ਨਿਰਮਲ ਹੋਇ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹਾਰਾ ਚੀਤ ॥
निरमल होइ तुम्हारा चीत ॥
इससे तुम्हारा चित्त निर्मल हो जाएगा।
ਮਨ ਤਨ ਕੀ ਸਭ ਮਿਟੈ ਬਲਾਇ ॥
मन तन की सभ मिटै बलाइ ॥
मन-तन की सब चिन्ता-परेशानियों मिट जाएँगी और
ਦੂਖੁ ਅੰਧੇਰਾ ਸਗਲਾ ਜਾਇ ॥੧॥
दूखु अंधेरा सगला जाइ ॥१॥
दुख का सारा अन्धेरा नाश हो जाएगा ॥ १॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਤ ਤਰੀਐ ਸੰਸਾਰੁ ॥
हरि गुण गावत तरीऐ संसारु ॥
हरि का गुणगान करने से संसार-सागर से पार हुआ जाता है और
ਵਡ ਭਾਗੀ ਪਾਈਐ ਪੁਰਖੁ ਅਪਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
वड भागी पाईऐ पुरखु अपारु ॥१॥ रहाउ ॥
भाग्यशाली को ही अपार परमेश्वर मिलता है॥ १॥ रहाउ॥
ਜੋ ਜਨੁ ਕਰੈ ਕੀਰਤਨੁ ਗੋਪਾਲ ॥
जो जनु करै कीरतनु गोपाल ॥
जो व्यक्ति भगवान का कीर्तन करता है,
ਤਿਸ ਕਉ ਪੋਹਿ ਨ ਸਕੈ ਜਮਕਾਲੁ ॥
तिस कउ पोहि न सकै जमकालु ॥
यमराज भी उसके निकट नहीं आ सकता।
ਜਗ ਮਹਿ ਆਇਆ ਸੋ ਪਰਵਾਣੁ ॥
जग महि आइआ सो परवाणु ॥
जग में उसका जन्म ही सफल है
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਪਨਾ ਖਸਮੁ ਪਛਾਣੁ ॥੨॥
गुरमुखि अपना खसमु पछाणु ॥२॥
जो गुरुमुख बनकर अपने मालिक को पहचान लेता है ॥२ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
हरि गुण गावै संत प्रसादि ॥
संत की कृपा से जो व्यक्ति हरि का स्तुतिगान करता है,
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਮਿਟਹਿ ਉਨਮਾਦ ॥
काम क्रोध मिटहि उनमाद ॥
काम, क्रोध एवं उन्माद उसके मन से मिट जाते हैं।
ਸਦਾ ਹਜੂਰਿ ਜਾਣੁ ਭਗਵੰਤ ॥
सदा हजूरि जाणु भगवंत ॥
सदैव भगवान को अपने आस-पास समझो
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕਾ ਪੂਰਨ ਮੰਤ ॥੩॥
पूरे गुर का पूरन मंत ॥३॥
पूर्ण गुरु का यह पूर्ण मंत्र है॥ ३॥
ਹਰਿ ਧਨੁ ਖਾਟਿ ਕੀਏ ਭੰਡਾਰ ॥
हरि धनु खाटि कीए भंडार ॥
हरि नाम रूपी धन प्राप्त करके भण्डार भर लिए हैं और
ਮਿਲਿ ਸਤਿਗੁਰ ਸਭਿ ਕਾਜ ਸਵਾਰ ॥
मिलि सतिगुर सभि काज सवार ॥
सतगुरु को मिलकर सब कार्य संवार लिए हैं।
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਰੰਗ ਸੰਗਿ ਜਾਗਾ ॥
हरि के नाम रंग संगि जागा ॥
हरि के नाम रंग से मन जाग गया है।
ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਨਾਨਕ ਮਨੁ ਲਾਗਾ ॥੪॥੧੪॥੧੬॥
हरि चरणी नानक मनु लागा ॥४॥१४॥१६॥
है नानक ! अब मन हरि-चरणों में लीन हो गया है ॥ ४ ॥१४॥ १६ ॥
ਗੋਂਡ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गोंड महला ५ ॥
गोंड महला ५ ॥
ਭਵ ਸਾਗਰ ਬੋਹਿਥ ਹਰਿ ਚਰਣ ॥
भव सागर बोहिथ हरि चरण ॥
हरी के चरण ही भवसागर से पार करवाने के लिए जहाज है।
ਸਿਮਰਤ ਨਾਮੁ ਨਾਹੀ ਫਿਰਿ ਮਰਣ ॥
सिमरत नामु नाही फिरि मरण ॥
