ਬਿਖੈ ਬਾਚੁ ਹਰਿ ਰਾਚੁ ਸਮਝੁ ਮਨ ਬਉਰਾ ਰੇ ॥
बिखै बाचु हरि राचु समझु मन बउरा रे ॥
हे मूर्ख मन ! विषय-विकारों से बच, ईश्वर में लीन हो और यह उपदेश धारण कर !
ਨਿਰਭੈ ਹੋਇ ਨ ਹਰਿ ਭਜੇ ਮਨ ਬਉਰਾ ਰੇ ਗਹਿਓ ਨ ਰਾਮ ਜਹਾਜੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
निरभै होइ न हरि भजे मन बउरा रे गहिओ न राम जहाजु ॥१॥ रहाउ ॥
हे मूर्ख मन ! तूने निडर होकर भगवान का भजन नहीं किया और राम नाम रूपी जहाज पर सवार नहीं हुआ ॥ १॥ रहाउ॥
ਮਰਕਟ ਮੁਸਟੀ ਅਨਾਜ ਕੀ ਮਨ ਬਉਰਾ ਰੇ ਲੀਨੀ ਹਾਥੁ ਪਸਾਰਿ ॥
मरकट मुसटी अनाज की मन बउरा रे लीनी हाथु पसारि ॥
हे मेरे मूर्ख मन ! अपना हाथ आगे फैलाकर बन्दर दानों की मुट्ठी भर लेता है।
ਛੂਟਨ ਕੋ ਸਹਸਾ ਪਰਿਆ ਮਨ ਬਉਰਾ ਰੇ ਨਾਚਿਓ ਘਰ ਘਰ ਬਾਰਿ ॥੨॥
छूटन को सहसा परिआ मन बउरा रे नाचिओ घर घर बारि ॥२॥
हे मेरे मूर्ख मन ! मुक्ति पाने की चिन्ता धारण कर, उसे हरेक घर के द्वार पर नाचना पड़ता है॥ २॥
ਜਿਉ ਨਲਨੀ ਸੂਅਟਾ ਗਹਿਓ ਮਨ ਬਉਰਾ ਰੇ ਮਾਯਾ ਇਹੁ ਬਿਉਹਾਰੁ ॥
जिउ नलनी सूअटा गहिओ मन बउरा रे माया इहु बिउहारु ॥
हे मेरे मूर्ख मन ! जैसे तोता नलिनी पर बैठकर फँस जाता है, वैसे ही दुनिया की माया का प्रसार है और मनुष्य इसमें फँस जाता है।
ਜੈਸਾ ਰੰਗੁ ਕਸੁੰਭ ਕਾ ਮਨ ਬਉਰਾ ਰੇ ਤਿਉ ਪਸਰਿਓ ਪਾਸਾਰੁ ॥੩॥
जैसा रंगु कसु्मभ का मन बउरा रे तिउ पसरिओ पासारु ॥३॥
हे मूर्ख मन ! जैसे कसुभे का रंग थोड़े ही दिन का है वैसे ही दुनिया का प्रसार (चार दिन हेतु) बिखरा हुआ है।॥ ३॥
ਨਾਵਨ ਕਉ ਤੀਰਥ ਘਨੇ ਮਨ ਬਉਰਾ ਰੇ ਪੂਜਨ ਕਉ ਬਹੁ ਦੇਵ ॥
नावन कउ तीरथ घने मन बउरा रे पूजन कउ बहु देव ॥
हे मूर्ख मन ! स्नान करने के लिए बहुत सारे धार्मिक तीर्थ हैं और पूजा करने के लिए अनेक देवी-देवता हैं।
ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਛੂਟਨੁ ਨਹੀ ਮਨ ਬਉਰਾ ਰੇ ਛੂਟਨੁ ਹਰਿ ਕੀ ਸੇਵ ॥੪॥੧॥੬॥੫੭॥
कहु कबीर छूटनु नही मन बउरा रे छूटनु हरि की सेव ॥४॥१॥६॥५७॥
