ਇਹੁ ਧਨੁ ਸੰਪੈ ਮਾਇਆ ਝੂਠੀ ਅੰਤਿ ਛੋਡਿ ਚਲਿਆ ਪਛੁਤਾਈ ॥
इहु धनु स्मपै माइआ झूठी अंति छोडि चलिआ पछुताई ॥
यह धन-सम्पत्ति और मोह-माया सब झूठे हैं। जिसे अन्तकाल त्याग कर पश्चाताप करते हुए प्राणी चला जाता है।
ਜਿਸ ਨੋ ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ ਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਸੋ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥
जिस नो किरपा करे गुरु मेले सो हरि हरि नामु समालि ॥
जिस पर ईश्वर की कृपा होती है, उसका गुरु से मिलन होता है और वह ईश्वर की उपासना में लीन हो जाता है।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤੀਜੈ ਪਹਰੈ ਪ੍ਰਾਣੀ ਸੇ ਜਾਇ ਮਿਲੇ ਹਰਿ ਨਾਲਿ ॥੩॥
कहु नानक तीजै पहरै प्राणी से जाइ मिले हरि नालि ॥३॥
गुरु जी उद्बोधन करते हैं हे नानक ! जीवन रूपी रात्रि के तृतीय प्रहर में जो प्राणी हरि-भजन करता है, वह प्रभु में ही विलीन हो जाता है ॥३॥
ਚਉਥੈ ਪਹਰੈ ਰੈਣਿ ਕੈ ਵਣਜਾਰਿਆ ਮਿਤ੍ਰਾ ਹਰਿ ਚਲਣ ਵੇਲਾ ਆਦੀ ॥
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि चलण वेला आदी ॥
हे मेरे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के चतुर्थ प्रहर में ईश्वर ने मृत्यु काल निकट ला दिया है।
ਕਰਿ ਸੇਵਹੁ ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੂ ਵਣਜਾਰਿਆ ਮਿਤ੍ਰਾ ਸਭ ਚਲੀ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਦੀ ॥
करि सेवहु पूरा सतिगुरू वणजारिआ मित्रा सभ चली रैणि विहादी ॥
इसलिए हे मित्र ! अपने हाथों से पूर्ण सतिगुरु की श्रद्धापूर्वक सेवा कर, क्योंकि जीवन रूपी समूची रात्रि अब व्यतीत होती जा रही है।
ਹਰਿ ਸੇਵਹੁ ਖਿਨੁ ਖਿਨੁ ਢਿਲ ਮੂਲਿ ਨ ਕਰਿਹੁ ਜਿਤੁ ਅਸਥਿਰੁ ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਹੋਵਹੁ ॥
हरि सेवहु खिनु खिनु ढिल मूलि न करिहु जितु असथिरु जुगु जुगु होवहु ॥
प्रतिक्षण परमेश्वर की सेवा करो, इसमें विलम्ब उचित नहीं, क्योंकि इससे तुम युग-युग के लिए अमर हो जाओगे।
ਹਰਿ ਸੇਤੀ ਸਦ ਮਾਣਹੁ ਰਲੀਆ ਜਨਮ ਮਰਣ ਦੁਖ ਖੋਵਹੁ ॥
हरि सेती सद माणहु रलीआ जनम मरण दुख खोवहु ॥
हे प्राणी ! ईश्वर के रंग में आनंद मनाओ और जन्म-मरण के दुःख को सदैव के लिए भुला दो।
ਗੁਰ ਸਤਿਗੁਰ ਸੁਆਮੀ ਭੇਦੁ ਨ ਜਾਣਹੁ ਜਿਤੁ ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਸੁਖਾਂ ॥
गुर सतिगुर सुआमी भेदु न जाणहु जितु मिलि हरि भगति सुखांदी ॥
सतिगुरु एवं भगवान में कोई अन्तर मत समझो। सतिगुरु को मिलकर भगवान की भक्ति अच्छी लगती है।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਾਣੀ ਚਉਥੈ ਪਹਰੈ ਸਫਲਿਓੁ ਰੈਣਿ ਭਗਤਾ ਦੀ ॥੪॥੧॥
कहु नानक प्राणी चउथै पहरै सफलिओ रैणि भगता दी ॥४॥१॥३॥
हे नानक ! जीवन रूपी रात्रि के चतुर्थ प्रहर में जो प्राणी भगवान की भक्ति करते हैं, उन भक्तों की जीवन-रात्रेि सफल हो जाती है ॥ ४॥१ ॥३ ॥
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सिरीरागु महला ५ ॥
श्रीरागु महला ५ ॥
ਪਹਿਲੈ ਪਹਰੈ ਰੈਣਿ ਕੈ ਵਣਜਾਰਿਆ ਮਿਤ੍ਰਾ ਧਰਿ ਪਾਇਤਾ ਉਦਰੈ ਮਾਹਿ ॥
