ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥
ਯਯਾ ਜਾਰਉ ਦੁਰਮਤਿ ਦੋਊ ॥
यया जारउ दुरमति दोऊ ॥
य – अपनी दुर्बुद्धि एवं द्वैतवाद को जला दो।
ਤਿਸਹਿ ਤਿਆਗਿ ਸੁਖ ਸਹਜੇ ਸੋਊ ॥
तिसहि तिआगि सुख सहजे सोऊ ॥
इनको त्याग कर सहज सुख में निद्रा करो।
ਯਯਾ ਜਾਇ ਪਰਹੁ ਸੰਤ ਸਰਨਾ ॥
यया जाइ परहु संत सरना ॥
य – जाकर उन संतों की शरण में पड़ जाओ,
ਜਿਹ ਆਸਰ ਇਆ ਭਵਜਲੁ ਤਰਨਾ ॥
जिह आसर इआ भवजलु तरना ॥
जिनकी सहायता से भवसागर से पार हुआ जा सकता है।
ਯਯਾ ਜਨਮਿ ਨ ਆਵੈ ਸੋਊ ॥
यया जनमि न आवै सोऊ ॥
य – वह व्यक्ति बार-बार संसार में जन्म नहीं लेता
ਏਕ ਨਾਮ ਲੇ ਮਨਹਿ ਪਰੋਊ ॥
एक नाम ले मनहि परोऊ ॥
जिस ने एक ईश्वर का नाम अपने मन में पिरो लिया है।
ਯਯਾ ਜਨਮੁ ਨ ਹਾਰੀਐ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਟੇਕ ॥
यया जनमु न हारीऐ गुर पूरे की टेक ॥
य – पूर्ण गुरु के आश्रय से अनमोल मनुष्य जीवन व्यर्थ नहीं जाता।
ਨਾਨਕ ਤਿਹ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਜਾ ਕੈ ਹੀਅਰੈ ਏਕ ॥੧੪॥
नानक तिह सुखु पाइआ जा कै हीअरै एक ॥१४॥
हे नानक ! जिसके हृदय में एक परमेश्वर ही विद्यमान है, वह आत्मिक सुख प्राप्त कर लेता है ॥१४॥
ਸਲੋਕੁ ॥
सलोकु ॥
श्लोक॥
ਅੰਤਰਿ ਮਨ ਤਨ ਬਸਿ ਰਹੇ ਈਤ ਊਤ ਕੇ ਮੀਤ ॥
अंतरि मन तन बसि रहे ईत ऊत के मीत ॥
जो इस लोक एवं परलोक में जीव का मित्र है, वह उसके मन-तन में रहता है।
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਉਪਦੇਸਿਆ ਨਾਨਕ ਜਪੀਐ ਨੀਤ ॥੧॥
गुरि पूरै उपदेसिआ नानक जपीऐ नीत ॥१॥
हे नानक ! पूर्ण गुरु ने मुझे हमेशा प्रभु का भजन करने का उपदेश प्रदान किया है॥ १॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸਿਮਰਹੁ ਤਾਸੁ ਕਉ ਜੋ ਅੰਤਿ ਸਹਾਈ ਹੋਇ ॥
अनदिनु सिमरहु तासु कउ जो अंति सहाई होइ ॥
रात-दिन उसका सिमरन करो, जो अन्तिम समय में जीव का सहायक बनता है।
ਇਹ ਬਿਖਿਆ ਦਿਨ ਚਾਰਿ ਛਿਅ ਛਾਡਿ ਚਲਿਓ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
इह बिखिआ दिन चारि छिअ छाडि चलिओ सभु कोइ ॥
मोह-माया का यह विष केवल चार अथवा छ : दिनों का ही है। सभी इसे छोड़कर चले जाते हैं।
