Hindi Page 1026

ਛੋਡਿਹੁ ਨਿੰਦਾ ਤਾਤਿ ਪਰਾਈ ॥
छोडिहु निंदा ताति पराई ॥
पराई-निन्दा और दूसरों से द्वेष करना छोड़ दो,

ਪੜਿ ਪੜਿ ਦਝਹਿ ਸਾਤਿ ਨ ਆਈ ॥
पड़ि पड़ि दझहि साति न आई ॥
जो ग्रंथों का अध्ययन करके भी ईर्षा-अग्नि में जलते रहते हैं, उनके मन को शान्ति नहीं मिलती।

ਮਿਲਿ ਸਤਸੰਗਤਿ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਹੁ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਸਖਾਈ ਹੇ ॥੭॥
मिलि सतसंगति नामु सलाहहु आतम रामु सखाई हे ॥७॥
सत्संगति में मिलकर राम-नाम का स्तुतिगान करो, अंत में वही सहायक होता है॥ ७॥

ਛੋਡਹੁ ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧੁ ਬੁਰਿਆਈ ॥
छोडहु काम क्रोधु बुरिआई ॥
काम, क्रोध एवं बुराई करना छोड़ दो,

ਹਉਮੈ ਧੰਧੁ ਛੋਡਹੁ ਲੰਪਟਾਈ ॥
हउमै धंधु छोडहु ल्मपटाई ॥
अहम् पैदा करने वाला धंधा एवं लम्पटता छोड़ दो ।

ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਣਿ ਪਰਹੁ ਤਾ ਉਬਰਹੁ ਇਉ ਤਰੀਐ ਭਵਜਲੁ ਭਾਈ ਹੇ ॥੮॥
सतिगुर सरणि परहु ता उबरहु इउ तरीऐ भवजलु भाई हे ॥८॥
गुरु की शरण में रहे तो बन्धनों से मुक्त हो जाओगे, इस तरह भवसागर पार किया जा सकता है।८॥

ਆਗੈ ਬਿਮਲ ਨਦੀ ਅਗਨਿ ਬਿਖੁ ਝੇਲਾ ॥
आगै बिमल नदी अगनि बिखु झेला ॥
आगे यमपुरी में विशुद्ध अग्नि से भरी हुई वैतर्णी नामक नदी में से पार होना पड़ता है, जिसमें से विष रूपी लपटें निकलती हैं।

ਤਿਥੈ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ਜੀਉ ਇਕੇਲਾ ॥
तिथै अवरु न कोई जीउ इकेला ॥
वहाँ जीव अकेला ही होता है और उसका कोई साथीं नहीं होता।

ਭੜ ਭੜ ਅਗਨਿ ਸਾਗਰੁ ਦੇ ਲਹਰੀ ਪੜਿ ਦਝਹਿ ਮਨਮੁਖ ਤਾਈ ਹੇ ॥੯॥
भड़ भड़ अगनि सागरु दे लहरी पड़ि दझहि मनमुख ताई हे ॥९॥
उस अग्नि के सागर में भड़कती हुई लहरें उत्पन्न होती हैं, जिन में गिरकर स्वेच्छाचारी जलकर राख हो जाते हैं।॥ ९॥

ਗੁਰ ਪਹਿ ਮੁਕਤਿ ਦਾਨੁ ਦੇ ਭਾਣੈ ॥
गुर पहि मुकति दानु दे भाणै ॥
मुक्ति का भेद गुरु के ही पास है, जो वह स्वेच्छा से ही देता है।

ਜਿਨਿ ਪਾਇਆ ਸੋਈ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ॥
जिनि पाइआ सोई बिधि जाणै ॥
जिन्होंने गुरु से मुक्ति का भेद पाया है, वही इसकी विधि को जानते हैं।

ਜਿਨ ਪਾਇਆ ਤਿਨ ਪੂਛਹੁ ਭਾਈ ਸੁਖੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵ ਕਮਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
जिन पाइआ तिन पूछहु भाई सुखु सतिगुर सेव कमाई हे ॥१०॥
हे भाई ! उनसे जाकर पूछ लो, जिन्होंने इसे पा लिया है। सतिगुरु की सेवा करने से ही सच्चा सुख प्राप्त होता है। १०॥

ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਉਰਝਿ ਮਰਹਿ ਬੇਕਾਰਾ ॥
गुर बिनु उरझि मरहि बेकारा ॥
गुरु के बिना जीव विकारों में उलझकर मर जाते हैं।

ਜਮੁ ਸਿਰਿ ਮਾਰੇ ਕਰੇ ਖੁਆਰਾ ॥
जमु सिरि मारे करे खुआरा ॥
फिर यम उनके सिर पर प्रहार करके बड़ा तंग करता है।

ਬਾਧੇ ਮੁਕਤਿ ਨਾਹੀ ਨਰ ਨਿੰਦਕ ਡੂਬਹਿ ਨਿੰਦ ਪਰਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
बाधे मुकति नाही नर निंदक डूबहि निंद पराई हे ॥११॥
बन्धनों में फेंसे हुए निंदक आदमी की मुक्ति संभव नहीं, वह पराई निन्दा कर-कर के ही डूब जाता है॥ ११॥