नाम स्मरण करने से जीव की दोबारा मृत्यु नहीं होती।
ਹਰਿ ਗੁਣ ਰਮਤ ਨਾਹੀ ਜਮ ਪੰਥ ॥
हरि गुण रमत नाही जम पंथ ॥
हरि का गुणगान करने से यम के मार्ग पर नहीं जाना पड़ता।
ਮਹਾ ਬੀਚਾਰ ਪੰਚ ਦੂਤਹ ਮੰਥ ॥੧॥
महा बीचार पंच दूतह मंथ ॥१॥
प्रभु का चिंतन कामादिक पाँच दूतों का नाश कर देता है।१॥
ਤਉ ਸਰਣਾਈ ਪੂਰਨ ਨਾਥ ॥
तउ सरणाई पूरन नाथ ॥
हे पूर्ण नाथ ! मैं तेरी शरण में आया हूँ,
ਜੰਤ ਅਪਨੇ ਕਉ ਦੀਜਹਿ ਹਾਥ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जंत अपने कउ दीजहि हाथ ॥१॥ रहाउ ॥
अपने जीव को हाथ देकर रक्षा कीजिए। १॥ रहाउ ॥
ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਬੇਦ ਪੁਰਾਣ ॥
सिम्रिति सासत्र बेद पुराण ॥
स्मृति, शास्त्र, वेद एवं पुराण
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕਾ ਕਰਹਿ ਵਖਿਆਣ ॥
पारब्रहम का करहि वखिआण ॥
भगवान् की महिमा का ही बखान करते हैं।
ਜੋਗੀ ਜਤੀ ਬੈਸਨੋ ਰਾਮਦਾਸ ॥
जोगी जती बैसनो रामदास ॥
योगी, ब्रह्मचारी, वैष्णव तथा रामदास भी
ਮਿਤਿ ਨਾਹੀ ਬ੍ਰਹਮ ਅਬਿਨਾਸ ॥੨॥
मिति नाही ब्रहम अबिनास ॥२॥
अविनाशी ब्रह्मा के विस्तार को नहीं जानते ॥२॥
ਕਰਣ ਪਲਾਹ ਕਰਹਿ ਸਿਵ ਦੇਵ ॥
करण पलाह करहि सिव देव ॥
शिवशंकर जैसे देव भी उसे पाने के लिए करुणा करते हैं
ਤਿਲੁ ਨਹੀ ਬੂਝਹਿ ਅਲਖ ਅਭੇਵ ॥
तिलु नही बूझहि अलख अभेव ॥
लेकिन तिल मात्र भी अलक्ष्य अभेद परमात्मा को नहीं बुझते।
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਜਿਸੁ ਆਪੇ ਦੇਇ ॥
प्रेम भगति जिसु आपे देइ ॥
जिसे वह अपनी प्रेम-भक्ति देता है,”
ਜਗ ਮਹਿ ਵਿਰਲੇ ਕੇਈ ਕੇਇ ॥੩॥
जग महि विरले केई केइ ॥३॥
इस में ऐसे व्यक्ति विरले ही हैं।३ ।
ਮੋਹਿ ਨਿਰਗੁਣ ਗੁਣੁ ਕਿਛਹੂ ਨਾਹਿ ॥
मोहि निरगुण गुणु किछहू नाहि ॥
मुझ गुणहीन में कोई भी गुण नहीं है और
ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਤੇਰੀ ਦ੍ਰਿਸਟੀ ਮਾਹਿ ॥
सरब निधान तेरी द्रिसटी माहि ॥
सब खजाने तेरी -दृष्टि में ही हैं।
ਨਾਨਕੁ ਦੀਨੁ ਜਾਚੈ ਤੇਰੀ ਸੇਵ ॥
नानकु दीनु जाचै तेरी सेव ॥
दीन नानक तो तेरी सेवा ही चाहता है,
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਦੀਜੈ ਗੁਰਦੇਵ ॥੪॥੧੫॥੧੭॥
करि किरपा दीजै गुरदेव ॥४॥१५॥१७॥
हे गुरुदेव ! कृपा करके मुझे अपनी सेवा दीजिए ॥४॥१५॥१७॥
ਗੋਂਡ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गोंड महला ५ ॥
गोंड महला ५ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਲੀਆ ਧਰਤਿ ਬਿਦਾਰਉ ॥
संत का लीआ धरति बिदारउ ॥
संत का तिरस्कृत व्यक्ति धरती से अलग कर देना चाहिए और
ਸੰਤ ਕਾ ਨਿੰਦਕੁ ਅਕਾਸ ਤੇ ਟਾਰਉ ॥
संत का निंदकु अकास ते टारउ ॥
संत का निंदक तो आकाश से नीचे फेंक देना चाहिए।
ਸੰਤ ਕਉ ਰਾਖਉ ਅਪਨੇ ਜੀਅ ਨਾਲਿ ॥
