Hindi Page 1370

ਆਪ ਡੁਬੇ ਚਹੁ ਬੇਦ ਮਹਿ ਚੇਲੇ ਦੀਏ ਬਹਾਇ ॥੧੦੪॥
आप डुबे चहु बेद महि चेले दीए बहाइ ॥१०४॥
ऐसे गुरु स्वयं तो चार वेदों के कर्मकाण्ड में डूबे होते हैं, अपने चेलों को भी उस कर्मकाण्ड में बहा देते हैं।॥ १०४ ॥

ਕਬੀਰ ਜੇਤੇ ਪਾਪ ਕੀਏ ਰਾਖੇ ਤਲੈ ਦੁਰਾਇ ॥
कबीर जेते पाप कीए राखे तलै दुराइ ॥
हे कबीर ! व्यक्ति जितने भी पाप कर्म करता है, उसको लोगों से छिपाकर दिल में रखता है।

ਪਰਗਟ ਭਏ ਨਿਦਾਨ ਸਭ ਜਬ ਪੂਛੇ ਧਰਮ ਰਾਇ ॥੧੦੫॥
परगट भए निदान सभ जब पूछे धरम राइ ॥१०५॥
परन्तु जब धर्मराज कर्मो का हिसाब पूछता है तो सब सामने आ जाते हैं।॥ १०५ ॥

ਕਬੀਰ ਹਰਿ ਕਾ ਸਿਮਰਨੁ ਛਾਡਿ ਕੈ ਪਾਲਿਓ ਬਹੁਤੁ ਕੁਟੰਬੁ ॥
कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै पालिओ बहुतु कुट्मबु ॥
हे कबीर ! व्यक्ति भगवान का भजन छोड़कर परिवार के पालन-पोषण में लीन रहता है।

ਧੰਧਾ ਕਰਤਾ ਰਹਿ ਗਇਆ ਭਾਈ ਰਹਿਆ ਨ ਬੰਧੁ ॥੧੦੬॥
धंधा करता रहि गइआ भाई रहिआ न बंधु ॥१०६॥
वह काम धंधे करता भजन से वंचित रह जाता है और अन्त में भाई-बन्धु कोई नहीं रहता ॥ १०६॥

ਕਬੀਰ ਹਰਿ ਕਾ ਸਿਮਰਨੁ ਛਾਡਿ ਕੈ ਰਾਤਿ ਜਗਾਵਨ ਜਾਇ ॥
कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै राति जगावन जाइ ॥
कबीर जी कहते हैं- परमात्मा का सिमरन छोड़कर जो स्त्री रात को श्मशान में मुर्दा जगाने जाती है,

ਸਰਪਨਿ ਹੋਇ ਕੈ ਅਉਤਰੈ ਜਾਏ ਅਪੁਨੇ ਖਾਇ ॥੧੦੭॥
सरपनि होइ कै अउतरै जाए अपुने खाइ ॥१०७॥
वह नागिन बनकर जन्म लेती है और अपने ही बच्चों को खा जाती है॥ १०७ ॥

ਕਬੀਰ ਹਰਿ ਕਾ ਸਿਮਰਨੁ ਛਾਡਿ ਕੈ ਅਹੋਈ ਰਾਖੈ ਨਾਰਿ ॥
कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै अहोई राखै नारि ॥
कबीर जी कथन करते हैं- जो नारी भगवान का सिमरन छोड़कर आहोई माता का व्रत रखती है,

ਗਦਹੀ ਹੋਇ ਕੈ ਅਉਤਰੈ ਭਾਰੁ ਸਹੈ ਮਨ ਚਾਰਿ ॥੧੦੮॥
गदही होइ कै अउतरै भारु सहै मन चारि ॥१०८॥
वह गधी बनकर अवतरित होती है और कई मन बोझ उठाती है॥ १०८ ॥