ਬੋਲਹੁ ਸਾਚੁ ਪਛਾਣਹੁ ਅੰਦਰਿ ॥
बोलहु साचु पछाणहु अंदरि ॥
सदैव सत्य बोलो और मन में ही पहचान लो,

ਦੂਰਿ ਨਾਹੀ ਦੇਖਹੁ ਕਰਿ ਨੰਦਰਿ ॥
दूरि नाही देखहु करि नंदरि ॥
अपने मन में ही झाँक कर देखो, वह कहीं दूर नहीं है।

ਬਿਘਨੁ ਨਾਹੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਰੁ ਤਾਰੀ ਇਉ ਭਵਜਲੁ ਪਾਰਿ ਲੰਘਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
बिघनु नाही गुरमुखि तरु तारी इउ भवजलु पारि लंघाई हे ॥१२॥
गुरुमुख नाम रूपी नैया में सवार होकर भवसागर में से पार हो जाता है और उसे कोई विघ्न उत्पन्न नहीं होता॥ १२॥

ਦੇਹੀ ਅੰਦਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਵਾਸੀ ॥
देही अंदरि नामु निवासी ॥
शरीर में ही प्रभु-नाम स्थित है,

ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਹੈ ਅਬਿਨਾਸੀ ॥
आपे करता है अबिनासी ॥
वह अविनाशी परमात्मा स्वयं ही रचयिता है।

ਨਾ ਜੀਉ ਮਰੈ ਨ ਮਾਰਿਆ ਜਾਈ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਸਬਦਿ ਰਜਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ना जीउ मरै न मारिआ जाई करि देखै सबदि रजाई हे ॥१३॥
आत्मा न कभी मरता है, न ही इसे मारा जा सकता है, ईश्वर स्वयं ही रचना करके अपनी इच्छानुसार देख-रेख करता है॥ १३॥

ਓਹੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੈ ਨਾਹੀ ਅੰਧਿਆਰਾ ॥
ओहु निरमलु है नाही अंधिआरा ॥
परमात्मा निर्मल है, उसमें अज्ञान रूपी अंधेरा नहीं है।

ਓਹੁ ਆਪੇ ਤਖਤਿ ਬਹੈ ਸਚਿਆਰਾ ॥
ओहु आपे तखति बहै सचिआरा ॥
वह परम-सत्य स्वयं ही अपने सिंहासन पर विराजमान होता है।

ਸਾਕਤ ਕੂੜੇ ਬੰਧਿ ਭਵਾਈਅਹਿ ਮਰਿ ਜਨਮਹਿ ਆਈ ਜਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
साकत कूड़े बंधि भवाईअहि मरि जनमहि आई जाई हे ॥१४॥
प्रभु से टूटे हुए झूठे जीव बन्धनों में फँसकर योनि-चक्र में ही भटकते रहते हैं, इसलिए पुनः पुनः जन्म-मरण में ही पड़े रहते हैं। १४॥

ਗੁਰ ਕੇ ਸੇਵਕ ਸਤਿਗੁਰ ਪਿਆਰੇ ॥
गुर के सेवक सतिगुर पिआरे ॥
गुरु की सेवा में लल्लीन रहने वाले सेवक सतगुरु को बहुत प्रिय हैं।

ਓਇ ਬੈਸਹਿ ਤਖਤਿ ਸੁ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ओइ बैसहि तखति सु सबदु वीचारे ॥
वे सत्य के सिंहासन पर विराजमान होकर ब्रह्म-शब्द का ही चिन्तन करते हैं।

ਤਤੁ ਲਹਹਿ ਅੰਤਰਗਤਿ ਜਾਣਹਿ ਸਤਸੰਗਤਿ ਸਾਚੁ ਵਡਾਈ ਹੇ ॥੧੫॥
ततु लहहि अंतरगति जाणहि सतसंगति साचु वडाई हे ॥१५॥
वे परम तत्व को पाकर अन्तर्गति को जान लेते हैं और सत्संगत में मिलकर सत्य का स्तुतिगान करके बड़ाई प्राप्त करते हैं।॥ १५॥

ਆਪਿ ਤਰੈ ਜਨੁ ਪਿਤਰਾ ਤਾਰੇ ॥
आपि तरै जनु पितरा तारे ॥
ऐसे भक्तजन स्वयं तो पार होते ही हैं, अपने पेितरों का भी उद्धार करने के योगदान देते हैं।

ਸੰਗਤਿ ਮੁਕਤਿ ਸੁ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੇ ॥
संगति मुकति सु पारि उतारे ॥
उनकी संगत में आने वाले भी मुक्ति पा कर उद्धारक बन गए हैं।

ਨਾਨਕੁ ਤਿਸ ਕਾ ਲਾਲਾ ਗੋਲਾ ਜਿਨਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੬॥
नानकु तिस का लाला गोला जिनि गुरमुखि हरि लिव लाई हे ॥१६॥६॥
नानक उसका सेवक एवं गुलाम है, जिस गुरमुख ने परमात्मा में लगन लगाई है॥ १६॥ ६॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
मारू महला १ ॥
मारू महला १॥

