ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਓ ਮਨਿ ਵੇਖਹੁ ਕੋ ਪਤੀਆਇ ॥
बिनु सतिगुर किनै न पाइओ मनि वेखहु को पतीआइ ॥
मन में भलीभांति मनन करके देख लो, सतगुरु के बिना किसी ने परमात्मा को नहीं पाया।
ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਈਐ ਭੇਟੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
हरि किरपा ते सतिगुरु पाईऐ भेटै सहजि सुभाइ ॥
प्रभु की कृपा से सतगुरु प्राप्त होता है और स्वाभाविक ही उससे भेंट होती है।
ਮਨਮੁਖ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇਆ ਬਿਨੁ ਭਾਗਾ ਹਰਿ ਧਨੁ ਨ ਪਾਇ ॥੫॥
मनमुख भरमि भुलाइआ बिनु भागा हरि धनु न पाइ ॥५॥
स्वेच्छाचारी भ्रम में भूला रहता है और भाग्य के बिना उसे हरिनाम धन प्राप्त नहीं होता॥५॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਸਭਾ ਧਾਤੁ ਹੈ ਪੜਿ ਪੜਿ ਕਰਹਿ ਵੀਚਾਰੁ ॥
त्रै गुण सभा धातु है पड़ि पड़ि करहि वीचारु ॥
तीन गुण केवल माया ही है और पण्डित पढ़-पढ़कर चिंतन करते हैं।
ਮੁਕਤਿ ਕਦੇ ਨ ਹੋਵਈ ਨਹੁ ਪਾਇਨੑਿ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
मुकति कदे न होवई नहु पाइन्हि मोख दुआरु ॥
उससे कभी मुक्ति प्राप्त नहीं होती और न ही मोक्ष का द्वार मिलता है।
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਬੰਧਨ ਨ ਤੁਟਹੀ ਨਾਮਿ ਨ ਲਗੈ ਪਿਆਰੁ ॥੬॥
बिनु सतिगुर बंधन न तुटही नामि न लगै पिआरु ॥६॥
सतगुरु के बिना संसार के बन्धन नहीं टूटते और न ही हरिनाम से प्रेम लगता है॥६॥
ਪੜਿ ਪੜਿ ਪੰਡਿਤ ਮੋਨੀ ਥਕੇ ਬੇਦਾਂ ਕਾ ਅਭਿਆਸੁ ॥
पड़ि पड़ि पंडित मोनी थके बेदां का अभिआसु ॥
वेदों के पाठ-पठन का अभ्यास करके पण्डित एवं मौनी भी थक गए हैं।
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਚਿਤਿ ਨ ਆਵਈ ਨਹ ਨਿਜ ਘਰਿ ਹੋਵੈ ਵਾਸੁ ॥
हरि नामु चिति न आवई नह निज घरि होवै वासु ॥
इससे परमात्मा के नाम का स्मरण नहीं होता और न ही सच्चे घर में निवास प्राप्त होता है।
ਜਮਕਾਲੁ ਸਿਰਹੁ ਨ ਉਤਰੈ ਅੰਤਰਿ ਕਪਟ ਵਿਣਾਸੁ ॥੭॥
जमकालु सिरहु न उतरै अंतरि कपट विणासु ॥७॥
मृत्यु का भय सिर से दूर नहीं होता और अन्तर्मन का कपट नष्ट कर देता है॥७॥
ਹਰਿ ਨਾਵੈ ਨੋ ਸਭੁ ਕੋ ਪਰਤਾਪਦਾ ਵਿਣੁ ਭਾਗਾਂ ਪਾਇਆ ਨ ਜਾਇ ॥
हरि नावै नो सभु को परतापदा विणु भागां पाइआ न जाइ ॥
नि:संकोच सब लोग हरिनाम के आकांक्षी हैं, पर यह भाग्य के बिना प्राप्त नहीं होता।
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਗੁਰੁ ਭੇਟੀਐ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
नदरि करे गुरु भेटीऐ हरि नामु वसै मनि आइ ॥
