Hindi Page 1073

ਧਨ ਅੰਧੀ ਪਿਰੁ ਚਪਲੁ ਸਿਆਨਾ ॥
धन अंधी पिरु चपलु सिआना ॥
स्त्री ज्ञानहीन है किन्तु पति चतुर एवं बुद्धिमान है।

ਪੰਚ ਤਤੁ ਕਾ ਰਚਨੁ ਰਚਾਨਾ ॥
पंच ततु का रचनु रचाना ॥
परमात्मा ने यह रचना पाँच तत्वों से बनाई है,”

ਜਿਸੁ ਵਖਰ ਕਉ ਤੁਮ ਆਏ ਹਹੁ ਸੋ ਪਾਇਓ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਸਾ ਹੇ ॥੬॥
जिसु वखर कउ तुम आए हहु सो पाइओ सतिगुर पासा हे ॥६॥
जिस नाम रूपी वस्तु के लिए तुम जगत् में आए हो, वह वस्तु सतिगुरु से प्राप्त होती है॥ ६॥

ਧਨ ਕਹੈ ਤੂ ਵਸੁ ਮੈ ਨਾਲੇ ॥
धन कहै तू वसु मै नाले ॥
स्त्री कहती है कि हे मेरे स्वामी ! तुम सदा ही मेरे संग रहो,”

ਪ੍ਰਿਅ ਸੁਖਵਾਸੀ ਬਾਲ ਗੁਪਾਲੇ ॥
प्रिअ सुखवासी बाल गुपाले ॥
तुम्हारे संग सुख में रहना मेरा कुटम्ब है।

ਤੁਝੈ ਬਿਨਾ ਹਉ ਕਿਤ ਹੀ ਨ ਲੇਖੈ ਵਚਨੁ ਦੇਹਿ ਛੋਡਿ ਨ ਜਾਸਾ ਹੇ ॥੭॥
तुझै बिना हउ कित ही न लेखै वचनु देहि छोडि न जासा हे ॥७॥
तुम्हारे बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है, मुझे वचन दो कि तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाओगे॥ ७॥

ਪਿਰਿ ਕਹਿਆ ਹਉ ਹੁਕਮੀ ਬੰਦਾ ॥
पिरि कहिआ हउ हुकमी बंदा ॥
“(आत्मा रूपी) पति (शरीर रूपी) पत्नी को सच्ची बात कहता है कि मैं तो परमात्मा के हुक्म का पालन करने वाला बंदा हूँ,”

ਓਹੁ ਭਾਰੋ ਠਾਕੁਰੁ ਜਿਸੁ ਕਾਣਿ ਨ ਛੰਦਾ ॥
ओहु भारो ठाकुरु जिसु काणि न छंदा ॥
वह समूचे जगत् का मालिक है, जिसे किसी बात की कोई परवाह एवं भय नहीं।

ਜਿਚਰੁ ਰਾਖੈ ਤਿਚਰੁ ਤੁਮ ਸੰਗਿ ਰਹਣਾ ਜਾ ਸਦੇ ਤ ਊਠਿ ਸਿਧਾਸਾ ਹੇ ॥੮॥
जिचरु राखै तिचरु तुम संगि रहणा जा सदे त ऊठि सिधासा हे ॥८॥
जब तक प्रभु मुझे रखेगा, तब तक ही मैंने तेरे साथ रहना है, जब वह मुझे बुलाएगा मैंने यहाँ से चले जाना है॥ ८॥

ਜਉ ਪ੍ਰਿਅ ਬਚਨ ਕਹੇ ਧਨ ਸਾਚੇ ॥
जउ प्रिअ बचन कहे धन साचे ॥
जब पति ने अपनी पत्नी को ऐसे सच्चे वचन कहे तो

ਧਨ ਕਛੂ ਨ ਸਮਝੈ ਚੰਚਲਿ ਕਾਚੇ ॥
धन कछू न समझै चंचलि काचे ॥
तुच्छ मति वाली चंचल स्त्री ने कुछ भी न समझा।

ਬਹੁਰਿ ਬਹੁਰਿ ਪਿਰ ਹੀ ਸੰਗੁ ਮਾਗੈ ਓਹੁ ਬਾਤ ਜਾਨੈ ਕਰਿ ਹਾਸਾ ਹੇ ॥੯॥
बहुरि बहुरि पिर ही संगु मागै ओहु बात जानै करि हासा हे ॥९॥
वह बार-बार प्रेिय का संग ही माँगती अपने पति की बात को व्यंग्य ही समझ लिया॥ ९॥

ਆਈ ਆਗਿਆ ਪਿਰਹੁ ਬੁਲਾਇਆ ॥
आई आगिआ पिरहु बुलाइआ ॥
जब प्रभु की आज्ञा आई तो पति चल लिया,”

