈ ਸਦਾ ਸਦਾ ਓਹੁ ਊਜਲਾ ਮੈਲਾ ਕਦੇ ਨ ਹੋਇ ॥
पैनणु सिफति सनाइ है सदा सदा ओहु ऊजला मैला कदे न होइ ॥
ईश्वर की स्तुति एवं भजन-गान ही मनुष्य का सही वस्त्र है और यह सदा-सर्वदा उज्ज्वल रहता है और कभी मैला नहीं होता।

ਸਹਜੇ ਸਚੁ ਧਨੁ ਖਟਿਆ ਥੋੜਾ ਕਦੇ ਨ ਹੋਇ ॥
सहजे सचु धनु खटिआ थोड़ा कदे न होइ ॥
जिसने सहजावस्था में सत्य नाम रूपी धन की कमाई की है, वह धन कभी कम नहीं होता।

ਦੇਹੀ ਨੋ ਸਬਦੁ ਸੀਗਾਰੁ ਹੈ ਜਿਤੁ ਸਦਾ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
देही नो सबदु सीगारु है जितु सदा सदा सुखु होइ ॥
परमात्मा का नाम ही शरीर का सच्चा शृंगार है, जिससे सदैव सुख मिलता रहता है।

ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੁਝੀਐ ਜਿਸ ਨੋ ਆਪਿ ਵਿਖਾਲੇ ਸੋਇ ॥੨॥
नानक गुरमुखि बुझीऐ जिस नो आपि विखाले सोइ ॥२॥
हे नानक! जिसे स्वयं ही दर्शन करवाता है, वह गुरुमुख बनकर इस रहस्य को समझ लेता है॥ २॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥

ਅੰਤਰਿ ਜਪੁ ਤਪੁ ਸੰਜਮੋ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਜਾਪੈ ॥
अंतरि जपु तपु संजमो गुर सबदी जापै ॥
मन में जप, तप एवं संयम का ज्ञान शब्द-गुरु द्वारा ही मालूम होता है।

ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਹਉਮੈ ਅਗਿਆਨੁ ਗਵਾਪੈ ॥
हरि हरि नामु धिआईऐ हउमै अगिआनु गवापै ॥
परमात्मा के नाम का ध्यान करने से अभिमान एवं अज्ञान दूर हो जाते हैं।

ਅੰਦਰੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤਿ ਭਰਪੂਰੁ ਹੈ ਚਾਖਿਆ ਸਾਦੁ ਜਾਪੈ ॥
अंदरु अम्रिति भरपूरु है चाखिआ सादु जापै ॥
मनुष्य का मन नामामृत से भरपूर है लेकिन इसे चखने से ही इसका स्वाद मालूम होता है।

ਜਿਨ ਚਾਖਿਆ ਸੇ ਨਿਰਭਉ ਭਏ ਸੇ ਹਰਿ ਰਸਿ ਧ੍ਰਾਪੈ ॥
जिन चाखिआ से निरभउ भए से हरि रसि ध्रापै ॥
जिन्होंने इसे चखा है, वे निर्भय हो गए हैं और हरि-नाम रस से संतुष्ट हो गए हैं।

ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਪੀਆਇਆ ਫਿਰਿ ਕਾਲੁ ਨ ਵਿਆਪੈ ॥੧੭॥
हरि किरपा धारि पीआइआ फिरि कालु न विआपै ॥१७॥
परमात्मा ने कृपा करके जिसे नामामृत का पान करवाया है, उसे फिर काल ने तंग नहीं किया॥ १७॥

ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
सलोकु मः ३ ॥
श्लोक महला ३॥

ਲੋਕੁ ਅਵਗਣਾ ਕੀ ਬੰਨੑੈ ਗੰਠੜੀ ਗੁਣ ਨ ਵਿਹਾਝੈ ਕੋਇ ॥
लोकु अवगणा की बंन्है गंठड़ी गुण न विहाझै कोइ ॥
लोग अवगुणों की गठरी तो बाँधते जाते हैं, किन्तु गुणों को कोई भी नहीं खरीदता।