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा धरि पाइता उदरै माहि ॥
हे मेरे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के प्रथम प्रहर में ईश्वर प्राणी की माता के उदर में डाल देता है।
ਦਸੀ ਮਾਸੀ ਮਾਨਸੁ ਕੀਆ ਵਣਜਾਰਿਆ ਮਿਤ੍ਰਾ ਕਰਿ ਮੁਹਲਤਿ ਕਰਮ ਕਮਾਹਿ ॥
दसी मासी मानसु कीआ वणजारिआ मित्रा करि मुहलति करम कमाहि ॥
माता के उदर में ही प्रभु दस माह में उसे मनुष्य बना देता है। प्रभु उसे जीवन रूपी समय देता है और इस समय में प्राणी शुभ-अशुभ कर्म करता है।
ਮੁਹਲਤਿ ਕਰਿ ਦੀਨੀ ਕਰਮ ਕਮਾਣੇ ਜੈਸਾ ਲਿਖਤੁ ਧੁਰਿ ਪਾਇਆ ॥
मुहलति करि दीनी करम कमाणे जैसा लिखतु धुरि पाइआ ॥
प्रभु यह जीवन-अवधि निर्धारित कर देता है। जीव के पूर्व जन्म के कर्मो अनुसार उसके माथे पर ऐसी किस्मत लिख दी जाती है, जैसे वह कर्म करता है।
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਭਾਈ ਸੁਤ ਬਨਿਤਾ ਤਿਨ ਭੀਤਰਿ ਪ੍ਰਭੂ ਸੰਜੋਇਆ ॥
मात पिता भाई सुत बनिता तिन भीतरि प्रभू संजोइआ ॥
परमात्मा प्राणी को माता-पिता, भाई, पुत्र-पत्नी इत्यादि के संबंधों में बांध देता है।
ਕਰਮ ਸੁਕਰਮ ਕਰਾਏ ਆਪੇ ਇਸੁ ਜੰਤੈ ਵਸਿ ਕਿਛੁ ਨਾਹਿ ॥
करम सुकरम कराए आपे इसु जंतै वसि किछु नाहि ॥
हरि स्वयं ही शुभ अथवा अशुभ कर्म प्राणी से करवाता है तथा प्राणी के अपने वश में कुछ नहीं।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਾਣੀ ਪਹਿਲੈ ਪਹਰੈ ਧਰਿ ਪਾਇਤਾ ਉਦਰੈ ਮਾਹਿ ॥੧॥
कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै धरि पाइता उदरै माहि ॥१॥
हे नानक ! जीवन रूपी रात्रि के प्रथम प्रहर में भगवान प्राणी को माता के उदर में डाल देता है ॥१॥
ਦੂਜੈ ਪਹਰੈ ਰੈਣਿ ਕੈ ਵਣਜਾਰਿਆ ਮਿਤ੍ਰਾ ਭਰਿ ਜੁਆਨੀ ਲਹਰੀ ਦੇਇ ॥
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा भरि जुआनी लहरी देइ ॥
हे मेरे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के द्वितीय प्रहर में प्राणी की भरी जवानी नदी के समान काम, मोह और तृष्णा की तरंगों में बहती है।
ਬੁਰਾ ਭਲਾ ਨ ਪਛਾਣਈ ਵਣਜਾਰਿਆ ਮਿਤ੍ਰਾ ਮਨੁ ਮਤਾ ਅਹੰਮੇਇ ॥
बुरा भला न पछाणई वणजारिआ मित्रा मनु मता अहमेइ ॥
हे मेरे वणजारे मित्र ! अहंकार में मदमस्त होने के कारण प्राणी बुरा-भला पहचानने में असमर्थ होता है।
ਬੁਰਾ ਭਲਾ ਨ ਪਛਾਣੈ ਪ੍ਰਾਣੀ ਆਗੈ ਪੰਥੁ ਕਰਾਰਾ ॥
बुरा भला न पछाणै प्राणी आगै पंथु करारा ॥
प्राणी अच्छे-बुरे की पहचान नहीं करता और आगे बढ़ने का मार्ग उसके लिए अधिक कठोर है।
ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਕਬਹੂੰ ਨ ਸੇਵਿਆ ਸਿਰਿ ਠਾਢੇ ਜਮ ਜੰਦਾਰਾ ॥
पूरा सतिगुरु कबहूं न सेविआ सिरि ठाढे जम जंदारा ॥
वह सतिगुरु को पहचानकर उसकी सेवा में लीन नहीं होता और निर्दयी यमदूत उसके सिर पर (मृत्यु रूपी) दण्ड धारण किए खड़ा रहता है।
ਧਰਮ ਰਾਇ ਜਬ ਪਕਰਸਿ ਬਵਰੇ ਤਬ ਕਿਆ ਜਬਾਬੁ ਕਰੇਇ ॥
धरम राइ जब पकरसि बवरे तब किआ जबाबु करेइ ॥
हे मूर्ख मनुष्य ! जब धर्मराज तुझे पकड़कर पूछेगा? तुम उसको अपने कर्मों का क्या उत्तर दोगे?
