ਗੁਪਤੀ ਬਾਣੀ ਪਰਗਟੁ ਹੋਇ ॥
गुपती बाणी परगटु होइ ॥
हे नानक ! जिसके मन में अनहद शब्द रूपी गुप्त वाणी प्रगट हो जाती हैं,
ਨਾਨਕ ਪਰਖਿ ਲਏ ਸਚੁ ਸੋਇ ॥੫੩॥
नानक परखि लए सचु सोइ ॥५३॥
वह सत्य की पहचान कर लेता है॥ ५३ ॥
ਸਹਜ ਭਾਇ ਮਿਲੀਐ ਸੁਖੁ ਹੋਵੈ ॥
सहज भाइ मिलीऐ सुखु होवै ॥
सहज स्वभाव परमात्मा को मिलने से ही सुख उपलब्ध होता है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਗੈ ਨੀਦ ਨ ਸੋਵੈ ॥
गुरमुखि जागै नीद न सोवै ॥
गुरुमुख सदा ही जागृत रहता है और वह अज्ञान की निद्रा में नहीं सोता।
ਸੁੰਨ ਸਬਦੁ ਅਪਰੰਪਰਿ ਧਾਰੈ ॥
सुंन सबदु अपर्मपरि धारै ॥
अनहद शब्द को अपरंपार प्रभु ही उत्पन्न करता है।
ਕਹਤੇ ਮੁਕਤੁ ਸਬਦਿ ਨਿਸਤਾਰੈ ॥
कहते मुकतु सबदि निसतारै ॥
नाम-सिमरन करने वाले की मुक्ति हो जाती है और शब्द द्वारा अन्यों का भी कल्याण हो जाता है।
ਗੁਰ ਕੀ ਦੀਖਿਆ ਸੇ ਸਚਿ ਰਾਤੇ ॥
गुर की दीखिआ से सचि राते ॥
गुरु से दीक्षा लेने वाला सत्य में ही विलीन रहता है।
ਨਾਨਕ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ਮਿਲਣ ਨਹੀ ਭ੍ਰਾਤੇ ॥੫੪॥
नानक आपु गवाइ मिलण नही भ्राते ॥५४॥
हे नानक ! अहंत्व को दूर करने से ही सत्य से मिलाप होता है किन्तु भ्रम में फँसने से मिलाप नहीं होता ॥ ५४॥
ਕੁਬੁਧਿ ਚਵਾਵੈ ਸੋ ਕਿਤੁ ਠਾਇ ॥
कुबुधि चवावै सो कितु ठाइ ॥
“[सिद्धों ने फिर से प्रश्न किया-} वह कौन-सा ठिकाना है, जहाँ रहकर मनमुख अपनी खोटी बुद्धि को नाश कर देता है?”
ਕਿਉ ਤਤੁ ਨ ਬੂਝੈ ਚੋਟਾ ਖਾਇ ॥
किउ ततु न बूझै चोटा खाइ ॥
वह यम से चोटें खाता रहता है और परमतत्व को क्यों नहीं बूझता ?
