Hindi Page 990

ਪਾਪ ਪਥਰ ਤਰਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥
पाप पथर तरणु न जाई ॥
अरे भाई ! पाप रूपी पत्थरों से भरी हुई नैया द्वारा संसार-सागर से पार नहीं हुआ जाता।

ਭਉ ਬੇੜਾ ਜੀਉ ਚੜਾਊ ॥
भउ बेड़ा जीउ चड़ाऊ ॥
श्रद्धा-भक्ति रूपी नैया से ही जीव भवसागर से पार होता है।

ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਦੇਵੈ ਕਾਹੂ ॥੪॥੨॥
कहु नानक देवै काहू ॥४॥२॥
हे नानक ! यह श्रद्धा-भक्ति रूपी नैया परमेश्वर किसी विरले को ही प्रदान करता है॥ ४॥ २॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੧ ॥
मारू महला १ घरु १ ॥
मारू महला १ घरु १॥

ਕਰਣੀ ਕਾਗਦੁ ਮਨੁ ਮਸਵਾਣੀ ਬੁਰਾ ਭਲਾ ਦੁਇ ਲੇਖ ਪਏ ॥
करणी कागदु मनु मसवाणी बुरा भला दुइ लेख पए ॥
आचरण कागज एवं मन स्याही की दवात है और बुरा-भला दो प्रकार के कर्म तकदीर में लिखे पड़े हैं।

ਜਿਉ ਜਿਉ ਕਿਰਤੁ ਚਲਾਏ ਤਿਉ ਚਲੀਐ ਤਉ ਗੁਣ ਨਾਹੀ ਅੰਤੁ ਹਰੇ ॥੧॥
जिउ जिउ किरतु चलाए तिउ चलीऐ तउ गुण नाही अंतु हरे ॥१॥
हे परमेश्वर ! तेरे गुणों का तो कोई अन्त नहीं है, जैसे-जैसे कर्म करवाता है, वैसे ही चलना पड़ता है॥ १॥

ਚਿਤ ਚੇਤਸਿ ਕੀ ਨਹੀ ਬਾਵਰਿਆ ॥
चित चेतसि की नही बावरिआ ॥
हे बावले जीव ! मन में परमात्मा को याद क्यों नहीं करता ?

ਹਰਿ ਬਿਸਰਤ ਤੇਰੇ ਗੁਣ ਗਲਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हरि बिसरत तेरे गुण गलिआ ॥१॥ रहाउ ॥
भगवान को विस्मृत करने से तेरे गुण क्षीण हो जाते हैं।॥ १॥ रहाउ॥

ਜਾਲੀ ਰੈਨਿ ਜਾਲੁ ਦਿਨੁ ਹੂਆ ਜੇਤੀ ਘੜੀ ਫਾਹੀ ਤੇਤੀ ॥
जाली रैनि जालु दिनु हूआ जेती घड़ी फाही तेती ॥
तुझे फँसाने के लिए रात्री जाली और दिन जाल बना हुआ है, जितनी घड़ियाँ हैं, उतनी ही मुसीबतें हैं।

ਰਸਿ ਰਸਿ ਚੋਗ ਚੁਗਹਿ ਨਿਤ ਫਾਸਹਿ ਛੂਟਸਿ ਮੂੜੇ ਕਵਨ ਗੁਣੀ ॥੨॥
रसि रसि चोग चुगहि नित फासहि छूटसि मूड़े कवन गुणी ॥२॥
तू नित्य स्वाद ले लेकर विषय-विकार रूपी दाना चुगता रहता है और फँसता जा रहा है। अरे मूर्ख ! किस गुण से भला तेरा छुटकारा हो सकता है?॥ २॥

ਕਾਇਆ ਆਰਣੁ ਮਨੁ ਵਿਚਿ ਲੋਹਾ ਪੰਚ ਅਗਨਿ ਤਿਤੁ ਲਾਗਿ ਰਹੀ ॥
काइआ आरणु मनु विचि लोहा पंच अगनि तितु लागि रही ॥
शरीर एक भट्टी बना हुआ है, जिसमें मन लोहे के समान है और काम, क्रोध, मोह, लोभ एवं अहंकार रूपी पंचाग्नि इसे जला रही है।

ਕੋਇਲੇ ਪਾਪ ਪੜੇ ਤਿਸੁ ਊਪਰਿ ਮਨੁ ਜਲਿਆ ਸੰਨੑੀ ਚਿੰਤ ਭਈ ॥੩॥
कोइले पाप पड़े तिसु ऊपरि मनु जलिआ संन्ही चिंत भई ॥३॥
पाप रूपी कोयले इसके ऊपर पड़े हुए हैं, यह मन जल रहा है और तेरी चिंता छोटी चिमटी बनी हुई है॥ ३॥

ਭਇਆ ਮਨੂਰੁ ਕੰਚਨੁ ਫਿਰਿ ਹੋਵੈ ਜੇ ਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤਿਨੇਹਾ ॥
भइआ मनूरु कंचनु फिरि होवै जे गुरु मिलै तिनेहा ॥
यदि गुरु मिल जाए तो लोहा रूपी मन स्वर्ण हो सकता है।

