ਕਿਉ ਨ ਅਰਾਧਹੁ ਮਿਲਿ ਕਰਿ ਸਾਧਹੁ ਘਰੀ ਮੁਹਤਕ ਬੇਲਾ ਆਈ ॥
किउ न अराधहु मिलि करि साधहु घरी मुहतक बेला आई ॥
जिंदगी का घड़ी भर का समय मिला है, मौत निश्चित है, फिर क्यों न साधु पुरुषों के साथ परमात्मा की आराधना की जाए।
ਅਰਥੁ ਦਰਬੁ ਸਭੁ ਜੋ ਕਿਛੁ ਦੀਸੈ ਸੰਗਿ ਨ ਕਛਹੂ ਜਾਈ ॥
अरथु दरबु सभु जो किछु दीसै संगि न कछहू जाई ॥
धन-दौलत जो कुछ दिखाई देता है, (मरणोपरांत) कुछ भी साथ नहीं जाता।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਹਰਿ ਆਰਾਧਹੁ ਕਵਨ ਉਪਮਾ ਦੇਉ ਕਵਨ ਬਡਾਈ ॥੨॥
कहु नानक हरि हरि आराधहु कवन उपमा देउ कवन बडाई ॥२॥
नानक फुरमाते हैं कि उस अखिलेश्वर की क्या उपमा करूँ, उसकी प्रशंसा किस तरह की जाए, हमें तो हरदम हरि की आराधना करनी चाहिए ॥२॥
ਪੂਛਉ ਸੰਤ ਮੇਰੋ ਠਾਕੁਰੁ ਕੈਸਾ ॥
पूछउ संत मेरो ठाकुरु कैसा ॥
मैं संतों से पूछता हूँ कि मेरा मालिक कैसा है।
ਹੀਂਉ ਅਰਾਪਉਂ ਦੇਹੁ ਸਦੇਸਾ ॥
हींउ अरापउं देहु सदेसा ॥
मुझे उसका संदेश दो, मैं तो हृदय एवं प्राण सर्वस्व उसे अर्पण कर दूँगा।
ਦੇਹੁ ਸਦੇਸਾ ਪ੍ਰਭ ਜੀਉ ਕੈਸਾ ਕਹ ਮੋਹਨ ਪਰਵੇਸਾ ॥
देहु सदेसा प्रभ जीउ कैसा कह मोहन परवेसा ॥
मुझे कोई संदेश दो, मेरा प्रभु कैसा है, किस जगह पर रहता है।
ਅੰਗ ਅੰਗ ਸੁਖਦਾਈ ਪੂਰਨ ਬ੍ਰਹਮਾਈ ਥਾਨ ਥਾਨੰਤਰ ਦੇਸਾ ॥
अंग अंग सुखदाई पूरन ब्रहमाई थान थानंतर देसा ॥
वह पूर्ण ब्रहा सुखदायक आसपास है, देश-देशांतर सब में मौजूद है।
ਬੰਧਨ ਤੇ ਮੁਕਤਾ ਘਟਿ ਘਟਿ ਜੁਗਤਾ ਕਹਿ ਨ ਸਕਉ ਹਰਿ ਜੈਸਾ ॥
बंधन ते मुकता घटि घटि जुगता कहि न सकउ हरि जैसा ॥
वह बन्धनों से मुक्त है, घट-घट में वही विद्यमान है, वह प्रभु जैसा है, मैं उसकी महिमा बता नहीं सकता।
ਦੇਖਿ ਚਰਿਤ ਨਾਨਕ ਮਨੁ ਮੋਹਿਓ ਪੂਛੈ ਦੀਨੁ ਮੇਰੋ ਠਾਕੁਰੁ ਕੈਸਾ ॥੩॥
देखि चरित नानक मनु मोहिओ पूछै दीनु मेरो ठाकुरु कैसा ॥३॥
नानक कथन करते हैं कि उसकी लीला देखकर मन मोहित हो गया है और विनम्रतापूर्वक पूछता हूँ कि मेरा मालिक कैसा है॥३॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅਪੁਨੇ ਪਹਿ ਆਇਆ ॥
करि किरपा अपुने पहि आइआ ॥
वह कृपा करके अन्तर्मन में आता है।
ਧੰਨਿ ਸੁ ਰਿਦਾ ਜਿਹ ਚਰਨ ਬਸਾਇਆ ॥
धंनि सु रिदा जिह चरन बसाइआ ॥
वह हृदय धन्य है, जो उसके चरणों में प्रेम लगाता है।
ਚਰਨ ਬਸਾਇਆ ਸੰਤ ਸੰਗਾਇਆ ਅਗਿਆਨ ਅੰਧੇਰੁ ਗਵਾਇਆ ॥
चरन बसाइआ संत संगाइआ अगिआन अंधेरु गवाइआ ॥
परमात्मा के चरण संतों की संगत में ही प्राप्त होते हैं और अज्ञान का अंधेरा दूर हो जाता है।
ਭਇਆ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ਰਿਦੈ ਉਲਾਸੁ ਪ੍ਰਭੁ ਲੋੜੀਦਾ ਪਾਇਆ ॥