कबीर जी कहते हैं कि हे मूर्ख मन ! इस तरह तेरी मुक्ति नहीं होनी। मुक्ति केवल भगवान का सिमरन एवं भक्ति करने से ही मिलेगी ॥ ४॥ १॥ ६॥ ५७ ॥
ਗਉੜੀ ॥
गउड़ी ॥
गउड़ी ॥
ਅਗਨਿ ਨ ਦਹੈ ਪਵਨੁ ਨਹੀ ਮਗਨੈ ਤਸਕਰੁ ਨੇਰਿ ਨ ਆਵੈ ॥
अगनि न दहै पवनु नही मगनै तसकरु नेरि न आवै ॥
इस नाम-धन को न अग्नि जला सकती है, न पवन उड़ाकर ले जा सकती है और इस धन के निकट चोर भी नहीं आता ।
ਰਾਮ ਨਾਮ ਧਨੁ ਕਰਿ ਸੰਚਉਨੀ ਸੋ ਧਨੁ ਕਤ ਹੀ ਨ ਜਾਵੈ ॥੧॥
राम नाम धनु करि संचउनी सो धनु कत ही न जावै ॥१॥
(हे जीव !) राम नाम रूपी धन संचित कर; चूंकि यह धन कहीं नहीं जाता ॥ १॥
ਹਮਰਾ ਧਨੁ ਮਾਧਉ ਗੋਬਿੰਦੁ ਧਰਣੀਧਰੁ ਇਹੈ ਸਾਰ ਧਨੁ ਕਹੀਐ ॥
हमरा धनु माधउ गोबिंदु धरणीधरु इहै सार धनु कहीऐ ॥
हमारा धन तो माधव गोविन्द ही है, जो सारी धरती का सहारा है। इसी धन को सब धनों में सर्वोत्तम कहा जाता है।
ਜੋ ਸੁਖੁ ਪ੍ਰਭ ਗੋਬਿੰਦ ਕੀ ਸੇਵਾ ਸੋ ਸੁਖੁ ਰਾਜਿ ਨ ਲਹੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जो सुखु प्रभ गोबिंद की सेवा सो सुखु राजि न लहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
जो सुख प्रभु गोविन्द के भजन में मिलता है, वह सुख राज्य-शासन में मी नहीं मिलता॥ १॥ रहाउ॥
ਇਸੁ ਧਨ ਕਾਰਣਿ ਸਿਵ ਸਨਕਾਦਿਕ ਖੋਜਤ ਭਏ ਉਦਾਸੀ ॥
इसु धन कारणि सिव सनकादिक खोजत भए उदासी ॥
इस धन के लिए शिवजी एवं (ब्रह्मा के पुत्र) सनकादिक खोज करते-करते संसार से विरक्त हुए।
ਮਨਿ ਮੁਕੰਦੁ ਜਿਹਬਾ ਨਾਰਾਇਨੁ ਪਰੈ ਨ ਜਮ ਕੀ ਫਾਸੀ ॥੨॥
मनि मुकंदु जिहबा नाराइनु परै न जम की फासी ॥२॥
जिस जीव के हृदय में मुक्तिदाता ईश्वर रहता है, जिसकी जिह्म पर नारायण विद्यमान है, उसे यम की फांसी नहीं लग सकती॥ २ ॥
ਨਿਜ ਧਨੁ ਗਿਆਨੁ ਭਗਤਿ ਗੁਰਿ ਦੀਨੀ ਤਾਸੁ ਸੁਮਤਿ ਮਨੁ ਲਾਗਾ ॥
निज धनु गिआनु भगति गुरि दीनी तासु सुमति मनु लागा ॥
भगवान की भक्ति एवं ज्ञान ही (जीव का) यथार्थ धन है। जिस सुमति वाले को गुरु ने यह देन प्रदान की है, उसका मन उस प्रभु में बसता है।
