ਰਾਗੁ ਬਸੰਤੁ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੧ ਚਉਪਦੇ ਦੁਤੁਕੇ
रागु बसंतु महला १ घरु १ चउपदे दुतुके
रागु बसंतु महला १ घरु १ चउपदे दुतुके
ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਅਜੂਨੀ ਸੈਭੰ ਗੁਰਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
ईश्वर एक है, उसका नाम सत्य है, वह कर्ता पुरुष है, सर्वशक्तिमान है, उसे कोई भय नहीं, सब पर सम-दृष्टि होने के कारण वह निर्वेर है, वह कालातीत ब्रह्म-मूर्ति सदा अमर है, वह योनि-चक्र से रहित है, स्वजन्मा है, गुरु की कृपा से प्राप्त होता है।
ਮਾਹਾ ਮਾਹ ਮੁਮਾਰਖੀ ਚੜਿਆ ਸਦਾ ਬਸੰਤੁ ॥
माहा माह मुमारखी चड़िआ सदा बसंतु ॥
महीनों में सबसे मुबारक महीना वसंत आ गया है, यह सदा ही खिला रहने वाला है।
ਪਰਫੜੁ ਚਿਤ ਸਮਾਲਿ ਸੋਇ ਸਦਾ ਸਦਾ ਗੋਬਿੰਦੁ ॥੧॥
परफड़ु चित समालि सोइ सदा सदा गोबिंदु ॥१॥
हे मन ! तुम खुशियों से झूमकर सर्वदा परमात्मा का स्मरण करो॥१॥
ਭੋਲਿਆ ਹਉਮੈ ਸੁਰਤਿ ਵਿਸਾਰਿ ॥
भोलिआ हउमै सुरति विसारि ॥
हे भोले ! अहम्-वृति को छोड़ दे,
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਬੀਚਾਰਿ ਮਨ ਗੁਣ ਵਿਚਿ ਗੁਣੁ ਲੈ ਸਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हउमै मारि बीचारि मन गुण विचि गुणु लै सारि ॥१॥ रहाउ ॥
अहम् को मारकर मन में चिंतन कर और सर्वोत्तम गुणों को संभाल ले॥१॥ रहाउ॥
ਕਰਮ ਪੇਡੁ ਸਾਖਾ ਹਰੀ ਧਰਮੁ ਫੁਲੁ ਫਲੁ ਗਿਆਨੁ ॥
करम पेडु साखा हरी धरमु फुलु फलु गिआनु ॥
सम्पूर्ण विश्व कर्म रूपी पेड़ है, हरि-नाम इसकी शाखाएँ हैं, धर्म करना इसका फूल है और ज्ञान की प्राप्ति फल है।
ਪਤ ਪਰਾਪਤਿ ਛਾਵ ਘਣੀ ਚੂਕਾ ਮਨ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥੨॥
पत परापति छाव घणी चूका मन अभिमानु ॥२॥
जब पत्तों के रूप में घनी छाँव प्राप्त होती है तो मन का अभिमान निवृत्त हो जाता है।॥२॥
ਅਖੀ ਕੁਦਰਤਿ ਕੰਨੀ ਬਾਣੀ ਮੁਖਿ ਆਖਣੁ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ॥
अखी कुदरति कंनी बाणी मुखि आखणु सचु नामु ॥
उसकी सुन्दर प्रकृति आँखों से नसीब होती है, कानों से मधुर वाणी नसीब होती है।
ਪਤਿ ਕਾ ਧਨੁ ਪੂਰਾ ਹੋਆ ਲਾਗਾ ਸਹਜਿ ਧਿਆਨੁ ॥੩॥
पति का धनु पूरा होआ लागा सहजि धिआनु ॥३॥
अगर सहज स्वभाव परमात्मा में ध्यान लगाया जाए तो लोक-परलोक में प्रतिष्ठा का पूरा धन उपलब्ध हो जाता है॥३॥
ਮਾਹਾ ਰੁਤੀ ਆਵਣਾ ਵੇਖਹੁ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥
माहा रुती आवणा वेखहु करम कमाइ ॥
हे भाई ! महीने और ऋतुएँ तो आने जाने वाली हैं, अतः नाम स्मरण रूपी सच्ची कर्म कमाई करके देख लो।
ਨਾਨਕ ਹਰੇ ਨ ਸੂਕਹੀ ਜਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਹੇ ਸਮਾਇ ॥੪॥੧॥
नानक हरे न सूकही जि गुरमुखि रहे समाइ ॥४॥१॥
गुरु नानक साहिब का फुरमान है कि जो गुरु के निर्देशानुसार प्रभु-नाम स्मरण में लीन रहते हैं, वे कभी नहीं सूखते और सदा हरे-भरे रहते हैं।॥४॥१॥
ਮਹਲਾ ੧ ਬਸੰਤੁ ॥
महला १ बसंतु ॥
महला १ बसंतु॥
ਰੁਤਿ ਆਈਲੇ ਸਰਸ ਬਸੰਤ ਮਾਹਿ ॥
रुति आईले सरस बसंत माहि ॥
रमणीय ऋतु वसंत का महीना आ गया है।
ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਰਵਹਿ ਸਿ ਤੇਰੈ ਚਾਇ ॥
