Hindi Page 1012

ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੈ ਜਿਸ ਨੋ ਹੁਕਮੁ ਮਨਾਏ ॥੭॥
गुर सेवा सदा सुखु है जिस नो हुकमु मनाए ॥७॥
गुरु की सेवा से सदा सुख प्राप्त होता है, पर सेवा भी वही करता है, जिससे हुक्म मनवाता है॥ ७॥

ਸੁਇਨਾ ਰੁਪਾ ਸਭ ਧਾਤੁ ਹੈ ਮਾਟੀ ਰਲਿ ਜਾਈ ॥
सुइना रुपा सभ धातु है माटी रलि जाई ॥
सोना-चांदी इत्यादि सब धातुएँ अन्ततः मिट्टी में ही मिल जाती हैं।

ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਨਾਲਿ ਨ ਚਲਈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ॥
बिनु नावै नालि न चलई सतिगुरि बूझ बुझाई ॥
सतगुरु ने यही रहस्य बताया है कि प्रभु नाम के अतिरिक्त कुछ भी साथ नहीं जाता।

ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੇ ਨਿਰਮਲੇ ਸਾਚੈ ਰਹੇ ਸਮਾਈ ॥੮॥੫॥
नानक नामि रते से निरमले साचै रहे समाई ॥८॥५॥
हे नानक ! वही निर्मल हैं जो नाम-स्मरण में रत हैं और सत्य में ही विलीन रहते हैं। ८॥ ५॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
मारू महला १ ॥
मारू महला १॥

ਹੁਕਮੁ ਭਇਆ ਰਹਣਾ ਨਹੀ ਧੁਰਿ ਫਾਟੇ ਚੀਰੈ ॥
हुकमु भइआ रहणा नही धुरि फाटे चीरै ॥
ईश्वरेच्छा से अगर मौत का बुलावा आ गया तो इस सच्चाई को मान लो कि अब संसार में नहीं रहना है।

ਏਹੁ ਮਨੁ ਅਵਗਣਿ ਬਾਧਿਆ ਸਹੁ ਦੇਹ ਸਰੀਰੈ ॥
एहु मनु अवगणि बाधिआ सहु देह सरीरै ॥
यह मन अवगुणों में बंधा हुआ है, इसलिए मनुष्य दुखों को सहता है।

ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਬਖਸਾਈਅਹਿ ਸਭਿ ਗੁਨਹ ਫਕੀਰੈ ॥੧॥
पूरै गुरि बखसाईअहि सभि गुनह फकीरै ॥१॥
यदि पूर्ण गुरु से क्षमादान पाया जाए तो सब गुनाह छूट जाते हैं। १॥

ਕਿਉ ਰਹੀਐ ਉਠਿ ਚਲਣਾ ਬੁਝੁ ਸਬਦ ਬੀਚਾਰਾ ॥
किउ रहीऐ उठि चलणा बुझु सबद बीचारा ॥
(जब मृत्यु अटल है) एक न एक दिन हर किसी ने जग से चले जाना है तो सदैव कैसे रहा जा सकता है ? शब्द-गुरु द्वारा चिंतन करके रहस्य को समझ लो।

ਜਿਸੁ ਤੂ ਮੇਲਹਿ ਸੋ ਮਿਲੈ ਧੁਰਿ ਹੁਕਮੁ ਅਪਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिसु तू मेलहि सो मिलै धुरि हुकमु अपारा ॥१॥ रहाउ ॥
हे ईश्वर ! जिसे तू मिलाता है, वही मिलता है, तेरा हुक्म अटल है॥ १॥ रहाउ॥

ਜਿਉ ਤੂ ਰਾਖਹਿ ਤਿਉ ਰਹਾ ਜੋ ਦੇਹਿ ਸੁ ਖਾਉ ॥
जिउ तू राखहि तिउ रहा जो देहि सु खाउ ॥
जैसे तू (सुख-दुख में) रखता है, वैसे ही रहता हूँ, जो तू देता है, वही खाता हूँ।

