ਗੋਂਡ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गोंड महला ५ ॥
गोंड महला ५ ॥
ਸੰਤਨ ਕੈ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥
संतन कै बलिहारै जाउ ॥
संतों पर बलिहारी जाना चाहिए,
ਸੰਤਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਰਾਮ ਗੁਨ ਗਾਉ ॥
संतन कै संगि राम गुन गाउ ॥
संतों के संग मिलकर राम के गुण गाते रहो।
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਕਿਲਵਿਖ ਸਭਿ ਗਏ ॥
संत प्रसादि किलविख सभि गए ॥
संतों की कृपा से सभी पाप दूर हो जाते हैं और
ਸੰਤ ਸਰਣਿ ਵਡਭਾਗੀ ਪਏ ॥੧॥
संत सरणि वडभागी पए ॥१॥
संतों की शरण कोई भाग्यशाली ही पाता है॥ १॥
ਰਾਮੁ ਜਪਤ ਕਛੁ ਬਿਘਨੁ ਨ ਵਿਆਪੈ ॥
रामु जपत कछु बिघनु न विआपै ॥
राम नाम जपने से कोई विघ्न नहीं आता।
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਅਪੁਨਾ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਪੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुर प्रसादि अपुना प्रभु जापै ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु की कृपा से प्रभु अपना ही प्रतीत होता है॥ १॥ रहाउ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਜਬ ਹੋਇ ਦਇਆਲ ॥
पारब्रहमु जब होइ दइआल ॥
जब परमात्मा दयालु होता है तो
ਸਾਧੂ ਜਨ ਕੀ ਕਰੈ ਰਵਾਲ ॥
साधू जन की करै रवाल ॥
वह जीव को साधुजनों की चरण-धूलि बना देता है।
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਇਸੁ ਤਨ ਤੇ ਜਾਇ ॥
कामु क्रोधु इसु तन ते जाइ ॥
फिर काम एवं क्रोध इस तन से दूर हो जाते हैं और
ਰਾਮ ਰਤਨੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੨॥
राम रतनु वसै मनि आइ ॥२॥
राम नाम रूपी रत्न मन में आ बसता है॥ २॥
ਸਫਲੁ ਜਨਮੁ ਤਾਂ ਕਾ ਪਰਵਾਣੁ ॥
सफलु जनमु तां का परवाणु ॥
जो परमात्मा को अपने निकट समझता है,
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਨਿਕਟਿ ਕਰਿ ਜਾਣੁ ॥
पारब्रहमु निकटि करि जाणु ॥
उसका जन्म सफल एवं परवान हो जाता है।
ਭਾਇ ਭਗਤਿ ਪ੍ਰਭ ਕੀਰਤਨਿ ਲਾਗੈ ॥
भाइ भगति प्रभ कीरतनि लागै ॥
ऐसा जीव श्रद्धा भक्ति से प्रभु का कीर्तन करता रहता है और
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕਾ ਸੋਇਆ ਜਾਗੈ ॥੩॥
जनम जनम का सोइआ जागै ॥३॥
जन्म-जन्मांतर का सोया हुआ उसका मन जाग जाता है ॥३॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਜਨ ਕਾ ਆਧਾਰੁ ॥
चरन कमल जन का आधारु ॥
भगवान के चरण-कमल ही दास का आधार है।
ਗੁਣ ਗੋਵਿੰਦ ਰਉਂ ਸਚੁ ਵਾਪਾਰੁ ॥
गुण गोविंद रउं सचु वापारु ॥
