ਆਪੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਮਾਏ ॥੪॥੯॥੧੯॥
आपे गुरमुखि दे वडिआई नानक नामि समाए ॥४॥९॥१९॥
नानक का कथन है कि वह गुरमुख को ही बड़ाई प्रदान करता है, इस तरह वह नाम में ही समा जाता है॥४॥ ६॥ १६॥
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੩ ॥
भैरउ महला ३ ॥
भैरउ महला ३॥
ਮੇਰੀ ਪਟੀਆ ਲਿਖਹੁ ਹਰਿ ਗੋਵਿੰਦ ਗੋਪਾਲਾ ॥
मेरी पटीआ लिखहु हरि गोविंद गोपाला ॥
मेरी पट्टी पर हरिनाम लिख दो;
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਫਾਥੇ ਜਮ ਜਾਲਾ ॥
दूजै भाइ फाथे जम जाला ॥
हरि के सिवा किसी दूसरे से लगाव लगाना तो मौत के जाल में फँसने बराबर है।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਕਰੇ ਮੇਰੀ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਾ ॥
सतिगुरु करे मेरी प्रतिपाला ॥
सतगुरु मेरी रक्षा करता है,
ਹਰਿ ਸੁਖਦਾਤਾ ਮੇਰੈ ਨਾਲਾ ॥੧॥
हरि सुखदाता मेरै नाला ॥१॥
वह सुखदाता ईश्वर मेरे साथ ही है॥१॥
ਗੁਰ ਉਪਦੇਸਿ ਪ੍ਰਹਿਲਾਦੁ ਹਰਿ ਉਚਰੈ ॥
गुर उपदेसि प्रहिलादु हरि उचरै ॥
गुरु के उपदेश पर प्रहलाद ने हरिनाम उच्चरित किया और
ਸਾਸਨਾ ਤੇ ਬਾਲਕੁ ਗਮੁ ਨ ਕਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सासना ते बालकु गमु न करै ॥१॥ रहाउ ॥
बालक दण्ड से बिल्कुल नहीं डरता॥१॥ रहाउ॥
ਮਾਤਾ ਉਪਦੇਸੈ ਪ੍ਰਹਿਲਾਦ ਪਿਆਰੇ ॥
माता उपदेसै प्रहिलाद पिआरे ॥
माता ने उपदेश दिया, प्यारे पुत्र प्रहलाद !
ਪੁਤ੍ਰ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਛੋਡਹੁ ਜੀਉ ਲੇਹੁ ਉਬਾਰੇ ॥
पुत्र राम नामु छोडहु जीउ लेहु उबारे ॥
राम नाम का जाप छोड़कर अपने प्राण बचा लो।
ਪ੍ਰਹਿਲਾਦੁ ਕਹੈ ਸੁਨਹੁ ਮੇਰੀ ਮਾਇ ॥
प्रहिलादु कहै सुनहु मेरी माइ ॥
प्रहलाद ने निर्भीक होकर कहा; हे मेरी माता !
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਨ ਛੋਡਾ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ਬੁਝਾਇ ॥੨॥
राम नामु न छोडा गुरि दीआ बुझाइ ॥२॥
गुरु ने मुझे भेद समझा दिया है, अतः मैं राम नाम (का जाप) नहीं छोड़ सकता॥२॥
ਸੰਡਾ ਮਰਕਾ ਸਭਿ ਜਾਇ ਪੁਕਾਰੇ ॥
संडा मरका सभि जाइ पुकारे ॥
प्रहलाद के अध्यापक शण्ड तथा अमरक ने राजा को शिकायत करते हुए आरोप लगाया कि
ਪ੍ਰਹਿਲਾਦੁ ਆਪਿ ਵਿਗੜਿਆ ਸਭਿ ਚਾਟੜੇ ਵਿਗਾੜੇ ॥
प्रहिलादु आपि विगड़िआ सभि चाटड़े विगाड़े ॥
प्रहलाद स्वयं तो बिगड़ा ही है, इसने अन्य सब विद्यार्थी भी बिगाड़ दिए हैं।
ਦੁਸਟ ਸਭਾ ਮਹਿ ਮੰਤ੍ਰੁ ਪਕਾਇਆ ॥
दुसट सभा महि मंत्रु पकाइआ ॥
दुष्ट राजा के दरबार में (प्रहलाद को मारने की) सलाह की गई,
ਪ੍ਰਹਲਾਦ ਕਾ ਰਾਖਾ ਹੋਇ ਰਘੁਰਾਇਆ ॥੩॥
प्रहलाद का राखा होइ रघुराइआ ॥३॥
परन्तु ईश्वर स्वयं प्रहलाद का रखवाला बना॥३॥
ਹਾਥਿ ਖੜਗੁ ਕਰਿ ਧਾਇਆ ਅਤਿ ਅਹੰਕਾਰਿ ॥
हाथि खड़गु करि धाइआ अति अहंकारि ॥
अहंकारी राजा हाथ में तलवार पकड़ (प्रहलाद की ओर) आया और
ਹਰਿ ਤੇਰਾ ਕਹਾ ਤੁਝੁ ਲਏ ਉਬਾਰਿ ॥
हरि तेरा कहा तुझु लए उबारि ॥
क्रोधपूर्ण बोला, “कहाँ है तेरा परमात्मा, जो तुझे बचा लेगा?”
