ਲਿਖਿਆ ਹੋਵੈ ਨਾਨਕਾ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਇ ॥੧॥
लिखिआ होवै नानका करता करे सु होइ ॥१॥
नानक कथन करते हैं कि चाहे भाग्यानुसार होता है, परन्तु जो ईश्वर करता है, वही होता है॥१॥
ਮਃ ੧ ॥
मः १ ॥
महला १॥
ਰੰਨਾ ਹੋਈਆ ਬੋਧੀਆ ਪੁਰਸ ਹੋਏ ਸਈਆਦ ॥
रंना होईआ बोधीआ पुरस होए सईआद ॥
मासूम स्त्रियाँ दुर्बल हो गई हैं और चतुर पुरुष अत्याचारी हो गए हैं (वे पुरुषों के जुल्म एवं वासना को बर्दाश्त कर रही हैं)।
ਸੀਲੁ ਸੰਜਮੁ ਸੁਚ ਭੰਨੀ ਖਾਣਾ ਖਾਜੁ ਅਹਾਜੁ ॥
सीलु संजमु सुच भंनी खाणा खाजु अहाजु ॥
शील, संयम एवं शुद्धता दूर हो गई है और जायज-नाजायज सब खाया जा रहा है।
ਸਰਮੁ ਗਇਆ ਘਰਿ ਆਪਣੈ ਪਤਿ ਉਠਿ ਚਲੀ ਨਾਲਿ ॥
सरमु गइआ घरि आपणै पति उठि चली नालि ॥
(बलात्कार एवं कामवासना के कारण) शर्म तो घर से उठकर ही चली गई है, साथ ही (बहु-बेटियों की) इज्जत भी चली गई है।
ਨਾਨਕ ਸਚਾ ਏਕੁ ਹੈ ਅਉਰੁ ਨ ਸਚਾ ਭਾਲਿ ॥੨॥
नानक सचा एकु है अउरु न सचा भालि ॥२॥
गुरु नानक का कथन है कि केवल ईश्वर ही सच्चा है, किसी अन्य में सच की तलाश मत करो ॥२॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥
ਬਾਹਰਿ ਭਸਮ ਲੇਪਨ ਕਰੇ ਅੰਤਰਿ ਗੁਬਾਰੀ ॥
बाहरि भसम लेपन करे अंतरि गुबारी ॥
मनुष्य बाहर शरीर पर भस्म लगा लेता है, पर अन्तर्मन में अभिमान ही भरा होता है।
ਖਿੰਥਾ ਝੋਲੀ ਬਹੁ ਭੇਖ ਕਰੇ ਦੁਰਮਤਿ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥
खिंथा झोली बहु भेख करे दुरमति अहंकारी ॥
दुर्मति के कारण अहंकारी योगी की तरह गुदड़ी झोली धारण करके आडम्बर करता है।
ਸਾਹਿਬ ਸਬਦੁ ਨ ਊਚਰੈ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਪਸਾਰੀ ॥
साहिब सबदु न ऊचरै माइआ मोह पसारी ॥
मालिक का नामोच्चारण नहीं करता और माया-मोह में लीन रहता है।
ਅੰਤਰਿ ਲਾਲਚੁ ਭਰਮੁ ਹੈ ਭਰਮੈ ਗਾਵਾਰੀ ॥
अंतरि लालचु भरमु है भरमै गावारी ॥
मन में लालच एवं वहम ही रहता है और वह मूर्ख बनकर भटकता है।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਚੇਤਈ ਜੂਐ ਬਾਜੀ ਹਾਰੀ ॥੧੪॥
नानक नामु न चेतई जूऐ बाजी हारी ॥१४॥
हे नानक ! वह ईश्वर का चिंतन नहीं करता और अपनी जीवनबाजी जुए में हार देता है ॥१४॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੧ ॥
