ਪ੍ਰਿਉ ਸਹਜ ਸੁਭਾਈ ਛੋਡਿ ਨ ਜਾਈ ਮਨਿ ਲਾਗਾ ਰੰਗੁ ਮਜੀਠਾ ॥
प्रिउ सहज सुभाई छोडि न जाई मनि लागा रंगु मजीठा ॥
मेरा प्रिय प्रभु अपने सहज-स्वभाव से मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाता। मेरे मन को मजीठ की भाँति प्रभु का गहरा रंग लग गया है।
ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਬੇਧੇ ਚਰਨ ਕਮਲ ਕਿਛੁ ਆਨ ਨ ਮੀਠਾ ॥੧॥
हरि नानक बेधे चरन कमल किछु आन न मीठा ॥१॥
हे नानक ! हरि के चरण-कमलों ने मेरा मन बिंध दिया है और उसे अन्य कुछ भी अच्छा नहीं लगता ॥ १ ॥
ਜਿਉ ਰਾਤੀ ਜਲਿ ਮਾਛੁਲੀ ਤਿਉ ਰਾਮ ਰਸਿ ਮਾਤੇ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
जिउ राती जलि माछुली तिउ राम रसि माते राम राजे ॥
जैसे मछली जल में मस्त रहती है, वैसे ही मैं राम रस से मस्त हुआ हूँ।
ਗੁਰ ਪੂਰੈ ਉਪਦੇਸਿਆ ਜੀਵਨ ਗਤਿ ਭਾਤੇ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
गुर पूरै उपदेसिआ जीवन गति भाते राम राजे ॥
पूर्ण गुरु ने मुझे उपदेश दिया है और मैं राम से प्रेम करता हूँ जिसने मुझे जीवन-मुक्ति की देन प्रदान की है।
ਜੀਵਨ ਗਤਿ ਸੁਆਮੀ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਆਪਿ ਲੀਏ ਲੜਿ ਲਾਏ ॥
जीवन गति सुआमी अंतरजामी आपि लीए लड़ि लाए ॥
जिन मनुष्यों को अंतर्यामी स्वामी अपने दामन के साथ लगा लेता है, वे जीवन में मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं।
ਹਰਿ ਰਤਨ ਪਦਾਰਥੋ ਪਰਗਟੋ ਪੂਰਨੋ ਛੋਡਿ ਨ ਕਤਹੂ ਜਾਏ ॥
हरि रतन पदारथो परगटो पूरनो छोडि न कतहू जाए ॥
हरि अपना रत्न जैसा अमूल्य नाम अपने भक्तों के हृदय में प्रगट कर देता है। वह सब जीवों में समाया हुआ है और अपने भक्तों को छोड़कर कहीं नहीं जाता।
ਪ੍ਰਭੁ ਸੁਘਰੁ ਸਰੂਪੁ ਸੁਜਾਨੁ ਸੁਆਮੀ ਤਾ ਕੀ ਮਿਟੈ ਨ ਦਾਤੇ ॥
प्रभु सुघरु सरूपु सुजानु सुआमी ता की मिटै न दाते ॥
जगत का स्वामी प्रभु सुन्दर स्वरूप एवं बुद्धिमान है, उसकी देन कभी समाप्त नहीं होती।
ਜਲ ਸੰਗਿ ਰਾਤੀ ਮਾਛੁਲੀ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਮਾਤੇ ॥੨॥
जल संगि राती माछुली नानक हरि माते ॥२॥
हे नानक ! जैसे मछली जल में लीन हुई है वैसे ही मैं प्रभु में समाया हुआ हूँ॥ २॥
ਚਾਤ੍ਰਿਕੁ ਜਾਚੈ ਬੂੰਦ ਜਿਉ ਹਰਿ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰਾ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
चात्रिकु जाचै बूंद जिउ हरि प्रान अधारा राम राजे ॥
जैसे चातक स्वाति-बूंद की लालसा करता है वैसे ही हरि मेरे प्राणों का आधार है।
ਮਾਲੁ ਖਜੀਨਾ ਸੁਤ ਭ੍ਰਾਤ ਮੀਤ ਸਭਹੂੰ ਤੇ ਪਿਆਰਾ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
मालु खजीना सुत भ्रात मीत सभहूं ते पिआरा राम राजे ॥