रंगि राते रवहि सि तेरै चाइ ॥
हे परमेश्वर ! जो तेरे रंग में लीन रहते हैं, वे तुझे पाने के चाव में मस्त रहते हैं।
ਕਿਸੁ ਪੂਜ ਚੜਾਵਉ ਲਗਉ ਪਾਇ ॥੧॥
किसु पूज चड़ावउ लगउ पाइ ॥१॥
तेरे सिवा किसकी पूजा के लिए अर्चना-सामग्री भेंट करूँ, तेरे सिवा किसके पाँव छू सकता हूँ॥१॥
ਤੇਰਾ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸਾ ਕਹਉ ਰਾਇ ॥
तेरा दासनि दासा कहउ राइ ॥
हे मालिक ! तेरे दासों का दास कहलाता हूँ,
ਜਗਜੀਵਨ ਜੁਗਤਿ ਨ ਮਿਲੈ ਕਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जगजीवन जुगति न मिलै काइ ॥१॥ रहाउ ॥
हे संसार के जीवन ! (भक्ति के सिवा) किसी भी युक्ति से तुझे पाया नहीं जा सकता॥१॥ रहाउ॥
ਤੇਰੀ ਮੂਰਤਿ ਏਕਾ ਬਹੁਤੁ ਰੂਪ ॥
तेरी मूरति एका बहुतु रूप ॥
तेरी मूर्ति एक ही है, पर तेरे रूप अनेक हैं।
ਕਿਸੁ ਪੂਜ ਚੜਾਵਉ ਦੇਉ ਧੂਪ ॥
किसु पूज चड़ावउ देउ धूप ॥
फिर तेरे सिवा किसकी पूजा-अर्चना करूं, तेरे अतिरिक्त किसे धूप बत्ती इत्यादि भेंट करूँ।
ਤੇਰਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਇਆ ਕਹਾ ਪਾਇ ॥
तेरा अंतु न पाइआ कहा पाइ ॥
तेरा रहस्य कहीं भी प्राप्त नहीं हो सकता।
ਤੇਰਾ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸਾ ਕਹਉ ਰਾਇ ॥੨॥
तेरा दासनि दासा कहउ राइ ॥२॥
हे मालिक ! तेरे दासों का दास कहलाना चाहता हूँ॥२॥
ਤੇਰੇ ਸਠਿ ਸੰਬਤ ਸਭਿ ਤੀਰਥਾ ॥
तेरे सठि स्मबत सभि तीरथा ॥
साठ संवत, सभी तीर्थ तेरे ही हैं।
ਤੇਰਾ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਪਰਮੇਸਰਾ ॥
तेरा सचु नामु परमेसरा ॥
हे परमेश्वर ! तेरा नाम शाश्वत है।
ਤੇਰੀ ਗਤਿ ਅਵਿਗਤਿ ਨਹੀ ਜਾਣੀਐ ॥
तेरी गति अविगति नही जाणीऐ ॥
तेरी गति-ज्ञान जाना नहीं जा सकता और
ਅਣਜਾਣਤ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੀਐ ॥੩॥
अणजाणत नामु वखाणीऐ ॥३॥
बिना जाने ही तेरे नाम का उच्चारण करना चाहिए॥३॥
ਨਾਨਕੁ ਵੇਚਾਰਾ ਕਿਆ ਕਹੈ ॥
नानकु वेचारा किआ कहै ॥
नानक बेचारा भला तेरी क्या स्तुति कर सकता है,
ਸਭੁ ਲੋਕੁ ਸਲਾਹੇ ਏਕਸੈ ॥
सभु लोकु सलाहे एकसै ॥
सभी लोग एकमात्र तेरी ही प्रशंसा कर रहे हैं।
ਸਿਰੁ ਨਾਨਕ ਲੋਕਾ ਪਾਵ ਹੈ ॥
सिरु नानक लोका पाव है ॥
नानक का सिर उन महापुरुषों के पांवों पर पड़ा हुआ है।
ਬਲਿਹਾਰੀ ਜਾਉ ਜੇਤੇ ਤੇਰੇ ਨਾਵ ਹੈ ॥੪॥੨॥
बलिहारी जाउ जेते तेरे नाव है ॥४॥२॥
हे संसार के पालक ! जितने भी तेरे नाम हैं, मैं उन पर कुर्बान जाता हूँ॥४॥२॥
ਬਸੰਤੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
बसंतु महला १ ॥
बसंतु महला १॥
ਸੁਇਨੇ ਕਾ ਚਉਕਾ ਕੰਚਨ ਕੁਆਰ ॥
सुइने का चउका कंचन कुआर ॥
अगर किसी ने सोने का चौका तैयार किया हो, सोने के बर्तन वहाँ उपयोग करे,
ਰੁਪੇ ਕੀਆ ਕਾਰਾ ਬਹੁਤੁ ਬਿਸਥਾਰੁ ॥
रुपे कीआ कारा बहुतु बिसथारु ॥
चाँदी की रेखाएँ दूर-दूर तक खींच ले,
ਗੰਗਾ ਕਾ ਉਦਕੁ ਕਰੰਤੇ ਕੀ ਆਗਿ ॥
गंगा का उदकु करंते की आगि ॥
खाना पकाने के लिए पावन गंगा का जल एवं पवित्र अग्नि उपयोग करे,
ਗਰੁੜਾ ਖਾਣਾ ਦੁਧ ਸਿਉ ਗਾਡਿ ॥੧॥
गरुड़ा खाणा दुध सिउ गाडि ॥१॥
दूध में मिला कर भोजन पकाता है।॥१॥
ਰੇ ਮਨ ਲੇਖੈ ਕਬਹੂ ਨ ਪਾਇ ॥
रे मन लेखै कबहू न पाइ ॥
हे मन ! ऐसा कोई भी कर्मकाण्ड परमात्मा को मंजूर नहीं होता,