ਸਗਲ ਦੂਖ ਕਾ ਹੋਇਆ ਨਾਸੁ ॥੨॥
सगल दूख का होइआ नासु ॥२॥
तमाम दुःख-कलेश नष्ट हो जाते हैं। २॥
ਆਸਾ ਮਾਣੁ ਤਾਣੁ ਧਨੁ ਏਕ ॥
आसा माणु ताणु धनु एक ॥
एक ईश्वर ही मेरी आशा, प्रतिष्ठा, बल एवं धन है।
ਸਾਚੇ ਸਾਹ ਕੀ ਮਨ ਮਹਿ ਟੇਕ ॥੩॥
साचे साह की मन महि टेक ॥३॥
मेरे हृदय में सच्चे साहूकार का ही सहारा है॥ ३ ॥
ਮਹਾ ਗਰੀਬ ਜਨ ਸਾਧ ਅਨਾਥ ॥
महा गरीब जन साध अनाथ ॥
हे नानक ! परमात्मा के संतों का मैं एक महा निर्धन एवं अनाथ सेवक हूँ।
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭਿ ਰਾਖੇ ਦੇ ਹਾਥ ॥੪॥੮੫॥੧੫੪॥
नानक प्रभि राखे दे हाथ ॥४॥८५॥१५४॥
परन्तु ईश्वर ने अपना हाथ देकर मेरी रक्षा की है ॥४॥८५॥१५४॥
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਮਜਨੁ ਕਰਿ ਸੂਚੇ ॥
हरि हरि नामि मजनु करि सूचे ॥
हरि-परमेश्वर के नाम (तीर्थ) में स्नान करने से मैं पवित्र हो गया हूँ।
ਕੋਟਿ ਗ੍ਰਹਣ ਪੁੰਨ ਫਲ ਮੂਚੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
कोटि ग्रहण पुंन फल मूचे ॥१॥ रहाउ ॥
नाम-तीर्थ में स्नान करने से करोड़ों ग्रहणों के समय किए दान-पुण्य से भी अधिक फल प्राप्त होता है॥ १॥ रहाउ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਚਰਣ ਰਿਦੇ ਮਹਿ ਬਸੇ ॥
हरि के चरण रिदे महि बसे ॥
यदि भगवान के सुन्दर चरण हृदय में निवास कर जाएँ तो
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਵਿਖ ਨਸੇ ॥੧॥
जनम जनम के किलविख नसे ॥१॥
जन्म-जन्मांतरों के पाप नाश हो जाते हैं।॥ १॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਕੀਰਤਨ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ॥
साधसंगि कीरतन फलु पाइआ ॥
सत्संग में ईश्वर का भजन गायन करने का फल मुझे मिल गया है
ਜਮ ਕਾ ਮਾਰਗੁ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਨ ਆਇਆ ॥੨॥
जम का मारगु द्रिसटि न आइआ ॥२॥
और इसलिए मृत्यु का मार्ग दृष्टिगोचर नहीं होता।॥ २ ॥
ਮਨ ਬਚ ਕ੍ਰਮ ਗੋਵਿੰਦ ਅਧਾਰੁ ॥
मन बच क्रम गोविंद अधारु ॥
जो व्यक्ति अपने मन, वचन एवं कर्म का आधार गोविन्द के नाम को बना लेता है,
ਤਾ ਤੇ ਛੁਟਿਓ ਬਿਖੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥੩॥
ता ते छुटिओ बिखु संसारु ॥३॥
वह विषैले भवसागर से पार हो जाता है॥ ३ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਨੋ ਅਪਨਾ ॥
करि किरपा प्रभि कीनो अपना ॥
हे नानक ! भगवान ने जिस व्यक्ति को अपनी कृपा करके अपना बना लिया है,
ਨਾਨਕ ਜਾਪੁ ਜਪੇ ਹਰਿ ਜਪਨਾ ॥੪॥੮੬॥੧੫੫॥
नानक जापु जपे हरि जपना ॥४॥८६॥१५५॥
वह सदा प्रभु का जाप जपता है और प्रभु का भजन करता रहता हैं।॥४॥८६॥१५५॥
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਪਉ ਸਰਣਾਈ ਜਿਨਿ ਹਰਿ ਜਾਤੇ ॥
पउ सरणाई जिनि हरि जाते ॥
हे जीव ! जिन्होंने भगवान को समझ लिया है, उनकी शरण में पड़े रहो।
ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਚਰਣ ਹਰਿ ਰਾਤੇ ॥੧॥
मनु तनु सीतलु चरण हरि राते ॥१॥
भगवान के चरणों में मग्न होने से मन एवं तन शीतल हो जाते हैं।॥ १॥
ਭੈ ਭੰਜਨ ਪ੍ਰਭ ਮਨਿ ਨ ਬਸਾਹੀ ॥
भै भंजन प्रभ मनि न बसाही ॥
जो व्यक्ति भयनाशक प्रभु को अपने मन में नहीं बसाता,
ਡਰਪਤ ਡਰਪਤ ਜਨਮ ਬਹੁਤੁ ਜਾਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
डरपत डरपत जनम बहुतु जाही ॥१॥ रहाउ ॥
उसके अनेक जन्म इसी आतंक-भय में कांपते हुए बीत जाते हैं।॥ १॥ रहाउ॥
ਜਾ ਕੈ ਰਿਦੈ ਬਸਿਓ ਹਰਿ ਨਾਮ ॥
जा कै रिदै बसिओ हरि नाम ॥
जिसके हृदय में प्रभु का नाम निवास करता है,
ਸਗਲ ਮਨੋਰਥ ਤਾ ਕੇ ਪੂਰਨ ਕਾਮ ॥੨॥
सगल मनोरथ ता के पूरन काम ॥२॥
उसकी तमाम मनोकामनाएँ एवं कार्य सम्पूर्ण हो जाते हैं।॥ २॥
ਜਨਮੁ ਜਰਾ ਮਿਰਤੁ ਜਿਸੁ ਵਾਸਿ ॥
जनमु जरा मिरतु जिसु वासि ॥
जिसके वश में जन्म, बुढ़ापा एवं मृत्यु है
ਸੋ ਸਮਰਥੁ ਸਿਮਰਿ ਸਾਸਿ ਗਿਰਾਸਿ ॥੩॥
सो समरथु सिमरि सासि गिरासि ॥३॥
उस सर्वशक्तिमान प्रभु को अपने हर श्वास एवं ग्रास से स्मरण करता रह॥ ३॥
ਮੀਤੁ ਸਾਜਨੁ ਸਖਾ ਪ੍ਰਭੁ ਏਕ ॥
मीतु साजनु सखा प्रभु एक ॥
हे नानक ! एक ईश्वर ही हमारा मित्र, साजन और साथी है।
ਨਾਮੁ ਸੁਆਮੀ ਕਾ ਨਾਨਕ ਟੇਕ ॥੪॥੮੭॥੧੫੬॥
नामु सुआमी का नानक टेक ॥४॥८७॥१५६॥
जगत् के स्वामी प्रभु का नाम ही उसका एकमात्र सहारा है॥ ४ ॥ ८७ ॥ १५६ ॥
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਬਾਹਰਿ ਰਾਖਿਓ ਰਿਦੈ ਸਮਾਲਿ ॥
बाहरि राखिओ रिदै समालि ॥
संतजन संसार के साथ लोक-व्यवहार करते हुए गोविन्द को अपने मन में बसाकर रखते हैं।
ਘਰਿ ਆਏ ਗੋਵਿੰਦੁ ਲੈ ਨਾਲਿ ॥੧॥
घरि आए गोविंदु लै नालि ॥१॥
घर को लौटते हुए वह उसको साथ लेकर आते हैं।॥ १॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸੰਤਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ॥
हरि हरि नामु संतन कै संगि ॥
हरि-परमेश्वर का नाम संतजनों का साथी है।
ਮਨੁ ਤਨੁ ਰਾਤਾ ਰਾਮ ਕੈ ਰੰਗਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
मनु तनु राता राम कै रंगि ॥१॥ रहाउ ॥
उनका मन एवं तन राम के प्रेम रंग में ही मग्न रहता है॥ १॥ रहाउ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਾਗਰੁ ਤਰਿਆ ॥
गुर परसादी सागरु तरिआ ॥
गुरु की कृपा से संसार सागर से पार हुआ जा सकता है
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਵਿਖ ਸਭਿ ਹਿਰਿਆ ॥੨॥
जनम जनम के किलविख सभि हिरिआ ॥२॥
और जन्म-जन्मांतरों के तमाम पाप नाश हो जाते हैं।॥ २॥
ਸੋਭਾ ਸੁਰਤਿ ਨਾਮਿ ਭਗਵੰਤੁ ॥
सोभा सुरति नामि भगवंतु ॥
भगवान के नाम से ही मनुष्य को शोभा एवं सुरति प्राप्त होती है।
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕਾ ਨਿਰਮਲ ਮੰਤੁ ॥੩॥
पूरे गुर का निरमल मंतु ॥३॥
पूर्ण गुरु का नाम-मंत्र सदैव निर्मल है॥ ३॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਹਿਰਦੇ ਮਹਿ ਜਾਪੁ ॥