ईश्वर की कृपा से जब गुरु से भेंट होती है तो मन में हरिनाम अवस्थित हो जाता है।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੇ ਹੀ ਪਤਿ ਊਪਜੈ ਹਰਿ ਸਿਉ ਰਹਾਂ ਸਮਾਇ ॥੮॥੨॥
नानक नामे ही पति ऊपजै हरि सिउ रहां समाइ ॥८॥२॥
हे नानक ! हरिनाम से ही संसार में यश मिलता है और जीव हरि में ही लीन रहता है॥८॥२॥
ਮਲਾਰ ਮਹਲਾ ੩ ਅਸਟਪਦੀ ਘਰੁ ੨ ॥
मलार महला ३ असटपदी घरु २ ॥
मलार महला ३ असटपदी घरु २ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਕਾਰੈ ਲਾਏ ॥
हरि हरि क्रिपा करे गुर की कारै लाए ॥
जिस पर ईश्वर कृपा करता है, उसे गुरु की सेवा में लगा देता है।
ਦੁਖੁ ਪਲ੍ਹ੍ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਵਸਾਏ ॥
दुखु पल्हरि हरि नामु वसाए ॥
वह उसके दुखों को दूर करके ईश्वर के नाम-स्मरण में तल्लीन करता है।
ਸਾਚੀ ਗਤਿ ਸਾਚੈ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥
साची गति साचै चितु लाए ॥
यदि सच्चे परमेश्वर में ध्यान लगाएं तो सच्ची गति होती है,
ਗੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ਸਬਦਿ ਸੁਣਾਏ ॥੧॥
गुर की बाणी सबदि सुणाए ॥१॥
गुरु की वाणी शब्द सुनाती है॥१॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਸੇਵਿ ਨਿਧਾਨੁ ॥
मन मेरे हरि हरि सेवि निधानु ॥
हे मेरे मन ! ईश्वर की उपासना सर्व सुखों का भण्डार है और
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਹਰਿ ਧਨੁ ਪਾਈਐ ਅਨਦਿਨੁ ਲਾਗੈ ਸਹਜਿ ਧਿਆਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुर किरपा ते हरि धनु पाईऐ अनदिनु लागै सहजि धिआनु ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु की कृपा से ही हरिनाम धन प्राप्त होता है, तदन्तर सहज स्वाभाविक परमात्मा में ध्यान लगा रहता है॥१॥रहाउ॥
ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਕਾਮਣਿ ਕਰੇ ਸੀਂਗਾਰੁ ॥
बिनु पिर कामणि करे सींगारु ॥
जो स्त्री अपने पति के बिना श्रृंगार करती है,
ਦੁਹਚਾਰਣੀ ਕਹੀਐ ਨਿਤ ਹੋਇ ਖੁਆਰੁ ॥
दुहचारणी कहीऐ नित होइ खुआरु ॥
वह कुलच्छनी कहलाती है और हर रोज़ दुखी होती है।
ਮਨਮੁਖ ਕਾ ਇਹੁ ਬਾਦਿ ਆਚਾਰੁ ॥
मनमुख का इहु बादि आचारु ॥
स्वेच्छाचारी पुरुष का भी ऐसा ही बुरा आचरण होता है,
ਬਹੁ ਕਰਮ ਦ੍ਰਿੜਾਵਹਿ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ॥੨॥
बहु करम द्रिड़ावहि नामु विसारि ॥२॥
वह परमात्मा के नाम को भूलकर अनेक कर्मकाण्ड करता है॥२॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਾਮਣਿ ਬਣਿਆ ਸੀਗਾਰੁ ॥
गुरमुखि कामणि बणिआ सीगारु ॥
गुरमुख जीव-स्त्री ही भला श्रृंगार करती है।
ਸਬਦੇ ਪਿਰੁ ਰਾਖਿਆ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
सबदे पिरु राखिआ उर धारि ॥