ਜਿਉ ਤੂ ਚਲਾਵਹਿ ਤਿਉ ਚਲਾ ਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਉ ॥
जिउ तू चलावहि तिउ चला मुखि अम्रित नाउ ॥
जैसे तू चलाता है, वैसे ही चलता हूँ, मुँह से तेरा नामामृत जपता रहता हूँ।

ਮੇਰੇ ਠਾਕੁਰ ਹਥਿ ਵਡਿਆਈਆ ਮੇਲਹਿ ਮਨਿ ਚਾਉ ॥੨॥
मेरे ठाकुर हथि वडिआईआ मेलहि मनि चाउ ॥२॥
मेरे ठाकुर जी के हाथ में सब बड़ाईयों हैं, साथ मिला लो, मन में यही चाव है॥ २॥

ਕੀਤਾ ਕਿਆ ਸਾਲਾਹੀਐ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਸੋਈ ॥
कीता किआ सालाहीऐ करि देखै सोई ॥
परमात्मा द्वारा पैदा किए गए जगत की क्यों प्रशंसा करें ? वास्तव में वही सबकी देखभाल करता है।

ਜਿਨਿ ਕੀਆ ਸੋ ਮਨਿ ਵਸੈ ਮੈ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
जिनि कीआ सो मनि वसै मै अवरु न कोई ॥
जिसने पैदा किया है, वही मन में बसता है, उसके अलावा अन्य कोई महान नहीं।

ਸੋ ਸਾਚਾ ਸਾਲਾਹੀਐ ਸਾਚੀ ਪਤਿ ਹੋਈ ॥੩॥
सो साचा सालाहीऐ साची पति होई ॥३॥
उस परमसत्य ईश्वर की प्रशंसा करनी चाहिए, तो ही सच्चा सम्मान मिलता है॥ ३॥

ਪੰਡਿਤੁ ਪੜਿ ਨ ਪਹੁਚਈ ਬਹੁ ਆਲ ਜੰਜਾਲਾ ॥
पंडितु पड़ि न पहुचई बहु आल जंजाला ॥
पण्डित अनेक ग्रंथों का अध्ययन करके भी अपने लक्ष्य (सत्य) तक नहीं पहुँचता, अपितु दुनिया के जंजालों में ही उलझा रहता है।

ਪਾਪ ਪੁੰਨ ਦੁਇ ਸੰਗਮੇ ਖੁਧਿਆ ਜਮਕਾਲਾ ॥
पाप पुंन दुइ संगमे खुधिआ जमकाला ॥
पाप एवं पुण्य में फॅसकर यम एवं माया की भूख उसे दुखी करते रहते हैं।

ਵਿਛੋੜਾ ਭਉ ਵੀਸਰੈ ਪੂਰਾ ਰਖਵਾਲਾ ॥੪॥
विछोड़ा भउ वीसरै पूरा रखवाला ॥४॥
जिसे पूर्ण प्रभु बचाने वाला है, उसे वियोग एवं भय भूल जाता है।॥ ४॥

ਜਿਨ ਕੀ ਲੇਖੈ ਪਤਿ ਪਵੈ ਸੇ ਪੂਰੇ ਭਾਈ ॥
जिन की लेखै पति पवै से पूरे भाई ॥
जिनकी सेवा-भक्ति सफल होती है, वही पूर्ण संत हैं।

ਪੂਰੇ ਪੂਰੀ ਮਤਿ ਹੈ ਸਚੀ ਵਡਿਆਈ ॥
पूरे पूरी मति है सची वडिआई ॥
पूर्ण संत की मति भी पूर्ण होती है, उसे ही सच्ची बड़ाई मिलती है।

ਦੇਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵਈ ਲੈ ਲੈ ਥਕਿ ਪਾਈ ॥੫॥
देदे तोटि न आवई लै लै थकि पाई ॥५॥
ईश्वर सदैव देता रहता है, जिसमें कोई कमी नहीं आती किन्तु जीव ले लेकर थक जाते हैं।॥ ५॥

