ਹਰਿ ਸੁਆਮੀ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਤਿਨ ਮਿਲੇ ਜਿਨ ਲਿਖਿਆ ਧੁਰਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥
हरि सुआमी हरि प्रभु तिन मिले जिन लिखिआ धुरि हरि प्रीति ॥
जगत का स्वामी प्रभु उनको ही मिलता है, जिनके भाग्य में लिखा होता है।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗੁਰ ਬਚਨਿ ਜਪਿਓ ਮਨਿ ਚੀਤਿ ॥੧॥
जन नानक नामु धिआइआ गुर बचनि जपिओ मनि चीति ॥१॥
हे नानक ! गुरु के वचन से परमात्मा के नाम का ध्यान किया है और मन में उसी का जाप किया है॥ १॥
ਮਃ ੪ ॥
मः ४ ॥
महला ४॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸਜਣੁ ਲੋੜਿ ਲਹੁ ਭਾਗਿ ਵਸੈ ਵਡਭਾਗਿ ॥
हरि प्रभु सजणु लोड़ि लहु भागि वसै वडभागि ॥
सज्जन प्रभु को पा लो, यदि उत्तम भाग्य हो तो वह मन में बस जाता है।
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਦੇਖਾਲਿਆ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਲਿਵ ਲਾਗਿ ॥੨॥
गुरि पूरै देखालिआ नानक हरि लिव लागि ॥२॥
नानक फुरमाते हैं-पूर्ण गुरु ने परमात्मा के दर्शन करवाए हैं, अब उसी में लगन लगी हुई है॥ २॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਧਨੁ ਧਨੁ ਸੁਹਾਵੀ ਸਫਲ ਘੜੀ ਜਿਤੁ ਹਰਿ ਸੇਵਾ ਮਨਿ ਭਾਣੀ ॥
धनु धनु सुहावी सफल घड़ी जितु हरि सेवा मनि भाणी ॥
वह जीवन-घड़ी सफल, सुहावनी एवं धन्य है, जब ईश्वर की सेवा मन को अच्छी लगी।
ਹਰਿ ਕਥਾ ਸੁਣਾਵਹੁ ਮੇਰੇ ਗੁਰਸਿਖਹੁ ਮੇਰੇ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਅਕਥ ਕਹਾਣੀ ॥
हरि कथा सुणावहु मेरे गुरसिखहु मेरे हरि प्रभ अकथ कहाणी ॥
हे मेरे गुरु के शिष्यो ! मुझे हरि-कथा सुनाओ, उस प्रभु की कथा अकथनीय है।
ਕਿਉ ਪਾਈਐ ਕਿਉ ਦੇਖੀਐ ਮੇਰਾ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੁਘੜੁ ਸੁਜਾਣੀ ॥
किउ पाईऐ किउ देखीऐ मेरा हरि प्रभु सुघड़ु सुजाणी ॥
मेरा चतुर प्रभु क्योंकर पाया जाता है, क्योंकर उसके दर्शन होते हैं ?
ਹਰਿ ਮੇਲਿ ਦਿਖਾਏ ਆਪਿ ਹਰਿ ਗੁਰ ਬਚਨੀ ਨਾਮਿ ਸਮਾਣੀ ॥
हरि मेलि दिखाए आपि हरि गुर बचनी नामि समाणी ॥
वह स्वयं ही मिलाता है, स्वयं ही दर्शन करवाता है और गुरु के वचनों से जीव प्रभु में ही विलीन हो जाता है।
ਤਿਨ ਵਿਟਹੁ ਨਾਨਕੁ ਵਾਰਿਆ ਜੋ ਜਪਦੇ ਹਰਿ ਨਿਰਬਾਣੀ ॥੧੦॥
तिन विटहु नानकु वारिआ जो जपदे हरि निरबाणी ॥१०॥
हे नानक ! मैं उन लोगों पर कुर्बान जाता हूँ, जो ईश्वर का नाम जपते हैं॥ १०॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
सलोक मः ४ ॥
श्लोक महला ४॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਰਤੇ ਲੋਇਣਾ ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਗੁਰੁ ਦੇਇ ॥
हरि प्रभ रते लोइणा गिआन अंजनु गुरु देइ ॥
गुरु ने ज्ञान का सुरमा दिया तो ये आँखें प्रभु में ही लीन हो गई।
ਮੈ ਪ੍ਰਭੁ ਸਜਣੁ ਪਾਇਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਹਜਿ ਮਿਲੇਇ ॥੧॥