संत कउ राखउ अपने जीअ नालि ॥
संत को अपने प्राणों से लगाकर रखो
ਸੰਤ ਉਧਾਰਉ ਤਤਖਿਣ ਤਾਲਿ ॥੧॥
संत उधारउ ततखिण तालि ॥१॥
चूंकि संत का संग तत्क्षण उद्धार कर देता है ॥ १॥
ਸੋਈ ਸੰਤੁ ਜਿ ਭਾਵੈ ਰਾਮ ॥
सोई संतु जि भावै राम ॥
वही संत है, जो राम को प्यारा लगता है।
ਸੰਤ ਗੋਬਿੰਦ ਕੈ ਏਕੈ ਕਾਮ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
संत गोबिंद कै एकै काम ॥१॥ रहाउ ॥
गोविंद और संत का एक ही काम है॥ १॥ रहाउ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਊਪਰਿ ਦੇਇ ਪ੍ਰਭੁ ਹਾਥ ॥
संत कै ऊपरि देइ प्रभु हाथ ॥
प्रभु अपना हाथ रखकर संत की रक्षा करता है और
ਸੰਤ ਕੈ ਸੰਗਿ ਬਸੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ॥
संत कै संगि बसै दिनु राति ॥
दिन-रात संत के साथ ही रहता है।
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸੰਤਹ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਿ ॥
सासि सासि संतह प्रतिपालि ॥
यह श्वास-श्वास संतों का प्रतिपालक बनता है।
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਰਾਜ ਤੇ ਟਾਲਿ ॥੨॥
संत का दोखी राज ते टालि ॥२॥
संत का दोषी अपना राज भी गंवा देता है ॥ २॥
ਸੰਤ ਕੀ ਨਿੰਦਾ ਕਰਹੁ ਨ ਕੋਇ ॥
संत की निंदा करहु न कोइ ॥
हे भाई! कोई भी संत की निंदा न करो;
ਜੋ ਨਿੰਦੈ ਤਿਸ ਕਾ ਪਤਨੁ ਹੋਇ ॥
जो निंदै तिस का पतनु होइ ॥
जो भी उनकी निंदा करता है, उसका पतन हो जाता है।
ਜਿਸ ਕਉ ਰਾਖੈ ਸਿਰਜਨਹਾਰੁ ॥
जिस कउ राखै सिरजनहारु ॥
जिसकी रक्षा सृजनहार करता है,
ਝਖ ਮਾਰਉ ਸਗਲ ਸੰਸਾਰੁ ॥੩॥
झख मारउ सगल संसारु ॥३॥
सारा संसार व्यर्थ ही उसका बुरा करने के लिए ठोकरें खाता रहता है ॥३॥
ਪ੍ਰਭ ਅਪਨੇ ਕਾ ਭਇਆ ਬਿਸਾਸੁ ॥
प्रभ अपने का भइआ बिसासु ॥
संत को अपने प्रभु पर अटल विश्वास हो गया है,
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤਿਸ ਕੀ ਰਾਸਿ ॥
जीउ पिंडु सभु तिस की रासि ॥
यह जीवन एवं शरीर सब उसकी ही दी हुई राशि है।
ਨਾਨਕ ਕਉ ਉਪਜੀ ਪਰਤੀਤਿ ॥
नानक कउ उपजी परतीति ॥
नानक के मन में यह निष्ठा उत्पन्न हो गई है कि
ਮਨਮੁਖ ਹਾਰ ਗੁਰਮੁਖ ਸਦ ਜੀਤਿ ॥੪॥੧੬॥੧੮॥
मनमुख हार गुरमुख सद जीति ॥४॥१६॥१८॥
मनमुख जीवन में हार जाता है और गुरुमुख सदा जीत प्राप्त करता है ॥४॥१६॥१८॥
ਗੋਂਡ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गोंड महला ५ ॥
गोंड महला ५ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਨੀਰਿ ਨਰਾਇਣ ॥
नामु निरंजनु नीरि नराइण ॥
नारायण का पावन नाम शुद्ध जल की तरह है,
ਰਸਨਾ ਸਿਮਰਤ ਪਾਪ ਬਿਲਾਇਣ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
रसना सिमरत पाप बिलाइण ॥१॥ रहाउ ॥
जिसका जिव्हा द्वारा सिमरन करने से सारे पाप नाश हो जाते हैं ॥ १॥ रहाउ ॥