Hindi Page 1084

ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ਸੋਈ ਕਾਜੀ ॥
सचु कमावै सोई काजी ॥
सत्य का आचरण अपनाने वाला ही सच्चा काजी हैं।

ਜੋ ਦਿਲੁ ਸੋਧੈ ਸੋਈ ਹਾਜੀ ॥
जो दिलु सोधै सोई हाजी ॥
जो अपने दिल को शुद्ध कर लेता है, वास्तव में वहीं मक्के का हज्ज़ करने वाला हाजी है।

ਸੋ ਮੁਲਾ ਮਲਊਨ ਨਿਵਾਰੈ ਸੋ ਦਰਵੇਸੁ ਜਿਸੁ ਸਿਫਤਿ ਧਰਾ ॥੬॥
सो मुला मलऊन निवारै सो दरवेसु जिसु सिफति धरा ॥६॥
वहीं मुल्ला हैं, जो अपने मन की अहम् रूपी मैल को दूर करता है और दरवेश वहीं कहलाता है,जो अल्लाह की प्रशंसा का सहारा लेता है॥६॥

ਸਭੇ ਵਖਤ ਸਭੇ ਕਰਿ ਵੇਲਾ ॥ ਖਾਲਕੁ ਯਾਦਿ ਦਿਲੈ ਮਹਿ ਮਉਲਾ ॥
सभे वखत सभे करि वेला ॥ खालकु यादि दिलै महि मउला ॥
हर वक्त को बंदगी करने का समय बना लो,” दुनिया को बनाने वाले उस परवरदगार को हर समय अपने दिल में याद करो।

ਤਸਬੀ ਯਾਦਿ ਕਰਹੁ ਦਸ ਮਰਦਨੁ ਸੁੰਨਤਿ ਸੀਲੁ ਬੰਧਾਨਿ ਬਰਾ ॥੭॥
तसबी यादि करहु दस मरदनु सुंनति सीलु बंधानि बरा ॥७॥
खुदा को याद करते रहो, यहीं तस्बीह अर्थात् माला जपना है, दस इन्द्रियों को मार देना ही सुन्नत करवाना है और शील स्वभाव ही सबसे बड़ा नियंत्रण है॥७॥

ਦਿਲ ਮਹਿ ਜਾਨਹੁ ਸਭ ਫਿਲਹਾਲਾ ॥
दिल महि जानहु सभ फिलहाला ॥
अपने दिल में यह बात समझ लो जगत् का सब कुछ थोड़े समय के लिए ही रहने वाला हैं।

ਖਿਲਖਾਨਾ ਬਿਰਾਦਰ ਹਮੂ ਜੰਜਾਲਾ ॥
खिलखाना बिरादर हमू जंजाला ॥
है मेरे भाई ! परिवार एवं घरबार जंजाल ही हैं।

ਮੀਰ ਮਲਕ ਉਮਰੇ ਫਾਨਾਇਆ ਏਕ ਮੁਕਾਮ ਖੁਦਾਇ ਦਰਾ ॥੮॥
मीर मलक उमरे फानाइआ एक मुकाम खुदाइ दरा ॥८॥
एक खुदा का दरबार ही सदा अटल रहने वाला मुकाम है और बादशाह, मलिक एवं सरदार फना होने वाले हैं॥ ८॥

ਅਵਲਿ ਸਿਫਤਿ ਦੂਜੀ ਸਾਬੂਰੀ ॥
अवलि सिफति दूजी साबूरी ॥
अल्लाह की प्रशंसा पहली नमाज, संतोष रखना दूसरी नमाज,”

ਤੀਜੈ ਹਲੇਮੀ ਚਉਥੈ ਖੈਰੀ ॥
तीजै हलेमी चउथै खैरी ॥
नम्रता धारण करना तीसरे वक्त की नमाज, जरुरतमंदों को दान-पुण्य करना चौथी नमाज और