मै प्रभु सजणु पाइआ जन नानक सहजि मिलेइ ॥१॥
इस तरह हे नानक ! मैंने सहज स्वाभाविक ही सज्जन प्रभु को पा लिया॥ १॥
ਮਃ ੪ ॥
मः ४ ॥
महला ४॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਤਰਿ ਸਾਂਤਿ ਹੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥
गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥
गुरमुख के अन्तर्मन में सुख शान्ति बसी रहती है, उसके मन तन में हरिनाम समाया रहता है।
ਨਾਮੁ ਚਿਤਵੈ ਨਾਮੋ ਪੜੈ ਨਾਮਿ ਰਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
नामु चितवै नामो पड़ै नामि रहै लिव लाइ ॥
वह नाम का चिन्तन करता है, हरिनाम का पठन करता है और नाम में ही ध्यानशील रहता है।
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਈਐ ਚਿੰਤਾ ਗਈ ਬਿਲਾਇ ॥
नामु पदारथु पाईऐ चिंता गई बिलाइ ॥
हरिनाम पदार्थ पाने से सब चिन्ता दूर हो जाती है।
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਨਾਮੁ ਊਪਜੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਭੁਖ ਸਭ ਜਾਇ ॥
सतिगुरि मिलिऐ नामु ऊपजै त्रिसना भुख सभ जाइ ॥
यदि सतगुरु से मिलाप हो जाए तो ही हरिनाम उपजता है और तृष्णा-भूख सब दूर हो जाती है।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੇ ਰਤਿਆ ਨਾਮੋ ਪਲੈ ਪਾਇ ॥੨॥
नानक नामे रतिआ नामो पलै पाइ ॥२॥
हे नानक ! हरिनाम में तल्लीने रहने वाला ही नाम को पाता है॥ २॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਤੁਧੁ ਆਪੇ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇ ਕੈ ਤੁਧੁ ਆਪੇ ਵਸਗਤਿ ਕੀਤਾ ॥
तुधु आपे जगतु उपाइ कै तुधु आपे वसगति कीता ॥
हे प्रभु ! तूने जगत को उत्पन्न करके अपने वश में किया हुआ है।
ਇਕਿ ਮਨਮੁਖ ਕਰਿ ਹਾਰਾਇਅਨੁ ਇਕਨਾ ਮੇਲਿ ਗੁਰੂ ਤਿਨਾ ਜੀਤਾ ॥
इकि मनमुख करि हाराइअनु इकना मेलि गुरू तिना जीता ॥
किसी को स्वेच्छाचारी बनाकर जीवन में हरा दिया है और किसी को गुरु से मिलाकर जीवन-बाजी में जीत का हकदार बना दिया है।
ਹਰਿ ਊਤਮੁ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਨਾਮੁ ਹੈ ਗੁਰ ਬਚਨਿ ਸਭਾਗੈ ਲੀਤਾ ॥
हरि ऊतमु हरि प्रभ नामु है गुर बचनि सभागै लीता ॥
प्रभु का नाम उत्तम है और गुरु के वचन से कोई भाग्यशाली ही लेता है।
ਦੁਖੁ ਦਾਲਦੁ ਸਭੋ ਲਹਿ ਗਇਆ ਜਾਂ ਨਾਉ ਗੁਰੂ ਹਰਿ ਦੀਤਾ ॥
दुखु दालदु सभो लहि गइआ जां नाउ गुरू हरि दीता ॥
जब गुरु ने हरिनाम प्रदान किया तो दुख-दारिद्र सब दूर हो गए।
ਸਭਿ ਸੇਵਹੁ ਮੋਹਨੋ ਮਨਮੋਹਨੋ ਜਗਮੋਹਨੋ ਜਿਨਿ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇ ਸਭੋ ਵਸਿ ਕੀਤਾ ॥੧੧॥
सभि सेवहु मोहनो मनमोहनो जगमोहनो जिनि जगतु उपाइ सभो वसि कीता ॥११॥
सभी मन एवं जगत को मोहित करने वाले प्रभु का सुमिरन (स्मरण) करो, जिसने जगत को उत्पन्न करके सब जीवों को वश में किया हुआ है।॥ ११॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
सलोक मः ४ ॥
श्लोक महला ४॥
ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਹਉਮੈ ਰੋਗੁ ਹੈ ਭ੍ਰਮਿ ਭੂਲੇ ਮਨਮੁਖ ਦੁਰਜਨਾ ॥
मन अंतरि हउमै रोगु है भ्रमि भूले मनमुख दुरजना ॥
मन में अहंकार का रोग लगा होता है, जिस कारण दुष्ट स्वेच्छाचारी पथभ्रष्ट हो जाते हैं।
ਨਾਨਕ ਰੋਗੁ ਵਞਾਇ ਮਿਲਿ ਸਤਿਗੁਰ ਸਾਧੂ ਸਜਨਾ ॥੧॥
नानक रोगु वञाइ मिलि सतिगुर साधू सजना ॥१॥
नानक का फुरमान है कि जब सतगुरु, सज्जन साधु मिलता है तो यह रोग दूर हो जाता है॥ १॥
ਮਃ ੪ ॥
मः ४ ॥
महला ४॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਤਾਮਿ ਸਗਾਰਵਾ ਜਾਂ ਦੇਖਾ ਹਰਿ ਨੈਣੇ ॥
मनु तनु तामि सगारवा जां देखा हरि नैणे ॥
जब आँखों से प्रभु के दर्शन किए तो मन तन सुन्दर हो गया।
ਨਾਨਕ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਮੈ ਮਿਲੈ ਹਉ ਜੀਵਾ ਸਦੁ ਸੁਣੇ ॥੨॥
नानक सो प्रभु मै मिलै हउ जीवा सदु सुणे ॥२॥
हे नानक ! वह प्रभु मुझे मिल गया है, जिसका कीर्तन सुनकर मैं जीता हूँ॥ २॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਜਗੰਨਾਥ ਜਗਦੀਸਰ ਕਰਤੇ ਅਪਰੰਪਰ ਪੁਰਖੁ ਅਤੋਲੁ ॥
जगंनाथ जगदीसर करते अपर्मपर पुरखु अतोलु ॥
ईश्वर सम्पूर्ण जगत का मालिक है, वह जगदीश्वर प्रकृति का रचनहार है, परे से परे, परमपुरुष एवं अतुलनीय है।
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹੁ ਮੇਰੇ ਗੁਰਸਿਖਹੁ ਹਰਿ ਊਤਮੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਮੋਲੁ ॥
हरि नामु धिआवहु मेरे गुरसिखहु हरि ऊतमु हरि नामु अमोलु ॥
हे मेरे गुरु के शिष्यो ! हरिनाम का ध्यान करो, वह उत्तम एवं अमूल्य है।
ਜਿਨ ਧਿਆਇਆ ਹਿਰਦੈ ਦਿਨਸੁ ਰਾਤਿ ਤੇ ਮਿਲੇ ਨਹੀ ਹਰਿ ਰੋਲੁ ॥
जिन धिआइआ हिरदै दिनसु राति ते मिले नही हरि रोलु ॥
जिन्होंने हृदय में दिन-रात ध्यान किया है, वे प्रभु में मिल गए हैं, पथभ्रष्ट नहीं हुए।
ਵਡਭਾਗੀ ਸੰਗਤਿ ਮਿਲੈ ਗੁਰ ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰਾ ਬੋਲੁ ॥
वडभागी संगति मिलै गुर सतिगुर पूरा बोलु ॥
भाग्यशाली को संगत में पूर्ण गुरु का वचन मिलता है।
ਸਭਿ ਧਿਆਵਹੁ ਨਰ ਨਾਰਾਇਣੋ ਨਾਰਾਇਣੋ ਜਿਤੁ ਚੂਕਾ ਜਮ ਝਗੜੁ ਝਗੋਲੁ ॥੧੨॥
सभि धिआवहु नर नाराइणो नाराइणो जितु चूका जम झगड़ु झगोलु ॥१२॥
हे भक्तजनो ! सभी नारायण का भजन करो, जिसके फलस्वरूप यम का झगड़ा समाप्त हो जाता है॥ १२॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
सलोक मः ४ ॥
श्लोक महला ४॥
ਹਰਿ ਜਨ ਹਰਿ ਹਰਿ ਚਉਦਿਆ ਸਰੁ ਸੰਧਿਆ ਗਾਵਾਰ ॥
हरि जन हरि हरि चउदिआ सरु संधिआ गावार ॥
हरि-भक्त हरि भजन में लीन रहता है, यदि कोई मूर्ख तीर का निशाना छोड़ता है,
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਜਨ ਹਰਿ ਲਿਵ ਉਬਰੇ ਜਿਨ ਸੰਧਿਆ ਤਿਸੁ ਫਿਰਿ ਮਾਰ ॥੧॥
नानक हरि जन हरि लिव उबरे जिन संधिआ तिसु फिरि मार ॥१॥
नानक फुरमान करते हैं कि हरि-भक्ति में लीन भक्त तो इससे बच जाता है, परन्तु निशाना लगाने वाला स्वयं ही मौत की लपेट में आ जाता है।॥ १॥