ਜਲਤ ਅੰਭ ਥੰਭਿ ਮਨੁ ਧਾਵਤ ਭਰਮ ਬੰਧਨ ਭਉ ਭਾਗਾ ॥੩॥
जलत अंभ थ्मभि मनु धावत भरम बंधन भउ भागा ॥३॥
प्रभु का नाम (तृष्णा में) जलती हुई आत्मा हेतु जल है और भागते-दौड़ते मन हेतु स्तम्म है। उससे दुविधा के बन्धनों का भय दूर हो जाता है॥ ३॥
ਕਹੈ ਕਬੀਰੁ ਮਦਨ ਕੇ ਮਾਤੇ ਹਿਰਦੈ ਦੇਖੁ ਬੀਚਾਰੀ ॥
कहै कबीरु मदन के माते हिरदै देखु बीचारी ॥
कबीर जी कहते हैं-हे कामवासना में लिप्त मानव ! अपने हृदय में सोच-विचार कर देख,
ਤੁਮ ਘਰਿ ਲਾਖ ਕੋਟਿ ਅਸ੍ਵ ਹਸਤੀ ਹਮ ਘਰਿ ਏਕੁ ਮੁਰਾਰੀ ॥੪॥੧॥੭॥੫੮॥
तुम घरि लाख कोटि अस्व हसती हम घरि एकु मुरारी ॥४॥१॥७॥५८॥
यदि तेरे घर में लाखों-करोड़ों हाथी तथा घोड़े हैं तो मेरे हृदय-घर में एक मुरारी ही है॥ ४॥ १॥ ७॥ ५८ ॥
ਗਉੜੀ ॥
गउड़ी ॥
गउड़ी ॥
ਜਿਉ ਕਪਿ ਕੇ ਕਰ ਮੁਸਟਿ ਚਨਨ ਕੀ ਲੁਬਧਿ ਨ ਤਿਆਗੁ ਦਇਓ ॥
जिउ कपि के कर मुसटि चनन की लुबधि न तिआगु दइओ ॥
जैसे लालच कारण बन्दर अपने हाथ में (भुने हुए) चनों की मुट्टी को नहीं छोड़ता और इस कारण वह फंस जाता है,
ਜੋ ਜੋ ਕਰਮ ਕੀਏ ਲਾਲਚ ਸਿਉ ਤੇ ਫਿਰਿ ਗਰਹਿ ਪਰਿਓ ॥੧॥
जो जो करम कीए लालच सिउ ते फिरि गरहि परिओ ॥१॥
वैसे ही जीव लालच के वशीभूत होकर जो-जो कर्म करता है, वे सभी दोबारा उसके गले में ही पड़ते हैं।॥ १॥
ਭਗਤਿ ਬਿਨੁ ਬਿਰਥੇ ਜਨਮੁ ਗਇਓ ॥
भगति बिनु बिरथे जनमु गइओ ॥
भगवान की भक्ति के बिना मनुष्य-जन्म व्यर्थ ही जाता है।
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਭਗਵਾਨ ਭਜਨ ਬਿਨੁ ਕਹੀ ਨ ਸਚੁ ਰਹਿਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
साधसंगति भगवान भजन बिनु कही न सचु रहिओ ॥१॥ रहाउ ॥
साधसंगत में भगवान का भजन किए बिना सत्य कहीं भी निवास नहीं करता ॥ १॥ रहाउ ॥
ਜਿਉ ਉਦਿਆਨ ਕੁਸਮ ਪਰਫੁਲਿਤ ਕਿਨਹਿ ਨ ਘ੍ਰਾਉ ਲਇਓ ॥
जिउ उदिआन कुसम परफुलित किनहि न घ्राउ लइओ ॥
जैसे भयानक वन में खिले हुए फूलों की सुगन्धि कोई नहीं ले सकता,