ਏਕੁ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਓਹੁ ਦੇਵੈ ਤਉ ਨਾਨਕ ਤ੍ਰਿਸਟਸਿ ਦੇਹਾ ॥੪॥੩॥
एकु नामु अम्रितु ओहु देवै तउ नानक त्रिसटसि देहा ॥४॥३॥
हे नानक ! यदि वह तुझे नामामृत प्रदान कर दे तो तेरे शरीर में रहने वाला मन स्थिर हो सकता है।४॥ ३॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
मारू महला १ ॥
मारू महला १॥

ਬਿਮਲ ਮਝਾਰਿ ਬਸਸਿ ਨਿਰਮਲ ਜਲ ਪਦਮਨਿ ਜਾਵਲ ਰੇ ॥
बिमल मझारि बससि निरमल जल पदमनि जावल रे ॥
कमल का फूल एवं पानी का मलिन जाला यह दोनों ही सरोवर के निर्मल जल में रहते हैं।

ਪਦਮਨਿ ਜਾਵਲ ਜਲ ਰਸ ਸੰਗਤਿ ਸੰਗਿ ਦੋਖ ਨਹੀ ਰੇ ॥੧॥
पदमनि जावल जल रस संगति संगि दोख नही रे ॥१॥
कमल का फूल पानी के मलिन जाले एवं अमृतमयी जल इन दोनों की संगत में रहता है परन्तु उसे उनकी संगत करने से कोई दोष नहीं लगता॥ १॥

ਦਾਦਰ ਤੂ ਕਬਹਿ ਨ ਜਾਨਸਿ ਰੇ ॥
दादर तू कबहि न जानसि रे ॥
हे मेंढक ! तू कभी नहीं समझता।

ਭਖਸਿ ਸਿਬਾਲੁ ਬਸਸਿ ਨਿਰਮਲ ਜਲ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨ ਲਖਸਿ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
भखसि सिबालु बससि निरमल जल अम्रितु न लखसि रे ॥१॥ रहाउ ॥
तू निर्मल जल में रहता है परन्तु पानी के मलिन जाले को खाता रहता है, तू अमृत रूपी जल के महत्व को नहीं जानता॥ १॥ रहाउ॥

ਬਸੁ ਜਲ ਨਿਤ ਨ ਵਸਤ ਅਲੀਅਲ ਮੇਰ ਚਚਾ ਗੁਨ ਰੇ ॥
बसु जल नित न वसत अलीअल मेर चचा गुन रे ॥
चाहे तू नित्य ही जल में रहता है,भँवरा जल में नहीं रहता परन्तु वह फूल का रस ऊपर से ही चूसता रहता है।

ਚੰਦ ਕੁਮੁਦਨੀ ਦੂਰਹੁ ਨਿਵਸਸਿ ਅਨਭਉ ਕਾਰਨਿ ਰੇ ॥੨॥
चंद कुमुदनी दूरहु निवससि अनभउ कारनि रे ॥२॥
अपने मन के ज्ञान के कारण कुमुदिनी चाँद को दूर से देखकर ही अपना शीश झुका देती है॥ २॥

ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਖੰਡੁ ਦੂਧਿ ਮਧੁ ਸੰਚਸਿ ਤੂ ਬਨ ਚਾਤੁਰ ਰੇ ॥
अम्रित खंडु दूधि मधु संचसि तू बन चातुर रे ॥
हे मेंढक ! तू बुद्धिमान बन जा, तुझे ज्ञान नहीं कि चीनी, दूध एवं शहद से मधुर अमृतमयी रस पदार्थ बन जाते हैं।

ਅਪਨਾ ਆਪੁ ਤੂ ਕਬਹੁ ਨ ਛੋਡਸਿ ਪਿਸਨ ਪ੍ਰੀਤਿ ਜਿਉ ਰੇ ॥੩॥
अपना आपु तू कबहु न छोडसि पिसन प्रीति जिउ रे ॥३॥
जैसे जोंक थन से चिपक कर दुग्ध की बजाय रक्त चूषण करती है, वैसे ही तू भी कीचड़ की गंदगी खाने का अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ता॥ ३॥

ਪੰਡਿਤ ਸੰਗਿ ਵਸਹਿ ਜਨ ਮੂਰਖ ਆਗਮ ਸਾਸ ਸੁਨੇ ॥
पंडित संगि वसहि जन मूरख आगम सास सुने ॥
जैसे मूर्ख आदमी विद्वान पण्डितों से वेद-शास्त्र सुनता रहता है, परन्तु शिक्षा को ग्रहण न करने के कारण फिर भी वह ज्ञानहीन ही बना रहता है,