चरण कमल हिरदे महि जापु ॥
भगवान के चरण-कमलों का हृदय में भजन कर।
ਨਾਨਕੁ ਪੇਖਿ ਜੀਵੈ ਪਰਤਾਪੁ ॥੪॥੮੮॥੧੫੭॥
नानकु पेखि जीवै परतापु ॥४॥८८॥१५७॥
नानक तो उस ईश्वर का प्रताप देखकर जीवन प्राप्त करता है ॥४॥८८॥१५७॥
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਧੰਨੁ ਇਹੁ ਥਾਨੁ ਗੋਵਿੰਦ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥
धंनु इहु थानु गोविंद गुण गाए ॥
वह स्थान बड़ा धन्य है, जहाँ गोविन्द की गुणस्तुति की जाती है।
ਕੁਸਲ ਖੇਮ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਬਸਾਏ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
कुसल खेम प्रभि आपि बसाए ॥१॥ रहाउ ॥
प्रभु स्वयं उनको सुख व आनंद में (कुशलक्षेम) बसाता है॥ १॥ रहाउ ॥
ਬਿਪਤਿ ਤਹਾ ਜਹਾ ਹਰਿ ਸਿਮਰਨੁ ਨਾਹੀ ॥
बिपति तहा जहा हरि सिमरनु नाही ॥
जहाँ प्रभु का भजन नहीं होता है, वहाँ विपदा विद्यमान है।
ਕੋਟਿ ਅਨੰਦ ਜਹ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਹੀ ॥੧॥
कोटि अनंद जह हरि गुन गाही ॥१॥
यहाँ करोड़ों ही आनंद हैं, जहाँ भगवान की महिमा का गायन किया जाता है॥ १॥
ਹਰਿ ਬਿਸਰਿਐ ਦੁਖ ਰੋਗ ਘਨੇਰੇ ॥
हरि बिसरिऐ दुख रोग घनेरे ॥
प्रभु को विस्मृत करने से मनुष्य को अधिकतर दुख एवं रोग लग जाते हैं।
ਪ੍ਰਭ ਸੇਵਾ ਜਮੁ ਲਗੈ ਨ ਨੇਰੇ ॥੨॥
प्रभ सेवा जमु लगै न नेरे ॥२॥
प्रभु की सेवा-भक्ति के फलस्वरूप यमदूत प्राणी के निकट नहीं आता ॥ २॥
ਸੋ ਵਡਭਾਗੀ ਨਿਹਚਲ ਥਾਨੁ ॥
सो वडभागी निहचल थानु ॥
वह स्थान सौभाग्यशाली एवं अटल है,
ਜਹ ਜਪੀਐ ਪ੍ਰਭ ਕੇਵਲ ਨਾਮੁ ॥੩॥
जह जपीऐ प्रभ केवल नामु ॥३॥
जहाँ केवल प्रभु के नाम का ही जाप होता रहता है।॥ ३॥
ਜਹ ਜਾਈਐ ਤਹ ਨਾਲਿ ਮੇਰਾ ਸੁਆਮੀ ॥
जह जाईऐ तह नालि मेरा सुआमी ॥
जहाँ कहीं भी मैं जाता हूँ, वहाँ मेरा स्वामी मेरे साथ होता है।
ਨਾਨਕ ਕਉ ਮਿਲਿਆ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥੪॥੮੯॥੧੫੮॥
नानक कउ मिलिआ अंतरजामी ॥४॥८९॥१५८॥
नानक को अन्तर्यामी प्रभु मिल गया है॥ ४॥ ८९ ॥ १५८॥
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਜੋ ਪ੍ਰਾਣੀ ਗੋਵਿੰਦੁ ਧਿਆਵੈ ॥
जो प्राणी गोविंदु धिआवै ॥
जो प्राणी गोविन्द का ध्यान करता है,
ਪੜਿਆ ਅਣਪੜਿਆ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵੈ ॥੧॥
पड़िआ अणपड़िआ परम गति पावै ॥१॥
वह चाहे विद्वान हो अथवा अनपढ़-वह परमगति प्राप्त कर लेता है॥ १॥
ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਸਿਮਰਿ ਗੋਪਾਲ ॥
साधू संगि सिमरि गोपाल ॥
हे भाई ! संतों की सभा में रहकर गोपाल का सिमरन करो,
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਝੂਠਾ ਧਨੁ ਮਾਲੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
बिनु नावै झूठा धनु मालु ॥१॥ रहाउ ॥
क्योंकि नाम के बिना धन-दौलत एवं सम्पत्ति सब झूठे हैं॥ १॥ रहाउ॥