ਮੇਰੇ ਮਨ ਨਾਮੁ ਹਿਰਦੈ ਧਾਰਿ ॥
मेरे मन नामु हिरदै धारि ॥
हे मेरे मन ! हृदय में प्रभु नाम को धारण करो;
ਕਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਮਨੁ ਤਨੁ ਲਾਇ ਹਰਿ ਸਿਉ ਅਵਰ ਸਗਲ ਵਿਸਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
करि प्रीति मनु तनु लाइ हरि सिउ अवर सगल विसारि ॥१॥ रहाउ ॥
अन्य सबकुछ भुलाकर मन-तन से भगवान से प्रीति करो॥ १॥ रहाउ॥
ਜੀਉ ਮਨੁ ਤਨੁ ਪ੍ਰਾਣ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਤੂ ਆਪਨ ਆਪੁ ਨਿਵਾਰਿ ॥
जीउ मनु तनु प्राण प्रभ के तू आपन आपु निवारि ॥
यह आत्मा, मन, तन, प्राण सब ईश्वर की देन है, इसलिए तू अपना अहम् त्याग दे।
ਗੋਵਿਦ ਭਜੁ ਸਭਿ ਸੁਆਰਥ ਪੂਰੇ ਨਾਨਕ ਕਬਹੁ ਨ ਹਾਰਿ ॥੨॥੪॥੨੭॥
गोविद भजु सभि सुआरथ पूरे नानक कबहु न हारि ॥२॥४॥२७॥
हे नानक ! गोविंद का भजन करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं और कभी भी निराश नहीं होना पड़ता॥२॥४॥२७॥
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
मारू महला ५ ॥
मारू महला ५॥
ਤਜਿ ਆਪੁ ਬਿਨਸੀ ਤਾਪੁ ਰੇਣ ਸਾਧੂ ਥੀਉ ॥
तजि आपु बिनसी तापु रेण साधू थीउ ॥
हे जीव ! अहं-भावना त्याग दो, हर प्रकार की तकलीफ मिट जाएगी, इसलिए साधुओं की चरणरज बन जाओ।
ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਨਾਮੁ ਤੇਰਾ ਕਰਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਜਿਸੁ ਦੀਉ ॥੧॥
तिसहि परापति नामु तेरा करि क्रिपा जिसु दीउ ॥१॥
हे परमात्मा ! तेरा नाम उसे ही प्राप्त होता है, जिसे तू कृपा करके देता है॥ १॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਉ ॥
मेरे मन नामु अम्रितु पीउ ॥
हे मेरे मन ! नामामृत का पान करो;
ਆਨ ਸਾਦ ਬਿਸਾਰਿ ਹੋਛੇ ਅਮਰੁ ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਜੀਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
आन साद बिसारि होछे अमरु जुगु जुगु जीउ ॥१॥ रहाउ ॥
अन्य तुच्छ स्वाद भुला दो और अमर होकर युग-युग जीओ॥ १॥ रहाउ॥
ਨਾਮੁ ਇਕ ਰਸ ਰੰਗ ਨਾਮਾ ਨਾਮਿ ਲਾਗੀ ਲੀਉ ॥
नामु इक रस रंग नामा नामि लागी लीउ ॥
जिसकी प्रभु-नाम से लगन लगी रहती है, उसके लिए केवल नाम ही पदार्थों के तमाम रस एवं दुनिया के रंग हैं।
ਮੀਤੁ ਸਾਜਨੁ ਸਖਾ ਬੰਧਪੁ ਹਰਿ ਏਕੁ ਨਾਨਕ ਕੀਉ ॥੨॥੫॥੨੮॥
मीतु साजनु सखा बंधपु हरि एकु नानक कीउ ॥२॥५॥२८॥
हे नानक ! एक ईश्वर को ही मैंने अपना मित्र, साजन, सखा एवं बंधु बनाया है॥ २॥ ५॥ २८॥
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
मारू महला ५ ॥
मारू महला ५॥
ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਿ ਮਾਤਾ ਉਦਰਿ ਰਾਖੈ ਲਗਨਿ ਦੇਤ ਨ ਸੇਕ ॥