ਕਾ ਕੋ ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੁਤ ਧੀਆ ॥
का को मात पिता सुत धीआ ॥
माता, पिता, पुत्र एवं पुत्री कोई भी किसी का संगी नहीं है।
ਗ੍ਰਿਹ ਬਨਿਤਾ ਕਛੁ ਸੰਗਿ ਨ ਲੀਆ ॥
ग्रिह बनिता कछु संगि न लीआ ॥
कोई भी इन्सान घर, पत्नी एवं अन्य पदार्थ कुछ भी साथ लेकर नहीं जाता।
ਐਸੀ ਸੰਚਿ ਜੁ ਬਿਨਸਤ ਨਾਹੀ ॥
ऐसी संचि जु बिनसत नाही ॥
इसलिए ऐसा नाम-धन संचित करो जो कभी नाश नहीं होता
ਪਤਿ ਸੇਤੀ ਅਪੁਨੈ ਘਰਿ ਜਾਹੀ ॥
पति सेती अपुनै घरि जाही ॥
और जो सम्मानपूर्वक अपने घर (परलोक) में जा सके।
ਸਾਧਸੰਗਿ ਕਲਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਇਆ ॥
साधसंगि कलि कीरतनु गाइआ ॥
हे नानक ! जो लोग अपने जीवन में सत्संग में प्रभु का भजन गायन करते हैं,
ਨਾਨਕ ਤੇ ਤੇ ਬਹੁਰਿ ਨ ਆਇਆ ॥੧੫॥
नानक ते ते बहुरि न आइआ ॥१५॥
वह पुनः जन्म-मरण के चक्र में फँसकर इस संसार में नहीं आते॥ १५॥
ਸਲੋਕੁ ॥
सलोकु ॥
श्लोक॥
ਅਤਿ ਸੁੰਦਰ ਕੁਲੀਨ ਚਤੁਰ ਮੁਖਿ ਙਿਆਨੀ ਧਨਵੰਤ ॥
अति सुंदर कुलीन चतुर मुखि ङिआनी धनवंत ॥
यदि कोई व्यक्ति अति सुन्दर, कुलीन, चतुर एवं उच्चकोटि का ज्ञानी एवं धनवान हो तो भी
ਮਿਰਤਕ ਕਹੀਅਹਿ ਨਾਨਕਾ ਜਿਹ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨਹੀ ਭਗਵੰਤ ॥੧॥
मिरतक कहीअहि नानका जिह प्रीति नही भगवंत ॥१॥
हे नानक ! जिनके हृदय में भगवान की प्रीति नहीं है वे मृतक ही कहलाए जाएँगे ॥ १॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥
ਙੰਙਾ ਖਟੁ ਸਾਸਤ੍ਰ ਹੋਇ ਙਿਆਤਾ ॥
ङंङा खटु सासत्र होइ ङिआता ॥
ङ – कोई व्यक्ति शास्त्रों का ज्ञाता हो,
ਪੂਰਕੁ ਕੁੰਭਕ ਰੇਚਕ ਕਰਮਾਤਾ ॥
पूरकु कु्मभक रेचक करमाता ॥
वह (योगी की भाँति) श्वास अन्दर खींचने, बाहर निकालने एवं टिकाने का कर्म करता हो,
ਙਿਆਨ ਧਿਆਨ ਤੀਰਥ ਇਸਨਾਨੀ ॥
ङिआन धिआन तीरथ इसनानी ॥
वह ज्ञान (धार्मिक) चर्चा, मनन, तीर्थ यात्रा एवं स्नान करता हो,
ਸੋਮਪਾਕ ਅਪਰਸ ਉਦਿਆਨੀ ॥
सोमपाक अपरस उदिआनी ॥
वह अपना भोजन स्वयं पकाता हो, किसी के साथ न लगता हो एवं जंगल में रहता हो,
ਰਾਮ ਨਾਮ ਸੰਗਿ ਮਨਿ ਨਹੀ ਹੇਤਾ ॥
राम नाम संगि मनि नही हेता ॥
