ਇਨ ਬਿਧਿ ਹਰਿ ਮਿਲੀਐ ਵਰ ਕਾਮਨਿ ਧਨ ਸੋਹਾਗੁ ਪਿਆਰੀ ॥
इन बिधि हरि मिलीऐ वर कामनि धन सोहागु पिआरी ॥
इस तरीके से जीव रूपी कामिनी को हरि रूपी वर मिलता है और उस प्यारी को सुहाग मिल जाता है।
ਜਾਤਿ ਬਰਨ ਕੁਲ ਸਹਸਾ ਚੂਕਾ ਗੁਰਮਤਿ ਸਬਦਿ ਬੀਚਾਰੀ ॥੧॥
जाति बरन कुल सहसा चूका गुरमति सबदि बीचारी ॥१॥
गुरु-मत के शब्द का चिंतन करते हुए जाति-वर्ण एवं कुल का संशय दूर हो गया है॥१॥
ਜਿਸੁ ਮਨੁ ਮਾਨੈ ਅਭਿਮਾਨੁ ਨ ਤਾ ਕਉ ਹਿੰਸਾ ਲੋਭੁ ਵਿਸਾਰੇ ॥
जिसु मनु मानै अभिमानु न ता कउ हिंसा लोभु विसारे ॥
जिसका मन परितृप्त हो जाता है, उसे अभिमान नहीं होता और वह हिंसा व लोभ को भुला देता है।
ਸਹਜਿ ਰਵੈ ਵਰੁ ਕਾਮਣਿ ਪਿਰ ਕੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਰੰਗਿ ਸਵਾਰੇ ॥੨॥
सहजि रवै वरु कामणि पिर की गुरमुखि रंगि सवारे ॥२॥
जीव रूपी कामिनी स्वाभाविक ही पति-प्रभु के साथ आनंद करती है और गुरु के माध्यम से उसका प्रेम रंग संवर जाता है।॥२॥
ਜਾਰਉ ਐਸੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕੁਟੰਬ ਸਨਬੰਧੀ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਪਸਾਰੀ ॥
जारउ ऐसी प्रीति कुट्मब सनबंधी माइआ मोह पसारी ॥
ऐसा प्रेम त्याग देना चाहिए, जो परिवार एवं रिश्तेदारों के साथ मोह-माया फैलाता है।
ਜਿਸੁ ਅੰਤਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਰਾਮ ਰਸੁ ਨਾਹੀ ਦੁਬਿਧਾ ਕਰਮ ਬਿਕਾਰੀ ॥੩॥
जिसु अंतरि प्रीति राम रसु नाही दुबिधा करम बिकारी ॥३॥
जिसके अन्तर्मन में ईश्वर से प्रेम नहीं, वह दुविधा एवं विकारयुक्त कर्म करता है॥३॥
ਅੰਤਰਿ ਰਤਨ ਪਦਾਰਥ ਹਿਤ ਕੌ ਦੁਰੈ ਨ ਲਾਲ ਪਿਆਰੀ ॥
अंतरि रतन पदारथ हित कौ दुरै न लाल पिआरी ॥
जिसके मन में प्रेम पदार्थ रूपी रत्न विद्यमान होता है, वह दुनिया से छिपा नहीं रहता।
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਅਮੋਲਕੁ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਅੰਤਰਿ ਧਾਰੀ ॥੪॥੩॥
नानक गुरमुखि नामु अमोलकु जुगि जुगि अंतरि धारी ॥४॥३॥
गुरु नानक का कथन है कि ऐसा गुरमुख युग युग प्रभु का अमूल्य नाम मन में बसाए रखता है॥४॥३॥
ਸਾਰੰਗ ਮਹਲਾ ੪ ਘਰੁ ੧
सारंग महला ४ घरु १
सारंग महला ४ घरु १
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਹਮ ਧੂਰਿ ॥
हरि के संत जना की हम धूरि ॥
हम ईश्वर के भक्तजनों की मात्र चरणरज हैं।
ਮਿਲਿ ਸਤਸੰਗਤਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
मिलि सतसंगति परम पदु पाइआ आतम रामु रहिआ भरपूरि ॥१॥ रहाउ ॥