प्रभु मुझे धन-भण्डार, पुत्र, भाई एवं मित्र सबसे प्रिय है।
ਸਭਹੂੰ ਤੇ ਪਿਆਰਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਾਰਾ ਤਾ ਕੀ ਗਤਿ ਨਹੀ ਜਾਣੀਐ ॥
सभहूं ते पिआरा पुरखु निरारा ता की गति नही जाणीऐ ॥
सबसे प्यारा एवं निराला आदिपुरुष मुझे सबसे प्रिय लगता है। उसकी गति कोई भी मनुष्य जान नहीं सकता।
ਹਰਿ ਸਾਸਿ ਗਿਰਾਸਿ ਨ ਬਿਸਰੈ ਕਬਹੂੰ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਰੰਗੁ ਮਾਣੀਐ ॥
हरि सासि गिरासि न बिसरै कबहूं गुर सबदी रंगु माणीऐ ॥
प्रत्येक श्वास एवं ग्रास भर के लिए भी मैं हरि को विस्मृत नहीं करता। गुरु के शब्द द्वारा मैं उसके प्रेम का आनंद प्राप्त करता हूँ।
ਪ੍ਰਭੁ ਪੁਰਖੁ ਜਗਜੀਵਨੋ ਸੰਤ ਰਸੁ ਪੀਵਨੋ ਜਪਿ ਭਰਮ ਮੋਹ ਦੁਖ ਡਾਰਾ ॥
प्रभु पुरखु जगजीवनो संत रसु पीवनो जपि भरम मोह दुख डारा ॥
परमपुरुष प्रभु जगत का जीवन है। संतजन हरि-रस का पान करते हैं और उसका सुमिरन करके अपना भ्रम, मोह एवं दुःख दूर कर लेते हैं।
ਚਾਤ੍ਰਿਕੁ ਜਾਚੈ ਬੂੰਦ ਜਿਉ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਪਿਆਰਾ ॥੩॥
चात्रिकु जाचै बूंद जिउ नानक हरि पिआरा ॥३॥
जैसे चातक स्वाति-बूंद की अभिलाषा करता है वैसे ही नानक को हरि प्यारा लगता है॥ ३॥
ਮਿਲੇ ਨਰਾਇਣ ਆਪਣੇ ਮਾਨੋਰਥੋ ਪੂਰਾ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
मिले नराइण आपणे मानोरथो पूरा राम राजे ॥
अपने नारायण से मिलकर मेरे मनोरथ पूरे हो गए हैं।
ਢਾਠੀ ਭੀਤਿ ਭਰੰਮ ਕੀ ਭੇਟਤ ਗੁਰੁ ਸੂਰਾ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
ढाठी भीति भरम की भेटत गुरु सूरा राम राजे ॥
शूरवीर गुरु को मिलने से भ्रम की दीवार ध्वस्त हो गई है।
ਪੂਰਨ ਗੁਰ ਪਾਏ ਪੁਰਬਿ ਲਿਖਾਏ ਸਭ ਨਿਧਿ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥
पूरन गुर पाए पुरबि लिखाए सभ निधि दीन दइआला ॥
पूर्ण गुरु उन्हें ही मिला है, जिन्होंने अपने पूर्व जन्म के कर्मो अनुसार अपनी तकदीर में सर्व निधियाँ देने वाले दीन दयालु परमात्मा से शुभ लेख लिखाए हैं।
ਆਦਿ ਮਧਿ ਅੰਤਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਈ ਸੁੰਦਰ ਗੁਰ ਗੋਪਾਲਾ ॥
आदि मधि अंति प्रभु सोई सुंदर गुर गोपाला ॥
सुन्दर गुरु गोपाल प्रभु ही सृष्टि के आदि, मध्य एवं अन्त तक विद्यमान है।
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨੰਦ ਘਨੇਰੇ ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਸਾਧੂ ਧੂਰਾ ॥
सूख सहज आनंद घनेरे पतित पावन साधू धूरा ॥
साधुओं की चरण-धूलि पतितों को पावन कर देती है और बड़ा सुख एवं सहज आनंद प्रदान करती है।
ਹਰਿ ਮਿਲੇ ਨਰਾਇਣ ਨਾਨਕਾ ਮਾਨੋਰਥੋੁ ਪੂਰਾ ॥੪॥੧॥੩॥
हरि मिले नराइण नानका मानोरथो पूरा ॥४॥१॥३॥