ਗੁਣ ਕਾ ਗਾਹਕੁ ਨਾਨਕਾ ਵਿਰਲਾ ਕੋਈ ਹੋਇ ॥
गुण का गाहकु नानका विरला कोई होइ ॥
हे नानक ! गुणों का ग्राहक कोई विरला पुरुष ही होता है।

ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਗੁਣ ਪਾਈਅਨੑਿ ਜਿਸ ਨੋ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥੧॥
गुर परसादी गुण पाईअन्हि जिस नो नदरि करेइ ॥१॥
जिस पर प्रभु कृपा-दृष्टि करता है, गुरु के आशीर्वाद से वह गुणों को प्राप्त कर लेता है॥ १॥

ਮਃ ੩ ॥
मः ३ ॥
महला ३॥

ਗੁਣ ਅਵਗੁਣ ਸਮਾਨਿ ਹਹਿ ਜਿ ਆਪਿ ਕੀਤੇ ਕਰਤਾਰਿ ॥
गुण अवगुण समानि हहि जि आपि कीते करतारि ॥
गुण-अवगुण भी एक समान ही हैं, क्योंकि ईश्वर ने ही इन्हें बनाया है।

ਨਾਨਕ ਹੁਕਮਿ ਮੰਨਿਐ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਵੀਚਾਰਿ ॥੨॥
नानक हुकमि मंनिऐ सुखु पाईऐ गुर सबदी वीचारि ॥२॥
हे नानक ! शब्द गुरु द्वारा चिंतन करने एवं परमात्मा का हुक्म मानने से ही सुख प्राप्त होता है॥ २॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥

ਅੰਦਰਿ ਰਾਜਾ ਤਖਤੁ ਹੈ ਆਪੇ ਕਰੇ ਨਿਆਉ ॥
अंदरि राजा तखतु है आपे करे निआउ ॥
परमात्मा रूपी राजा मन में ही अपने सिंहासन पर विराजमान है और स्वयं न्याय करता है।

ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਦਰੁ ਜਾਣੀਐ ਅੰਦਰਿ ਮਹਲੁ ਅਸਰਾਉ ॥
गुर सबदी दरु जाणीऐ अंदरि महलु असराउ ॥
अन्तर्मन में ही जीवों का आश्रय प्रभु का दसम द्वार है और शब्द-गुरु द्वारा ही जिसका द्वार बोध होता है।

ਖਰੇ ਪਰਖਿ ਖਜਾਨੈ ਪਾਈਅਨਿ ਖੋਟਿਆ ਨਾਹੀ ਥਾਉ ॥
खरे परखि खजानै पाईअनि खोटिआ नाही थाउ ॥
वह स्वयं ही भले जीवों को परखकर खजाने में डाल देता है, किन्तु दुष्टों को कहीं भी ठिकाना नहीं मिलता।

ਸਭੁ ਸਚੋ ਸਚੁ ਵਰਤਦਾ ਸਦਾ ਸਚੁ ਨਿਆਉ ॥
सभु सचो सचु वरतदा सदा सचु निआउ ॥
सब तरफ परम-सत्य ही व्याप्त है और उसका न्याय भी सदैव सत्य है।

ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਕਾ ਰਸੁ ਆਇਆ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਨਾਉ ॥੧੮॥
अम्रित का रसु आइआ मनि वसिआ नाउ ॥१८॥
जिसके मन में प्रभु का नाम बस गया है, उसे ही नामामृत का स्वाद आया है॥ १८॥

ਸਲੋਕ ਮਃ ੧ ॥
सलोक मः १ ॥
श्लोक महला १॥

ਹਉ ਮੈ ਕਰੀ ਤਾਂ ਤੂ ਨਾਹੀ ਤੂ ਹੋਵਹਿ ਹਉ ਨਾਹਿ ॥
हउ मै करी तां तू नाही तू होवहि हउ नाहि ॥
हे ईश्वर ! जब अभिमान करता हूँ तो तू मन में नहीं रहता किन्तु जब तू मन में होता है तो अभिमान मिट जाता है।

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