सलोक मः १ ॥
श्लोक महला १ ॥
ਲਖ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਹੋਵੈ ਲਖ ਜੀਵਣੁ ਕਿਆ ਖੁਸੀਆ ਕਿਆ ਚਾਉ ॥
लख सिउ प्रीति होवै लख जीवणु किआ खुसीआ किआ चाउ ॥
बेशक लाखों से हमारा प्रेम हो, लाखों वर्ष तक हमारी जिंदगी हो, इन सबके बावजूद ऐसी खुशियों और चाव का क्या फायदा,
ਵਿਛੁੜਿਆ ਵਿਸੁ ਹੋਇ ਵਿਛੋੜਾ ਏਕ ਘੜੀ ਮਹਿ ਜਾਇ ॥
विछुड़िआ विसु होइ विछोड़ा एक घड़ी महि जाइ ॥
क्योंकि एक घड़ी में ही विछोड़ा हो जाता है और इनका वियोग दुखों भरा जहर होता है।
ਜੇ ਸਉ ਵਰ੍ਹਿਆ ਮਿਠਾ ਖਾਜੈ ਭੀ ਫਿਰਿ ਕਉੜਾ ਖਾਇ ॥
जे सउ वर्हिआ मिठा खाजै भी फिरि कउड़ा खाइ ॥
चाहे सौ वर्ष तक सुखों भरा मीठा खाता रहे, फिर भी आखिरकार दुख रूपी कड़वा खाना ही पड़ता है।
ਮਿਠਾ ਖਾਧਾ ਚਿਤਿ ਨ ਆਵੈ ਕਉੜਤਣੁ ਧਾਇ ਜਾਇ ॥
मिठा खाधा चिति न आवै कउड़तणु धाइ जाइ ॥
मीठा खाते याद ही नहीं आता परन्तु कड़वा (दुख) हर वक्त याद आता है।
ਮਿਠਾ ਕਉੜਾ ਦੋਵੈ ਰੋਗ ॥
मिठा कउड़ा दोवै रोग ॥
मीठा (सुख) एवं कड़वा (दुख) दोनों ही रोग हैं।
ਨਾਨਕ ਅੰਤਿ ਵਿਗੁਤੇ ਭੋਗ ॥
नानक अंति विगुते भोग ॥
हे नानक ! मीठा-कड़वा भोगने की वजह से मनुष्य परेशान ही होता है।
ਝਖਿ ਝਖਿ ਝਖਣਾ ਝਗੜਾ ਝਾਖ ॥
झखि झखि झखणा झगड़ा झाख ॥
यह सब अनुपयोगी, फलहीन काम, फिजूल आचरण एवं बेकार का झगड़ा मोलना है।
ਝਖਿ ਝਖਿ ਜਾਹਿ ਝਖਹਿ ਤਿਨੑ ਪਾਸਿ ॥੧॥
झखि झखि जाहि झखहि तिन्ह पासि ॥१॥
फिर भी दुनिया वाले इन विकारों की ओर भागे जाते हैं और इनको जीव पास रखते हैं ॥१॥
ਮਃ ੧ ॥
मः १ ॥
महला १ ॥
ਕਾਪੜੁ ਕਾਠੁ ਰੰਗਾਇਆ ਰਾਂਗਿ ॥
कापड़ु काठु रंगाइआ रांगि ॥
लोग कपड़े एवं लकड़ी की चीजों को भिन्न-भिन्न रंगों में रंगते हैं।
ਘਰ ਗਚ ਕੀਤੇ ਬਾਗੇ ਬਾਗ ॥
घर गच कीते बागे बाग ॥
अपने घर की सफेदी कर सुन्दर बनाते हैं।
ਸਾਦ ਸਹਜ ਕਰਿ ਮਨੁ ਖੇਲਾਇਆ ॥
साद सहज करि मनु खेलाइआ ॥
इन आनंदों एवं सुखों में मन को बहलाते हैं और
ਤੈ ਸਹ ਪਾਸਹੁ ਕਹਣੁ ਕਹਾਇਆ ॥
तै सह पासहु कहणु कहाइआ ॥
मालिक से डॉट-फटकार मिलती है।
ਮਿਠਾ ਕਰਿ ਕੈ ਕਉੜਾ ਖਾਇਆ ॥
मिठा करि कै कउड़ा खाइआ ॥
लोग विकारों की कड़वाहट को मीठा मानकर खाते हैं और