भइआ प्रगासु रिदै उलासु प्रभु लोड़ीदा पाइआ ॥
प्रभु को पा कर ह्रदय में प्रकाश एवं उल्लास उत्पन्न हो गया है और सब कामनाएँ पूरी हो गई हैं।
ਦੁਖੁ ਨਾਠਾ ਸੁਖੁ ਘਰ ਮਹਿ ਵੂਠਾ ਮਹਾ ਅਨੰਦ ਸਹਜਾਇਆ ॥
दुखु नाठा सुखु घर महि वूठा महा अनंद सहजाइआ ॥
दुख दूर हुआ है, सुखों की लब्धि हो गई है और हृदय में सहज स्वाभाविक महा आनंद उत्पन्न हो चुका है।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੈ ਪੂਰਾ ਪਾਇਆ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅਪੁਨੇ ਪਹਿ ਆਇਆ ॥੪॥੧॥
कहु नानक मै पूरा पाइआ करि किरपा अपुने पहि आइआ ॥४॥१॥
हे नानक ! मैंने पूर्ण परमेश्वर को पा लिया है और वह कृपा करके अन्तर्मन में आया है॥४॥१॥
ਸਾਰੰਗ ਕੀ ਵਾਰ ਮਹਲਾ ੪ ਰਾਇ ਮਹਮੇ ਹਸਨੇ ਕੀ ਧੁਨਿ
सारंग की वार महला ४ राइ महमे हसने की धुनि
सारंग की वार महला ४ राइ महमे हसने की धुनि
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਸਲੋਕ ਮਹਲਾ ੨ ॥
सलोक महला २ ॥
श्लोक महला २ ॥
ਗੁਰੁ ਕੁੰਜੀ ਪਾਹੂ ਨਿਵਲੁ ਮਨੁ ਕੋਠਾ ਤਨੁ ਛਤਿ ॥
गुरु कुंजी पाहू निवलु मनु कोठा तनु छति ॥
मन रूपी घर जिसकी छत यह शरीर है, इसे माया का ताला लगा हुआ है और उस ताले की कुंजी गुरु (के पास) है।
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਮਨ ਕਾ ਤਾਕੁ ਨ ਉਘੜੈ ਅਵਰ ਨ ਕੁੰਜੀ ਹਥਿ ॥੧॥
नानक गुर बिनु मन का ताकु न उघड़ै अवर न कुंजी हथि ॥१॥
नानक फुरमाते हैं कि गुरु के बिना मन का दरवाजा नहीं खुलता, दरअसल गुरु बिना किसी अन्य के हाथ यह कुंजी नहीं है॥१॥
ਮਹਲਾ ੧ ॥
महला १ ॥
महला १ ॥
ਨ ਭੀਜੈ ਰਾਗੀ ਨਾਦੀ ਬੇਦਿ ॥
न भीजै रागी नादी बेदि ॥
संगीत एवं वेदों के मंत्रोच्चारण से ईश्वर खुश नहीं होता।
ਨ ਭੀਜੈ ਸੁਰਤੀ ਗਿਆਨੀ ਜੋਗਿ ॥
न भीजै सुरती गिआनी जोगि ॥
ज्ञान एवं योग-साधना से भी वह प्रसन्न नहीं होता।
ਨ ਭੀਜੈ ਸੋਗੀ ਕੀਤੈ ਰੋਜਿ ॥
न भीजै सोगी कीतै रोजि ॥
रोज गमगीन रहकर भी उसे खुश नहीं किया जा सकता।
ਨ ਭੀਜੈ ਰੂਪੀਂ ਮਾਲੀਂ ਰੰਗਿ ॥
न भीजै रूपीं मालीं रंगि ॥
रूप-सौन्दर्य, मौज-मेला मनाकर भी प्रसन्न नहीं होता।
ਨ ਭੀਜੈ ਤੀਰਥਿ ਭਵਿਐ ਨੰਗਿ ॥
न भीजै तीरथि भविऐ नंगि ॥
निर्वस्त्र तीर्थ यात्रा और
ਨ ਭੀਜੈ ਦਾਤੀਂ ਕੀਤੈ ਪੁੰਨਿ ॥
न भीजै दातीं कीतै पुंनि ॥
दान-पुण्य करने से भी परमात्मा प्रसन्न नहीं होता।
ਨ ਭੀਜੈ ਬਾਹਰਿ ਬੈਠਿਆ ਸੁੰਨਿ ॥
न भीजै बाहरि बैठिआ सुंनि ॥
शून्य समाधि में बैठे रहने पर भी नहीं रीझता और
ਨ ਭੀਜੈ ਭੇੜਿ ਮਰਹਿ ਭਿੜਿ ਸੂਰ ॥
न भीजै भेड़ि मरहि भिड़ि सूर ॥