यदि उसके ह्रदय में प्रभु के नाम से प्रीति नहीं
ਜੋ ਕਛੁ ਕੀਨੋ ਸੋਊ ਅਨੇਤਾ ॥
जो कछु कीनो सोऊ अनेता ॥
तो सब कुछ जो वह करता है, वह नाशवान है।
ਉਆ ਤੇ ਊਤਮੁ ਗਨਉ ਚੰਡਾਲਾ ॥
उआ ते ऊतमु गनउ चंडाला ॥
हे नानक ! उससे उत्तम उस चंडाल को समझो,
ਨਾਨਕ ਜਿਹ ਮਨਿ ਬਸਹਿ ਗੁਪਾਲਾ ॥੧੬॥
नानक जिह मनि बसहि गुपाला ॥१६॥
जिसके मन में गोपाल निवास करता है ॥१६॥
ਸਲੋਕੁ ॥
सलोकु ॥
श्लोक॥
ਕੁੰਟ ਚਾਰਿ ਦਹ ਦਿਸਿ ਭ੍ਰਮੇ ਕਰਮ ਕਿਰਤਿ ਕੀ ਰੇਖ ॥
कुंट चारि दह दिसि भ्रमे करम किरति की रेख ॥
मनुष्य अपने किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार संसार के चारों कुण्ट एवं दसों दिशाओं में भटकता रहता है।
ਸੂਖ ਦੂਖ ਮੁਕਤਿ ਜੋਨਿ ਨਾਨਕ ਲਿਖਿਓ ਲੇਖ ॥੧॥
सूख दूख मुकति जोनि नानक लिखिओ लेख ॥१॥
हे नानक ! सुख-दुःख, मोक्ष एवं योनि (आवागमन) लिखी हुई किस्मत अनुसार ही मिलता है॥१॥
ਪਵੜੀ ॥
पवड़ी ॥
पउड़ी॥
ਕਕਾ ਕਾਰਨ ਕਰਤਾ ਸੋਊ ॥
कका कारन करता सोऊ ॥
क – परमात्मा स्वयं ही संयोग बनाने वाला है।
ਲਿਖਿਓ ਲੇਖੁ ਨ ਮੇਟਤ ਕੋਊ ॥
लिखिओ लेखु न मेटत कोऊ ॥
कोई भी प्राणी विधाता के विधान को मिटा नहीं सकता।
ਨਹੀ ਹੋਤ ਕਛੁ ਦੋਊ ਬਾਰਾ ॥
नही होत कछु दोऊ बारा ॥
ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जो उसे फिर से करना पड़े,
ਕਰਨੈਹਾਰੁ ਨ ਭੂਲਨਹਾਰਾ ॥
करनैहारु न भूलनहारा ॥
परमात्मा कभी भूल नहीं करता।
ਕਾਹੂ ਪੰਥੁ ਦਿਖਾਰੈ ਆਪੈ ॥
काहू पंथु दिखारै आपै ॥
कुछ जीवों को वह स्वयं ही सन्मार्ग दिखा देता है।
ਕਾਹੂ ਉਦਿਆਨ ਭ੍ਰਮਤ ਪਛੁਤਾਪੈ ॥
काहू उदिआन भ्रमत पछुतापै ॥
कुछ जीवों को वह भयानक जंगल में भटकाता रहता है।
ਆਪਨ ਖੇਲੁ ਆਪ ਹੀ ਕੀਨੋ ॥
आपन खेलु आप ही कीनो ॥
यह समूचा जगत्-खेल भगवान ने स्वयं ही रचा है।
ਜੋ ਜੋ ਦੀਨੋ ਸੁ ਨਾਨਕ ਲੀਨੋ ॥੧੭॥
जो जो दीनो सु नानक लीनो ॥१७॥
हे नानक ! जो कुछ भी प्रभु प्राणियों को देता है, वही उन्हें मिल जाता है॥ १७॥
ਸਲੋਕੁ ॥
सलोकु ॥
श्लोक ॥
ਖਾਤ ਖਰਚਤ ਬਿਲਛਤ ਰਹੇ ਟੂਟਿ ਨ ਜਾਹਿ ਭੰਡਾਰ ॥
खात खरचत बिलछत रहे टूटि न जाहि भंडार ॥