ਤਿਨਿ ਕਉੜੈ ਤਨਿ ਰੋਗੁ ਜਮਾਇਆ ॥
तिनि कउड़ै तनि रोगु जमाइआ ॥
यह कड़वाहट उनके तन में रोग पैदा करती है।
ਜੇ ਫਿਰਿ ਮਿਠਾ ਪੇੜੈ ਪਾਇ ॥
जे फिरि मिठा पेड़ै पाइ ॥
हे माँ! यदि मनुष्य पुनः मीठे (हरि-नाम) में दिलचस्पी ले
ਤਉ ਕਉੜਤਣੁ ਚੂਕਸਿ ਮਾਇ ॥
तउ कउड़तणु चूकसि माइ ॥
तो (माया का) कड़वापन दूर हो जाता है।
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਵੈ ਸੋਇ ॥
नानक गुरमुखि पावै सोइ ॥
गुरु नानक फुरमान करते हैं- गुरु से सत्य को वही पाता है,
ਜਿਸ ਨੋ ਪ੍ਰਾਪਤਿ ਲਿਖਿਆ ਹੋਇ ॥੨॥
जिस नो प्रापति लिखिआ होइ ॥२॥
जिसके भाग्य में प्राप्ति होती है॥२॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਜਿਨ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਮੈਲੁ ਕਪਟੁ ਹੈ ਬਾਹਰੁ ਧੋਵਾਇਆ ॥
जिन कै हिरदै मैलु कपटु है बाहरु धोवाइआ ॥
जिनके हृदय में मैल एवं कपट होता है, वे केवल बाहर से स्वच्छ दिखाई देते हैं।
ਕੂੜੁ ਕਪਟੁ ਕਮਾਵਦੇ ਕੂੜੁ ਪਰਗਟੀ ਆਇਆ ॥
कूड़ु कपटु कमावदे कूड़ु परगटी आइआ ॥
ये झूठ एवं कपट का आचरण अपनाते हैं परन्तु उनका झूठ सामने आ ही जाता है।
ਅੰਦਰਿ ਹੋਇ ਸੁ ਨਿਕਲੈ ਨਹ ਛਪੈ ਛਪਾਇਆ ॥
अंदरि होइ सु निकलै नह छपै छपाइआ ॥
जो मनुष्य के अन्तर्मन में होता है, वह बाहर निकल ही आता है और वह छिपा नहीं रहता।
ਕੂੜੈ ਲਾਲਚਿ ਲਗਿਆ ਫਿਰਿ ਜੂਨੀ ਪਾਇਆ ॥
कूड़ै लालचि लगिआ फिरि जूनी पाइआ ॥
झूठ एवं लालच में लिप्त रहने वाले पुनः योनियों में पड़ते हैं।
ਨਾਨਕ ਜੋ ਬੀਜੈ ਸੋ ਖਾਵਣਾ ਕਰਤੈ ਲਿਖਿ ਪਾਇਆ ॥੧੫॥
नानक जो बीजै सो खावणा करतै लिखि पाइआ ॥१५॥
हे नानक ! विधाता का यही विधान है कि जो जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है॥ १५ ॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੨ ॥
सलोक मः २ ॥
श्लोक महला २ ॥
ਕਥਾ ਕਹਾਣੀ ਬੇਦੀਂ ਆਣੀ ਪਾਪੁ ਪੁੰਨੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥
कथा कहाणी बेदीं आणी पापु पुंनु बीचारु ॥
जो कथा-कहानियाँ वेदों में आई हैं, उस में पाप-पुण्य की बात की गई है।
ਦੇ ਦੇ ਲੈਣਾ ਲੈ ਲੈ ਦੇਣਾ ਨਰਕਿ ਸੁਰਗਿ ਅਵਤਾਰ ॥
दे दे लैणा लै लै देणा नरकि सुरगि अवतार ॥