सत्संग में मिलकर परमपद पाया है और ज्ञान हो गया है कि ईश्वर सबमें व्याप्त है॥१॥रहाउ॥।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੰਤੁ ਮਿਲੈ ਸਾਂਤਿ ਪਾਈਐ ਕਿਲਵਿਖ ਦੁਖ ਕਾਟੇ ਸਭਿ ਦੂਰਿ ॥
सतिगुरु संतु मिलै सांति पाईऐ किलविख दुख काटे सभि दूरि ॥
यदि सच्चा गुरु संत मिल जाए तो ही शान्ति प्राप्त होती है और वह सभी पाप दुख काट कर दूर कर देता है।
ਆਤਮ ਜੋਤਿ ਭਈ ਪਰਫੂਲਿਤ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਦੇਖਿਆ ਹਜੂਰਿ ॥੧॥
आतम जोति भई परफूलित पुरखु निरंजनु देखिआ हजूरि ॥१॥
जब ईश्वर के साक्षात् दर्शन किए तो हमारी अन्तरात्मा प्रफुल्लित हो गई॥१॥
ਵਡੈ ਭਾਗਿ ਸਤਸੰਗਤਿ ਪਾਈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥
वडै भागि सतसंगति पाई हरि हरि नामु रहिआ भरपूरि ॥
अहोभाग्य से हमें सत्संग प्राप्त हुई है, जहाँ ज्ञान हो गया केि ईश्वर सर्व व्याप्त है।
ਅਠਸਠਿ ਤੀਰਥ ਮਜਨੁ ਕੀਆ ਸਤਸੰਗਤਿ ਪਗ ਨਾਏ ਧੂਰਿ ॥੨॥
अठसठि तीरथ मजनु कीआ सतसंगति पग नाए धूरि ॥२॥
सत्संगियों की चरण-धूल में स्नान करके हमने अड़सठ तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त कर लिया है॥२॥
ਦੁਰਮਤਿ ਬਿਕਾਰ ਮਲੀਨ ਮਤਿ ਹੋਛੀ ਹਿਰਦਾ ਕੁਸੁਧੁ ਲਾਗਾ ਮੋਹ ਕੂਰੁ ॥
दुरमति बिकार मलीन मति होछी हिरदा कुसुधु लागा मोह कूरु ॥
दुर्मति एवं विकारों से मलिन हमारी बुद्धि ओछी हो गई है और अशुद्ध हृदय को झूठा मोह लगा हुआ है।
ਬਿਨੁ ਕਰਮਾ ਕਿਉ ਸੰਗਤਿ ਪਾਈਐ ਹਉਮੈ ਬਿਆਪਿ ਰਹਿਆ ਮਨੁ ਝੂਰਿ ॥੩॥
बिनु करमा किउ संगति पाईऐ हउमै बिआपि रहिआ मनु झूरि ॥३॥
उत्तम भाग्य के बिना संगत कैसे प्राप्त हो सकती है, अहम्-भावना में लीन मन परेशान रहता है॥३॥
ਹੋਹੁ ਦਇਆਲ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਿ ਹਰਿ ਜੀ ਮਾਗਉ ਸਤਸੰਗਤਿ ਪਗ ਧੂਰਿ ॥
होहु दइआल क्रिपा करि हरि जी मागउ सतसंगति पग धूरि ॥
हे प्रभु ! दयालु हो जाओ, कृपा करो, मैं सत्संगियों की चरण-धूल ही चाहता हूँ।
ਨਾਨਕ ਸੰਤੁ ਮਿਲੈ ਹਰਿ ਪਾਈਐ ਜਨੁ ਹਰਿ ਭੇਟਿਆ ਰਾਮੁ ਹਜੂਰਿ ॥੪॥੧॥
नानक संतु मिलै हरि पाईऐ जनु हरि भेटिआ रामु हजूरि ॥४॥१॥
नानक का मत है कि जब संत महापुरुष से साक्षात्कार होता है तो ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है और वह प्रत्यक्ष ही परमेश्वर से मिला देता है॥४॥१॥
ਸਾਰੰਗ ਮਹਲਾ ੪ ॥
सारंग महला ४ ॥
सारंग महला ४ ॥
ਗੋਬਿੰਦ ਚਰਨਨ ਕਉ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥
गोबिंद चरनन कउ बलिहारी ॥
हम परमात्मा के चरणों पर कुर्बान हैं।