“(प्रभु के खजाने को) मनुष्य खाते, खर्च करते और भोगते रहते हैं परन्तु प्रभु का खजाना कभी समाप्त नहीं होता।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਪਤ ਅਨੇਕ ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਹਿ ਸੁਮਾਰ ॥੧॥
हरि हरि जपत अनेक जन नानक नाहि सुमार ॥१॥
हे नानक ! हरि-परमेश्वर के नाम का अनेकों ही मनुष्य भजन करते रहते हैं, जो कि गणना से परे है॥ १ ॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਖਖਾ ਖੂਨਾ ਕਛੁ ਨਹੀ ਤਿਸੁ ਸੰਮ੍ਰਥ ਕੈ ਪਾਹਿ ॥
खखा खूना कछु नही तिसु सम्रथ कै पाहि ॥
ख – परमात्मा जो समस्त शक्तियों का स्वामी है, उसके घर में किसी वस्तु की कोई कमी नहीं।
ਜੋ ਦੇਨਾ ਸੋ ਦੇ ਰਹਿਓ ਭਾਵੈ ਤਹ ਤਹ ਜਾਹਿ ॥
जो देना सो दे रहिओ भावै तह तह जाहि ॥
जो कुछ प्रभु ने देना है, वह देता जा रहा है। मनुष्य चाहे जहाँ मन करता है, वहाँ चलता रहे।
ਖਰਚੁ ਖਜਾਨਾ ਨਾਮ ਧਨੁ ਇਆ ਭਗਤਨ ਕੀ ਰਾਸਿ ॥
खरचु खजाना नाम धनु इआ भगतन की रासि ॥
नाम-धन भक्तों के पास खर्च करने के लिए भण्डार है। यह उनकी राशि-पूंजी है।
ਖਿਮਾ ਗਰੀਬੀ ਅਨਦ ਸਹਜ ਜਪਤ ਰਹਹਿ ਗੁਣਤਾਸ ॥
खिमा गरीबी अनद सहज जपत रहहि गुणतास ॥
सहनशीलता, नम्रता, आनंद एवं सहजता से वह गुणों के भण्डार प्रभु का जाप करते जाते हैं।
ਖੇਲਹਿ ਬਿਗਸਹਿ ਅਨਦ ਸਿਉ ਜਾ ਕਉ ਹੋਤ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥
खेलहि बिगसहि अनद सिउ जा कउ होत क्रिपाल ॥
परमेश्वर जिन पर कृपा करता है, वह आनंदपूर्वक जीवन का खेल खेलते हैं और सदैव प्रसन्न रहते हैं।
ਸਦੀਵ ਗਨੀਵ ਸੁਹਾਵਨੇ ਰਾਮ ਨਾਮ ਗ੍ਰਿਹਿ ਮਾਲ ॥
सदीव गनीव सुहावने राम नाम ग्रिहि माल ॥
जिनके ह्रदय घर में राम के नाम का पदार्थ है, वह सदैव ही धनवान एवं सुन्दर हैं।
ਖੇਦੁ ਨ ਦੂਖੁ ਨ ਡਾਨੁ ਤਿਹ ਜਾ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੀ ॥
खेदु न दूखु न डानु तिह जा कउ नदरि करी ॥
ईश्वर जिन पर कृपा-दृष्टि करता है, उनको न ही कोई कष्ट होता है, न ही कोई पीड़ा एवं दण्ड मिलता है।
ਨਾਨਕ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਭਾਣਿਆ ਪੂਰੀ ਤਿਨਾ ਪਰੀ ॥੧੮॥
नानक जो प्रभ भाणिआ पूरी तिना परी ॥१८॥
हे नानक ! जो प्रभु को भले लगते हैं, वह पूर्णतया सफल हो जाते हैं।॥१८॥