ਇਹੁ ਮੋਹੁ ਮਾਇਆ ਤੇਰੈ ਸੰਗਿ ਨ ਚਾਲੈ ਝੂਠੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਗਾਈ ॥
इहु मोहु माइआ तेरै संगि न चालै झूठी प्रीति लगाई ॥
जिस मोह-माया के साथ तुमने लगन लगा रखी है, यह मिथ्या है, मृत्यु के समय यह तुम्हारा साथ नहीं देगी।
ਸਗਲੀ ਰੈਣਿ ਗੁਦਰੀ ਅੰਧਿਆਰੀ ਸੇਵਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਚਾਨਣੁ ਹੋਇ ॥
सगली रैणि गुदरी अंधिआरी सेवि सतिगुरु चानणु होइ ॥
तेरी जीवन रूपी समूह रात्रि अज्ञानता के अंधेरे में बीत गई है, अब भी यदि सतिगुरु की शरण लेकर उनकी सेवा करोगे तो तेरे अंतर्मन में ज्ञान का प्रकाश उदय हो जाएगा।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਾਣੀ ਚਉਥੈ ਪਹਰੈ ਦਿਨੁ ਨੇੜੈ ਆਇਆ ਸੋਇ ॥੪॥
कहु नानक प्राणी चउथै पहरै दिनु नेड़ै आइआ सोइ ॥४॥
हे नानक ! जीवन रूपी रात्रि के चतुर्थ प्रहर में मृत्यु-काल निकट आ रहा है॥४॥
ਲਿਖਿਆ ਆਇਆ ਗੋਵਿੰਦ ਕਾ ਵਣਜਾਰਿਆ ਮਿਤ੍ਰਾ ਉਠਿ ਚਲੇ ਕਮਾਣਾ ਸਾਥਿ ॥
लिखिआ आइआ गोविंद का वणजारिआ मित्रा उठि चले कमाणा साथि ॥
हे मेरे वणजारे मित्र !जब भगवान का सन्देश आ जाता है तो प्राणी इस दुनिया को छोड़कर चल देता है। उसके किए कर्म उसके साथ जाते हैं।
ਇਕ ਰਤੀ ਬਿਲਮ ਨ ਦੇਵਨੀ ਵਣਜਾਰਿਆ ਮਿਤ੍ਰਾ ਓਨੀ ਤਕੜੇ ਪਾਏ ਹਾਥ ॥
इक रती बिलम न देवनी वणजारिआ मित्रा ओनी तकड़े पाए हाथ ॥
हे मेरे वणजारे मित्र ! वह एक क्षण की भी देरी नहीं करने देते। यमदूत नश्वर प्राणी को मजबूत हाथों से पकड़कर ले जाते हैं।
ਲਿਖਿਆ ਆਇਆ ਪਕੜਿ ਚਲਾਇਆ ਮਨਮੁਖ ਸਦਾ ਦੁਹੇਲੇ ॥
लिखिआ आइआ पकड़ि चलाइआ मनमुख सदा दुहेले ॥
प्रभु का लिखित आदेश मिलते ही प्राणी को यमदूत संसार से अलग कर देते हैं। ऐसे में मनमुखी प्राणी सदा कष्ट सहन करते हैं।
ਜਿਨੀ ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿਆ ਸੇ ਦਰਗਹ ਸਦਾ ਸੁਹੇਲੇ ॥
जिनी पूरा सतिगुरु सेविआ से दरगह सदा सुहेले ॥
जो प्राणी पूर्ण सतिगुरु की भरपूर सेवा करते हैं, वे परमात्मा के दरबार में सदैव सुखी रहते हैं।
ਕਰਮ ਧਰਤੀ ਸਰੀਰੁ ਜੁਗ ਅੰਤਰਿ ਜੋ ਬੋਵੈ ਸੋ ਖਾਤਿ ॥
करम धरती सरीरु जुग अंतरि जो बोवै सो खाति ॥
इस कलियुग में शरीर धरती रूप है। इस शरीर रूपी धरती में मनुष्य जो कर्म रूपी बीज बोता है, वह उसका वही फल प्राप्त करता है।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਭਗਤ ਸੋਹਹਿ ਦਰਵਾਰੇ ਮਨਮੁਖ ਸਦਾ ਭਵਾਤਿ ॥੫॥੧॥੪॥
कहु नानक भगत सोहहि दरवारे मनमुख सदा भवाति ॥५॥१॥४॥
हे नानक ! भगवान के भक्त उसके दरबार में सुन्दर लगते हैं और मनमुख हमेशा ही जन्म-मरण के चक्र में पड़कर भटकते रहते हैं ॥५॥१॥४॥
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੪ ਘਰੁ ੨ ਛੰਤ
सिरीरागु महला ४ घरु २ छंत
श्रीरागु महला ४ घरु २ छंत
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
ਮੁੰਧ ਇਆਣੀ ਪੇਈਅੜੈ ਕਿਉ ਕਰਿ ਹਰਿ ਦਰਸਨੁ ਪਿਖੈ ॥
मुंध इआणी पेईअड़ै किउ करि हरि दरसनु पिखै ॥
यदि नवयौवन जीव-स्त्री अपने बाबुल (इहलोक) के घर में ज्ञानहीन ही रहे तो वह अपने पति-प्रभु के दर्शन कैसे कर सकती है?