ਜਮ ਦਰਿ ਬਾਧੇ ਕੋਇ ਨ ਰਾਖੈ ॥
जम दरि बाधे कोइ न राखै ॥
(गुरु जी उत्तर देते हैं कि) यम के द्वार पर बंधे हुए जीव की कोई भी रक्षा नहीं करता और
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਨਾਹੀ ਪਤਿ ਸਾਖੈ ॥
बिनु सबदै नाही पति साखै ॥
शब्द के बिना कोई भी उसकी इज्जत एवं उस पर भरोसा नहीं करता।
ਕਿਉ ਕਰਿ ਬੂਝੈ ਪਾਵੈ ਪਾਰੁ ॥
किउ करि बूझै पावै पारु ॥
वह सत्य को कैसे पहचान सकता है और कैसे भवसागर से पार हो सकता है।
ਨਾਨਕ ਮਨਮੁਖਿ ਨ ਬੁਝੈ ਗਵਾਰੁ ॥੫੫॥
नानक मनमुखि न बुझै गवारु ॥५५॥
हे नानक ! मूर्ख मनमुख को कभी ज्ञान नहीं होता॥ ५५॥
ਕੁਬੁਧਿ ਮਿਟੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥
कुबुधि मिटै गुर सबदु बीचारि ॥
{गुरु जी उत्तर देते हैं-} गुरु-शब्द का चिंतन करने से खोटी बुद्धि का नाश हो जाता है।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਮੋਖ ਦੁਆਰ ॥
सतिगुरु भेटै मोख दुआर ॥
सतगुरु से साक्षात्कार होने से मोक्ष द्वार मिल जाता है।
ਤਤੁ ਨ ਚੀਨੈ ਮਨਮੁਖੁ ਜਲਿ ਜਾਇ ॥
ततु न चीनै मनमुखु जलि जाइ ॥
मनमुख परमतत्व की पहचान नहीं करता इसलिए जलकर राख हो जाता है।
ਦੁਰਮਤਿ ਵਿਛੁੜਿ ਚੋਟਾ ਖਾਇ ॥
दुरमति विछुड़ि चोटा खाइ ॥
जीव अपनी दुर्मति के कारण सत्य से बिछुड़ कर यम का दुख भोगता रहता है।
ਮਾਨੈ ਹੁਕਮੁ ਸਭੇ ਗੁਣ ਗਿਆਨ ॥
मानै हुकमु सभे गुण गिआन ॥
परमात्मा के हुक्म का पालन करने वाला सभी गुणों एवं ज्ञान को हासिल कर लेता है।
ਨਾਨਕ ਦਰਗਹ ਪਾਵੈ ਮਾਨੁ ॥੫੬॥
नानक दरगह पावै मानु ॥५६॥
हे नानक ! वही मनुष्य दरबार में सम्मान प्राप्त करता है॥ ५६॥
ਸਾਚੁ ਵਖਰੁ ਧਨੁ ਪਲੈ ਹੋਇ ॥
साचु वखरु धनु पलै होइ ॥
जिसके पास सत्य रूपी धन राशि होती है,
ਆਪਿ ਤਰੈ ਤਾਰੇ ਭੀ ਸੋਇ ॥
आपि तरै तारे भी सोइ ॥
वह स्वयं तो भवसागर से पार होता ही है, अपने संगियों का भी उद्धार करवा देता है।
ਸਹਜਿ ਰਤਾ ਬੂਝੈ ਪਤਿ ਹੋਇ ॥
सहजि रता बूझै पति होइ ॥
जो सहज ही सत्य में लीन रहता है, वह सत्य को बूझकर शोभा का पात्र बन जाता है।
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਰੈ ਨ ਕੋਇ ॥
ता की कीमति करै न कोइ ॥
ऐसे व्यक्ति की सही कीमत कोई नहीं कर सकता।
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
जह देखा तह रहिआ समाइ ॥
वह जिधर भी देखता है, उसे भगवान ही दिखाई देता है।
ਨਾਨਕ ਪਾਰਿ ਪਰੈ ਸਚ ਭਾਇ ॥੫੭॥
नानक पारि परै सच भाइ ॥५७॥
हे नानक ! सत्य में श्रद्धा भावना रखने से जीव का कल्याण हो जाता है।॥ ५७ ॥
ਸੁ ਸਬਦ ਕਾ ਕਹਾ ਵਾਸੁ ਕਥੀਅਲੇ ਜਿਤੁ ਤਰੀਐ ਭਵਜਲੁ ਸੰਸਾਰੋ ॥
सु सबद का कहा वासु कथीअले जितु तरीऐ भवजलु संसारो ॥
“(सिद्धों ने पुनः पूछा-) उस शब्द का निवास कहाँ पर है, जिस द्वारा संसार रूपी भवजल से उद्धार होता है?”
ਤ੍ਰੈ ਸਤ ਅੰਗੁਲ ਵਾਈ ਕਹੀਐ ਤਿਸੁ ਕਹੁ ਕਵਨੁ ਅਧਾਰੋ ॥
त्रै सत अंगुल वाई कहीऐ तिसु कहु कवनु अधारो ॥
दस अंगुल बाहर आने वाले प्राण-वायु का वास्तव में क्या आधार है?
