ਆਪੇ ਮੇਲੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ॥
आपे मेले दे वडिआई ॥
वह स्वयं ही जीव को मिलाकर बड़ाई प्रदान करता है और
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਕੀਮਤਿ ਪਾਈ ॥
गुर परसादी कीमति पाई ॥
गुरु की अनुकंपा से ही सही कीमत आंक पाता है।
ਮਨਮੁਖਿ ਬਹੁਤੁ ਫਿਰੈ ਬਿਲਲਾਦੀ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਖੁਆਈ ਹੇ ॥੩॥
मनमुखि बहुतु फिरै बिललादी दूजै भाइ खुआई हे ॥३॥
मनमुखी जीव बहुत भटकता, रोता-चिल्लाता एवं द्वैतभाव में तंग होता है॥ ३॥
ਹਉਮੈ ਮਾਇਆ ਵਿਚੇ ਪਾਈ ॥
हउमै माइआ विचे पाई ॥
अहम् एवं माया में लिप्त होकर
ਮਨਮੁਖ ਭੂਲੇ ਪਤਿ ਗਵਾਈ ॥
मनमुख भूले पति गवाई ॥
मनमुखी जीव पथभ्रष्ट हुआ है और अपनी प्रतिष्ठा गवां दी है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੋ ਨਾਇ ਰਾਚੈ ਸਾਚੈ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੪॥
गुरमुखि होवै सो नाइ राचै साचै रहिआ समाई हे ॥४॥
जो गुरुमुख होता है, वह नाम में ही लीन रहता है और सत्य में ही समाया रहता है॥ ४॥
ਗੁਰ ਤੇ ਗਿਆਨੁ ਨਾਮ ਰਤਨੁ ਪਾਇਆ ॥
गुर ते गिआनु नाम रतनु पाइआ ॥
जिसने गुरु से ज्ञान एवं नाम रूपी रत्न पा लिया है,
ਮਨਸਾ ਮਾਰਿ ਮਨ ਮਾਹਿ ਸਮਾਇਆ ॥
मनसा मारि मन माहि समाइआ ॥
वह अपनी वासनाओं को मिटाकर मन में ही स्थिर रहता है।
ਆਪੇ ਖੇਲ ਕਰੇ ਸਭਿ ਕਰਤਾ ਆਪੇ ਦੇਇ ਬੁਝਾਈ ਹੇ ॥੫॥
आपे खेल करे सभि करता आपे देइ बुझाई हे ॥५॥
परमात्मा स्वयं ही सारी लीला करता है और स्वयं ही ज्ञान प्रदान करता है॥ ५॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
सतिगुरु सेवे आपु गवाए ॥
जो अहम् मिटाकर सतगुरु की सेवा करता है,
ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸਬਦਿ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
मिलि प्रीतम सबदि सुखु पाए ॥
वह प्रियतम प्रभु से मिलकर शब्द द्वारा सुख प्राप्त करता है।
ਅੰਤਰਿ ਪਿਆਰੁ ਭਗਤੀ ਰਾਤਾ ਸਹਜਿ ਮਤੇ ਬਣਿ ਆਈ ਹੇ ॥੬॥
अंतरि पिआरु भगती राता सहजि मते बणि आई हे ॥६॥
मन में प्रेम धारण कर वह भक्ति में लीन रहता है और सहज ही उसकी प्रभु से प्रीति बनी रहती है। ६॥
ਦੂਖ ਨਿਵਾਰਣੁ ਗੁਰ ਤੇ ਜਾਤਾ ॥
दूख निवारणु गुर ते जाता ॥
दुख का निवारण करने वाला परमेश्वर तो गुरु से ही जाना जाता है,
ਆਪਿ ਮਿਲਿਆ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ॥
आपि मिलिआ जगजीवनु दाता ॥
फिर जीवनदाता प्रभु स्वयं ही मिल जाता है।
ਜਿਸ ਨੋ ਲਾਏ ਸੋਈ ਬੂਝੈ ਭਉ ਭਰਮੁ ਸਰੀਰਹੁ ਜਾਈ ਹੇ ॥੭॥
जिस नो लाए सोई बूझै भउ भरमु सरीरहु जाई हे ॥७॥
जिसे वह भक्ति में लगाता है, वही इस तथ्य को बूझता है और उसके शरीर में से भय एवं भ्रम दूर हो जाता है॥ ७॥
ਆਪੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੇ ਦੇਵੈ ॥
आपे गुरमुखि आपे देवै ॥
वह स्वयं ही गुरु की संगति में नाम प्रदान करता है और
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੈ ॥
सचै सबदि सतिगुरु सेवै ॥
