Hindi Page 711

ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਅਜੂਨੀ ਸੈਭੰ ਗੁਰਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
परमात्मा एक है, उसका नाम सत्य है। वह सृष्टि का रचयिता सर्वशक्तिमान है। उसमें किसी तरह का भय व्याप्त नहीं है, उसकी किसी से शत्रुता नहीं, वह कालातीत, अजन्मा एवं स्वयंभू है और गुरु-कृपा से उसे पाया जा सकता है।

ਰਾਗੁ ਟੋਡੀ ਮਹਲਾ ੪ ਘਰੁ ੧ ॥
रागु टोडी महला ४ घरु १ ॥
रागु टोडी महला ४ घरु १ ॥

ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਰਹਿ ਨ ਸਕੈ ਮਨੁ ਮੇਰਾ ॥
हरि बिनु रहि न सकै मनु मेरा ॥
भगवान के बिना मेरा यह मन रह नहीं सकता।

ਮੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮ ਪ੍ਰਾਨ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਬਹੁਰਿ ਨ ਭਵਜਲਿ ਫੇਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
मेरे प्रीतम प्रान हरि प्रभु गुरु मेले बहुरि न भवजलि फेरा ॥१॥ रहाउ ॥
यदि गुरु मुझे प्राणपति प्रियतम हरि-प्रभु से मिला दे तो इस संसार-सागर में पुनः जन्म लेकर आना नहीं पड़ेगा ॥१॥ रहाउ ॥

ਮੇਰੈ ਹੀਅਰੈ ਲੋਚ ਲਗੀ ਪ੍ਰਭ ਕੇਰੀ ਹਰਿ ਨੈਨਹੁ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਹੇਰਾ ॥
मेरै हीअरै लोच लगी प्रभ केरी हरि नैनहु हरि प्रभ हेरा ॥
मेरे मन में प्रभु-मिलन की तीव्र लालसा लगी हुई है और अपनी आंखों से हरि-प्रभु को ही देखता रहता हूँ।

ਸਤਿਗੁਰਿ ਦਇਆਲਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ਹਰਿ ਪਾਧਰੁ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਕੇਰਾ ॥੧॥
सतिगुरि दइआलि हरि नामु द्रिड़ाइआ हरि पाधरु हरि प्रभ केरा ॥१॥
दयालु, सतगुरु ने मेरे मन में परमात्मा का नाम दृढ़ कर दिया है। चूंकि हरि-प्रभु की प्राप्ति का यह नाम रूपी मार्ग ही सुगम है ॥१॥

ਹਰਿ ਰੰਗੀ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਭ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਗੋਵਿੰਦ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਕੇਰਾ ॥
हरि रंगी हरि नामु प्रभ पाइआ हरि गोविंद हरि प्रभ केरा ॥
मैंने प्रिय गोविन्द, हरि-प्रभु का हरि-नाम प्राप्त किया है।

ਹਰਿ ਹਿਰਦੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਮੀਠਾ ਲਾਗਾ ਮੁਖਿ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ਚੰਗੇਰਾ ॥੨॥
हरि हिरदै मनि तनि मीठा लागा मुखि मसतकि भागु चंगेरा ॥२॥
हरि का नाम मेरे हृदय, मन एवं तन को बड़ा मीठा लगता है। चूंकि मेरे मुख एवं माथे पर शुभ भाग्य जाग गया है॥२॥

ਲੋਭ ਵਿਕਾਰ ਜਿਨਾ ਮਨੁ ਲਾਗਾ ਹਰਿ ਵਿਸਰਿਆ ਪੁਰਖੁ ਚੰਗੇਰਾ ॥
लोभ विकार जिना मनु लागा हरि विसरिआ पुरखु चंगेरा ॥
जिनका मन लोभ एवं विकारों में लगा रहता है, उन्हें महान् परमपुरुष परमेश्वर विस्मृत ही रहता है।

ਓਇ ਮਨਮੁਖ ਮੂੜ ਅਗਿਆਨੀ ਕਹੀਅਹਿ ਤਿਨ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ਮੰਦੇਰਾ ॥੩॥
ओइ मनमुख मूड़ अगिआनी कहीअहि तिन मसतकि भागु मंदेरा ॥३॥
ऐसे व्यक्ति स्वेच्छाचारी, मूर्ख एवं अज्ञानी ही कहलाते हैं और उनके माथे पर भी दुर्भाग्य ही विद्यमान रहता है।॥३॥

