Hindi Page 1405

ਤਾਰੵਉ ਸੰਸਾਰੁ ਮਾਯਾ ਮਦ ਮੋਹਿਤ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਦੀਅਉ ਸਮਰਥੁ ॥
तार्यउ संसारु माया मद मोहित अम्रित नामु दीअउ समरथु ॥
माया के मद में मोहित दुनिया को समर्थ गुरु रामदास ने नामामृत प्रदान करके पार उतार दिया है।

ਫੁਨਿ ਕੀਰਤਿਵੰਤ ਸਦਾ ਸੁਖ ਸੰਪਤਿ ਰਿਧਿ ਅਰੁ ਸਿਧਿ ਨ ਛੋਡਇ ਸਥੁ ॥
फुनि कीरतिवंत सदा सुख स्मपति रिधि अरु सिधि न छोडइ सथु ॥
वे कीर्तिवान हैं, सुख-समृद्धि, ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ उनका संग नहीं छोड़ती।

ਦਾਨਿ ਬਡੌ ਅਤਿਵੰਤੁ ਮਹਾਬਲਿ ਸੇਵਕਿ ਦਾਸਿ ਕਹਿਓ ਇਹੁ ਤਥੁ ॥
दानि बडौ अतिवंतु महाबलि सेवकि दासि कहिओ इहु तथु ॥
सेवक दास मथुरा यही तथ्य कहता है कि वे महादानी, बड़े उपकारी, अत्यंत महांबली एवं हरिनाम के परम भक्त हैं।

ਤਾਹਿ ਕਹਾ ਪਰਵਾਹ ਕਾਹੂ ਕੀ ਜਾ ਕੈ ਬਸੀਸਿ ਧਰਿਓ ਗੁਰਿ ਹਥੁ ॥੭॥੪੯॥
ताहि कहा परवाह काहू की जा कै बसीसि धरिओ गुरि हथु ॥७॥४९॥
जिसके सिर पर गुरु रामदास ने हाथ धरा हो, उसे किसी चीज की कोई परवाह नहीं रहती॥ ७ ॥ ४६ ॥

ਤੀਨਿ ਭਵਨ ਭਰਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਸੋਈ ॥
तीनि भवन भरपूरि रहिओ सोई ॥
तीनों लोकों में परब्रह्म परमेश्वर ही विद्यमान है,

ਅਪਨ ਸਰਸੁ ਕੀਅਉ ਨ ਜਗਤ ਕੋਈ ॥
अपन सरसु कीअउ न जगत कोई ॥
अपने जैसा उसने जगत में कोई उत्पन्न नहीं किया।

ਆਪੁਨ ਆਪੁ ਆਪ ਹੀ ਉਪਾਯਉ ॥
आपुन आपु आप ही उपायउ ॥
अपने आपको भी उसने स्वयं ही पैदा किया है।

ਸੁਰਿ ਨਰ ਅਸੁਰ ਅੰਤੁ ਨਹੀ ਪਾਯਉ ॥
सुरि नर असुर अंतु नही पायउ ॥
देवता, मनुष्य एवं असुर कोई भी उसका रहस्य नहीं पा सका।

ਪਾਯਉ ਨਹੀ ਅੰਤੁ ਸੁਰੇ ਅਸੁਰਹ ਨਰ ਗਣ ਗੰਧ੍ਰਬ ਖੋਜੰਤ ਫਿਰੇ ॥
पायउ नही अंतु सुरे असुरह नर गण गंध्रब खोजंत फिरे ॥
देवता, असुर, मनुष्य, गण-गंधर्व सब उसे ही खोज रहे हैं, परन्तु उसका भेद किसी ने नहीं पाया।

ਅਬਿਨਾਸੀ ਅਚਲੁ ਅਜੋਨੀ ਸੰਭਉ ਪੁਰਖੋਤਮੁ ਅਪਾਰ ਪਰੇ ॥
अबिनासी अचलु अजोनी स्मभउ पुरखोतमु अपार परे ॥
वह अविनाशी एवं अडोल है, वह योनियों के चक्र से मुक्त है और स्वयं ही प्रगट हुआ है। वह पुरुषोत्तम परमेश्वर परे से परे अपार है।

ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਮਰਥੁ ਸਦਾ ਸੋਈ ਸਰਬ ਜੀਅ ਮਨਿ ਧੵਾਇਯਉ ॥
करण कारण समरथु सदा सोई सरब जीअ मनि ध्याइयउ ॥
वह करण-कारण, सर्वकला समर्थ है, सब जीव मन में उसी का ध्यान करते हैं।

ਸ੍ਰੀ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਜਯੋ ਜਯ ਜਗ ਮਹਿ ਤੈ ਹਰਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਇਯਉ ॥੧॥
स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥१॥
हे श्री गुरु रामदास ! तुमने हरि-सा परमपद पा लिया है, जगत में तुम्हारी जय-जयकार हो रही है॥१॥