ਭਵਜਲੁ ਜਗਤੁ ਨ ਜਾਈ ਤਰਣਾ ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
भवजलु जगतु न जाई तरणा जपि हरि हरि पारि उतारी ॥१॥ रहाउ ॥
यह संसार-समुद्र तैरा नहीं जा सकता, यदि परमात्मा का जाप किया जाए तो पार उतारा हो जाता है॥१॥रहाउ॥।
ਹਿਰਦੈ ਪ੍ਰਤੀਤਿ ਬਨੀ ਪ੍ਰਭ ਕੇਰੀ ਸੇਵਾ ਸੁਰਤਿ ਬੀਚਾਰੀ ॥
हिरदै प्रतीति बनी प्रभ केरी सेवा सुरति बीचारी ॥
हृदय में प्रभु के प्रति निष्ठा बनी तो सेवा का विचार किया।
ਅਨਦਿਨੁ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਹਿਰਦੈ ਸਰਬ ਕਲਾ ਗੁਣਕਾਰੀ ॥੧॥
अनदिनु राम नामु जपि हिरदै सरब कला गुणकारी ॥१॥
ईश्वर सर्वशक्तिमान एवं गुणों का भण्डार है, दिन-रात हृदय में उसके नाम का जाप करो॥१॥
ਪ੍ਰਭੁ ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਰਵਿਆ ਸ੍ਰਬ ਠਾਈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਅਲਖ ਅਪਾਰੀ ॥
प्रभु अगम अगोचरु रविआ स्रब ठाई मनि तनि अलख अपारी ॥
अपहुँच, मन-वाणी से परे प्रभु सब स्थानों पर रमण कर रहा है और मन तन में भी वही अलख अपार है।
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾਲ ਭਏ ਤਬ ਪਾਇਆ ਹਿਰਦੈ ਅਲਖੁ ਲਖਾਰੀ ॥੨॥
गुर किरपाल भए तब पाइआ हिरदै अलखु लखारी ॥२॥
जब गुरु कृपालु हुआ तो हृदय में अदृष्ट प्रभु के दर्शन हो गए ॥२॥
ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਰਬ ਧਰਣੀਧਰ ਸਾਕਤ ਕਉ ਦੂਰਿ ਭਇਆ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥
अंतरि हरि नामु सरब धरणीधर साकत कउ दूरि भइआ अहंकारी ॥
समूची पृथ्वी को धारण करने वाला परमेश्वर अन्तर्मन में ही है लेकिन मायावी अहंकारी को वह दूर ही लगता है।
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਜਲਤ ਨ ਕਬਹੂ ਬੂਝਹਿ ਜੂਐ ਬਾਜੀ ਹਾਰੀ ॥੩॥
त्रिसना जलत न कबहू बूझहि जूऐ बाजी हारी ॥३॥
तृष्णा की अग्नि में जलता हुआ वह कभी नहीं समझता और अपनी जीवन बाजी जुए में हार देता है॥३॥
ਊਠਤ ਬੈਠਤ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਵਹਿ ਗੁਰਿ ਕਿੰਚਤ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥
ऊठत बैठत हरि गुन गावहि गुरि किंचत किरपा धारी ॥
जब गुरु की थोड़ी-सी कृपा होती है तो मनुष्य उठते-बैठते सदैव परमात्मा के गुण गाता है।
ਨਾਨਕ ਜਿਨ ਕਉ ਨਦਰਿ ਭਈ ਹੈ ਤਿਨ ਕੀ ਪੈਜ ਸਵਾਰੀ ॥੪॥੨॥
नानक जिन कउ नदरि भई है तिन की पैज सवारी ॥४॥२॥
हे नानक ! जिन पर ईश्वर की करुणा-दृष्टि हुई है, उसने उनकी लाज़ रख ली है॥ ४ ॥ २ ॥