ਖਾਰ ਸਮੁਦ੍ਰੁ ਢੰਢੋਲੀਐ ਇਕੁ ਮਣੀਆ ਪਾਵੈ ॥
खार समुद्रु ढंढोलीऐ इकु मणीआ पावै ॥
यदि खारे समुद्र में ढूँढने से कोई एक मोती मिल भी जाए तो

ਦੁਇ ਦਿਨ ਚਾਰਿ ਸੁਹਾਵਣਾ ਮਾਟੀ ਤਿਸੁ ਖਾਵੈ ॥
दुइ दिन चारि सुहावणा माटी तिसु खावै ॥
वह दो-चार दिन ही सुन्दर लगता है, आखिरकार उस मोती को मिट्टी निगल जाती है।

ਗੁਰੁ ਸਾਗਰੁ ਸਤਿ ਸੇਵੀਐ ਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ॥੬॥
गुरु सागरु सति सेवीऐ दे तोटि न आवै ॥६॥
यदि सत्य के सागर गुरु की सेवा की जाए तो कोई कमी नहीं आती॥ ६॥

ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵਨਿ ਸੇ ਊਜਲੇ ਸਭ ਮੈਲੁ ਭਰੀਜੈ ॥
मेरे प्रभ भावनि से ऊजले सभ मैलु भरीजै ॥
जो मेरे प्रभु को प्रिय लगते हैं, वही उज्ज्वल हैं एवं अन्य सभी पापों की मैल से भरे हुए हैं।

ਮੈਲਾ ਊਜਲੁ ਤਾ ਥੀਐ ਪਾਰਸ ਸੰਗਿ ਭੀਜੈ ॥
मैला ऊजलु ता थीऐ पारस संगि भीजै ॥
पापों से मलिन हुआ जीव तभी उज्ज्वल होता है, जब वह गुरु रूपी पारस से मिलकर नामामृत से भीग जाता है।

ਵੰਨੀ ਸਾਚੇ ਲਾਲ ਕੀ ਕਿਨਿ ਕੀਮਤਿ ਕੀਜੈ ॥੭॥
वंनी साचे लाल की किनि कीमति कीजै ॥७॥
सत्य रूपी लाल का नाम-रंग उसे ऐसा चढ़ जाता है कि उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता॥ ७॥

ਭੇਖੀ ਹਾਥ ਨ ਲਭਈ ਤੀਰਥਿ ਨਹੀ ਦਾਨੇ ॥
भेखी हाथ न लभई तीरथि नही दाने ॥
वेश धारण करने, तीथों में स्नान एवं दान पुण्य से भी सत्य प्राप्त नहीं होता।

ਪੂਛਉ ਬੇਦ ਪੜੰਤਿਆ ਮੂਠੀ ਵਿਣੁ ਮਾਨੇ ॥
पूछउ बेद पड़ंतिआ मूठी विणु माने ॥
वेदों का पाठ् करने वाले पण्डितों से पूछ लो, इस सत्य को न मानने वाली दुनिया ही लुट रही है।

ਨਾਨਕ ਕੀਮਤਿ ਸੋ ਕਰੇ ਪੂਰਾ ਗੁਰੁ ਗਿਆਨੇ ॥੮॥੬॥
नानक कीमति सो करे पूरा गुरु गिआने ॥८॥६॥
हे नानक ! जिसे पूर्ण गुरु ज्ञान प्रदान करता है, वही नाम-रत्न की सही कीमत कर सकता है॥ ८॥ ६॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
मारू महला १ ॥
मारू महला १॥

ਮਨਮੁਖੁ ਲਹਰਿ ਘਰੁ ਤਜਿ ਵਿਗੂਚੈ ਅਵਰਾ ਕੇ ਘਰ ਹੇਰੈ ॥
मनमुखु लहरि घरु तजि विगूचै अवरा के घर हेरै ॥
स्वेच्छाचारी जीव जोश में घर-बार त्याग कर भटकता फिरता है और दूसरों के घर देखता है।