ਬੋਲੈ ਖੇਲੈ ਅਸਥਿਰੁ ਹੋਵੈ ਕਿਉ ਕਰਿ ਅਲਖੁ ਲਖਾਏ ॥
बोलै खेलै असथिरु होवै किउ करि अलखु लखाए ॥
जो सत्ता बोलती एवं खेलती रहती है, वह कैसे स्थिर हो सकती है ? और क्योंकर परमात्मा के दर्शन कर सकती है?”
ਸੁਣਿ ਸੁਆਮੀ ਸਚੁ ਨਾਨਕੁ ਪ੍ਰਣਵੈ ਅਪਣੇ ਮਨ ਸਮਝਾਏ ॥
सुणि सुआमी सचु नानकु प्रणवै अपणे मन समझाए ॥
गुरु जी ने उत्तर दिया-हे स्वामी ! जरा ध्यान से सुनो; नानक सच्ची प्रार्थना करता है कि मन को समझाने से ही स्थिर किया जा सकता है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੇ ਸਚਿ ਲਿਵ ਲਾਗੈ ਕਰਿ ਨਦਰੀ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ॥
गुरमुखि सबदे सचि लिव लागै करि नदरी मेलि मिलाए ॥
जब गुरुमुख बनकर शब्द द्वारा सत्य में ध्यान लग जाता है तो ईश्वर अपनी करुणा-दृष्टि से साथ मिला लेता है।
ਆਪੇ ਦਾਨਾ ਆਪੇ ਬੀਨਾ ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਸਮਾਏ ॥੫੮॥
आपे दाना आपे बीना पूरै भागि समाए ॥५८॥
परमात्मा स्वयं ही चतुर एवं सर्वज्ञाता है और पूर्ण भाग्य से ही जीव उसमें विलीन होता है॥ ५८ ॥
ਸੁ ਸਬਦ ਕਉ ਨਿਰੰਤਰਿ ਵਾਸੁ ਅਲਖੰ ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਸੋਈ ॥
सु सबद कउ निरंतरि वासु अलखं जह देखा तह सोई ॥
उस शब्द का निरंतर सब में निवास है, वह अदृष्ट है, फिर भी जिधर भी देखो, वही समाया हुआ है।
ਪਵਨ ਕਾ ਵਾਸਾ ਸੁੰਨ ਨਿਵਾਸਾ ਅਕਲ ਕਲਾ ਧਰ ਸੋਈ ॥
पवन का वासा सुंन निवासा अकल कला धर सोई ॥
जैसे पवन हर जगह फैली हुई है, वैसे ही शब्द का निवास है। वह निर्गुण भी है और सगुण भी है।
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸਬਦੁ ਘਟ ਮਹਿ ਵਸੈ ਵਿਚਹੁ ਭਰਮੁ ਗਵਾਏ ॥
नदरि करे सबदु घट महि वसै विचहु भरमु गवाए ॥
जब परमात्मा अपनी कृपा-दृष्टि करता है तो हृदय में शब्द का निवास हो जाता है और मन का भ्रम दूर हो जाता है।
ਤਨੁ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਨਿਰਮਲ ਬਾਣੀ ਨਾਮੋੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
तनु मनु निरमलु निरमल बाणी नामो मंनि वसाए ॥
जो निर्मल वाणी द्वारा नाम को मन में बसा लेता है, उसका तन-मन निर्मल हो जाता है।
ਸਬਦਿ ਗੁਰੂ ਭਵਸਾਗਰੁ ਤਰੀਐ ਇਤ ਉਤ ਏਕੋ ਜਾਣੈ ॥
सबदि गुरू भवसागरु तरीऐ इत उत एको जाणै ॥
जो व्यक्ति शब्द-गुरु द्वारा संसार-सागर से पार हो जाता है, वह लोक-परलोक में व्यापक ईश्वर को जान लेता है।
