Hindi Page 1229

ਸਾਰੰਗ ਮਹਲਾ ੫ ਚਉਪਦੇ ਘਰੁ ੫
सारंग महला ५ चउपदे घरु ५
सारंग महला ५ चउपदे घरु ५

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

ਹਰਿ ਭਜਿ ਆਨ ਕਰਮ ਬਿਕਾਰ ॥
हरि भजि आन करम बिकार ॥
हे लोगो ! भगवान का भजन कर लो, क्योंकि अन्य कर्म विकारयुक्त एवं बेकार हैं।

ਮਾਨ ਮੋਹੁ ਨ ਬੁਝਤ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਕਾਲ ਗ੍ਰਸ ਸੰਸਾਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
मान मोहु न बुझत त्रिसना काल ग्रस संसार ॥१॥ रहाउ ॥
मान-मोह में तृष्णा कभी नहीं बुझती और काल संसार को खा लेता है॥१॥रहाउ॥।

ਖਾਤ ਪੀਵਤ ਹਸਤ ਸੋਵਤ ਅਉਧ ਬਿਤੀ ਅਸਾਰ ॥
खात पीवत हसत सोवत अउध बिती असार ॥
खाते-पीते, हँसते-सोते पूरी जिंदगी बेकार के कामों में व्यतीत हो जाती है।

ਨਰਕ ਉਦਰਿ ਭ੍ਰਮੰਤ ਜਲਤੋ ਜਮਹਿ ਕੀਨੀ ਸਾਰ ॥੧॥
नरक उदरि भ्रमंत जलतो जमहि कीनी सार ॥१॥
नरक रूपी पेट में भागदौड़ करते मनुष्य दुखों में जलता है और आखिरकार यम ही सजा देता है।॥१॥

ਪਰ ਦ੍ਰੋਹ ਕਰਤ ਬਿਕਾਰ ਨਿੰਦਾ ਪਾਪ ਰਤ ਕਰ ਝਾਰ ॥
पर द्रोह करत बिकार निंदा पाप रत कर झार ॥
दूसरों से नफरत, द्रोह, विकार करते तथा निंदा एवं पाप में लीन रहकर मनुष्य हाथ झाड़ लेता है।

ਬਿਨਾ ਸਤਿਗੁਰ ਬੂਝ ਨਾਹੀ ਤਮ ਮੋਹ ਮਹਾਂ ਅੰਧਾਰ ॥੨॥
बिना सतिगुर बूझ नाही तम मोह महां अंधार ॥२॥
सच्चे गुरु के बिना ज्ञान नहीं होता और मोह के महा अंधकार में पड़ा रहता है।॥२॥

ਬਿਖੁ ਠਗਉਰੀ ਖਾਇ ਮੂਠੋ ਚਿਤਿ ਨ ਸਿਰਜਨਹਾਰ ॥
बिखु ठगउरी खाइ मूठो चिति न सिरजनहार ॥
मनुष्य विषय-विकारों की ठगबूटी खाकर ठग जाता है परन्तु बनाने वाले को याद नहीं करता।

ਗੋਬਿੰਦ ਗੁਪਤ ਹੋਇ ਰਹਿਓ ਨਿਆਰੋ ਮਾਤੰਗ ਮਤਿ ਅਹੰਕਾਰ ॥੩॥
गोबिंद गुपत होइ रहिओ निआरो मातंग मति अहंकार ॥३॥
वह हाथी की मानिंद बुद्धि के अहंकार में मस्त रहता है किन्तु अन्तर्मन में प्रच्छन्न रूप से व्याप्त ईश्वर को नहीं जानता ॥३॥

ਕਰਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਪ੍ਰਭ ਸੰਤ ਰਾਖੇ ਚਰਨ ਕਮਲ ਅਧਾਰ ॥
करि क्रिपा प्रभ संत राखे चरन कमल अधार ॥
प्रभु ने अपने चरण-कमल का आसरा देकर कृपा करके सज्जनों को बचाया है।