ਕਬੀਰ ਚਤੁਰਾਈ ਅਤਿ ਘਨੀ ਹਰਿ ਜਪਿ ਹਿਰਦੈ ਮਾਹਿ ॥
कबीर चतुराई अति घनी हरि जपि हिरदै माहि ॥
कबीर जी उद्बोधन करते हैं- सबसे बड़ी समझदारी तो यही है कि दिल में भगवान का भजन किया जाए,

ਸੂਰੀ ਊਪਰਿ ਖੇਲਨਾ ਗਿਰੈ ਤ ਠਾਹਰ ਨਾਹਿ ॥੧੦੯॥
सूरी ऊपरि खेलना गिरै त ठाहर नाहि ॥१०९॥
अन्यथा सूली पर चढ़ने के समान है, इससे यदि गिर पड़े तो कहीं आसरा नहीं मिलना ॥ १०६ ॥

ਕਬੀਰ ਸੋੁਈ ਮੁਖੁ ਧੰਨਿ ਹੈ ਜਾ ਮੁਖਿ ਕਹੀਐ ਰਾਮੁ ॥
कबीर सोई मुखु धंनि है जा मुखि कहीऐ रामु ॥
कबीर जी कथन करते हैं- वही मुख धन्य है, जिससे राम नाम कहा जाता है।

ਦੇਹੀ ਕਿਸ ਕੀ ਬਾਪੁਰੀ ਪਵਿਤ੍ਰੁ ਹੋਇਗੋ ਗ੍ਰਾਮੁ ॥੧੧੦॥
देही किस की बापुरी पवित्रु होइगो ग्रामु ॥११०॥
शरीर बेचारे की तो क्या बात है, पूरा नगर ही पवित्र हो जाएगा, जिसमें राम नाम जपा जाएगा ॥ ११० ॥

ਕਬੀਰ ਸੋਈ ਕੁਲ ਭਲੀ ਜਾ ਕੁਲ ਹਰਿ ਕੋ ਦਾਸੁ ॥
कबीर सोई कुल भली जा कुल हरि को दासु ॥
हे कबीर ! वही कुल भली है, जिसमें ईश्वर का भक्त उत्पन्न होता है।

ਜਿਹ ਕੁਲ ਦਾਸੁ ਨ ਊਪਜੈ ਸੋ ਕੁਲ ਢਾਕੁ ਪਲਾਸੁ ॥੧੧੧॥
जिह कुल दासु न ऊपजै सो कुल ढाकु पलासु ॥१११॥
जिस कुल में ईश्वर-भक्त पैदा नहीं होता, वह कुल ढाक-प्लाश के समान व्यर्थ है॥ १११॥

ਕਬੀਰ ਹੈ ਗਇ ਬਾਹਨ ਸਘਨ ਘਨ ਲਾਖ ਧਜਾ ਫਹਰਾਹਿ ॥
कबीर है गइ बाहन सघन घन लाख धजा फहराहि ॥
हे कबीर ! बेशक कितने ही हाथी, घोड़े एवं सवारी के लिए वाहन हों, चाहे देश-प्रदेश में सत्ता के झण्डे झूलते हों।

ਇਆ ਸੁਖ ਤੇ ਭਿਖੵਾ ਭਲੀ ਜਉ ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਦਿਨ ਜਾਹਿ ॥੧੧੨॥
इआ सुख ते भिख्या भली जउ हरि सिमरत दिन जाहि ॥११२॥
इन सुखों के बावजूद भिक्षा ही भली है, यदि दिन परमात्मा के सिमरन में गुजरता हो ॥ ११२ ॥

ਕਬੀਰ ਸਭੁ ਜਗੁ ਹਉ ਫਿਰਿਓ ਮਾਂਦਲੁ ਕੰਧ ਚਢਾਇ ॥
कबीर सभु जगु हउ फिरिओ मांदलु कंध चढाइ ॥
हे कबीर ! कधे पर ढोल रखकर मैं संसार भर में घूमा हूँ।

ਕੋਈ ਕਾਹੂ ਕੋ ਨਹੀ ਸਭ ਦੇਖੀ ਠੋਕਿ ਬਜਾਇ ॥੧੧੩॥
कोई काहू को नही सभ देखी ठोकि बजाइ ॥११३॥
सब लोगों को देखा है (हरेक स्वार्थी है) कोई किसी का नहीं ॥ ११३॥