ਤੈਸੇ ਭ੍ਰਮਤ ਅਨੇਕ ਜੋਨਿ ਮਹਿ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਕਾਲ ਹਇਓ ॥੨॥
तैसे भ्रमत अनेक जोनि महि फिरि फिरि काल हइओ ॥२॥
वैसे ही प्रभु-वन्दना एवं भक्ति के बिना मनुष्य कई योनियों में भटकता है और मृत्यु उसे बार-बार नष्ट करती है॥ २॥
ਇਆ ਧਨ ਜੋਬਨ ਅਰੁ ਸੁਤ ਦਾਰਾ ਪੇਖਨ ਕਉ ਜੁ ਦਇਓ ॥
इआ धन जोबन अरु सुत दारा पेखन कउ जु दइओ ॥
यह धन, यौवन, पुत्र एवं पत्नी- जो प्रभु के दिए हुए हैं, केवल एक बीत जाने वाला दृश्य है।
ਤਿਨ ਹੀ ਮਾਹਿ ਅਟਕਿ ਜੋ ਉਰਝੇ ਇੰਦ੍ਰੀ ਪ੍ਰੇਰਿ ਲਇਓ ॥੩॥
तिन ही माहि अटकि जो उरझे इंद्री प्रेरि लइओ ॥३॥
जो इनमें फँस और उलझ जाते हैं, उनको इन्द्रियाँ आकर्षित करके कुमार्गगामी कर देती हैं।॥ ३॥
ਅਉਧ ਅਨਲ ਤਨੁ ਤਿਨ ਕੋ ਮੰਦਰੁ ਚਹੁ ਦਿਸ ਠਾਟੁ ਠਇਓ ॥
अउध अनल तनु तिन को मंदरु चहु दिस ठाटु ठइओ ॥
आयु अग्नि है और शरीर तिनकों का घर है। चारों तरफ सर्वत्र यहीं बनावट बनी हुई है।
ਕਹਿ ਕਬੀਰ ਭੈ ਸਾਗਰ ਤਰਨ ਕਉ ਮੈ ਸਤਿਗੁਰ ਓਟ ਲਇਓ ॥੪॥੧॥੮॥੫੯॥
कहि कबीर भै सागर तरन कउ मै सतिगुर ओट लइओ ॥४॥१॥८॥५९॥
हे कबीर ! इस भयानक संसार-सागर से पार होने के लिए मैंने सतिगुरु की शरण ली है॥ ४॥ १॥ ८ ॥ ५९॥
ਗਉੜੀ ॥
गउड़ी ॥
गउड़ी ॥
ਪਾਨੀ ਮੈਲਾ ਮਾਟੀ ਗੋਰੀ ॥ ਇਸ ਮਾਟੀ ਕੀ ਪੁਤਰੀ ਜੋਰੀ ॥੧॥
पानी मैला माटी गोरी ॥ इस माटी की पुतरी जोरी ॥१॥
पिता के वीर्य की मलिन बूंद एवं माँ के रक्त से भगवान ने जीव का यह मिट्टी का शरीर बनाया है॥ १॥
ਮੈ ਨਾਹੀ ਕਛੁ ਆਹਿ ਨ ਮੋਰਾ ॥
मै नाही कछु आहि न मोरा ॥
हे मेरे गोविन्द ! मेरा कोई वजूद नहीं है और मेरे पास कुछ भी नहीं है।
ਤਨੁ ਧਨੁ ਸਭੁ ਰਸੁ ਗੋਬਿੰਦ ਤੋਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तनु धनु सभु रसु गोबिंद तोरा ॥१॥ रहाउ ॥
यह शरीर, धन एवं यह आत्मा सब तेरे दिए हुए हैं।॥ १॥ रहाउ॥
ਇਸ ਮਾਟੀ ਮਹਿ ਪਵਨੁ ਸਮਾਇਆ ॥
इस माटी महि पवनु समाइआ ॥
इस मिट्टी के शरीर में प्राण डाल दिए गए हैं,