ਕਰਮੁ ਹੋਵੈ ਗੁਰੁ ਕਿਰਪਾ ਕਰੈ ॥
करमु होवै गुरु किरपा करै ॥
अगर उत्तम भाग्य हो तो गुरु कृपा करता है,
ਇਹੁ ਮਨੁ ਜਾਗੈ ਇਸੁ ਮਨ ਕੀ ਦੁਬਿਧਾ ਮਰੈ ॥੪॥
इहु मनु जागै इसु मन की दुबिधा मरै ॥४॥
यह मन जागृत हो जाता है और इस मन की दुविधा समाप्त हो जाती है॥४॥
ਮਨ ਕਾ ਸੁਭਾਉ ਸਦਾ ਬੈਰਾਗੀ ॥
मन का सुभाउ सदा बैरागी ॥
मन का स्वभाव सदा वैराग्यपूर्ण है और
ਸਭ ਮਹਿ ਵਸੈ ਅਤੀਤੁ ਅਨਰਾਗੀ ॥੫॥
सभ महि वसै अतीतु अनरागी ॥५॥
सब में वह अतीत एवं प्यारा ईश्वर बसता है॥५॥
ਕਹਤ ਨਾਨਕੁ ਜੋ ਜਾਣੈ ਭੇਉ ॥ ਆਦਿ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰੰਜਨ ਦੇਉ ॥੬॥੫॥
कहत नानकु जो जाणै भेउ ॥ आदि पुरखु निरंजन देउ ॥६॥५॥
नानक कहते हैं कि जो इस रहस्य को जानता है, वह आदिपुरुष निरंजन का रूप है॥६॥५॥
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੩ ॥
भैरउ महला ३ ॥
भैरउ महला ३॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਜਗਤ ਨਿਸਤਾਰਾ ॥ ਭਵਜਲੁ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰਣਹਾਰਾ ॥੧॥
राम नामु जगत निसतारा ॥ भवजलु पारि उतारणहारा ॥१॥
राम नाम जगत का मुक्तिदाता है और यही संसार-सागर से पार उतारने वाला है॥१॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮ੍ਹ੍ਹਾਲਿ ॥ ਸਦ ਹੀ ਨਿਬਹੈ ਤੇਰੈ ਨਾਲਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुर परसादी हरि नामु सम्हालि ॥ सद ही निबहै तेरै नालि ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु की कृपा से हरिनाम स्मरण करो, हे भाई ! यह सदा ही तेरा साथ निभानेवाला है॥१॥रहाउ॥
ਨਾਮੁ ਨ ਚੇਤਹਿ ਮਨਮੁਖ ਗਾਵਾਰਾ ॥
नामु न चेतहि मनमुख गावारा ॥
मूर्ख मनमुख जीव हरिनाम स्मरण नहीं करता तो फिर
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕੈਸੇ ਪਾਵਹਿ ਪਾਰਾ ॥੨॥
बिनु नावै कैसे पावहि पारा ॥२॥
नाम के बिना वह कैसे पार हो सकता है॥२॥
ਆਪੇ ਦਾਤਿ ਕਰੇ ਦਾਤਾਰੁ ॥
आपे दाति करे दातारु ॥
दरअसल हरिनाम की दात ईश्वर स्वयं ही देता है,
ਦੇਵਣਹਾਰੇ ਕਉ ਜੈਕਾਰੁ ॥੩॥
देवणहारे कउ जैकारु ॥३॥
उस दाता को हमारा कोटि-कोटि वन्दन है॥३॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਮਿਲਾਏ ॥ ਨਾਨਕ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਵਸਾਏ ॥੪॥੬॥
नदरि करे सतिगुरू मिलाए ॥ नानक हिरदै नामु वसाए ॥४॥६॥
अगर प्रभु कृपा करे तो सतगुरु से मिला देता है। नानक फुरमाते हैं कि फिर गुरु हृदय में हरिनाम बसा देता है॥ ४॥६॥
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੩ ॥
भैरउ महला ३ ॥
भैरउ महला ३॥
ਨਾਮੇ ਉਧਰੇ ਸਭਿ ਜਿਤਨੇ ਲੋਅ ॥
नामे उधरे सभि जितने लोअ ॥
जितने भी सब लोक हैं, हरिनाम से ही उनका उद्धार हुआ है और
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਿਨਾ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੧॥
गुरमुखि जिना परापति होइ ॥१॥
गुरु से सबको हरिनाम प्राप्त होता है॥१॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਅਪਣੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇਇ ॥
हरि जीउ अपणी क्रिपा करेइ ॥