ਹਰਿ ਹਰਿ ਅਪਨੀ ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਹੁਰੜੈ ਕੰਮ ਸਿਖੈ ॥
हरि हरि अपनी किरपा करे गुरमुखि साहुरड़ै कम सिखै ॥
जब भगवान अपनी कृपा करता है तो वह गुरु के माध्यम से ससुराल (परलोक) के कार्य सीख लेती है।
ਸਾਹੁਰੜੈ ਕੰਮ ਸਿਖੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਸਦਾ ਧਿਆਏ ॥
साहुरड़ै कम सिखै गुरमुखि हरि हरि सदा धिआए ॥
गुरमुख पत्नी पिया के घर के कामकाज सीखती है और सदैव ही अपने ईश्वर का चिन्तन करती है।
ਸਹੀਆ ਵਿਚਿ ਫਿਰੈ ਸੁਹੇਲੀ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਬਾਹ ਲੁਡਾਏ ॥
सहीआ विचि फिरै सुहेली हरि दरगह बाह लुडाए ॥
यह अपनी सत्संगी सखियों में रहकर सुखी जीवन व्यतीत करती है और मरणोपरांत वह अपनी बाह घुमाती हुई अर्थात निश्चित होकर हरि के दरबार में जाती है।
ਲੇਖਾ ਧਰਮ ਰਾਇ ਕੀ ਬਾਕੀ ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਕਿਰਖੈ ॥
लेखा धरम राइ की बाकी जपि हरि हरि नामु किरखै ॥
हरि-परमेश्वर के नाम का उच्चारण करने से वह धर्मराज के हिसाब-किताब से बच जाती है।
ਮੁੰਧ ਇਆਣੀ ਪੇਈਅੜੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਦਰਸਨੁ ਦਿਖੈ ॥੧॥
मुंध इआणी पेईअड़ै गुरमुखि हरि दरसनु दिखै ॥१॥
इस तरह अपने पीहर (इहलोक) में ही ज्ञानहीन नवयौवन जीव-स्त्री अपने पति-परमेश्वर के साक्षात् दर्शन कर लेती है॥१॥
ਵੀਆਹੁ ਹੋਆ ਮੇਰੇ ਬਾਬੁਲਾ ਗੁਰਮੁਖੇ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ॥
वीआहु होआ मेरे बाबुला गुरमुखे हरि पाइआ ॥
हे मेरे बाबुल ! अब मेरा विवाह हो गया है, गुरु के उपदेश द्वारा मैंने पति-परमेश्वर को पा लिया है।
ਅਗਿਆਨੁ ਅੰਧੇਰਾ ਕਟਿਆ ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਪ੍ਰਚੰਡੁ ਬਲਾਇਆ ॥
अगिआनु अंधेरा कटिआ गुर गिआनु प्रचंडु बलाइआ ॥
गुरु ने मेरे अन्तर्मन से अज्ञान का अंधेरा दूर कर दिया है। गुरु ने मेरे अन्तर्मन में ज्ञान का प्रचण्ड दीपक प्रज्वलित कर दिया है।
ਬਲਿਆ ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਅੰਧੇਰਾ ਬਿਨਸਿਆ ਹਰਿ ਰਤਨੁ ਪਦਾਰਥੁ ਲਾਧਾ ॥
बलिआ गुर गिआनु अंधेरा बिनसिआ हरि रतनु पदारथु लाधा ॥
गुरु का प्रदान किया हुआ ज्ञान का प्रकाश होने पर अँधेरा नष्ट हो गया है और उस आलोक में हरि के नाम का अमूल्य रत्न-पदार्थ मिल गया है।
ਹਉਮੈ ਰੋਗੁ ਗਇਆ ਦੁਖੁ ਲਾਥਾ ਆਪੁ ਆਪੈ ਗੁਰਮਤਿ ਖਾਧਾ ॥
हउमै रोगु गइआ दुखु लाथा आपु आपै गुरमति खाधा ॥