ਕਰ ਜੋਰਿ ਨਾਨਕੁ ਸਰਨਿ ਆਇਓ ਗੋੁਪਾਲ ਪੁਰਖ ਅਪਾਰ ॥੪॥੧॥੧੨੯॥
कर जोरि नानकु सरनि आइओ गोपाल पुरख अपार ॥४॥१॥१२९॥
नानक हाथ जोड़कर परमपुरुष परमेश्वर की शरण में आया है॥४॥१॥ १२६ ॥

ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੬ ਪੜਤਾਲ
सारग महला ५ घरु ६ पड़ताल
सारग महला ५ घरु ६ पड़ताल

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

ਸੁਭ ਬਚਨ ਬੋਲਿ ਗੁਨ ਅਮੋਲ ॥
सुभ बचन बोलि गुन अमोल ॥
हर पल शुभ वचन बोलो, यही अमूल्य गुण है।

ਕਿੰਕਰੀ ਬਿਕਾਰ ॥
किंकरी बिकार ॥
बुरे काम मत करो।

ਦੇਖੁ ਰੀ ਬੀਚਾਰ ॥
देखु री बीचार ॥
हे जीव-स्त्री ! भलीभांति चिन्तन कर,

ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਧਿਆਇ ਮਹਲੁ ਪਾਇ ॥
गुर सबदु धिआइ महलु पाइ ॥
शब्द-गुरु का ध्यान करने से मंजिल (प्रभु) प्राप्त होती है।

ਹਰਿ ਸੰਗਿ ਰੰਗ ਕਰਤੀ ਮਹਾ ਕੇਲ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हरि संगि रंग करती महा केल ॥१॥ रहाउ ॥
वहाँ प्रभु के साथ आनंद-क्रीड़ा करोगी ॥१॥रहाउ॥।

ਸੁਪਨ ਰੀ ਸੰਸਾਰੁ ॥
सुपन री संसारु ॥
यह संसार एक सपना है,

ਮਿਥਨੀ ਬਿਸਥਾਰੁ ॥
मिथनी बिसथारु ॥
अन्य सब विस्तार झूठा है।

ਸਖੀ ਕਾਇ ਮੋਹਿ ਮੋਹਿਲੀ ਪ੍ਰਿਅ ਪ੍ਰੀਤਿ ਰਿਦੈ ਮੇਲ ॥੧॥
सखी काइ मोहि मोहिली प्रिअ प्रीति रिदै मेल ॥१॥
हे सखी ! क्यों मोह-माया में मोहित होती हो, हृदय में प्रियतम का प्रेम बसा लो॥१॥

ਸਰਬ ਰੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਆਰੁ ॥
सरब री प्रीति पिआरु ॥
प्रभु सब से प्रेम करता है,

ਪ੍ਰਭੁ ਸਦਾ ਰੀ ਦਇਆਰੁ ॥
प्रभु सदा री दइआरु ॥
वह सदा दयालु है,

ਕਾਂਏਂ ਆਨ ਆਨ ਰੁਚੀਐ ॥
कांएं आन आन रुचीऐ ॥
फिर भला अन्य कार्यों में क्योंकर दिलचस्पी रखती हो ?

ਹਰਿ ਸੰਗਿ ਸੰਗਿ ਖਚੀਐ ॥
हरि संगि संगि खचीऐ ॥
प्रभु की प्रेम-भक्ति में तल्लीन रहो।

ਜਉ ਸਾਧਸੰਗ ਪਾਏ ॥
जउ साधसंग पाए ॥
हे नानक ! जब साधु पुरुषों का साथ प्राप्त होता है तो ही

ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਧਿਆਏ ॥
कहु नानक हरि धिआए ॥
जीव परमात्मा का ध्यान करता है,

ਅਬ ਰਹੇ ਜਮਹਿ ਮੇਲ ॥੨॥੧॥੧੩੦॥
अब रहे जमहि मेल ॥२॥१॥१३०॥
तब यमदूतों से मिलाप नहीं होता॥२॥१॥ १३० ॥

ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥

ਕੰਚਨਾ ਬਹੁ ਦਤ ਕਰਾ ॥
कंचना बहु दत करा ॥
बहुत सारा सोना दान करना,

ਭੂਮਿ ਦਾਨੁ ਅਰਪਿ ਧਰਾ ॥
भूमि दानु अरपि धरा ॥
भूमि दान में अर्पित करना.