ਪੰਜਵੈ ਪੰਜੇ ਇਕਤੁ ਮੁਕਾਮੈ ਏਹਿ ਪੰਜਿ ਵਖਤ ਤੇਰੇ ਅਪਰਪਰਾ ॥੯॥
पंजवै पंजे इकतु मुकामै एहि पंजि वखत तेरे अपरपरा ॥९॥
पॉच इन्द्रियों को एक स्थान पर स्थिर करके रखना तेरी पाँचवी नमाज है। तेरी नमाज़ के ये पाँच वक्त ही सबसे उत्तम हैं॥९॥

ਸਗਲੀ ਜਾਨਿ ਕਰਹੁ ਮਉਦੀਫਾ ॥
सगली जानि करहु मउदीफा ॥
यह समझकर कि खुदा सारी दुनिया में रहता है, इस ज्ञान को वज़ीफा बना अर्थात् अपने मनोरथ पूर्ति का पाठ बना और

ਬਦ ਅਮਲ ਛੋਡਿ ਕਰਹੁ ਹਥਿ ਕੂਜਾ ॥
बद अमल छोडि करहु हथि कूजा ॥
पाप कर्मों के त्याग को हाथ में पकड़ने वाला लोटा बना।

ਖੁਦਾਇ ਏਕੁ ਬੁਝਿ ਦੇਵਹੁ ਬਾਂਗਾਂ ਬੁਰਗੂ ਬਰਖੁਰਦਾਰ ਖਰਾ ॥੧੦॥
खुदाइ एकु बुझि देवहु बांगां बुरगू बरखुरदार खरा ॥१०॥
खुदा को एक ही समझकर मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए बाँग दिया कर और उस खुदा का नेक पुत्र बनना ही बिगुल बजाना है। १०॥

ਹਕੁ ਹਲਾਲੁ ਬਖੋਰਹੁ ਖਾਣਾ ॥
हकु हलालु बखोरहु खाणा ॥
हक की कमाई का ही भोजन किया करो,”

ਦਿਲ ਦਰੀਆਉ ਧੋਵਹੁ ਮੈਲਾਣਾ ॥
दिल दरीआउ धोवहु मैलाणा ॥
अपने दिल को दरिया की तरह बड़ा बनाओं और मन की मैल साफ कर लो।

ਪੀਰੁ ਪਛਾਣੈ ਭਿਸਤੀ ਸੋਈ ਅਜਰਾਈਲੁ ਨ ਦੋਜ ਠਰਾ ॥੧੧॥
पीरु पछाणै भिसती सोई अजराईलु न दोज ठरा ॥११॥
अपने पीर को पहचान कर सेवा में लीन रहने वाला ही बिहिश्त में जाने का हकदार हैं और मृत्यु का फरिश्ता (यम) उसे दोजख (नरक) में नहीं डालता॥ ११॥

ਕਾਇਆ ਕਿਰਦਾਰ ਅਉਰਤ ਯਕੀਨਾ ॥
काइआ किरदार अउरत यकीना ॥
जिस शरीर द्वारा तू शुभाशुभ कर्म करता है, उसे अपनी विश्वासपात्र औरत बना और

ਰੰਗ ਤਮਾਸੇ ਮਾਣਿ ਹਕੀਨਾ ॥
रंग तमासे माणि हकीना ॥
फिर उस द्वारा खुदा को मिलकर रंग-तमाशों का आनंद भोग।

ਨਾਪਾਕ ਪਾਕੁ ਕਰਿ ਹਦੂਰਿ ਹਦੀਸਾ ਸਾਬਤ ਸੂਰਤਿ ਦਸਤਾਰ ਸਿਰਾ ॥੧੨॥
नापाक पाकु करि हदूरि हदीसा साबत सूरति दसतार सिरा ॥१२॥
हे नापाक बंदे ! अपने आपको पवित्र बना। खुदा को साक्षात् समझना ही कुरान की हदीसों को पढ़ना हैं। साबत सूरत रहना ही सिर पर पगड़ी पहनना है॥ १२॥

ਮੁਸਲਮਾਣੁ ਮੋਮ ਦਿਲਿ ਹੋਵੈ ॥
मुसलमाणु मोम दिलि होवै ॥
सच्चा मुसलमान वहीं है, जिसका दिल मोम की तरह नरम होता है,”