ਨਾ ਧਨ ਪੁਛੀ ਨ ਮਤਾ ਪਕਾਇਆ ॥
ना धन पुछी न मता पकाइआ ॥
पति ने न ही अपनी पत्नी से पूछा और न ही उसके साथ कोई सलाह की।

ਊਠਿ ਸਿਧਾਇਓ ਛੂਟਰਿ ਮਾਟੀ ਦੇਖੁ ਨਾਨਕ ਮਿਥਨ ਮੋਹਾਸਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ऊठि सिधाइओ छूटरि माटी देखु नानक मिथन मोहासा हे ॥१०॥
पति उठकर चला गया और विधवा पत्नी मिट्टी हो गई।

ਰੇ ਮਨ ਲੋਭੀ ਸੁਣਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ॥
रे मन लोभी सुणि मन मेरे ॥
हे नानक ! इस सच्चाई को देख लो,माया का प्रसार मिथ्या ही है॥ १०॥

ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ਸਦੇਰੇ ॥
सतिगुरु सेवि दिनु राति सदेरे ॥
हे लोभी मन! जरा ध्यानपूर्वक सुन;

ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਪਚਿ ਮੂਏ ਸਾਕਤ ਨਿਗੁਰੇ ਗਲਿ ਜਮ ਫਾਸਾ ਹੇ ॥੧੧॥
बिनु सतिगुर पचि मूए साकत निगुरे गलि जम फासा हे ॥११॥
दिन-रात सदैव सतिगुरु की सेवा करो,”

ਮਨਮੁਖਿ ਆਵੈ ਮਨਮੁਖਿ ਜਾਵੈ ॥
मनमुखि आवै मनमुखि जावै ॥
सतिगुरु के बिना पदार्थवादी जीव गल सड़कर मर गए हैं और उन निगुरों के गले में यम का फंदा ही पड़ता है॥ ११॥

ਮਨਮੁਖਿ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਚੋਟਾ ਖਾਵੈ ॥
मनमुखि फिरि फिरि चोटा खावै ॥
मनमुखी जीव जन्मते-मरते रहते हैं और उनको बार-बार यम से चोटें प्राप्त होती हैं।

ਜਿਤਨੇ ਨਰਕ ਸੇ ਮਨਮੁਖਿ ਭੋਗੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਲੇਪੁ ਨ ਮਾਸਾ ਹੇ ॥੧੨॥
जितने नरक से मनमुखि भोगै गुरमुखि लेपु न मासा हे ॥१२॥
जितने भी नरक हैं, मनमुखी उतने ही भोगते हैं, लेकिन गुरुमुख को तिल मात्र भी दुख प्रभावित नहीं करता॥ १२॥

ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੋਇ ਜਿ ਹਰਿ ਜੀਉ ਭਾਇਆ ॥
गुरमुखि सोइ जि हरि जीउ भाइआ ॥
वास्तव में गुरुमुख वही है, जो भगवान् को भाया है।

ਤਿਸੁ ਕਉਣੁ ਮਿਟਾਵੈ ਜਿ ਪ੍ਰਭਿ ਪਹਿਰਾਇਆ ॥
तिसु कउणु मिटावै जि प्रभि पहिराइआ ॥
जिसे प्रभु ने यश प्रदान किया है, उसकी शोभा कौन मिटा सकता है।

ਸਦਾ ਅਨੰਦੁ ਕਰੇ ਆਨੰਦੀ ਜਿਸੁ ਸਿਰਪਾਉ ਪਇਆ ਗਲਿ ਖਾਸਾ ਹੇ ॥੧੩॥
सदा अनंदु करे आनंदी जिसु सिरपाउ पइआ गलि खासा हे ॥१३॥
जिसके गले में परमात्मा ने सम्मान का सिरोपा पहनाया है, वह सदा परमानंद में लीन रहता है।॥ १३॥

ਹਉ ਬਲਿਹਾਰੀ ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰੇ ॥
हउ बलिहारी सतिगुर पूरे ॥
मैं पूर्ण सतगुरु पर बलिहारी जाता हूँ।

ਸਰਣਿ ਕੇ ਦਾਤੇ ਬਚਨ ਕੇ ਸੂਰੇ ॥
सरणि के दाते बचन के सूरे ॥
हे शरण दाता, वचन के शूरवीर सतगुरु !