ਬਿਬੇਕ ਬੁਧਿ ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈ ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਗੁਰੂ ਪ੍ਰਭ ਕੇਰਾ ॥
बिबेक बुधि सतिगुर ते पाई गुर गिआनु गुरू प्रभ केरा ॥
गुरु से ही मुझे विवेक बुद्धि प्राप्त हुई है और गुरु से ही प्रभु प्राप्ति का ज्ञान प्राप्त हुआ है।

ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਗੁਰੂ ਤੇ ਪਾਇਆ ਧੁਰਿ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ਲਿਖੇਰਾ ॥੪॥੧॥
जन नानक नामु गुरू ते पाइआ धुरि मसतकि भागु लिखेरा ॥४॥१॥
हे नानक ! गुरु से ही मुझे प्रभु नाम की प्राप्ति हुई क्योंकि प्रारम्भ से ही मेरे माथे पर ऐसा भाग्य लिखा हुआ था॥ ४॥ १॥

ਟੋਡੀ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੧ ਦੁਪਦੇ
टोडी महला ५ घरु १ दुपदे
टोडी महला ५ घरु १ दुपदे

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

ਸੰਤਨ ਅਵਰ ਨ ਕਾਹੂ ਜਾਨੀ ॥
संतन अवर न काहू जानी ॥
संत-महापुरुष परमात्मा के अलावा अन्य किसी को भी नहीं जानते।

ਬੇਪਰਵਾਹ ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਹਰਿ ਕੈ ਜਾ ਕੋ ਪਾਖੁ ਸੁਆਮੀ ॥ ਰਹਾਉ ॥
बेपरवाह सदा रंगि हरि कै जा को पाखु सुआमी ॥ रहाउ ॥
जगत का स्वामी जिनका भी पक्ष लेता हैं, वे हमेशा ही निश्चिंत होकर प्रभु के रंग में बेपरवाह हुए रहते हैं।॥ रहाउ॥

ਊਚ ਸਮਾਨਾ ਠਾਕੁਰ ਤੇਰੋ ਅਵਰ ਨ ਕਾਹੂ ਤਾਨੀ ॥
ऊच समाना ठाकुर तेरो अवर न काहू तानी ॥
हे ठाकुर जी ! तेरा नाम रूपी शामियाना सर्वोच्च है और तेरे अलावा अन्य कोई ताकतवर नहीं।

ਐਸੋ ਅਮਰੁ ਮਿਲਿਓ ਭਗਤਨ ਕਉ ਰਾਚਿ ਰਹੇ ਰੰਗਿ ਗਿਆਨੀ ॥੧॥
ऐसो अमरु मिलिओ भगतन कउ राचि रहे रंगि गिआनी ॥१॥
भक्तों को ऐसा हुक्म मिला है कि वे ज्ञानी बनकर प्रभु के रंग में ही मग्न रहते हैं।॥ १॥

ਰੋਗ ਸੋਗ ਦੁਖ ਜਰਾ ਮਰਾ ਹਰਿ ਜਨਹਿ ਨਹੀ ਨਿਕਟਾਨੀ ॥
रोग सोग दुख जरा मरा हरि जनहि नही निकटानी ॥
रोग, शोक, दु:ख, बुढ़ापा एवं मृत्यु भक्तजनों के निकट नहीं आते।

ਨਿਰਭਉ ਹੋਇ ਰਹੇ ਲਿਵ ਏਕੈ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਮਨੁ ਮਾਨੀ ॥੨॥੧॥
निरभउ होइ रहे लिव एकै नानक हरि मनु मानी ॥२॥१॥
हे नानक ! ऐसे भक्त निर्भीक होकर एक परमेश्वर में ही वृति लगाकर रखते हैं और उनका मन उसकी भक्ति में ही प्रसन्न रहता है। ॥२॥१॥

ਟੋਡੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
टोडी महला ५ ॥
टोडी महला ५ ॥

ਹਰਿ ਬਿਸਰਤ ਸਦਾ ਖੁਆਰੀ ॥
हरि बिसरत सदा खुआरी ॥
भगवान को विस्मृत करने से मनुष्य सदैव ही ख्वार होता रहता है।

ਤਾ ਕਉ ਧੋਖਾ ਕਹਾ ਬਿਆਪੈ ਜਾ ਕਉ ਓਟ ਤੁਹਾਰੀ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ता कउ धोखा कहा बिआपै जा कउ ओट तुहारी ॥ रहाउ ॥
हे परमेश्वर ! जिसे तुम्हारी शरण मिली हुई है, फिर वह कैसे धोखे का शिकार हो सकता है ॥ रहाउ ॥

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