रणभूमि में योद्धा बनकर वीरगति पाने से भी खुश नहीं होता।
ਨ ਭੀਜੈ ਕੇਤੇ ਹੋਵਹਿ ਧੂੜ ॥
न भीजै केते होवहि धूड़ ॥
शरीर पर भस्म लगाकर भी वह खुश नहीं होता।
ਲੇਖਾ ਲਿਖੀਐ ਮਨ ਕੈ ਭਾਇ ॥
लेखा लिखीऐ मन कै भाइ ॥
मन की अवस्था के अनुकूल हमारे कर्मों का हिसाब लिखा जाता है।
ਨਾਨਕ ਭੀਜੈ ਸਾਚੈ ਨਾਇ ॥੨॥
नानक भीजै साचै नाइ ॥२॥
गुरु नानक का कथन है कि ईश्वर केवल सच्चा नाम जपने से ही प्रसन्न होता है।॥२॥
ਮਹਲਾ ੧ ॥
महला १ ॥
महला १ ॥
ਨਵ ਛਿਅ ਖਟ ਕਾ ਕਰੇ ਬੀਚਾਰੁ ॥
नव छिअ खट का करे बीचारु ॥
कोई मनुष्य नौ व्याकरण, छ: शास्त्रों का अभ्यास करता है,
ਨਿਸਿ ਦਿਨ ਉਚਰੈ ਭਾਰ ਅਠਾਰ ॥
निसि दिन उचरै भार अठार ॥
दिन-रात महाभारत के अठारह पवों का उच्चारण करता है।
ਤਿਨਿ ਭੀ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਇਆ ਤੋਹਿ ॥
तिनि भी अंतु न पाइआ तोहि ॥
हे ईश्वर ! इन सबके बावजूद भी उसे तेरा रहस्य प्राप्त नहीं होता।
ਨਾਮ ਬਿਹੂਣ ਮੁਕਤਿ ਕਿਉ ਹੋਇ ॥
नाम बिहूण मुकति किउ होइ ॥
हरि-नाम से विहीन मुक्ति कैसे हो सकती है।
ਨਾਭਿ ਵਸਤ ਬ੍ਰਹਮੈ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਣਿਆ ॥
नाभि वसत ब्रहमै अंतु न जाणिआ ॥
कमल-नाभि में बसकर ब्रह्मा भी ईश्वर का रहस्य प्राप्त नहीं कर सका,
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਪਛਾਣਿਆ ॥੩॥
गुरमुखि नानक नामु पछाणिआ ॥३॥
हे नानक ! गुरु के सान्निध्य में हरि-नाम की पहचान होती है॥३॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਨਿਰੰਜਨਾ ਜਿਨਿ ਆਪੁ ਉਪਾਇਆ ॥
आपे आपि निरंजना जिनि आपु उपाइआ ॥
ईश्वर स्वजन्मा है, सर्वशक्तिमान है, वह मोह-माया की कालिमा से रहित है।
ਆਪੇ ਖੇਲੁ ਰਚਾਇਓਨੁ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਸਬਾਇਆ ॥
आपे खेलु रचाइओनु सभु जगतु सबाइआ ॥
समूचा जगत बनाकर उसने अपना एक खेल रचाया है।
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਆਪਿ ਸਿਰਜਿਅਨੁ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਵਧਾਇਆ ॥
त्रै गुण आपि सिरजिअनु माइआ मोहु वधाइआ ॥
तीन गुणों की रचना कर उसने मोह-माया में वृद्धि की हुई है।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਉਬਰੇ ਜਿਨ ਭਾਣਾ ਭਾਇਆ ॥
गुर परसादी उबरे जिन भाणा भाइआ ॥
जिसे परमात्मा की रज़ा अच्छी लगी है, गुरु की कृपा से उसका उद्धार हो गया है।
ਨਾਨਕ ਸਚੁ ਵਰਤਦਾ ਸਭ ਸਚਿ ਸਮਾਇਆ ॥੧॥
नानक सचु वरतदा सभ सचि समाइआ ॥१॥
हे नानक ! वह परम-सत्य ही कार्यशील है और सब सत्य में ही विलीन है॥१॥