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਦੂਜੈ ਪਹਰੈ ਪ੍ਰਾਣੀ ਭਰਿ ਜੋਬਨੁ ਲਹਰੀ ਦੇਇ ॥੨॥
कहु नानक दूजै पहरै प्राणी भरि जोबनु लहरी देइ ॥२॥
हे नानक ! जीवन रूपी रात्रि के द्वितीय प्रहर में प्राणी की भरी जवानी नदी के समान काम, मोह एवं तृष्णा की तरंगों में बहती है॥२॥
ਤੀਜੈ ਪਹਰੈ ਰੈਣਿ ਕੈ ਵਣਜਾਰਿਆ ਮਿਤ੍ਰਾ ਬਿਖੁ ਸੰਚੈ ਅੰਧੁ ਅਗਿਆਨੁ ॥
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बिखु संचै अंधु अगिआनु ॥
हे मेरे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के तृतीय प्रहर में ज्ञानहीन,मुर्ख प्राणी विषय-वासनाओं का विष संग्रह करता है।
ਪੁਤ੍ਰਿ ਕਲਤ੍ਰਿ ਮੋਹਿ ਲਪਟਿਆ ਵਣਜਾਰਿਆ ਮਿਤ੍ਰਾ ਅੰਤਰਿ ਲਹਰਿ ਲੋਭਾਨੁ ॥
पुत्रि कलत्रि मोहि लपटिआ वणजारिआ मित्रा अंतरि लहरि लोभानु ॥
वह अपने पुत्र एवं पत्नी के मोह में फँसा हुआ है और उसके मन में लोभ की लहरें उठती हैं।
ਅੰਤਰਿ ਲਹਰਿ ਲੋਭਾਨੁ ਪਰਾਨੀ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਚਿਤਿ ਨ ਆਵੈ ॥
अंतरि लहरि लोभानु परानी सो प्रभु चिति न आवै ॥
मन में आकर्षक पदार्थों के लोभ की लहरें विद्यमान हैं। यह ईश्वर की ओर चित्त नहीं लगाता और ईश्वर-उपासना नहीं करता।
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਸਿਉ ਸੰਗੁ ਨ ਕੀਆ ਬਹੁ ਜੋਨੀ ਦੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥
साधसंगति सिउ संगु न कीआ बहु जोनी दुखु पावै ॥
वह सत्संग के साथ मेल-मिलाप नहीं करता और विभिन्न योनियों के अन्दर कष्ट सहन करता है।
ਸਿਰਜਨਹਾਰੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਸੁਆਮੀ ਇਕ ਨਿਮਖ ਨ ਲਗੋ ਧਿਆਨੁ ॥
सिरजनहारु विसारिआ सुआमी इक निमख न लगो धिआनु ॥
जगत् के सृजनहार स्वामी को उसने विस्मृत कर दिया है और वह एक क्षण मात्र भी अपनी वृत्ति प्रभु की तरफ नहीं लगाता।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਾਣੀ ਤੀਜੈ ਪਹਰੈ ਬਿਖੁ ਸੰਚੇ ਅੰਧੁ ਅਗਿਆਨੁ ॥੩॥
कहु नानक प्राणी तीजै पहरै बिखु संचे अंधु अगिआनु ॥३॥
हे नानक ! जीवन रूपी रात्रि के तृतीय प्रहर में अज्ञान में अंधा हुआ प्राणी विषय-वासनाओं का विष संचित करता रहता है।॥३॥
ਚਉਥੈ ਪਹਰੈ ਰੈਣਿ ਕੈ ਵਣਜਾਰਿਆ ਮਿਤ੍ਰਾ ਦਿਨੁ ਨੇੜੈ ਆਇਆ ਸੋਇ ॥
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा दिनु नेड़ै आइआ सोइ ॥
हे मेरे वणजारे मित्र ! जीवन रूपी रात्रि के चतुर्थ प्रहर में मृत्यु का दिन निकट आ रहा है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ਤੂੰ ਵਣਜਾਰਿਆ ਮਿਤ੍ਰਾ ਤੇਰਾ ਦਰਗਹ ਬੇਲੀ ਹੋਇ ॥
गुरमुखि नामु समालि तूं वणजारिआ मित्रा तेरा दरगह बेली होइ ॥
हे मेरे वणजारे मित्र ! तू सतिगुरु की शरण लेकर ईश्वर का नाम स्मरण कर, वह परलोक में तेरा एकमात्र सहारा होगा।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ਪਰਾਣੀ ਅੰਤੇ ਹੋਇ ਸਖਾਈ ॥
गुरमुखि नामु समालि पराणी अंते होइ सखाई ॥
हे प्राणी ! गुरु-उपदेशानुसार नाम को स्मरण कर और अंत में यही तेरा सखा होगा।