ਮਾਰਗਿ ਮੋਤੀ ਬੀਥਰੇ ਅੰਧਾ ਨਿਕਸਿਓ ਆਇ ॥
मारगि मोती बीथरे अंधा निकसिओ आइ ॥
जीवन राह पर गुण रूपी मोती बिखरे हुए हैं, लेकिन अन्धा मनुष्य पास से ही निकलता जा रहा है।

ਜੋਤਿ ਬਿਨਾ ਜਗਦੀਸ ਕੀ ਜਗਤੁ ਉਲੰਘੇ ਜਾਇ ॥੧੧੪॥
जोति बिना जगदीस की जगतु उलंघे जाइ ॥११४॥
ईश्वर की ज्ञान-ज्योति के बिना जगत गुजरता जाता है॥ ११४॥

ਬੂਡਾ ਬੰਸੁ ਕਬੀਰ ਕਾ ਉਪਜਿਓ ਪੂਤੁ ਕਮਾਲੁ ॥
बूडा बंसु कबीर का उपजिओ पूतु कमालु ॥
कबीर जी कहते हैं कि पुत्र कमाल क्या पैदा हुआ, मेरा तो वंश ही डूब गया।

ਹਰਿ ਕਾ ਸਿਮਰਨੁ ਛਾਡਿ ਕੈ ਘਰਿ ਲੇ ਆਯਾ ਮਾਲੁ ॥੧੧੫॥
हरि का सिमरनु छाडि कै घरि ले आया मालु ॥११५॥
भगवान का भजन छोड़कर यह तो घर में धन-दौलत ही ले आया है॥ ११५ ॥

ਕਬੀਰ ਸਾਧੂ ਕਉ ਮਿਲਨੇ ਜਾਈਐ ਸਾਥਿ ਨ ਲੀਜੈ ਕੋਇ ॥
कबीर साधू कउ मिलने जाईऐ साथि न लीजै कोइ ॥
कबीर जी उद्बोधन करते हैं कि हे भाई ! यदि साधु महापुरुष को मिलने जाना है तो किसी के साथ पर निर्भर मत रहो।

ਪਾਛੈ ਪਾਉ ਨ ਦੀਜੀਐ ਆਗੈ ਹੋਇ ਸੁ ਹੋਇ ॥੧੧੬॥
पाछै पाउ न दीजीऐ आगै होइ सु होइ ॥११६॥
यदि चल पड़े हो तो पीछे मत हटो, आगे जो होगा अथवा होना है, कोई चिंता न करो॥ ११६ ॥

ਕਬੀਰ ਜਗੁ ਬਾਧਿਓ ਜਿਹ ਜੇਵਰੀ ਤਿਹ ਮਤ ਬੰਧਹੁ ਕਬੀਰ ॥
कबीर जगु बाधिओ जिह जेवरी तिह मत बंधहु कबीर ॥
कबीर जी समझाते हैं कि जिस मोह-माया की जंजीर से संसार बंधा हुआ है, उससे अपने आपको मत बांधो।

ਜੈਹਹਿ ਆਟਾ ਲੋਨ ਜਿਉ ਸੋਨ ਸਮਾਨਿ ਸਰੀਰੁ ॥੧੧੭॥
जैहहि आटा लोन जिउ सोन समानि सरीरु ॥११७॥
अन्यथा सोने जैसा शरीर आटे व नमक की तरह सस्ते भाव व्यर्थ हो जायेंगे ॥११७॥

ਕਬੀਰ ਹੰਸੁ ਉਡਿਓ ਤਨੁ ਗਾਡਿਓ ਸੋਝਾਈ ਸੈਨਾਹ ॥
कबीर हंसु उडिओ तनु गाडिओ सोझाई सैनाह ॥
हे कबीर ! (मोंत करीब है) आत्मा उड़ने वाला है, शरीर खत्म हो रहा है फिर भी इशारों से संबंधियों को समझाता है।

