ਨਾਮੁ ਸੁਨਤ ਜਨੁ ਬਿਛੂਅ ਡਸਾਨਾ ॥੨॥
नामु सुनत जनु बिछूअ डसाना ॥२॥
परमात्मा का नाम सुनकर ऐसे हो जाता है, जैसे बिच्छु ने डंक मार दिया है॥ २॥
ਮਾਇਆ ਕਾਰਣਿ ਸਦ ਹੀ ਝੂਰੈ ॥
माइआ कारणि सद ही झूरै ॥
वह माया के कारण सदा ही चिंतित रहता है किन्तु
ਮਨਿ ਮੁਖਿ ਕਬਹਿ ਨ ਉਸਤਤਿ ਕਰੈ ॥
मनि मुखि कबहि न उसतति करै ॥
अपने मन एवं मुँह से कभी भगवान की स्तुति नहीं करता।
ਨਿਰਭਉ ਨਿਰੰਕਾਰ ਦਾਤਾਰੁ ॥
निरभउ निरंकार दातारु ॥
जो निर्भय, निरंकार एवं सबका दाता है,
ਤਿਸੁ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਕਰੈ ਗਵਾਰੁ ॥੩॥
तिसु सिउ प्रीति न करै गवारु ॥३॥
वह गंवार उससे कभी प्रेम नहीं करता ॥ ३ ॥
ਸਭ ਸਾਹਾ ਸਿਰਿ ਸਾਚਾ ਸਾਹੁ ॥
सभ साहा सिरि साचा साहु ॥
परमात्मा सब राजाओं में सच्चा राजा है और
ਵੇਮੁਹਤਾਜੁ ਪੂਰਾ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ॥
वेमुहताजु पूरा पातिसाहु ॥
वह पूर्ण बादशाह एवं बेपरवाह है।
ਮੋਹ ਮਗਨ ਲਪਟਿਓ ਭ੍ਰਮ ਗਿਰਹ ॥
मोह मगन लपटिओ भ्रम गिरह ॥
जीव माया के मोह में लिपटा रहता है और सूर्य के इर्द-गिर्द घूमने वाले ग्रहों की तरह भटकता रहता है।
ਨਾਨਕ ਤਰੀਐ ਤੇਰੀ ਮਿਹਰ ॥੪॥੨੧॥੩੨॥
नानक तरीऐ तेरी मिहर ॥४॥२१॥३२॥
नानक कहते हैं कि हे ईश्वर ! तेरी मेहर से ही भवसागर से पार हुआ जा सकता है॥ ४॥ २१॥ ३२॥
ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
रामकली महला ५ ॥
रामकली महला ५ ॥
ਰੈਣਿ ਦਿਨਸੁ ਜਪਉ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
रैणि दिनसु जपउ हरि नाउ ॥
रात-दिन हरि-नाम का जाप करो,
ਆਗੈ ਦਰਗਹ ਪਾਵਉ ਥਾਉ ॥
आगै दरगह पावउ थाउ ॥
इस तरह आगे प्रभु-दरबार में स्थान प्राप्त हो जाएगा।
ਸਦਾ ਅਨੰਦੁ ਨ ਹੋਵੀ ਸੋਗੁ ॥
सदा अनंदु न होवी सोगु ॥
फिर सदैव आनंद बना रहेगा और कभी कोई शोक-चिंता नहीं लगेगी।
ਕਬਹੂ ਨ ਬਿਆਪੈ ਹਉਮੈ ਰੋਗੁ ॥੧॥
कबहू न बिआपै हउमै रोगु ॥१॥
अहंकार का रोग भी कभी प्रभावित नहीं करेगा ॥ १॥
ਖੋਜਹੁ ਸੰਤਹੁ ਹਰਿ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ॥
खोजहु संतहु हरि ब्रहम गिआनी ॥
हे भक्तजनों, किसी ब्रह्मज्ञानी की खोज करो।
ਬਿਸਮਨ ਬਿਸਮ ਭਏ ਬਿਸਮਾਦਾ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵਹਿ ਹਰਿ ਸਿਮਰਿ ਪਰਾਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
बिसमन बिसम भए बिसमादा परम गति पावहि हरि सिमरि परानी ॥१॥ रहाउ ॥
हरि की महिमा को देखकर बड़ी हैरानी होती है। हे प्राणी ! हरि का स्मरण करने से परमगति प्राप्त हो जाती है॥ १॥ रहाउ ॥
ਗਨਿ ਮਿਨਿ ਦੇਖਹੁ ਸਗਲ ਬੀਚਾਰਿ ॥
गनि मिनि देखहु सगल बीचारि ॥
चाहे इस संदर्भ में सोच-समझ कर विचार करके देख लो,
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਕੋ ਸਕੈ ਨ ਤਾਰਿ ॥
नाम बिना को सकै न तारि ॥
नाम के बिना कोई भी संसार-सागर से पार नहीं हो सकता ।
ਸਗਲ ਉਪਾਵ ਨ ਚਾਲਹਿ ਸੰਗਿ ॥