ਗ੍ਰਿਹ ਧਰਮੁ ਗਵਾਏ ਸਤਿਗੁਰੁ ਨ ਭੇਟੈ ਦੁਰਮਤਿ ਘੂਮਨ ਘੇਰੈ ॥
ग्रिह धरमु गवाए सतिगुरु न भेटै दुरमति घूमन घेरै ॥
वह गृहस्थ धर्म का पालन नहीं करता, सतगुरु से उसकी भेंट नहीं होती। अतः वह दुर्मति के भैवर में ही फँसा रहता है।

ਦਿਸੰਤਰੁ ਭਵੈ ਪਾਠ ਪੜਿ ਥਾਕਾ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਹੋਇ ਵਧੇਰੈ ॥
दिसंतरु भवै पाठ पड़ि थाका त्रिसना होइ वधेरै ॥
वह देश-दिशांतर भटकता है, धर्मग्रंथों के पाठ-पढ़-पढ़कर मायूस हो जाता है, जिससे उसकी तृष्णा में और भी वृद्धि हो जाती है।

ਕਾਚੀ ਪਿੰਡੀ ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੈ ਉਦਰੁ ਭਰੈ ਜੈਸੇ ਢੋਰੈ ॥੧॥
काची पिंडी सबदु न चीनै उदरु भरै जैसे ढोरै ॥१॥
वह नश्वर शरीर शब्द के भेद को नहीं जानता और पशु की तरह पेट भरता रहता है॥ १॥

ਬਾਬਾ ਐਸੀ ਰਵਤ ਰਵੈ ਸੰਨਿਆਸੀ ॥
बाबा ऐसी रवत रवै संनिआसी ॥
हे बाबा ! सन्यासी का जीवन-आचरण ऐसा होना चाहिए कि

ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਤੇਰੈ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुर कै सबदि एक लिव लागी तेरै नामि रते त्रिपतासी ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु के शब्द द्वारा उसकी परमात्मा में लगन लगी रहे और हरि-नाम में रत रहकर तृप्त हो जाए॥ १॥ रहाउ॥

ਘੋਲੀ ਗੇਰੂ ਰੰਗੁ ਚੜਾਇਆ ਵਸਤ੍ਰ ਭੇਖ ਭੇਖਾਰੀ ॥
घोली गेरू रंगु चड़ाइआ वसत्र भेख भेखारी ॥
वह गेरु रंग घोलकर भगवे वस्त्र धारण कर लेता है और वेष रचकर भिखारी बन जाता है।

ਕਾਪੜ ਫਾਰਿ ਬਨਾਈ ਖਿੰਥਾ ਝੋਲੀ ਮਾਇਆਧਾਰੀ ॥
कापड़ फारि बनाई खिंथा झोली माइआधारी ॥
वह कपड़े फाड़कर गोदड़ी बनाकर धन पाने के लिए गले में झोली डाल लेता है।

ਘਰਿ ਘਰਿ ਮਾਗੈ ਜਗੁ ਪਰਬੋਧੈ ਮਨਿ ਅੰਧੈ ਪਤਿ ਹਾਰੀ ॥
घरि घरि मागै जगु परबोधै मनि अंधै पति हारी ॥
वह स्वयं तो घर-घर जाकर भिक्षा माँगता है किन्तु जग के लोगों को धर्मोपदेश देता है। मन के अन्धे ने अपना सम्मान ही गंवा दिया है।

ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਣਾ ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੈ ਜੂਐ ਬਾਜੀ ਹਾਰੀ ॥੨॥
भरमि भुलाणा सबदु न चीनै जूऐ बाजी हारी ॥२॥
भ्रम में भूला हुआ ब्रह्म-शब्द का भेद नहीं जानता, इस तरह उसने अपनी जीवनबाजी जुए में हार दी है ॥२॥

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