ਸਤਿਗੁਰਿ ਨਾਨਕਿ ਭਗਤਿ ਕਰੀ ਇਕ ਮਨਿ ਤਨੁ ਮਨੁ ਧਨੁ ਗੋਬਿੰਦ ਦੀਅਉ ॥
सतिगुरि नानकि भगति करी इक मनि तनु मनु धनु गोबिंद दीअउ ॥
सतिगुरु नानक देव जी ने दत्तचित होकर निरंकार की भक्ति की, उन्होंने अपना तन, मन, धन, सर्वस्व ईश्वर पर न्यौछावर कर दिया।

ਅੰਗਦਿ ਅਨੰਤ ਮੂਰਤਿ ਨਿਜ ਧਾਰੀ ਅਗਮ ਗੵਾਨਿ ਰਸਿ ਰਸੵਉ ਹੀਅਉ ॥
अंगदि अनंत मूरति निज धारी अगम ग्यानि रसि रस्यउ हीअउ ॥
गुरु अंगद देव जी ने प्रेम की मूर्ति परमेश्वर को अपने मन में बसाया और ज्ञान के कारण उनका दिल प्रेम रस में भीग गया।

ਗੁਰਿ ਅਮਰਦਾਸਿ ਕਰਤਾਰੁ ਕੀਅਉ ਵਸਿ ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਕਰਿ ਧੵਾਇਯਉ ॥
गुरि अमरदासि करतारु कीअउ वसि वाहु वाहु करि ध्याइयउ ॥
गुरु अमरदास ने भक्ति द्वारा परमात्मा को वश में कर लिया और वाह-वाह बड़ा मानकर ध्यान किया।

ਸ੍ਰੀ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਜਯੋ ਜਯ ਜਗ ਮਹਿ ਤੈ ਹਰਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਇਯਉ ॥੨॥
स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥२॥
हे श्री गुरु रामदास ! तुमने प्रभु पद ही पा लिया है, पूरे जगत् में तेरी जय-जयकार हो रही है।॥२॥

ਨਾਰਦੁ ਧ੍ਰੂ ਪ੍ਰਹਲਾਦੁ ਸੁਦਾਮਾ ਪੁਬ ਭਗਤ ਹਰਿ ਕੇ ਜੁ ਗਣੰ ॥
नारदु ध्रू प्रहलादु सुदामा पुब भगत हरि के जु गणं ॥
नारद, धुव, प्रहलाद एवं सुदामा पूर्व से ही परमात्मा के अनन्य भक्त माने जाते हैं।

ਅੰਬਰੀਕੁ ਜਯਦੇਵ ਤ੍ਰਿਲੋਚਨੁ ਨਾਮਾ ਅਵਰੁ ਕਬੀਰੁ ਭਣੰ ॥
अ्मबरीकु जयदेव त्रिलोचनु नामा अवरु कबीरु भणं ॥
अंबरीष, जयदेव, त्रिलोचन, नामदेव एवं कबीर सरीखे परम भक्तों का

ਤਿਨ ਕੌ ਅਵਤਾਰੁ ਭਯਉ ਕਲਿ ਭਿੰਤਰਿ ਜਸੁ ਜਗਤ੍ਰ ਪਰਿ ਛਾਇਯਉ ॥
तिन कौ अवतारु भयउ कलि भिंतरि जसु जगत्र परि छाइयउ ॥
कलियुग में अवतार हुआ, इनका यश पूरे जगत में फैला हुआ है।

ਸ੍ਰੀ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਜਯੋ ਜਯ ਜਗ ਮਹਿ ਤੈ ਹਰਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਇਯਉ ॥੩॥
स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥३॥
पर हे श्री गुरु रामदास ! तुमने तो परमात्मा का पद पा लिया है, जगत भर में तेरी जय जय हो रही है॥३॥

ਮਨਸਾ ਕਰਿ ਸਿਮਰੰਤ ਤੁਝੈ ਨਰ ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਮਿਟਿਅਉ ਜੁ ਤਿਣੰ ॥
मनसा करि सिमरंत तुझै नर कामु क्रोधु मिटिअउ जु तिणं ॥
हे गुरु रामदास ! जो व्यक्ति दृढ़संकल्प से तुम्हारा स्मरण करते हैं, उनका काम-क्रोध सब मिट जाता है।

ਬਾਚਾ ਕਰਿ ਸਿਮਰੰਤ ਤੁਝੈ ਤਿਨੑ ਦੁਖੁ ਦਰਿਦ੍ਰੁ ਮਿਟਯਉ ਜੁ ਖਿਣੰ ॥
बाचा करि सिमरंत तुझै तिन्ह दुखु दरिद्रु मिटयउ जु खिणं ॥
जो मन, वचन से तुझे स्मरण करते हैं, पल में ही उनका दुख-दारिद्रय मिट जाता है।