सगल उपाव न चालहि संगि ॥
अनेक प्रकार के सब उपाय भी साथ नहीं देने वाले,
ਭਵਜਲੁ ਤਰੀਐ ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਰੰਗਿ ॥੨॥
भवजलु तरीऐ प्रभ कै रंगि ॥२॥
अपितु प्रभु के रंग में लीन होने से ही भवसागर से पार हुआ जा सकता है॥ २॥
ਦੇਹੀ ਧੋਇ ਨ ਉਤਰੈ ਮੈਲੁ ॥
देही धोइ न उतरै मैलु ॥
शरीर को धोने से मन की मैल साफ नहीं होती,
ਹਉਮੈ ਬਿਆਪੈ ਦੁਬਿਧਾ ਫੈਲੁ ॥
हउमै बिआपै दुबिधा फैलु ॥
अपितु अहंकार में और वृद्धि हो जाती है और दुविधा भी फैल जाती है।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਅਉਖਧੁ ਜੋ ਜਨੁ ਖਾਇ ॥
हरि हरि अउखधु जो जनु खाइ ॥
जो व्यक्ति हरि-नाम रूपी औषधि को सेवन करता है,
ਤਾ ਕਾ ਰੋਗੁ ਸਗਲ ਮਿਟਿ ਜਾਇ ॥੩॥
ता का रोगु सगल मिटि जाइ ॥३॥
उसका सब प्रकार का रोग मिट जाता है॥ ३॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਦਇਆਲ ॥
करि किरपा पारब्रहम दइआल ॥
हे दयालु परब्रह्म ! ऐसी कृपा करो कि
ਮਨ ਤੇ ਕਬਹੁ ਨ ਬਿਸਰੁ ਗੋੁਪਾਲ ॥
मन ते कबहु न बिसरु गोपाल ॥
मन में कभी भी तुम विस्मृत न हो पाओ।
ਤੇਰੇ ਦਾਸ ਕੀ ਹੋਵਾ ਧੂਰਿ ॥ ਨਾਨਕ ਕੀ ਪ੍ਰਭ ਸਰਧਾ ਪੂਰਿ ॥੪॥੨੨॥੩੩
तेरे दास की होवा धूरि ॥ नानक की प्रभ सरधा पूरि ॥४॥२२॥३३॥
हे प्रभु ! तेरे दास की चरण-धूलि बन जाऊँ, नानक की यह श्रद्धा पूरी करो ॥ ४॥ २२ ॥ ३३ ॥
ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
रामकली महला ५ ॥
रामकली महला ५ ॥
ਤੇਰੀ ਸਰਣਿ ਪੂਰੇ ਗੁਰਦੇਵ ॥
तेरी सरणि पूरे गुरदेव ॥
हे पूर्ण गुरुदेव ! मैं तेरी शरण में आया हूँ, क्योंकि
ਤੁਧੁ ਬਿਨੁ ਦੂਜਾ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥
तुधु बिनु दूजा नाही कोइ ॥
तेरे बिना मेरा अन्य कोई अवलम्ब नहीं।
ਤੂ ਸਮਰਥੁ ਪੂਰਨ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ॥
तू समरथु पूरन पारब्रहमु ॥
हे पूर्ण परब्रह्म ! तू सर्वकला समर्थ है,
ਸੋ ਧਿਆਏ ਪੂਰਾ ਜਿਸੁ ਕਰਮੁ ॥੧॥
सो धिआए पूरा जिसु करमु ॥१॥
वही तेरा ध्यान-मनन करता है, जिसका पूर्ण भाग्य होता है॥ १ ॥
ਤਰਣ ਤਾਰਣ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੋ ਨਾਉ ॥
तरण तारण प्रभ तेरो नाउ ॥
हे प्रभु ! तेरा नाम संसार के बंधनों से मुक्त करवाने वाला है,
ਏਕਾ ਸਰਣਿ ਗਹੀ ਮਨ ਮੇਰੈ ਤੁਧੁ ਬਿਨੁ ਦੂਜਾ ਨਾਹੀ ਠਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
एका सरणि गही मन मेरै तुधु बिनु दूजा नाही ठाउ ॥१॥ रहाउ ॥
इसलिए मेरे मन ने एक तेरी ही शरण ग्रहण की है और तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ठोर -ठिकाना नहीं ॥ १॥ रहाउ॥
ਜਪਿ ਜਪਿ ਜੀਵਾ ਤੇਰਾ ਨਾਉ ॥
जपि जपि जीवा तेरा नाउ ॥
मैं तेरा नाम जप-जप कर ही जी रहा हूँ, और
ਆਗੈ ਦਰਗਹ ਪਾਵਉ ਠਾਉ ॥
आगै दरगह पावउ ठाउ ॥
आगे तेरे दरबार में स्थान प्राप्त कर लूंगा।
ਦੂਖੁ ਅੰਧੇਰਾ ਮਨ ਤੇ ਜਾਇ ॥ ਦੁਰਮਤਿ ਬਿਨਸੈ ਰਾਚੈ ਹਰਿ ਨਾਇ ॥੨॥