वह गुरु के उपदेश द्वारा प्रियतम प्रभु को अपने हृदय में बसाकर रखती है।
ਏਕੁ ਪਛਾਣੈ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ॥
एकु पछाणै हउमै मारि ॥
वह अहंकार को समाप्त कर एक प्रभु को पहचानती है,
ਸੋਭਾਵੰਤੀ ਕਹੀਐ ਨਾਰਿ ॥੩॥
सोभावंती कहीऐ नारि ॥३॥
इस प्रकार ऐसी स्त्री ही शोभावान कही जाती है॥३॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਦਾਤੇ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਆ ॥
बिनु गुर दाते किनै न पाइआ ॥
गुरु के बिना कोई भी दाता को नहीं पा सका और
ਮਨਮੁਖ ਲੋਭਿ ਦੂਜੈ ਲੋਭਾਇਆ ॥
मनमुख लोभि दूजै लोभाइआ ॥
स्वेच्छाचारी लालच एवं द्वैतभाव में ही लिप्त रहता है।
ਐਸੇ ਗਿਆਨੀ ਬੂਝਹੁ ਕੋਇ ॥
ऐसे गिआनी बूझहु कोइ ॥
कोई ज्ञानी ही इस तथ्य को बूझता है कि
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭੇਟੇ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਇ ॥੪॥
बिनु गुर भेटे मुकति न होइ ॥४॥
गुरु से भेंट के बिना मुक्ति नहीं होती॥४॥
ਕਹਿ ਕਹਿ ਕਹਣੁ ਕਹੈ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
कहि कहि कहणु कहै सभु कोइ ॥
बातें कर-करके हर कोई भक्ति की बात करता है
ਬਿਨੁ ਮਨ ਮੂਏ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਇ ॥
बिनु मन मूए भगति न होइ ॥
परन्तु मन को मारे बिना भक्ति नहीं होती।
ਗਿਆਨ ਮਤੀ ਕਮਲ ਪਰਗਾਸੁ ॥
गिआन मती कमल परगासु ॥
ज्ञान बुद्धि से ही हृदय कमल खिलता है।
ਤਿਤੁ ਘਟਿ ਨਾਮੈ ਨਾਮਿ ਨਿਵਾਸੁ ॥੫॥
तितु घटि नामै नामि निवासु ॥५॥
जिस दिल में नाम होता है, वह प्रभु नाम में ही लीन रहता है॥५॥
ਹਉਮੈ ਭਗਤਿ ਕਰੇ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
हउमै भगति करे सभु कोइ ॥
लोग अहम्-भाव में भक्ति करते हैं,
ਨਾ ਮਨੁ ਭੀਜੈ ਨਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ना मनु भीजै ना सुखु होइ ॥
इससे न मन भोगता है और न ही सुख प्राप्त होता है।
ਕਹਿ ਕਹਿ ਕਹਣੁ ਆਪੁ ਜਾਣਾਏ ॥
कहि कहि कहणु आपु जाणाए ॥
वे बातें करके अपने अहम् को सिद्ध करते हैं।
ਬਿਰਥੀ ਭਗਤਿ ਸਭੁ ਜਨਮੁ ਗਵਾਏ ॥੬॥
बिरथी भगति सभु जनमु गवाए ॥६॥
ऐसी भक्ति व्यर्थ ही जाती है और वे पूरा जीवन खो देते हैं।॥६॥
ਸੇ ਭਗਤ ਸਤਿਗੁਰ ਮਨਿ ਭਾਏ ॥
से भगत सतिगुर मनि भाए ॥
वही भक्त सतगुरु के मन को भाते हैं जो
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮਿ ਰਹੇ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
अनदिनु नामि रहे लिव लाए ॥
रात-दिन नाम-स्मरण में लीन रहते हैं।
ਸਦ ਹੀ ਨਾਮੁ ਵੇਖਹਿ ਹਜੂਰਿ ॥
सद ही नामु वेखहि हजूरि ॥
वै सदैव प्रभु को साक्षात् देखते हैं और