ਅੰਤਰ ਕੀ ਮਲੁ ਦਿਲ ਤੇ ਧੋਵੈ ॥
अंतर की मलु दिल ते धोवै ॥
वह अपने अन्तर्मन की मैल को दिल से धो देता है।

ਦੁਨੀਆ ਰੰਗ ਨ ਆਵੈ ਨੇੜੈ ਜਿਉ ਕੁਸਮ ਪਾਟੁ ਘਿਉ ਪਾਕੁ ਹਰਾ ॥੧੩॥
दुनीआ रंग न आवै नेड़ै जिउ कुसम पाटु घिउ पाकु हरा ॥१३॥
वह दुनिया के रंग-तमाशों के निकट नहीं आता और यूं पवित्र होता है, जिस प्रकार फूल, रेशम, घी एवं मृग-चरम पाक पवित्र होता है| १३॥

ਜਾ ਕਉ ਮਿਹਰ ਮਿਹਰ ਮਿਹਰਵਾਨਾ ॥
जा कउ मिहर मिहर मिहरवाना ॥
जिस पर मेहरबान अल्लाह की मेहर होती है,”

ਸੋਈ ਮਰਦੁ ਮਰਦੁ ਮਰਦਾਨਾ ॥
सोई मरदु मरदु मरदाना ॥
वास्तव में वहीं मर्दो में शूरवीर मर्द है।

ਸੋਈ ਸੇਖੁ ਮਸਾਇਕੁ ਹਾਜੀ ਸੋ ਬੰਦਾ ਜਿਸੁ ਨਜਰਿ ਨਰਾ ॥੧੪॥
सोई सेखु मसाइकु हाजी सो बंदा जिसु नजरि नरा ॥१४॥
जिस पर खुदा की कृपा-दृष्टि है, वहीं शेख, शेखों का पीर, हाजी एवं खुदा का नेक बंदा है॥ १४॥

ਕੁਦਰਤਿ ਕਾਦਰ ਕਰਣ ਕਰੀਮਾ ॥
कुदरति कादर करण करीमा ॥
हे कृपालु, रहमदिल, सच्चे खुदा ! तू कुदरत का रचयिता है,”

ਸਿਫਤਿ ਮੁਹਬਤਿ ਅਥਾਹ ਰਹੀਮਾ ॥
सिफति मुहबति अथाह रहीमा ॥
सब को बनाने वाला है, तेरी स्तुति एवं मुहब्बत अथाह है, तेरा हुक्म भी सत्य है।

ਹਕੁ ਹੁਕਮੁ ਸਚੁ ਖੁਦਾਇਆ ਬੁਝਿ ਨਾਨਕ ਬੰਦਿ ਖਲਾਸ ਤਰਾ ॥੧੫॥੩॥੧੨॥
हकु हुकमु सचु खुदाइआ बुझि नानक बंदि खलास तरा ॥१५॥३॥१२॥
हे नानक ! उस खुदा के भेद को बूझने वाला आदमी बन्धनों से मुक्त होकर संसार-सागर से पार हो जाता हैं॥१५॥ ३॥ १२॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
मारू महला ५ ॥
मारू महला ५॥

ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਸਭ ਊਚ ਬਿਰਾਜੇ ॥
पारब्रहम सभ ऊच बिराजे ॥
परब्रहा सर्वोच्च स्थान पर विराजमान है,”

ਆਪੇ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪੇ ਸਾਜੇ ॥
आपे थापि उथापे साजे ॥
सारी दुनिया को बनाने, मिटाने एवं पुनः स्थापना करने वाला भी वह आप ही हैं।

ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਸਰਣਿ ਗਹਤ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਕਿਛੁ ਭਉ ਨ ਵਿਆਪੈ ਬਾਲ ਕਾ ॥੧॥
प्रभ की सरणि गहत सुखु पाईऐ किछु भउ न विआपै बाल का ॥१॥
उस सर्वोच्च शक्ति प्रभु की शरण लेने से ही सुख प्राप्त होता है और मृत्यु इत्यादि कोई भय व्याप्त नहीं होता॥१॥