गोविंद का स्तुतिगान ही सच्चा व्यापार है।
ਦਾਸ ਜਨਾ ਕੀ ਮਨਸਾ ਪੂਰਿ ॥
दास जना की मनसा पूरि ॥
हे ईश्वर ! अपने दास जनों की अभिलाषा पूरी करो;
ਨਾਨਕ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ਜਨ ਧੂਰਿ ॥੪॥੨੦॥੨੨॥੬॥੨੮॥
नानक सुखु पावै जन धूरि ॥४॥२०॥२२॥६॥२८॥
क्योंकि नानक तो संतजनों की चरणधूलि पाकर ही सुख हासिल करता है॥ ४॥ २०॥ २२॥ ६॥ २८॥
ਰਾਗੁ ਗੋਂਡ ਅਸਟਪਦੀਆ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੨
रागु गोंड असटपदीआ महला ५ घरु २
रागु गोंड असटपदीआ महला ५ घरु २
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਕਰਿ ਨਮਸਕਾਰ ਪੂਰੇ ਗੁਰਦੇਵ ॥
करि नमसकार पूरे गुरदेव ॥
पूर्ण गुरुदेव को नमन करो,
ਸਫਲ ਮੂਰਤਿ ਸਫਲ ਜਾ ਕੀ ਸੇਵ ॥
सफल मूरति सफल जा की सेव ॥
जिसके दर्शन सफल हैं और जिसकी सेवा करने से सब कामनाएँ पूरी होती हैं।
ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥
अंतरजामी पुरखु बिधाता ॥
वह अन्तर्यामी, परमपुरुष विधाता है और
ਆਠ ਪਹਰ ਨਾਮ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ॥੧॥
आठ पहर नाम रंगि राता ॥१॥
आठ पहर नाम-रंग में ही लीन रहता है। १॥
ਗੁਰੁ ਗੋਬਿੰਦ ਗੁਰੂ ਗੋਪਾਲ ॥
गुरु गोबिंद गुरू गोपाल ॥
गुरु ही गोविंद एवं गुरु ही संसार का पालनहार है,
ਅਪਨੇ ਦਾਸ ਕਉ ਰਾਖਨਹਾਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
अपने दास कउ राखनहार ॥१॥ रहाउ ॥
वही अपने दास का रखवाला है। १॥ रहाउ॥
ਪਾਤਿਸਾਹ ਸਾਹ ਉਮਰਾਉ ਪਤੀਆਏ ॥
पातिसाह साह उमराउ पतीआए ॥
उसने राजा-महाराजा एवं उमराव प्रसन्न कर दिए हैं और
ਦੁਸਟ ਅਹੰਕਾਰੀ ਮਾਰਿ ਪਚਾਏ ॥
दुसट अहंकारी मारि पचाए ॥
दुष्ट अहंकारियों को मारकर नष्ट कर दिया है।
ਨਿੰਦਕ ਕੈ ਮੁਖਿ ਕੀਨੋ ਰੋਗੁ ॥
निंदक कै मुखि कीनो रोगु ॥
उसने निंदकों के मुँह में रोग पैदा कर दिया है और
ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਕਰੈ ਸਭੁ ਲੋਗੁ ॥੨॥
जै जै कारु करै सभु लोगु ॥२॥
दुनिया के सभी लोग उसकी ही जय-जयकार करते हैं॥ २ ॥
ਸੰਤਨ ਕੈ ਮਨਿ ਮਹਾ ਅਨੰਦੁ ॥
संतन कै मनि महा अनंदु ॥
संतों के मन में आनंद ही आनंद बना रहता है और
ਸੰਤ ਜਪਹਿ ਗੁਰਦੇਉ ਭਗਵੰਤੁ ॥
संत जपहि गुरदेउ भगवंतु ॥
वे सदैव ही गुरुदेव भगवन्त को जपते रहते हैं।
ਸੰਗਤਿ ਕੇ ਮੁਖ ਊਜਲ ਭਏ ॥
संगति के मुख ऊजल भए ॥
उनकी संगति में रहने वाले लोगों के मुख उज्जवल हो गए हैं और
ਸਗਲ ਥਾਨ ਨਿੰਦਕ ਕੇ ਗਏ ॥੩॥
सगल थान निंदक के गए ॥३॥
निंदकों के सभी स्थान उनके हाथ से निकल गए हैं।३॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਜਨੁ ਸਦਾ ਸਲਾਹੇ ॥ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਗੁਰ ਬੇਪਰਵਾਹੇ ॥