(वेद कथन करते हैं-) दिया हुआ (सुख अथवा दुख) लेना है और ले-लेकर उसे ही देना है, इस प्रकार (फल रूप में) नरक स्वर्ग में जन्म है।
ਉਤਮ ਮਧਿਮ ਜਾਤੀਂ ਜਿਨਸੀ ਭਰਮਿ ਭਵੈ ਸੰਸਾਰੁ ॥
उतम मधिम जातीं जिनसी भरमि भवै संसारु ॥
वेदों के अनुसार बतलाया गया है कि उच्च अथवा निम्न जाति के लोग भ्रम के कारण संसार में भटकते हैं।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਤਤੁ ਵਖਾਣੀ ਗਿਆਨ ਧਿਆਨ ਵਿਚਿ ਆਈ ॥
अम्रित बाणी ततु वखाणी गिआन धिआन विचि आई ॥
दूसरी तरफ गुरु की अमृतवाणी सार तत्व की चर्चा करती है, दरअसल यह ज्ञान ध्यान की अवस्था में आई है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਖੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤੀ ਸੁਰਤੀਂ ਕਰਮਿ ਧਿਆਈ ॥
गुरमुखि आखी गुरमुखि जाती सुरतीं करमि धिआई ॥
गुरु ने जो वाणी कही है, इसके तथ्य को उसी ने समझा है और ज्ञानवान् ने प्रभु-कृपा से ध्यान किया है।
ਹੁਕਮੁ ਸਾਜਿ ਹੁਕਮੈ ਵਿਚਿ ਰਖੈ ਹੁਕਮੈ ਅੰਦਰਿ ਵੇਖੈ ॥
हुकमु साजि हुकमै विचि रखै हुकमै अंदरि वेखै ॥
ईश्वर का हुक्म सर्वाधिकार सम्पन्न है, वह अपने हुक्म से संसार को बनाता है, हुक्म में ही लोगों को रखता है और हुक्म में ही पालन करता है।
ਨਾਨਕ ਅਗਹੁ ਹਉਮੈ ਤੁਟੈ ਤਾਂ ਕੋ ਲਿਖੀਐ ਲੇਖੈ ॥੧॥
नानक अगहु हउमै तुटै तां को लिखीऐ लेखै ॥१॥
हे नानक ! सर्वप्रथम अगर अहम् का अंत हो जाए तो ही कोई नवीन कर्मा लेख लिखा जाता है॥ १॥
ਮਃ ੧ ॥
मः १ ॥
महला १॥
ਬੇਦੁ ਪੁਕਾਰੇ ਪੁੰਨੁ ਪਾਪੁ ਸੁਰਗ ਨਰਕ ਕਾ ਬੀਉ ॥
बेदु पुकारे पुंनु पापु सुरग नरक का बीउ ॥
वेद हामी भरते हैं कि स्वर्ग नरक का मूल पाप-पुण्य ही हैं।
ਜੋ ਬੀਜੈ ਸੋ ਉਗਵੈ ਖਾਂਦਾ ਜਾਣੈ ਜੀਉ ॥
जो बीजै सो उगवै खांदा जाणै जीउ ॥
जीव जो (शुभाशुभ) बोता है, वही उत्पन्न होता है, उसे वही फल मिलता है।
ਗਿਆਨੁ ਸਲਾਹੇ ਵਡਾ ਕਰਿ ਸਚੋ ਸਚਾ ਨਾਉ ॥
गिआनु सलाहे वडा करि सचो सचा नाउ ॥
गुरु का ज्ञान परमात्मा को बड़ा मानकर सराहना करता है कि वह सत्य एवं शाश्वत रूप है।
ਸਚੁ ਬੀਜੈ ਸਚੁ ਉਗਵੈ ਦਰਗਹ ਪਾਈਐ ਥਾਉ ॥
सचु बीजै सचु उगवै दरगह पाईऐ थाउ ॥
सत्य को बोने से सत्य पैदा होता है और प्रभु-दरबार में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।