ਖਿਨ ਮਹਿ ਭੈਆਨ ਰੂਪੁ ਨਿਕਸਿਆ ਥੰਮ੍ਹ੍ਹ ਉਪਾੜਿ ॥
खिन महि भैआन रूपु निकसिआ थम्ह उपाड़ि ॥
तब पल में भयानक रूप नृसिंह खम्भा फोड़कर निकल आया और
ਹਰਣਾਖਸੁ ਨਖੀ ਬਿਦਾਰਿਆ ਪ੍ਰਹਲਾਦੁ ਲੀਆ ਉਬਾਰਿ ॥੪॥
हरणाखसु नखी बिदारिआ प्रहलादु लीआ उबारि ॥४॥
दुष्ट हिरण्यकशिपु को नाखुनों से फाड़कर भक्त प्रहलाद को बचा लिया॥४॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੇ ਹਰਿ ਜੀਉ ਕਾਰਜ ਸਵਾਰੇ ॥
संत जना के हरि जीउ कारज सवारे ॥
ईश्वर भक्तजनों के कार्य संवारता है और
ਪ੍ਰਹਲਾਦ ਜਨ ਕੇ ਇਕੀਹ ਕੁਲ ਉਧਾਰੇ ॥
प्रहलाद जन के इकीह कुल उधारे ॥
उसने भक्त प्रहलाद की इक्कीस कुलों का उद्धार किया।
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਹਉਮੈ ਬਿਖੁ ਮਾਰੇ ॥
गुर कै सबदि हउमै बिखु मारे ॥
नानक फुरमाते हैं कि गुरु के उपदेश से अहम् रूपी जहर को समाप्त किया जाए तो
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਸੰਤ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥੫॥੧੦॥੨੦॥
नानक राम नामि संत निसतारे ॥५॥१०॥२०॥
राम नाम से भक्तों की मुक्ति हो जाती है।॥ ५॥ १०॥२०॥
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੩ ॥
भैरउ महला ३ ॥
भैरउ महला ३॥
ਆਪੇ ਦੈਤ ਲਾਇ ਦਿਤੇ ਸੰਤ ਜਨਾ ਕਉ ਆਪੇ ਰਾਖਾ ਸੋਈ ॥
आपे दैत लाइ दिते संत जना कउ आपे राखा सोई ॥
(ईश्वर की यह लीला ही है कि) वह स्वयं ही दैत्यों को भक्तजनों के पीछे लगा देता है और फिर स्वयं ही उनकी रक्षा भी करता है।
ਜੋ ਤੇਰੀ ਸਦਾ ਸਰਣਾਈ ਤਿਨ ਮਨਿ ਦੁਖੁ ਨ ਹੋਈ ॥੧॥
जो तेरी सदा सरणाई तिन मनि दुखु न होई ॥१॥
हे भक्तवत्सल ! जो सदा तेरी शरण में रहता है, उसके मन को कोई दुःख-दर्द प्रभावित नहीं करता॥१॥
ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਭਗਤਾ ਕੀ ਰਖਦਾ ਆਇਆ ॥
जुगि जुगि भगता की रखदा आइआ ॥
युग-युगांतर से परमात्मा अपने भक्तों की रक्षा करता आया है,
ਦੈਤ ਪੁਤ੍ਰੁ ਪ੍ਰਹਲਾਦੁ ਗਾਇਤ੍ਰੀ ਤਰਪਣੁ ਕਿਛੂ ਨ ਜਾਣੈ ਸਬਦੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
दैत पुत्रु प्रहलादु गाइत्री तरपणु किछू न जाणै सबदे मेलि मिलाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
दैत्य पुत्र प्रहलाद गायत्री तर्पण कुछ नहीं जानता था, पर शब्द की स्तुति से ही उसका मिलाप हुआ॥१॥ रहाउ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਭਗਤਿ ਕਰਹਿ ਦਿਨ ਰਾਤੀ ਦੁਬਿਧਾ ਸਬਦੇ ਖੋਈ ॥
अनदिनु भगति करहि दिन राती दुबिधा सबदे खोई ॥