दूखु अंधेरा मन ते जाइ ॥ दुरमति बिनसै राचै हरि नाइ ॥२॥
मन से दुख का अंधेरा दूर हो जाता है और प्रभु का नाम-स्मरण करने से दुर्मति नाश हो जाती है॥ २॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਸਿਉ ਲਾਗੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥
चरन कमल सिउ लागी प्रीति ॥
प्रभु के सुन्दर चरण-कमलों से प्रीति लग गई है।
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਨਿਰਮਲ ਰੀਤਿ ॥
गुर पूरे की निरमल रीति ॥
पूर्ण गुरु की निर्मल मर्यादा है।
ਭਉ ਭਾਗਾ ਨਿਰਭਉ ਮਨਿ ਬਸੈ ॥
भउ भागा निरभउ मनि बसै ॥
निर्भय प्रभु का मन में निवास हो जाने से यम का भय भाग गया है।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਰਸਨਾ ਨਿਤ ਜਪੈ ॥੩॥
अम्रित नामु रसना नित जपै ॥३॥
अब रसना नित्य नामामृत को जपती रहती है॥ ३॥
ਕੋਟਿ ਜਨਮ ਕੇ ਕਾਟੇ ਫਾਹੇ ॥
कोटि जनम के काटे फाहे ॥
मैंने करोड़ों जन्मों के बन्धन काट दिए हैं और
ਪਾਇਆ ਲਾਭੁ ਸਚਾ ਧਨੁ ਲਾਹੇ ॥
पाइआ लाभु सचा धनु लाहे ॥
नाम-धन का सच्चा लाभ प्राप्त कर लिया है।
ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਅਖੁਟ ਭੰਡਾਰ ॥
तोटि न आवै अखुट भंडार ॥
इस अक्षय भण्डार के कारण कोई कमी नहीं आती।
ਨਾਨਕ ਭਗਤ ਸੋਹਹਿ ਹਰਿ ਦੁਆਰ ॥੪॥੨੩॥੩੪॥
नानक भगत सोहहि हरि दुआर ॥४॥२३॥३४॥
हे नानक ! भक्तजन हमेशा भगवान के द्वार में ही शोभा के पात्र बनते हैं ॥४॥२३॥३४॥
ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
रामकली महला ५ ॥
रामकली महला ५ ॥
ਰਤਨ ਜਵੇਹਰ ਨਾਮ ॥
रतन जवेहर नाम ॥
हरि का नाम अमूल्य रत्न एवं जवाहर के समान है।
ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਗਿਆਨ ॥
सतु संतोखु गिआन ॥
यह सत्य, संतोष, ज्ञान,
ਸੂਖ ਸਹਜ ਦਇਆ ਕਾ ਪੋਤਾ ॥
सूख सहज दइआ का पोता ॥
सहज सुख एवं दया का कोष है।
ਹਰਿ ਭਗਤਾ ਹਵਾਲੈ ਹੋਤਾ ॥੧॥
हरि भगता हवालै होता ॥१॥
यह कोष हरि ने अपने भक्तों को ही सौंपा हुआ है॥ १॥
ਮੇਰੇ ਰਾਮ ਕੋ ਭੰਡਾਰੁ ॥
मेरे राम को भंडारु ॥
मेरे राम का भण्डार बेअन्त है,
ਖਾਤ ਖਰਚਿ ਕਛੁ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਅੰਤੁ ਨਹੀ ਹਰਿ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
खात खरचि कछु तोटि न आवै अंतु नही हरि पारावारु ॥१॥ रहाउ ॥
जिसे खाने-खर्च करने से कोई कमी नहीं आती, उसका कोई अंत नहीं और न ही उसका आर-पार पाया जा सकता है॥ १॥ रहाउ ॥
ਕੀਰਤਨੁ ਨਿਰਮੋਲਕ ਹੀਰਾ ॥
कीरतनु निरमोलक हीरा ॥
भगवान का कीर्तन अमूल्य हीरे जैसा है,
ਆਨੰਦ ਗੁਣੀ ਗਹੀਰਾ ॥
आनंद गुणी गहीरा ॥
यह आनंददायक एवं गुणों का गहरा सागर है।
ਅਨਹਦ ਬਾਣੀ ਪੂੰਜੀ ॥
अनहद बाणी पूंजी ॥
अनहद वाणी अमूल्य पूंजी है,
ਸੰਤਨ ਹਥਿ ਰਾਖੀ ਕੂੰਜੀ ॥੨॥
संतन हथि राखी कूंजी ॥२॥
जिसकी कुंजी भगवान् ने संतों के हाथ में रखी हुई है॥ २॥