प्रतिपालि माता उदरि राखै लगनि देत न सेक ॥
जो माता के उदर में जीव का प्रतिपालन करता है, कोई दुख-दर्द नहीं लगने देता,
ਸੋਈ ਸੁਆਮੀ ਈਹਾ ਰਾਖੈ ਬੂਝੁ ਬੁਧਿ ਬਿਬੇਕ ॥੧॥
सोई सुआमी ईहा राखै बूझु बुधि बिबेक ॥१॥
वही स्वामी इहलोक में रक्षा करता है, अपनी विवेक बुद्धि से इस तथ्य को समझ लो॥ १॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਨਾਮ ਕੀ ਕਰਿ ਟੇਕ ॥
मेरे मन नाम की करि टेक ॥
हे मेरे मन ! प्रभु-नाम का सहारा लो;
ਤਿਸਹਿ ਬੂਝੁ ਜਿਨਿ ਤੂ ਕੀਆ ਪ੍ਰਭੁ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਏਕ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तिसहि बूझु जिनि तू कीआ प्रभु करण कारण एक ॥१॥ रहाउ ॥
जिसने तुझे बनाया है, उसे समझो, केवल एक परमात्मा ही रचयिता है॥ १॥ रहाउ॥
ਚੇਤਿ ਮਨ ਮਹਿ ਤਜਿ ਸਿਆਣਪ ਛੋਡਿ ਸਗਲੇ ਭੇਖ ॥
चेति मन महि तजि सिआणप छोडि सगले भेख ॥
सब ढोंग एवं चतुराईयों छोड़कर मन में भगवान को याद करो।
ਸਿਮਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਸਦਾ ਨਾਨਕ ਤਰੇ ਕਈ ਅਨੇਕ ॥੨॥੬॥੨੯॥
सिमरि हरि हरि सदा नानक तरे कई अनेक ॥२॥६॥२९॥
हे नानक ! सदैव परमात्मा की उपासना करो; जिसे स्मरण करके अनेक जीव भवसागर से तैर गए हैं॥ २॥ ६॥ २९॥
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
मारू महला ५ ॥
मारू महला ५॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਨਾਮੁ ਜਾ ਕੋ ਅਨਾਥ ਕੋ ਹੈ ਨਾਥੁ ॥
पतित पावन नामु जा को अनाथ को है नाथु ॥
जिसका नाम पतितपावन है, जो अनाथ जीवों का नाथ है,
ਮਹਾ ਭਉਜਲ ਮਾਹਿ ਤੁਲਹੋ ਜਾ ਕੋ ਲਿਖਿਓ ਮਾਥ ॥੧॥
महा भउजल माहि तुलहो जा को लिखिओ माथ ॥१॥
संसार-सागर में से पार करवाने के लिए तुलहा है, उसे ही मिलता है, जिसके मस्तक पर उत्तम भाग्य लिखा होता है॥ १॥
ਡੂਬੇ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਘਨ ਸਾਥ ॥
डूबे नाम बिनु घन साथ ॥
प्रभु-नाम के बिना अनेक काफिले भवसागर में डूब गए हैं,
ਕਰਣ ਕਾਰਣੁ ਚਿਤਿ ਨ ਆਵੈ ਦੇ ਕਰਿ ਰਾਖੈ ਹਾਥ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
करण कारणु चिति न आवै दे करि राखै हाथ ॥१॥ रहाउ ॥
जो हाथ देकर रक्षा करता है, वह स्रष्टा उन्हें याद ही नहीं आता। रहाउ
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਗੁਣ ਉਚਾਰਣ ਹਰਿ ਨਾਮ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਪਾਥ ॥
साधसंगति गुण उचारण हरि नाम अम्रित पाथ ॥
साधुओं की सभा में भगवान का गुणगान ही नामामृत को पाने का मार्ग है।
ਕਰਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਮੁਰਾਰਿ ਮਾਧਉ ਸੁਣਿ ਨਾਨਕ ਜੀਵੈ ਗਾਥ ॥੨॥੭॥੩੦॥
करहु क्रिपा मुरारि माधउ सुणि नानक जीवै गाथ ॥२॥७॥३०॥
नानक विनय करते हैं कि हे ईश्वर ! कृपा करो, ताकेि तेरी कथा सुनकर जीता रहूँ॥ २॥ ७॥ ३०॥
ਮਾਰੂ ਅੰਜੁਲੀ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੭
मारू अंजुली महला ५ घरु ७
मारू अंजुली महला ५ घरु ७
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਸੰਜੋਗੁ ਵਿਜੋਗੁ ਧੁਰਹੁ ਹੀ ਹੂਆ ॥
संजोगु विजोगु धुरहु ही हूआ ॥
(आत्मा-परमात्मा का) संयोग एवं वियोग ईश्वरेच्छा से ही निश्चित हुआ है।
ਪੰਚ ਧਾਤੁ ਕਰਿ ਪੁਤਲਾ ਕੀਆ ॥
पंच धातु करि पुतला कीआ ॥
पाँच तत्वों से मानव-शरीर बनाया और
ਸਾਹੈ ਕੈ ਫੁਰਮਾਇਅੜੈ ਜੀ ਦੇਹੀ ਵਿਚਿ ਜੀਉ ਆਇ ਪਇਆ ॥੧॥
साहै कै फुरमाइअड़ै जी देही विचि जीउ आइ पइआ ॥१॥
फिर ईश्वर के हुक्म से जीव आकर शरीर में प्रवेश कर गया।॥ १॥
ਜਿਥੈ ਅਗਨਿ ਭਖੈ ਭੜਹਾਰੇ ॥ ਊਰਧ ਮੁਖ ਮਹਾ ਗੁਬਾਰੇ ॥
जिथै अगनि भखै भड़हारे ॥ ऊरध मुख महा गुबारे ॥
जहाँ माता के गर्भ में भट्टी की तरह अग्नि जलती थी, यह जीव वहाँ घोर अंधेरे में उलटे मुँह पड़ा हुआ था।
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਮਾਲੇ ਸੋਈ ਓਥੈ ਖਸਮਿ ਛਡਾਇ ਲਇਆ ॥੨॥
सासि सासि समाले सोई ओथै खसमि छडाइ लइआ ॥२॥
उसने श्वास-श्वास से ईश्वर को याद किया और वहाँ मालिक ने उसे विपत्ति में से बचा लिया था॥ २॥
ਵਿਚਹੁ ਗਰਭੈ ਨਿਕਲਿ ਆਇਆ ॥
विचहु गरभै निकलि आइआ ॥
जब माता के गर्भ में से बाहर निकलकर आया अर्थात् जन्म हुआ तो
ਖਸਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਦੁਨੀ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ॥
खसमु विसारि दुनी चितु लाइआ ॥
उसने भगवान को भुलाकर दुनिया के साथ चित्त लगा लिया।
ਆਵੈ ਜਾਇ ਭਵਾਈਐ ਜੋਨੀ ਰਹਣੁ ਨ ਕਿਤਹੀ ਥਾਇ ਭਇਆ ॥੩॥
आवै जाइ भवाईऐ जोनी रहणु न कितही थाइ भइआ ॥३॥
परिणामस्वरूप वह जन्मता मरता और अनेक योनियों में भटकता रहता है, और उसे किसी भी स्थान पर निवास नहीं मिला। ३ ।
ਮਿਹਰਵਾਨਿ ਰਖਿ ਲਇਅਨੁ ਆਪੇ ॥
मिहरवानि रखि लइअनु आपे ॥
मेहरबान रब ने स्वयं ही उसे बचा लिया है चूंकि
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਤਿਸ ਕੇ ਥਾਪੇ ॥
जीअ जंत सभि तिस के थापे ॥
सभी जीव-जन्तु उसके ही पैदा किए हुए हैं।
ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਜਿਣਿ ਚਲਿਆ ਨਾਨਕ ਆਇਆ ਸੋ ਪਰਵਾਣੁ ਥਿਆ ॥੪॥੧॥੩੧॥
जनमु पदारथु जिणि चलिआ नानक आइआ सो परवाणु थिआ ॥४॥१॥३१॥
हे नानक ! जो अपने दुर्लभ जन्म की बाजी को जीतकर यहाँ से गया है, उसका ही जन्म लेना मंजूर हुआ है।४॥ १॥ ३१॥