नानक को नारायण मिल गया है और उसका मनोरथ पूरा हो गया है॥ ४॥ १॥ ३॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਛੰਤ ਘਰੁ ੬
आसा महला ५ छंत घरु ६
आसा महला ५ छंत घरु ६
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
ਸਲੋਕੁ ॥
सलोकु ॥
श्लोक॥
ਜਾ ਕਉ ਭਏ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਪ੍ਰਭ ਹਰਿ ਹਰਿ ਸੇਈ ਜਪਾਤ ॥
जा कउ भए क्रिपाल प्रभ हरि हरि सेई जपात ॥
जिन मनुष्यों पर प्रभु कृपालु हो जाता है, वे हरि-नाम ही जपते रहते हैं।
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਗੀ ਤਿਨੑ ਰਾਮ ਸਿਉ ਭੇਟਤ ਸਾਧ ਸੰਗਾਤ ॥੧॥
नानक प्रीति लगी तिन्ह राम सिउ भेटत साध संगात ॥१॥
हे नानक ! साधसंगत में मिलने से ही उनका प्रेम राम से लगा है॥ १॥
ਛੰਤੁ ॥
छंतु ॥
छंद ॥
ਜਲ ਦੁਧ ਨਿਆਈ ਰੀਤਿ ਅਬ ਦੁਧ ਆਚ ਨਹੀ ਮਨ ਐਸੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਹਰੇ ॥
जल दुध निआई रीति अब दुध आच नही मन ऐसी प्रीति हरे ॥
हे मन ! ईश्वर से ऐसा प्रेम कर, जैसा प्रेम जल का दूध से है। जब दोनों को आग पर रखा जाता है तो जल दूध को आंच नहीं आने देता।
ਅਬ ਉਰਝਿਓ ਅਲਿ ਕਮਲੇਹ ਬਾਸਨ ਮਾਹਿ ਮਗਨ ਇਕੁ ਖਿਨੁ ਭੀ ਨਾਹਿ ਟਰੈ ॥
अब उरझिओ अलि कमलेह बासन माहि मगन इकु खिनु भी नाहि टरै ॥
जैसे भैवरा कमल की सुगन्धि में मग्न होकर फंस जाता है तो एक क्षण भर को भी इससे दूर नहीं होता।
ਖਿਨੁ ਨਾਹਿ ਟਰੀਐ ਪ੍ਰੀਤਿ ਹਰੀਐ ਸੀਗਾਰ ਹਭਿ ਰਸ ਅਰਪੀਐ ॥
खिनु नाहि टरीऐ प्रीति हरीऐ सीगार हभि रस अरपीऐ ॥
हे मन ! इस तरह एक क्षण भर के लिए प्रभु के प्रेम से पीछे नहीं हटना चाहिए। अपने सारे श्रृंगार एवं रस प्रभु को अर्पण कर देने चाहिए।
ਜਹ ਦੂਖੁ ਸੁਣੀਐ ਜਮ ਪੰਥੁ ਭਣੀਐ ਤਹ ਸਾਧਸੰਗਿ ਨ ਡਰਪੀਐ ॥
जह दूखु सुणीऐ जम पंथु भणीऐ तह साधसंगि न डरपीऐ ॥
जहाँ दु:ख सुना जाता और यम का मार्ग बताया जाता है, वहां सत्संगति के प्रभाव से कोई भय प्रभावित नहीं करता।
ਕਰਿ ਕੀਰਤਿ ਗੋਵਿੰਦ ਗੁਣੀਐ ਸਗਲ ਪ੍ਰਾਛਤ ਦੁਖ ਹਰੇ ॥
करि कीरति गोविंद गुणीऐ सगल प्राछत दुख हरे ॥
गोविंद की कीर्ति का गुणगान करते रहो, इससे सब दुख एवं पाप दूर हो जाएँगे।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਛੰਤ ਗੋਵਿੰਦ ਹਰਿ ਕੇ ਮਨ ਹਰਿ ਸਿਉ ਨੇਹੁ ਕਰੇਹੁ ਐਸੀ ਮਨ ਪ੍ਰੀਤਿ ਹਰੇ ॥੧॥
कहु नानक छंत गोविंद हरि के मन हरि सिउ नेहु करेहु ऐसी मन प्रीति हरे ॥१॥
नानक का कथन है की हे मन ! गोविन्द की महिमा के गीत गाता रह और हरी से प्रेम बनाये रख। हे मन ! ऐसा प्रेम बनाये रख ॥ १ ॥
ਜੈਸੀ ਮਛੁਲੀ ਨੀਰ ਇਕੁ ਖਿਨੁ ਭੀ ਨਾ ਧੀਰੇ ਮਨ ਐਸਾ ਨੇਹੁ ਕਰੇਹੁ ॥
जैसी मछुली नीर इकु खिनु भी ना धीरे मन ऐसा नेहु करेहु ॥
जैसे मछली जल के बिना धैर्य नहीं करती, हे मन ! वैसे ही प्रभु से प्रेम कायम कर।