सासि सासि जनु सदा सलाहे ॥ पारब्रहम गुर बेपरवाहे ॥
परब्रह्म गुरु बेपरवाह है, भक्तजन सदा उसकी स्तुति करते रहते हैं
ਸਗਲ ਭੈ ਮਿਟੇ ਜਾ ਕੀ ਸਰਨਿ ॥
सगल भै मिटे जा की सरनि ॥
जिसकी शरण में आने से सारे भय मिट जाते है तथा
ਨਿੰਦਕ ਮਾਰਿ ਪਾਏ ਸਭਿ ਧਰਨਿ ॥੪॥
निंदक मारि पाए सभि धरनि ॥४॥
उसने निंदको को मार कर धरती पर लिटा दिया है ॥ ४ ॥
ਜਨ ਕੀ ਨਿੰਦਾ ਕਰੈ ਨ ਕੋਇ ॥
जन की निंदा करै न कोइ ॥
ईश्वर के उपासक की कोई भी निंदा मत करे,
ਜੋ ਕਰੈ ਸੋ ਦੁਖੀਆ ਹੋਇ ॥
जो करै सो दुखीआ होइ ॥
जो भी निंदा करता है, वही दुखी होता है।
ਆਠ ਪਹਰ ਜਨੁ ਏਕੁ ਧਿਆਏ ॥
आठ पहर जनु एकु धिआए ॥
वह आठ प्रहर केवल परमात्मा का ही भजन करता है और
ਜਮੂਆ ਤਾ ਕੈ ਨਿਕਟਿ ਨ ਜਾਏ ॥੫॥
जमूआ ता कै निकटि न जाए ॥५॥
यमराज भी उसके निकट नहीं जाता ॥५॥
ਜਨ ਨਿਰਵੈਰ ਨਿੰਦਕ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥
जन निरवैर निंदक अहंकारी ॥
प्रभु का सेवक किसी से भी वैर नहीं करता, किन्तु निंदक बड़ा अहंकारी होता है।
ਜਨ ਭਲ ਮਾਨਹਿ ਨਿੰਦਕ ਵੇਕਾਰੀ ॥
जन भल मानहि निंदक वेकारी ॥
सेवक सबका भला चाहता है, लेकिन निंदक बड़ा पापी होता है।
ਗੁਰ ਕੈ ਸਿਖਿ ਸਤਿਗੁਰੂ ਧਿਆਇਆ ॥
गुर कै सिखि सतिगुरू धिआइआ ॥
गुरु के शिष्यों ने सतगुरु का ही ध्यान किया है,
ਜਨ ਉਬਰੇ ਨਿੰਦਕ ਨਰਕਿ ਪਾਇਆ ॥੬॥
जन उबरे निंदक नरकि पाइआ ॥६॥
हरिजनों का उद्धार हो गया है, लेकिन निंदक नरक में पड़ गए हैं ॥६॥
ਸੁਣਿ ਸਾਜਨ ਮੇਰੇ ਮੀਤ ਪਿਆਰੇ ॥
सुणि साजन मेरे मीत पिआरे ॥
हे मेरे प्यारे मित्र ! हे साजन ! इस तथ्य को ध्यानपूर्वक सुनो,
ਸਤਿ ਬਚਨ ਵਰਤਹਿ ਹਰਿ ਦੁਆਰੇ ॥
सति बचन वरतहि हरि दुआरे ॥
ईश्वर के द्वार पर यह सत्य वचन ही सही सिद्ध हो रहे हैं,
ਜੈਸਾ ਕਰੇ ਸੁ ਤੈਸਾ ਪਾਏ ॥
जैसा करे सु तैसा पाए ॥
जैसा कोई कर्म करता है, वैसा ही वह फल पाता है।
ਅਭਿਮਾਨੀ ਕੀ ਜੜ ਸਰਪਰ ਜਾਏ ॥੭॥
अभिमानी की जड़ सरपर जाए ॥७॥
अभिमानी इन्सान की जड़ सचमुच ही उखड़ जाती है ॥७॥
ਨੀਧਰਿਆ ਸਤਿਗੁਰ ਧਰ ਤੇਰੀ ॥
नीधरिआ सतिगुर धर तेरी ॥
हे सतगुरु ! निराश्रित जीवों को तेरा ही आश्रय है,
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਰਾਖਹੁ ਜਨ ਕੇਰੀ ॥
करि किरपा राखहु जन केरी ॥
कृपा करके भक्तजनों की लाज रख लो।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥
कहु नानक तिसु गुर बलिहारी ॥
हे नानक ! मैं उस गुरु पर बलिहारी जाता हूँ
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਪੈਜ ਸਵਾਰੀ ॥੮॥੧॥੨੯॥
जा कै सिमरनि पैज सवारी ॥८॥१॥२९॥
जिसके सिमरन ने मेरी लाज रख ली ॥८॥१॥२९॥