ਕਰਮ ਕਰਿ ਤੁਅ ਦਰਸ ਪਰਸ ਪਾਰਸ ਸਰ ਬਲੵ ਭਟ ਜਸੁ ਗਾਇਯਉ ॥
करम करि तुअ दरस परस पारस सर बल्य भट जसु गाइयउ ॥
जो कर्मेन्द्रियों से तुम्हारा दर्शन व चरण स्पर्श करता है, पारस समान (महान्) हो जाता है, इसलिए बल्य भाट भी तुम्हारा ही यश गाता है।

ਸ੍ਰੀ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਜਯੋ ਜਯ ਜਗ ਮਹਿ ਤੈ ਹਰਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਇਯਉ ॥੪॥
स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥४॥
हे श्री गुरु रामदास ! तुमने ईश्वर का पद पा लिया है, संसार भर में तुम्हारी जय-जय हो रही है॥४॥

ਜਿਹ ਸਤਿਗੁਰ ਸਿਮਰੰਤ ਨਯਨ ਕੇ ਤਿਮਰ ਮਿਟਹਿ ਖਿਨੁ ॥
जिह सतिगुर सिमरंत नयन के तिमर मिटहि खिनु ॥
जिस सतिगुरु (रामदास) के स्मरण से आँखों का अज्ञानाधंकार पल में मिट जाता है।

ਜਿਹ ਸਤਿਗੁਰ ਸਿਮਰੰਥਿ ਰਿਦੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦਿਨੋ ਦਿਨੁ ॥
जिह सतिगुर सिमरंथि रिदै हरि नामु दिनो दिनु ॥
जिस सतिगुरु (रामदास) का सिमरन करने से हृदय में दिनों-दिन हरिनाम अवस्थित होता है।

ਜਿਹ ਸਤਿਗੁਰ ਸਿਮਰੰਥਿ ਜੀਅ ਕੀ ਤਪਤਿ ਮਿਟਾਵੈ ॥
जिह सतिगुर सिमरंथि जीअ की तपति मिटावै ॥
जिस सतिगुरु का स्मरण करने से दिल की जलन मिट जाती है।

ਜਿਹ ਸਤਿਗੁਰ ਸਿਮਰੰਥਿ ਰਿਧਿ ਸਿਧਿ ਨਵ ਨਿਧਿ ਪਾਵੈ ॥
जिह सतिगुर सिमरंथि रिधि सिधि नव निधि पावै ॥
जिस सतिगुरु को याद करने से ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ एवं नौ निधियाँ प्राप्त होती हैं।

ਸੋਈ ਰਾਮਦਾਸੁ ਗੁਰੁ ਬਲੵ ਭਣਿ ਮਿਲਿ ਸੰਗਤਿ ਧੰਨਿ ਧੰਨਿ ਕਰਹੁ ॥
सोई रामदासु गुरु बल्य भणि मिलि संगति धंनि धंनि करहु ॥
भाट बल्ह का अनुरोध है कि उस गुरु रामदास की संगत में मिलंकर प्रशंसागान करो।

ਜਿਹ ਸਤਿਗੁਰ ਲਗਿ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਈਐ ਸੋ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਿਮਰਹੁ ਨਰਹੁ ॥੫॥੫੪॥
जिह सतिगुर लगि प्रभु पाईऐ सो सतिगुरु सिमरहु नरहु ॥५॥५४॥
जिस सतिगुरु की शरण में प्रभु प्राप्त होता है, सो ऐसे सतिगुरु रामदास का हे लोगो ! हर वक्त स्मरण करो ॥५॥५४॥ (भाट बल्ह के पाँच सवैये पूरे, कुल चौवन सवैये हुए)

ਜਿਨਿ ਸਬਦੁ ਕਮਾਇ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਇਓ ਸੇਵਾ ਕਰਤ ਨ ਛੋਡਿਓ ਪਾਸੁ ॥
जिनि सबदु कमाइ परम पदु पाइओ सेवा करत न छोडिओ पासु ॥
जिस (गुरु रामदास) ने ब्रह्म-शब्द की साधना करके परमपद पाया, अपने गुरु अमरदास जी की सेवा में तन-मन से तल्लीन रहे और उनका साथ कभी न छोड़ा,

ਤਾ ਤੇ ਗਉਹਰੁ ਗੵਾਨ ਪ੍ਰਗਟੁ ਉਜੀਆਰਉ ਦੁਖ ਦਰਿਦ੍ਰ ਅੰਧੵਾਰ ਕੋ ਨਾਸੁ ॥
ता ते गउहरु ग्यान प्रगटु उजीआरउ दुख दरिद्र अंध्यार को नासु ॥
इसलिए परम ज्ञान का उजाला हुआ और दुख-दारिद्रय का अंधेरा नष्ट हो गया।

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