ईश्वर अपनी कृपा करता है और
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਵਡਿਆਈ ਦੇਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुरमुखि नामु वडिआई देइ ॥१॥ रहाउ ॥
गुरमुख को नाम देकर बड़ाई प्रदान करता है॥१॥ रहाउ॥
ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਜਿਨ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਆਰੁ ॥
राम नामि जिन प्रीति पिआरु ॥
जिसका राम नाम से प्रेम है,
ਆਪਿ ਉਧਰੇ ਸਭਿ ਕੁਲ ਉਧਾਰਣਹਾਰੁ ॥੨॥
आपि उधरे सभि कुल उधारणहारु ॥२॥
उसका स्वयं तो उद्धार हुआ ही है, उसने पूरी कुल का भी उद्धार करवा दिया है॥२॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਮਨਮੁਖ ਜਮ ਪੁਰਿ ਜਾਹਿ ॥
बिनु नावै मनमुख जम पुरि जाहि ॥
प्रभु-नामविहीन मनमुखी जीव यमपुरी (नरक) जाता है और
ਅਉਖੇ ਹੋਵਹਿ ਚੋਟਾ ਖਾਹਿ ॥੩॥
अउखे होवहि चोटा खाहि ॥३॥
तंग होकर कष्ट भोगता है॥३॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਦੇਵੈ ਸੋਇ ॥ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੪॥੭॥
आपे करता देवै सोइ ॥ नानक नामु परापति होइ ॥४॥७॥
नानक ! जब ईश्वर स्वयं देता है तो ही नाम प्राप्त होता है॥४॥ ७॥
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੩ ॥
भैरउ महला ३ ॥
भैरउ महला ३॥
ਗੋਵਿੰਦ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਨਕਾਦਿਕ ਉਧਾਰੇ ॥
गोविंद प्रीति सनकादिक उधारे ॥
गोविन्द से प्रेम के फलस्वरूप सनक-सनंदन का उद्धार हुआ,
ਰਾਮ ਨਾਮ ਸਬਦਿ ਬੀਚਾਰੇ ॥੧॥
राम नाम सबदि बीचारे ॥१॥
उन्होंने राम नाम शब्द का चिंतन किया॥१॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਅਪਣੀ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੁ ॥
हरि जीउ अपणी किरपा धारु ॥
अगर ईश्वर अपनी कृपा कर दे तो
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੇ ਲਗੈ ਪਿਆਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुरमुखि नामे लगै पिआरु ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु द्वारा नाम से प्रेम हो जाता है॥१॥रहाउ॥
ਅੰਤਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਭਗਤਿ ਸਾਚੀ ਹੋਇ ॥
अंतरि प्रीति भगति साची होइ ॥
अन्तर्मन में प्रेम से सच्ची भक्ति होती है और
ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਮੇਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥੨॥
पूरै गुरि मेलावा होइ ॥२॥
पूरे गुरु से मिलाप हो जाता है॥२॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਸੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੩॥
निज घरि वसै सहजि सुभाइ ॥ गुरमुखि नामु वसै मनि आइ ॥३॥
फिर जीव सहज-स्वभाव अपने वास्तविक घर में बस जाता है और गुरु द्वारा मन में हरिनाम आ बसता है॥३॥
ਆਪੇ ਵੇਖੈ ਵੇਖਣਹਾਰੁ ॥
आपे वेखै वेखणहारु ॥
वह देखनेवाला प्रभु स्वयं ही देख रहा है,
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਰਖਹੁ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥੪॥੮॥
नानक नामु रखहु उर धारि ॥४॥८॥