ਗਰਭ ਅਗਨਿ ਮਹਿ ਜਿਨਹਿ ਉਬਾਰਿਆ ॥
गरभ अगनि महि जिनहि उबारिआ ॥
जिस निरंकार ने गर्भ-अग्नि में से बचाया है,”

ਰਕਤ ਕਿਰਮ ਮਹਿ ਨਹੀ ਸੰਘਾਰਿਆ ॥
रकत किरम महि नही संघारिआ ॥
माँ के रक्त में छोटा-सा कृमि होने के बावजूद भी मिटने नहीं दिया,”

ਅਪਨਾ ਸਿਮਰਨੁ ਦੇ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਿਆ ਓਹੁ ਸਗਲ ਘਟਾ ਕਾ ਮਾਲਕਾ ॥੨॥
अपना सिमरनु दे प्रतिपालिआ ओहु सगल घटा का मालका ॥२॥
जिसने अपना सिमरन देकर पोषण किया है, वह सब शरीरों का मालिक हैं॥२३॥

ਚਰਣ ਕਮਲ ਸਰਣਾਈ ਆਇਆ ॥
चरण कमल सरणाई आइआ ॥
मैं तो प्रभु के चरण-कमल की शरण में आया हैं,”

ਸਾਧਸੰਗਿ ਹੈ ਹਰਿ ਜਸੁ ਗਾਇਆ ॥
साधसंगि है हरि जसु गाइआ ॥
सज्जन साधुओं के संग ईश्वर का हीं यश गाया है।

ਜਨਮ ਮਰਣ ਸਭਿ ਦੂਖ ਨਿਵਾਰੇ ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਭਉ ਨਹੀ ਕਾਲ ਕਾ ॥੩॥
जनम मरण सभि दूख निवारे जपि हरि हरि भउ नही काल का ॥३॥
परमात्मा का नाम जपने से जन्म-मरण के सभी दुख टूट जाते हैं और मृत्यु का भय भी नहीं रहता॥३॥

ਸਮਰਥ ਅਕਥ ਅਗੋਚਰ ਦੇਵਾ ॥
समरथ अकथ अगोचर देवा ॥
देवाधिदेव सर्वोच्च शक्ति परमेश्वर सर्वकला समर्थ हैं, उसकी लीलाएँ अकथनीय हैं, वह अदृष्ट है।

ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਤਾ ਕੀ ਸੇਵਾ ॥
जीअ जंत सभि ता की सेवा ॥
सृष्टि के सब जीव उसकी ही उपासना करते हैं।

ਅੰਡਜ ਜੇਰਜ ਸੇਤਜ ਉਤਭੁਜ ਬਹੁ ਪਰਕਾਰੀ ਪਾਲਕਾ ॥੪॥
अंडज जेरज सेतज उतभुज बहु परकारी पालका ॥४॥
अण्डज, जेरज, स्वदेज एवं उभिज्ज से पैदा होने वाले अनेक प्रकार के सब जीवों का पोषण कर रहा है॥४॥

ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ਨਿਧਾਨਾ ॥
तिसहि परापति होइ निधाना ॥
सुखों का खजाना उसे ही प्राप्त होता है,”

ਰਾਮ ਨਾਮ ਰਸੁ ਅੰਤਰਿ ਮਾਨਾ ॥
राम नाम रसु अंतरि माना ॥
जो अपने अन्तर्मन में राम नाम का आनंद लेता है।

ਕਰੁ ਗਹਿ ਲੀਨੇ ਅੰਧ ਕੂਪ ਤੇ ਵਿਰਲੇ ਕੇਈ ਸਾਲਕਾ ॥੫॥
करु गहि लीने अंध कूप ते विरले केई सालका ॥५॥
उसने स्वयं ही हाथ पकड़कर संसार-सागर रूपी अन्धकूप में से बाहर निकाल लिया है, परन्तु कोई विरला ही ऐसा साधक है॥५॥

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