जीव सच्चे शब्द द्वारा सतिगुरु की सेवा करता है।
ਜਰਾ ਜਮੁ ਤਿਸੁ ਜੋਹਿ ਨ ਸਾਕੈ ਸਾਚੇ ਸਿਉ ਬਣਿ ਆਈ ਹੇ ॥੮॥
जरा जमु तिसु जोहि न साकै साचे सिउ बणि आई हे ॥८॥
जिसकी प्रभु से प्रीति हो गई है, बुढ़ापा एवं मृत्यु उसे बिल्कुल स्पर्श नहीं करते॥ ८॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਜਲੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥
त्रिसना अगनि जलै संसारा ॥
संसार तृष्णा की अग्नि में जल रहा है और
ਜਲਿ ਜਲਿ ਖਪੈ ਬਹੁਤੁ ਵਿਕਾਰਾ ॥
जलि जलि खपै बहुतु विकारा ॥
जल-जलकर अनेक विकारों में दुखी हो रहा है।
ਮਨਮੁਖੁ ਠਉਰ ਨ ਪਾਏ ਕਬਹੂ ਸਤਿਗੁਰ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ਹੇ ॥੯॥
मनमुखु ठउर न पाए कबहू सतिगुर बूझ बुझाई हे ॥९॥
सतगुरु ने यही ज्ञान प्रदान किया है कि स्वेच्छाचारी जीव को कभी ठिकाना नहीं मिलता। ९॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਨਿ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ॥
सतिगुरु सेवनि से वडभागी ॥
सतगुरु की सेवा में लीन रहने वाले भाग्यशाली हैं और
ਸਾਚੈ ਨਾਮਿ ਸਦਾ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
साचै नामि सदा लिव लागी ॥
उनकी सदैव सत्य-नाम में लगन लगी रहती है।
ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੁ ਰਵਿਆ ਨਿਹਕੇਵਲੁ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
अंतरि नामु रविआ निहकेवलु त्रिसना सबदि बुझाई हे ॥१०॥
उनके अन्तर्मन में वासना-रहित नाम ही समाया रहता है और शब्द ने उनकी तृष्णा बुझा दी है॥ १०॥
ਸਚਾ ਸਬਦੁ ਸਚੀ ਹੈ ਬਾਣੀ ॥
सचा सबदु सची है बाणी ॥
शब्द सत्य है और वाणी भी सत्य है,
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲੈ ਕਿਨੈ ਪਛਾਣੀ ॥
गुरमुखि विरलै किनै पछाणी ॥
किसी विरले गुरुमुख ने इस तथ्य की पहचान की है।
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਬੈਰਾਗੀ ਆਵਣੁ ਜਾਣੁ ਰਹਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
सचै सबदि रते बैरागी आवणु जाणु रहाई हे ॥११॥
जो वैराग्यवान ब्रह्मा-शब्द में लीन रहते हैं, उनका जन्म-मरण छूट जाता है। ११॥
ਸਬਦੁ ਬੁਝੈ ਸੋ ਮੈਲੁ ਚੁਕਾਏ ॥
सबदु बुझै सो मैलु चुकाए ॥
जो शब्द के भेद को समझ लेता है, उसकी मन की मैल दूर हो जाती है और
ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਏ ॥
निरमल नामु वसै मनि आए ॥
उसके मन में निर्मल नाम का वास हो जाता है।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਅਪਣਾ ਸਦ ਹੀ ਸੇਵਹਿ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਜਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
सतिगुरु अपणा सद ही सेवहि हउमै विचहु जाई हे ॥१२॥
जो सदैव अपने सतगुरु की सेवा करते हैं, उनके मन में से अभिमान दूर हो जाता है॥ १२॥
ਗੁਰ ਤੇ ਬੂਝੈ ਤਾ ਦਰੁ ਸੂਝੈ ॥
गुर ते बूझै ता दरु सूझै ॥
जब जीव गुरु से ज्ञान प्राप्त करता है तो ही उसे सत्य के दर की सूझ होती है किन्तु
ਨਾਮ ਵਿਹੂਣਾ ਕਥਿ ਕਥਿ ਲੂਝੈ ॥