ਐਸਾ ਪ੍ਰਭੁ ਮਿਲਿਆ ਸੁਖਦਾਤਾ ਵਿਛੁੜਿ ਨ ਕਤ ਹੀ ਜਾਸਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ऐसा प्रभु मिलिआ सुखदाता विछुड़ि न कत ही जासा हे ॥१४॥
तेरी दया से मुझे सुख देने वाला ऐसा प्रभु मिला है, जिससे बिछुड़ कर में कहीं नहीं जाता॥ १४॥

ਗੁਣ ਨਿਧਾਨ ਕਿਛੁ ਕੀਮ ਨ ਪਾਈ ॥
गुण निधान किछु कीम न पाई ॥
उस गुणनिधान परमेश्वर की महिमा की कीमत नहीं ऑकी जा सकती,”

ਘਟਿ ਘਟਿ ਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਸਭ ਠਾਈ ॥
घटि घटि पूरि रहिओ सभ ठाई ॥
वह घट-घट सबमें रमण कर रहा है।

ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਦੀਨ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਹਉ ਰੇਣ ਤੇਰੇ ਜੋ ਦਾਸਾ ਹੇ ॥੧੫॥੧॥੨॥
नानक सरणि दीन दुख भंजन हउ रेण तेरे जो दासा हे ॥१५॥१॥२॥
नानक तो दोनों के दुख नाश करने वाले परमात्मा की शरण में है और प्रार्थना करता है कि हे प्रभु ! मैं तेरे दासों की चरण-धूलि बना रहूं।।१५॥ १॥ २॥

ਮਾਰੂ ਸੋਲਹੇ ਮਹਲਾ ੫
मारू सोलहे महला ५
मारू सोलहे महला ५

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥

ਕਰੈ ਅਨੰਦੁ ਅਨੰਦੀ ਮੇਰਾ ॥
करै अनंदु अनंदी मेरा ॥
मेरा आनंदी प्रभु सदा आनंद करता है,”

ਘਟਿ ਘਟਿ ਪੂਰਨੁ ਸਿਰ ਸਿਰਹਿ ਨਿਬੇਰਾ ॥
घटि घटि पूरनु सिर सिरहि निबेरा ॥
वह घट-घट में व्याप्त है और प्रत्येक जीव का कमों के अनुसार ही निपटारा करता है।

ਸਿਰਿ ਸਾਹਾ ਕੈ ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਅਵਰੁ ਨਾਹੀ ਕੋ ਦੂਜਾ ਹੇ ॥੧॥
सिरि साहा कै सचा साहिबु अवरु नाही को दूजा हे ॥१॥
वह सत्यस्वरूप परमेश्वर बादशाहों से भी बड़ा बादशाह है और उसके अलावा अन्य कोई बड़ा नहीं॥ १॥

ਹਰਖਵੰਤ ਆਨੰਤ ਦਇਆਲਾ ॥
हरखवंत आनंत दइआला ॥
खुशदिल, बेअंत एवं दयालु

ਪ੍ਰਗਟਿ ਰਹਿਓ ਪ੍ਰਭੁ ਸਰਬ ਉਜਾਲਾ ॥
प्रगटि रहिओ प्रभु सरब उजाला ॥
प्रभु की ज्योति का प्रकाश सब में प्रगट है।

ਰੂਪ ਕਰੇ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਵਿਗਸੈ ਆਪੇ ਹੀ ਆਪਿ ਪੂਜਾ ਹੇ ॥੨॥
रूप करे करि वेखै विगसै आपे ही आपि पूजा हे ॥२॥
वह अपने अनेक रूप पैदा करके उन्हें देखकर प्रसन्न होता है और स्वयं ही पुजारी के रूप में अपनी पूजा करता है॥ २॥

ਆਪੇ ਕੁਦਰਤਿ ਕਰੇ ਵੀਚਾਰਾ ॥
आपे कुदरति करे वीचारा ॥
वह स्वयं ही विचार करके कुदरत को रचता है और

ਆਪੇ ਹੀ ਸਚੁ ਕਰੇ ਪਸਾਰਾ ॥
आपे ही सचु करे पसारा ॥
स्वयं ही जगत्-प्रसार करता है।

ਆਪੇ ਖੇਲ ਖਿਲਾਵੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਆਪੇ ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਭੀਜਾ ਹੇ ॥੩॥
आपे खेल खिलावै दिनु राती आपे सुणि सुणि भीजा हे ॥३॥
वह स्वयं ही जीवों को दिन-रात खेल खेलाता रहता है और स्वयं ही अपना यश सुनकर प्रसन्न होता है।॥३॥

ਸਾਚਾ ਤਖਤੁ ਸਚੀ ਪਾਤਿਸਾਹੀ ॥
साचा तखतु सची पातिसाही ॥
उसका सिंहासन सदा अटल है और उसकी बादशाहत भी सच्ची है।

ਸਚੁ ਖਜੀਨਾ ਸਾਚਾ ਸਾਹੀ ॥
सचु खजीना साचा साही ॥
उसका खजाना सत्य है और वही सच्चा शाह है।

error: Content is protected !!