ਅਪਨਾ ਆਪੁ ਤੂ ਕਬਹੁ ਨ ਛੋਡਸਿ ਸੁਆਨ ਪੂਛਿ ਜਿਉ ਰੇ ॥੪॥
अपना आपु तू कबहु न छोडसि सुआन पूछि जिउ रे ॥४॥
जैसे कुत्ते की दुम सदा टेढ़ी ही रहती है, वैसे ही तू भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ता॥ ४॥

ਇਕਿ ਪਾਖੰਡੀ ਨਾਮਿ ਨ ਰਾਚਹਿ ਇਕਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਰੇ ॥
इकि पाखंडी नामि न राचहि इकि हरि हरि चरणी रे ॥
पाखण्डी लोग परमात्मा का नाम नहीं जपते किन्तु भक्तजन भगवान के चरणों में ही रत रहते हैं।

ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਪਾਵਸਿ ਨਾਨਕ ਰਸਨਾ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਰੇ ॥੫॥੪॥
पूरबि लिखिआ पावसि नानक रसना नामु जपि रे ॥५॥४॥
हे नानक ! प्रत्येक जीव पूर्व जन्म में किए कमों का फल प्राप्त करता है, अतः अपनी जीभ से हरि-नाम का जाप करते रहो॥ ५॥ ४॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
मारू महला १ ॥
मारू महला १॥

ਸਲੋਕੁ ॥
सलोकु ॥
श्लोक॥

ਪਤਿਤ ਪੁਨੀਤ ਅਸੰਖ ਹੋਹਿ ਹਰਿ ਚਰਨੀ ਮਨੁ ਲਾਗ ॥
पतित पुनीत असंख होहि हरि चरनी मनु लाग ॥
भगवान के चरणों में मन लगाने से असंख्य पापी जीव पावन हो गए हैं।

ਅਠਸਠਿ ਤੀਰਥ ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਭ ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗ ॥੧॥
अठसठि तीरथ नामु प्रभ नानक जिसु मसतकि भाग ॥१॥
हे नानक ! प्रभु का नाम अड़सठ तीर्थ के (पुण्य-फल के) समान है, जिसका उत्तम भाग्य है, उसे ही यह मिला है॥ १॥

ਸਬਦੁ ॥
सबदु ॥
शब्द॥

ਸਖੀ ਸਹੇਲੀ ਗਰਬਿ ਗਹੇਲੀ ॥
सखी सहेली गरबि गहेली ॥
हे अभिमानी सखी !

ਸੁਣਿ ਸਹ ਕੀ ਇਕ ਬਾਤ ਸੁਹੇਲੀ ॥੧॥
सुणि सह की इक बात सुहेली ॥१॥
मालिक की सुखदायक बात सुन॥ १॥

ਜੋ ਮੈ ਬੇਦਨ ਸਾ ਕਿਸੁ ਆਖਾ ਮਾਈ ॥
जो मै बेदन सा किसु आखा माई ॥
हे माँ! अपने मन की वेदना में किसे कहकर सुनाऊँ ?

ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਜੀਉ ਨ ਰਹੈ ਕੈਸੇ ਰਾਖਾ ਮਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हरि बिनु जीउ न रहै कैसे राखा माई ॥१॥ रहाउ ॥
हरि के बिना मैं रह नहीं सकती, फिर इन प्राणों को कैसे बचाऊँ ?॥ १॥ रहाउ॥

ਹਉ ਦੋਹਾਗਣਿ ਖਰੀ ਰੰਞਾਣੀ ॥
हउ दोहागणि खरी रंञाणी ॥
मैं दुहागिन बहुत ही दुखी हूँ।

ਗਇਆ ਸੁ ਜੋਬਨੁ ਧਨ ਪਛੁਤਾਣੀ ॥੨॥
गइआ सु जोबनु धन पछुताणी ॥२॥
जब जीव रूपी नारी का यौवन बीत गया तो उसे बड़ा पछतावा हुआ॥ २॥

ਤੂ ਦਾਨਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਿਰਿ ਮੇਰਾ ॥
तू दाना साहिबु सिरि मेरा ॥
हे परमेश्वर ! तू मेरा चतुंर मालिक है, मैं तेरा सेवक हूँ,

ਖਿਜਮਤਿ ਕਰੀ ਜਨੁ ਬੰਦਾ ਤੇਰਾ ॥੩॥
खिजमति करी जनु बंदा तेरा ॥३॥
इसलिए तेरी ही खिदमत करता हूँ॥ ३॥

ਭਣਤਿ ਨਾਨਕੁ ਅੰਦੇਸਾ ਏਹੀ ॥
भणति नानकु अंदेसा एही ॥
नानक कहते हैं कि मुझे एक यही चिंता है कि

ਬਿਨੁ ਦਰਸਨ ਕੈਸੇ ਰਵਉ ਸਨੇਹੀ ॥੪॥੫॥
बिनु दरसन कैसे रवउ सनेही ॥४॥५॥
प्रभु-दर्शन के बिना कैसे आनंद प्राप्त करूँ ॥४॥५॥

error: Content is protected !!