ਕੇਤੇ ਜੁਗ ਵਰਤੇ ਗੁਬਾਰੈ ॥
केते जुग वरते गुबारै ॥
प्रलय के घोर अन्धेरे में कितने ही युग बीत गए

ਤਾੜੀ ਲਾਈ ਅਪਰ ਅਪਾਰੈ ॥
ताड़ी लाई अपर अपारै ॥
जब अपरंपार ईश्वर ने समाधि लगाई थी

ਧੁੰਧੂਕਾਰਿ ਨਿਰਾਲਮੁ ਬੈਠਾ ਨਾ ਤਦਿ ਧੰਧੁ ਪਸਾਰਾ ਹੇ ॥੧॥
धुंधूकारि निरालमु बैठा ना तदि धंधु पसारा हे ॥१॥
उस घोर अन्धकार में निर्लिप्त होकर वह अकेला ही बैठा रहा, तब कोई जगत्-प्रसार नहीं था और न ही कोई कामकाज था॥ १॥

ਜੁਗ ਛਤੀਹ ਤਿਨੈ ਵਰਤਾਏ ॥
जुग छतीह तिनै वरताए ॥
उसने छत्तीस युगों का प्रचलन किया,

ਜਿਉ ਤਿਸੁ ਭਾਣਾ ਤਿਵੈ ਚਲਾਏ ॥
जिउ तिसु भाणा तिवै चलाए ॥
जैसे उसे मंजूर है, वैसे चलाता है।

ਤਿਸਹਿ ਸਰੀਕੁ ਨ ਦੀਸੈ ਕੋਈ ਆਪੇ ਅਪਰ ਅਪਾਰਾ ਹੇ ॥੨॥
तिसहि सरीकु न दीसै कोई आपे अपर अपारा हे ॥२॥
उसका शरीक कोई दिखाई नहीं देता, वह स्वयं अपरंपार है॥ २॥

ਗੁਪਤੇ ਬੂਝਹੁ ਜੁਗ ਚਤੁਆਰੇ ॥
गुपते बूझहु जुग चतुआरे ॥
यह बात समझ लो कि वह चारों युगों में गुप्त रूप में क्रियाशील है,

ਘਟਿ ਘਟਿ ਵਰਤੈ ਉਦਰ ਮਝਾਰੇ ॥
घटि घटि वरतै उदर मझारे ॥
प्रत्येक जीव के हृदय एवं उदर में व्याप्त है।

ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਏਕਾ ਏਕੀ ਵਰਤੈ ਕੋਈ ਬੂਝੈ ਗੁਰ ਵੀਚਾਰਾ ਹੇ ॥੩॥
जुगु जुगु एका एकी वरतै कोई बूझै गुर वीचारा हे ॥३॥
सच तो यही है केि युग-युगांतर केवल ईश्वर ही कार्यशील है, लेकिन इस तथ्य को कोई विरला ही गुरु के विचार द्वारा बूझता है॥ ३॥

ਬਿੰਦੁ ਰਕਤੁ ਮਿਲਿ ਪਿੰਡੁ ਸਰੀਆ ॥
बिंदु रकतु मिलि पिंडु सरीआ ॥
जब माँ के रक्त एवं पिता के वीर्य से मिलकर मानव-शरीर का सृजन हुआ तो

ਪਉਣੁ ਪਾਣੀ ਅਗਨੀ ਮਿਲਿ ਜੀਆ ॥
पउणु पाणी अगनी मिलि जीआ ॥
पवन, पानी एवं अग्नि इत्यादि पंच तत्वों ने मिलकर प्राणों का संचार करके बना दिया।

ਆਪੇ ਚੋਜ ਕਰੇ ਰੰਗ ਮਹਲੀ ਹੋਰ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਪਸਾਰਾ ਹੇ ॥੪॥
आपे चोज करे रंग महली होर माइआ मोह पसारा हे ॥४॥
इस शरीर रूपी रंग-महल में ईश्वर स्वयं ही लीला करता है, अन्य मोह-माया का ही प्रसार है॥ ४॥

ਗਰਭ ਕੁੰਡਲ ਮਹਿ ਉਰਧ ਧਿਆਨੀ ॥
गरभ कुंडल महि उरध धिआनी ॥
माँ के गर्भ में उल्टा पड़ा हुआ जीव परमात्मा के ध्यान में लीन था।

ਆਪੇ ਜਾਣੈ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
आपे जाणै अंतरजामी ॥
अन्तर्यामी स्वयं लीला जानता है,

ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲੇ ਅੰਤਰਿ ਉਦਰ ਮਝਾਰਾ ਹੇ ॥੫॥
सासि सासि सचु नामु समाले अंतरि उदर मझारा हे ॥५॥
माँ के उदर में जीव श्वास-श्वास से सत्य-नाम को ही स्मरण कर रहा था ॥५॥

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