नाम विहूणा कथि कथि लूझै ॥
नामविहीन व्यर्थ बातें कर-करके उलझता रहता है।
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਭੂਖ ਗਵਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
सतिगुर सेवे की वडिआई त्रिसना भूख गवाई हे ॥१३॥
सतगुरु की सेवा करने की यह बड़ाई है कि इसने तृष्णा भूख मिटा दी है॥ १३॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਮਿਲੈ ਤਾ ਬੂਝੈ ॥
आपे आपि मिलै ता बूझै ॥
जब ईश्वर स्वयं मिलता है तो ही ज्ञान होता है।
ਗਿਆਨ ਵਿਹੂਣਾ ਕਿਛੂ ਨ ਸੂਝੈ ॥
गिआन विहूणा किछू न सूझै ॥
लेकिन ज्ञानविहीन को कोई सूझ नहीं होती।
ਗੁਰ ਕੀ ਦਾਤਿ ਸਦਾ ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਬਾਣੀ ਸਬਦਿ ਵਜਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
गुर की दाति सदा मन अंतरि बाणी सबदि वजाई हे ॥१४॥
जिसकें मन में गुरु की बख्शिश है, वह वाणी द्वारा शब्द ही जपता रहता है॥ १४॥
ਜੋ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਸੁ ਕਰਮ ਕਮਾਇਆ ॥
जो धुरि लिखिआ सु करम कमाइआ ॥
जो प्रारम्भ से लिखा है, जीव वही कर्म करता है।
ਕੋਇ ਨ ਮੇਟੈ ਧੁਰਿ ਫੁਰਮਾਇਆ ॥
कोइ न मेटै धुरि फुरमाइआ ॥
भाग्यालेख को कोई टाल नहीं सकता।
ਸਤਸੰਗਤਿ ਮਹਿ ਤਿਨ ਹੀ ਵਾਸਾ ਜਿਨ ਕਉ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧੫॥
सतसंगति महि तिन ही वासा जिन कउ धुरि लिखि पाई हे ॥१५॥
जिनकी तकदीर में लिखा होता है, सत्संगति में उनका ही निवास होता है॥ १५॥
ਅਪਣੀ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸੋ ਪਾਏ ॥
अपणी नदरि करे सो पाए ॥
जिस पर अपनी कृपा-दृष्टि करता है, वही उसे प्राप्त करता है और
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਤਾੜੀ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥
सचै सबदि ताड़ी चितु लाए ॥
वह समाधिस्थ सच्चे शब्द में ही चित लगाता है।
ਨਾਨਕ ਦਾਸੁ ਕਹੈ ਬੇਨੰਤੀ ਭੀਖਿਆ ਨਾਮੁ ਦਰਿ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੧॥
नानक दासु कहै बेनंती भीखिआ नामु दरि पाई हे ॥१६॥१॥
दास नानक विनती करता है कि नाम रूपी भिक्षा प्रभु के द्वार से प्राप्त हुई है॥ १६॥ १॥
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
मारू महला ३ ॥
मारू महला ३॥
ਏਕੋ ਏਕੁ ਵਰਤੈ ਸਭੁ ਸੋਈ ॥
एको एकु वरतै सभु सोई ॥
एक अनन्तशक्ति (परमेश्वर) सर्वव्यापक है,”
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥
इस रहस्य को कोई विरला गुरुमुख ही बूझता है।
ਏਕੋ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸਭ ਅੰਤਰਿ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ਹੇ ॥੧॥
एको रवि रहिआ सभ अंतरि तिसु बिनु अवरु न कोई हे ॥१॥
एक वही सब जीवों में समाया हुआ है, उसके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं॥ १॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਜੀਅ ਉਪਾਏ ॥
लख चउरासीह जीअ उपाए ॥
उसने चौरासी लाख जीव पैदा किए हैं,”