ਚਿਹਨੁ ਵਰਨੁ ਨਹੀ ਛਾਇਆ ਮਾਇਆ ਨਾਨਕ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣੈ ॥੫੯॥
चिहनु वरनु नही छाइआ माइआ नानक सबदु पछाणै ॥५९॥
हे नानक ! यह माया जिस परमात्मा की छाया है, उसका कोई चिन्ह एवं वर्ण नहीं। जीव फिर शब्द की पहचान कर लेता है॥ ५६ ॥
ਤ੍ਰੈ ਸਤ ਅੰਗੁਲ ਵਾਈ ਅਉਧੂ ਸੁੰਨ ਸਚੁ ਆਹਾਰੋ ॥
त्रै सत अंगुल वाई अउधू सुंन सचु आहारो ॥
हे अवधूत ! दस अंगुल के प्रमाण वाले प्राणवायु का मुख्याधार परम-सत्य का चिंतन है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੋਲੈ ਤਤੁ ਬਿਰੋਲੈ ਚੀਨੈ ਅਲਖ ਅਪਾਰੋ ॥
गुरमुखि बोलै ततु बिरोलै चीनै अलख अपारो ॥
गुरुमुख नाम जपता एवं परम-तत्व को विलोता रहता है और अलख अपार को पहचान लेता है।
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਮੇਟੈ ਸਬਦੁ ਵਸਾਏ ਤਾ ਮਨਿ ਚੂਕੈ ਅਹੰਕਾਰੋ ॥
त्रै गुण मेटै सबदु वसाए ता मनि चूकै अहंकारो ॥
यह माया के तीनो गुणों को मिटाकर शब्द को बसा लेता है जिससे उसके मन का अहंकार दूर हो जाता है।
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਏਕੋ ਜਾਣੈ ਤਾ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਲਗੈ ਪਿਆਰੋ ॥
अंतरि बाहरि एको जाणै ता हरि नामि लगै पिआरो ॥
यदि वह अन्तर एवं बाहर ईश्वर की सत्ता को समझ ले तो ही उसका हरि-नाम से प्रेम होता है।
ਸੁਖਮਨਾ ਇੜਾ ਪਿੰਗੁਲਾ ਬੂਝੈ ਜਾ ਆਪੇ ਅਲਖੁ ਲਖਾਏ ॥
सुखमना इड़ा पिंगुला बूझै जा आपे अलखु लखाए ॥
जब परमात्मा स्वयं ही दर्शन देता है तो गुरुमुख इड़ा, पिंगला एवं सुषुम्ना नाड़ियों द्वारा हासिल होने वाले ज्ञान को बूझ लेता है।
ਨਾਨਕ ਤਿਹੁ ਤੇ ਊਪਰਿ ਸਾਚਾ ਸਤਿਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸਮਾਏ ॥੬੦॥
नानक तिहु ते ऊपरि साचा सतिगुर सबदि समाए ॥६०॥
हे नानक ! सच्चा परमेश्वर इन तीनों नाड़ियों से सर्वोच्च है और शब्द द्वारा ही उसमें लीन हुआ जा सकता है॥ ६० ॥
ਮਨ ਕਾ ਜੀਉ ਪਵਨੁ ਕਥੀਅਲੇ ਪਵਨੁ ਕਹਾ ਰਸੁ ਖਾਈ ॥
मन का जीउ पवनु कथीअले पवनु कहा रसु खाई ॥
(सिद्धों ने पुनः पूछा-) मन का (जीवन) प्राण वायु कहा जाता है किन्तु यह (प्राण) वायु कहीं से आहार प्राप्त करता है ?
ਗਿਆਨ ਕੀ ਮੁਦ੍ਰਾ ਕਵਨ ਅਉਧੂ ਸਿਧ ਕੀ ਕਵਨ ਕਮਾਈ ॥
गिआन की मुद्रा कवन अउधू सिध की कवन कमाई ॥
ज्ञान प्राप्त करने की मुद्राएँ अर्थात् साधन कौन-से हैं और कौन-सी साधना द्वारा जीव सिद्ध बन जाता है ?