हे नानक ! हरिनाम अपने दिल में बसाकर रखो॥४॥८॥
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੩ ॥
भैरउ महला ३ ॥
भैरउ महला ३॥
ਕਲਜੁਗ ਮਹਿ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਉਰ ਧਾਰੁ ॥
कलजुग महि राम नामु उर धारु ॥
कलियुग में राम-नाम हृदय में धारण करो;
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਮਾਥੈ ਪਾਵੈ ਛਾਰੁ ॥੧॥
बिनु नावै माथै पावै छारु ॥१॥
क्योंकि नाम के बिना माथे पर राख ही पड़ती है॥१॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਦੁਲਭੁ ਹੈ ਭਾਈ ॥
राम नामु दुलभु है भाई ॥
हे भाई ! राम नाम दुर्लभ है,
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुर परसादि वसै मनि आई ॥१॥ रहाउ ॥
अतः गुरु की कृपा से ही यह मन में आ बसता है॥१॥रहाउ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਜਨ ਭਾਲਹਿ ਸੋਇ ॥
राम नामु जन भालहि सोइ ॥
मनुष्य राम नाम ही ढूंढता है,
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਪ੍ਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੨॥
पूरे गुर ते प्रापति होइ ॥२॥
मगर पूरे गुरु से ही यह प्राप्त होता है।॥२॥
ਹਰਿ ਕਾ ਭਾਣਾ ਮੰਨਹਿ ਸੇ ਜਨ ਪਰਵਾਣੁ ॥
हरि का भाणा मंनहि से जन परवाणु ॥
जो परमात्मा की रज़ा को मानता है, वही व्यक्ति जीवन में सफल होता है और
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਨਾਮ ਨੀਸਾਣੁ ॥੩॥
गुर कै सबदि नाम नीसाणु ॥३॥
गुरु के उपदेश से लब्ध प्रभु-नाम में ही लवलीन रहता है।॥३॥
ਸੋ ਸੇਵਹੁ ਜੋ ਕਲ ਰਹਿਆ ਧਾਰਿ ॥
सो सेवहु जो कल रहिआ धारि ॥
जिसने सर्वशक्तियों को धारण किया हुआ है, उस ईश्वर की उपासना करो।
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪਿਆਰਿ ॥੪॥੯॥
नानक गुरमुखि नामु पिआरि ॥४॥९॥
हे नानक ! गुरु के सान्निध्य में प्रभु-नाम से प्यार बना रहता है॥४॥६॥
ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੩ ॥
भैरउ महला ३ ॥
भैरउ महला ३॥
ਕਲਜੁਗ ਮਹਿ ਬਹੁ ਕਰਮ ਕਮਾਹਿ ॥
कलजुग महि बहु करम कमाहि ॥
कलियुग में मनुष्य अनेक कर्मकाण्ड करता है,
ਨਾ ਰੁਤਿ ਨ ਕਰਮ ਥਾਇ ਪਾਹਿ ॥੧॥
ना रुति न करम थाइ पाहि ॥१॥
परन्तु यह कर्मकाण्ड करने का समय नहीं है, इसलिए कोई कर्म सफल नहीं हो पाता।॥१॥
ਕਲਜੁਗ ਮਹਿ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਹੈ ਸਾਰੁ ॥
कलजुग महि राम नामु है सारु ॥
कलियुग में राम नाम ही उपयोगी है और
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚਾ ਲਗੈ ਪਿਆਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुरमुखि साचा लगै पिआरु ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु के सान्निध्य में जीव को प्रभु से प्रेम हो जाता है॥१॥ रहाउ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਖੋਜਿ ਘਰੈ ਮਹਿ ਪਾਇਆ ॥ ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ॥੨॥
तनु मनु खोजि घरै महि पाइआ ॥ गुरमुखि राम नामि चितु लाइआ ॥२॥
तन मन को खोज कर इसे हृदय-घर में ही पाया जा सकता है और गुरु के सान्निध्य में राम नाम से चित लगा रहता है।॥२॥