जो रात-दिन भगवान की भक्ति करता है, शब्द द्वारा उसकी दुविधा निवृत्त हो जाती है।
ਸਦਾ ਨਿਰਮਲ ਹੈ ਜੋ ਸਚਿ ਰਾਤੇ ਸਚੁ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਸੋਈ ॥੨॥
सदा निरमल है जो सचि राते सचु वसिआ मनि सोई ॥२॥
जो प्रभु की स्मृति में लीन रहता है, वह सदा निर्मल होता है और उसके मन में सच्चा प्रभु बसा रहता है।॥२॥
ਮੂਰਖ ਦੁਬਿਧਾ ਪੜ੍ਹਹਿ ਮੂਲੁ ਨ ਪਛਾਣਹਿ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ॥
मूरख दुबिधा पड़्हहि मूलु न पछाणहि बिरथा जनमु गवाइआ ॥
मूर्ख व्यक्ति दुविधा में पड़ा रहता है, मूल को नहीं पहचानता, अतः उसका जीवन व्यर्थ ही जाता है।
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਨਿੰਦਾ ਕਰਹਿ ਦੁਸਟੁ ਦੈਤੁ ਚਿੜਾਇਆ ॥੩॥
संत जना की निंदा करहि दुसटु दैतु चिड़ाइआ ॥३॥
भक्तजनों की निंदा करने वालों ने दैत्य हिरण्यकशिपु को प्रहलाद के विरुद्ध उकसाया॥३॥
ਪ੍ਰਹਲਾਦੁ ਦੁਬਿਧਾ ਨ ਪੜੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਛੋਡੈ ਡਰੈ ਨ ਕਿਸੈ ਦਾ ਡਰਾਇਆ ॥
प्रहलादु दुबिधा न पड़ै हरि नामु न छोडै डरै न किसै दा डराइआ ॥
भक्त प्रहलाद दुविधा में न पड़ा, हरिनाम का जाप उसने बिल्कुल नहीं छोड़ा और न ही किसी के डराने पर (मौत से) डरा।
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕਾ ਹਰਿ ਜੀਉ ਰਾਖਾ ਦੈਤੈ ਕਾਲੁ ਨੇੜਾ ਆਇਆ ॥੪॥
संत जना का हरि जीउ राखा दैतै कालु नेड़ा आइआ ॥४॥
श्री हरि अपने भक्तजनों का रखवाला है, तभी दैत्य हिरण्यकशिपु का काल निकट आ गया॥४॥
ਆਪਣੀ ਪੈਜ ਆਪੇ ਰਾਖੈ ਭਗਤਾਂ ਦੇਇ ਵਡਿਆਈ ॥
आपणी पैज आपे राखै भगतां देइ वडिआई ॥
प्रभु अपनी भक्ति की लाज स्वयं रखता है और भक्तों को कीर्ति प्रदान करता है।
ਨਾਨਕ ਹਰਣਾਖਸੁ ਨਖੀ ਬਿਦਾਰਿਆ ਅੰਧੈ ਦਰ ਕੀ ਖਬਰਿ ਨ ਪਾਈ ॥੫॥੧੧॥੨੧॥
नानक हरणाखसु नखी बिदारिआ अंधै दर की खबरि न पाई ॥५॥११॥२१॥
हे नानक ! दुष्ट हिरण्यकशिपु का उसने नाखुनों से चीर कर वध कर दिया, पर अन्धे ने सच्चे द्वार को नहीं जाना॥ ५॥ ११॥२१॥
ਰਾਗੁ ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੪ ਚਉਪਦੇ ਘਰੁ ੧
रागु भैरउ महला ४ चउपदे घरु १
रागु भैरउ महला ४ चउपदे घरु १
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਹਰਿ ਜਨ ਸੰਤ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪਗਿ ਲਾਇਣੁ ॥
हरि जन संत करि किरपा पगि लाइणु ॥
अगर भक्तों व संतजनों की कृपा हो जाए तो वे प्रभु-चरणों में लगा देते हैं।