ਮਨ ਅਨਿਕ ਸੋਚ ਪਵਿਤ੍ਰ ਕਰਤ ॥
मन अनिक सोच पवित्र करत ॥
अनेक शुद्धता अपनाकर मन को पवित्र करना,

ਨਾਹੀ ਰੇ ਨਾਮ ਤੁਲਿ ਮਨ ਚਰਨ ਕਮਲ ਲਾਗੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
नाही रे नाम तुलि मन चरन कमल लागे ॥१॥ रहाउ ॥
इन सबके बावजूद ये कर्म हरिनाम की तुलना में नहीं आते, अतः मन को प्रभु-चरणों में लीन करना चाहिए॥१॥रहाउ॥।

ਚਾਰਿ ਬੇਦ ਜਿਹਵ ਭਨੇ ॥
चारि बेद जिहव भने ॥
जिह्म से चार वेदों का पाठ करना,

ਦਸ ਅਸਟ ਖਸਟ ਸ੍ਰਵਨ ਸੁਨੇ ॥
दस असट खसट स्रवन सुने ॥
अठारह पुराण तथा छ: शास्त्रों को कानों से सुनना,

ਨਹੀ ਤੁਲਿ ਗੋਬਿਦ ਨਾਮ ਧੁਨੇ ॥
नही तुलि गोबिद नाम धुने ॥
ये भी गोविन्द नामोच्चारण की ध्वनि के तुल्य नहीं,

ਮਨ ਚਰਨ ਕਮਲ ਲਾਗੇ ॥੧॥
मन चरन कमल लागे ॥१॥
मन को चरण-कमल में तल्लीन करना चाहिए॥१॥

ਬਰਤ ਸੰਧਿ ਸੋਚ ਚਾਰ ॥
बरत संधि सोच चार ॥
व्रत-उपवास, संध्या-आरती, चार तरह का शुद्धिकरण,

ਕ੍ਰਿਆ ਕੁੰਟਿ ਨਿਰਾਹਾਰ ॥
क्रिआ कुंटि निराहार ॥
निराहार तीर्थ-यात्रा एवं अस्पृष्ट रसोई करना,

ਅਪਰਸ ਕਰਤ ਪਾਕਸਾਰ ॥
अपरस करत पाकसार ॥
निउली कर्म का बहुत सारा विस्तार,

ਨਿਵਲੀ ਕਰਮ ਬਹੁ ਬਿਸਥਾਰ ॥
निवली करम बहु बिसथार ॥
धूप-दीप भी ईश्वर के नाम की तुलना में नहीं आते।

ਧੂਪ ਦੀਪ ਕਰਤੇ ਹਰਿ ਨਾਮ ਤੁਲਿ ਨ ਲਾਗੇ ॥
धूप दीप करते हरि नाम तुलि न लागे ॥
हे दयालु राम ! दीन की विनती सुनो;

ਰਾਮ ਦਇਆਰ ਸੁਨਿ ਦੀਨ ਬੇਨਤੀ ॥
राम दइआर सुनि दीन बेनती ॥
दर्शन दो, ऑखों से तुझे ही देखना चाहता हूँ।

ਦੇਹੁ ਦਰਸੁ ਨੈਨ ਪੇਖਉ ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਮਿਸਟ ਲਾਗੇ ॥੨॥੨॥੧੩੧॥
देहु दरसु नैन पेखउ जन नानक नाम मिसट लागे ॥२॥२॥१३१॥
दास नानक को तेरा नाम ही मीठा लगता है।॥२॥२॥ १३१॥

ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥

ਰਾਮ ਰਾਮ ਰਾਮ ਜਾਪਿ ਰਮਤ ਰਾਮ ਸਹਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
राम राम राम जापि रमत राम सहाई ॥१॥ रहाउ ॥
राम नाम का जाप करो, अंततः राम ही सहायता करने वाला है॥ १॥ रहाउ ॥

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