मेरे अहंकार का रोग दूर हो गया है और मेरा दुख मिट गया है। गुरु के उपदेश अधीन अपने अहंकार को मैंने स्वयं ही निगल लिया है।
ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਵਰੁ ਪਾਇਆ ਅਬਿਨਾਸੀ ਨਾ ਕਦੇ ਮਰੈ ਨ ਜਾਇਆ ॥
अकाल मूरति वरु पाइआ अबिनासी ना कदे मरै न जाइआ ॥
मैंने अकाल मूर्ति को अपना पति वरण कर लिया है। वह अनश्वर है और इसलिए वह जन्म और मरण से सदा ऊपर है।
ਵੀਆਹੁ ਹੋਆ ਮੇਰੇ ਬਾਬੋਲਾ ਗੁਰਮੁਖੇ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ॥੨॥
वीआहु होआ मेरे बाबोला गुरमुखे हरि पाइआ ॥२॥
हे मेरे बाबुल ! अब मेरा विवाह हो गया है और गुरु के उपदेश अनुसार पति-परमेश्वर हरि को प्राप्त कर लिया है ॥२॥
ਹਰਿ ਸਤਿ ਸਤੇ ਮੇਰੇ ਬਾਬੁਲਾ ਹਰਿ ਜਨ ਮਿਲਿ ਜੰਞ ਸੁਹੰਦੀ ॥
हरि सति सते मेरे बाबुला हरि जन मिलि जंञ सुहंदी ॥
हे मेरे बाबुल ! मेरा हरि-परमेश्वर सत्यस्वरूप है; भगवान के भक्त मिलकर भगवान की बारात में आए हैं। उनके आगमन से बारात बहुत सुन्दर लगती है।
ਪੇਵਕੜੈ ਹਰਿ ਜਪਿ ਸੁਹੇਲੀ ਵਿਚਿ ਸਾਹੁਰੜੈ ਖਰੀ ਸੋਹੰਦੀ ॥
पेवकड़ै हरि जपि सुहेली विचि साहुरड़ै खरी सोहंदी ॥
मैं अपने पीहर (इहलोक) में भगवान का नाम जपकर सुखपूर्वक रहती हूँ। अब मैं अपने ससुराल (परलोक) में शोभा प्राप्त कर रही हूँ।
ਸਾਹੁਰੜੈ ਵਿਚਿ ਖਰੀ ਸੋਹੰਦੀ ਜਿਨਿ ਪੇਵਕੜੈ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿਆ ॥
साहुरड़ै विचि खरी सोहंदी जिनि पेवकड़ै नामु समालिआ ॥
जिन्होंने अपने पीहर (इहलोक) में नाम-सिमरन किया होता है, उनकी ससुराल (परलोक) में बड़ी शोभा होती है।
ਸਭੁ ਸਫਲਿਓ ਜਨਮੁ ਤਿਨਾ ਦਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਿਨਾ ਮਨੁ ਜਿਣਿ ਪਾਸਾ ਢਾਲਿਆ ॥
सभु सफलिओ जनमु तिना दा गुरमुखि जिना मनु जिणि पासा ढालिआ ॥
उनका समूचा जीवन सफल हो जाता है, जिन्होंने गुरु के उपदेशानुसार मन की तृष्णाओं पर विजय प्राप्त की है।
ਹਰਿ ਸੰਤ ਜਨਾ ਮਿਲਿ ਕਾਰਜੁ ਸੋਹਿਆ ਵਰੁ ਪਾਇਆ ਪੁਰਖੁ ਅਨੰਦੀ ॥
हरि संत जना मिलि कारजु सोहिआ वरु पाइआ पुरखु अनंदी ॥
ईश्वर के सन्तजनों से भेंट करके मेरा विवाह कार्य सफल हुआ है और आनन्द के स्वरूप प्रभु को मैंने पति के तौर पर पा लिया है।
ਹਰਿ ਸਤਿ ਸਤਿ ਮੇਰੇ ਬਾਬੋਲਾ ਹਰਿ ਜਨ ਮਿਲਿ ਜੰਞ ਸੋੁਹੰਦੀ ॥੩॥
हरि सति सति मेरे बाबोला हरि जन मिलि जंञ सोहंदी ॥३॥
हे मेरे बाबुल ! भगवान सत्यस्वरूप है। भगवान के भक्तों के आगमन से बारात बहुत सुन्दर लगती है॥३॥