ਅਜਹੂ ਜੀਉ ਨ ਛੋਡਈ ਰੰਕਾਈ ਨੈਨਾਹ ॥੧੧੮॥
अजहू जीउ न छोडई रंकाई नैनाह ॥११८॥
अन्तकाल भी जीव ऑखों की कगालता नहीं छोड़ता ॥ ११८ ॥

ਕਬੀਰ ਨੈਨ ਨਿਹਾਰਉ ਤੁਝ ਕਉ ਸ੍ਰਵਨ ਸੁਨਉ ਤੁਅ ਨਾਉ ॥
कबीर नैन निहारउ तुझ कउ स्रवन सुनउ तुअ नाउ ॥
कबीर जी कहते हैं कि हे ईश्वर ! इन नयनों से तुझे निहारता रहूँ, कानों से तेरा नाम-कीर्तन सुनता रहूँ,

ਬੈਨ ਉਚਰਉ ਤੁਅ ਨਾਮ ਜੀ ਚਰਨ ਕਮਲ ਰਿਦ ਠਾਉ ॥੧੧੯॥
बैन उचरउ तुअ नाम जी चरन कमल रिद ठाउ ॥११९॥
तेरे ही नामोच्चारण में लीन रहूँ और तेरे ही चरण कमल हृदय में बसाकर रखें ॥ ११६ ॥

ਕਬੀਰ ਸੁਰਗ ਨਰਕ ਤੇ ਮੈ ਰਹਿਓ ਸਤਿਗੁਰ ਕੇ ਪਰਸਾਦਿ ॥
कबीर सुरग नरक ते मै रहिओ सतिगुर के परसादि ॥
कबीर जी कहते हैं कि सतिगुरु की कृपा से मैं स्वर्ग-नरक के चक्र से मुक्त हो गया हूँ।

ਚਰਨ ਕਮਲ ਕੀ ਮਉਜ ਮਹਿ ਰਹਉ ਅੰਤਿ ਅਰੁ ਆਦਿ ॥੧੨੦॥
चरन कमल की मउज महि रहउ अंति अरु आदि ॥१२०॥
मैं आदि से अंत तक परमेश्वर के चरण-कमल की मौज में तल्लीन रहता हूँ॥ १२०॥

ਕਬੀਰ ਚਰਨ ਕਮਲ ਕੀ ਮਉਜ ਕੋ ਕਹਿ ਕੈਸੇ ਉਨਮਾਨ ॥
कबीर चरन कमल की मउज को कहि कैसे उनमान ॥
कबीर जी कहते हैं- चरण-कमल की मौज का ठीक अनुमान किस तरह लगाया जाए,

ਕਹਿਬੇ ਕਉ ਸੋਭਾ ਨਹੀ ਦੇਖਾ ਹੀ ਪਰਵਾਨੁ ॥੧੨੧॥
कहिबे कउ सोभा नही देखा ही परवानु ॥१२१॥
कहने से तो शोभा नहीं देता, परन्तु देखने से ही विश्वास होता है॥ १२१ ॥

ਕਬੀਰ ਦੇਖਿ ਕੈ ਕਿਹ ਕਹਉ ਕਹੇ ਨ ਕੋ ਪਤੀਆਇ ॥
कबीर देखि कै किह कहउ कहे न को पतीआइ ॥
हे कबीर ! (चरण-कमल की मौज को) देखकर मैं किसे बताऊँ, क्योंकि बताने से किसी को भरोसा नहीं होता।

ਹਰਿ ਜੈਸਾ ਤੈਸਾ ਉਹੀ ਰਹਉ ਹਰਖਿ ਗੁਨ ਗਾਇ ॥੧੨੨॥
हरि जैसा तैसा उही रहउ हरखि गुन गाइ ॥१२२॥
यही कहना उचित है कि ईश्वर जैसा है वैसा ही है, अतः मैं उसके गुणगान में खुश रहता हूँ॥ १२२ ॥

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