ਵਡਭਾਗੀ ਮਿਲੁ ਰਾਮਾ ॥੧॥
वडभागी मिलु रामा ॥१॥
हे सौभाग्यशाली ! राम से मिल॥ १॥
ਗੁਰੁ ਜੋਗੀ ਪੁਰਖੁ ਮਿਲਿਆ ਰੰਗੁ ਮਾਣੀ ਜੀਉ ॥
गुरु जोगी पुरखु मिलिआ रंगु माणी जीउ ॥
मैं, योगी गुरु परमेश्वर से मिल गया हूँ और उसके रंग में आनंद प्राप्त करता हूँ।
ਗੁਰੁ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਰਤੜਾ ਸਦਾ ਨਿਰਬਾਣੀ ਜੀਉ ॥
गुरु हरि रंगि रतड़ा सदा निरबाणी जीउ ॥
गुरु परमेश्वर के प्रेम में मग्न रहता है और सदैव पावन-पवित्र है।
ਵਡਭਾਗੀ ਮਿਲੁ ਸੁਘੜ ਸੁਜਾਣੀ ਜੀਉ ॥
वडभागी मिलु सुघड़ सुजाणी जीउ ॥
सौभाग्य से मैं चतुर एवं सर्वज्ञ प्रभु से मिल गया हूँ।
ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਤਨੁ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਭਿੰਨਾ ॥੨॥
मेरा मनु तनु हरि रंगि भिंना ॥२॥
मेरा मन एवं तन परमेश्वर के रंग में मग्न है। ॥२॥
ਆਵਹੁ ਸੰਤਹੁ ਮਿਲਿ ਨਾਮੁ ਜਪਾਹਾ ॥
आवहु संतहु मिलि नामु जपाहा ॥
हे संतजनों! आओ हम मिलकर प्रभु के नाम का जाप करें।
ਵਿਚਿ ਸੰਗਤਿ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਲੈ ਲਾਹਾ ਜੀਉ ॥
विचि संगति नामु सदा लै लाहा जीउ ॥
हम सत्संगति में मिलकर सदैव नाम रूपी लाभ प्राप्त करें।
ਕਰਿ ਸੇਵਾ ਸੰਤਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਮੁਖਿ ਪਾਹਾ ਜੀਉ ॥
करि सेवा संता अम्रितु मुखि पाहा जीउ ॥
संतों की सेवा करके हम अपने मुख में नाम रूपी अमृत डालें।
ਮਿਲੁ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਅੜੇ ਧੁਰਿ ਕਰਮਾ ॥੩॥
मिलु पूरबि लिखिअड़े धुरि करमा ॥३॥
प्रारम्भ से किस्मत में पूर्व कर्मों के लिखे लेखों अनुसार प्रभु से जा मिलो। ॥३॥
ਸਾਵਣਿ ਵਰਸੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤਿ ਜਗੁ ਛਾਇਆ ਜੀਉ ॥
सावणि वरसु अम्रिति जगु छाइआ जीउ ॥
श्रावण के महीने में नाम अमृत वाला बादल जगत् पर छाया हुआ है।
ਮਨੁ ਮੋਰੁ ਕੁਹੁਕਿਅੜਾ ਸਬਦੁ ਮੁਖਿ ਪਾਇਆ ॥
मनु मोरु कुहुकिअड़ा सबदु मुखि पाइआ ॥
नाम अमृत को चखकर मेरे मन का मोर प्रसन्न होकर चहचहाने लग गया।
ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਵੁਠੜਾ ਮਿਲਿਆ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ਜੀਉ ॥
हरि अम्रितु वुठड़ा मिलिआ हरि राइआ जीउ ॥
जब हरि-नाम रूपी अमृत मेरे हृदय में आ बसा तो मुझे प्रभु-परमेश्वर मिल गया।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰੇਮਿ ਰਤੰਨਾ ॥੪॥੧॥੨੭॥੬੫॥
जन नानक प्रेमि रतंना ॥४॥१॥२७॥६५॥
हे नानक ! मैं प्रभु की प्रीति में मग्न हो गया हूँ। ॥४॥१॥२७॥६५॥
ਗਉੜੀ ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੪ ॥
गउड़ी माझ महला ४ ॥
गउड़ी माझ महला ४ ॥
ਆਉ ਸਖੀ ਗੁਣ ਕਾਮਣ ਕਰੀਹਾ ਜੀਉ ॥
आउ सखी गुण कामण करीहा जीउ ॥
हे मेरी सत्संगी सखियों ! आओ, हम प्रभु को वश में करने के लिए शुभ गुणों के जादू-टोने तैयार करें और
ਮਿਲਿ ਸੰਤ ਜਨਾ ਰੰਗੁ ਮਾਣਿਹ ਰਲੀਆ ਜੀਉ ॥
मिलि संत जना रंगु माणिह रलीआ जीउ ॥
संतजनों से मिलकर हम प्रभु-प्रेम का सुख एवं आनंद भोगें।
ਗੁਰ ਦੀਪਕੁ ਗਿਆਨੁ ਸਦਾ ਮਨਿ ਬਲੀਆ ਜੀਉ ॥
गुर दीपकु गिआनु सदा मनि बलीआ जीउ ॥
मेरे हृदय में गुरु के ज्ञान का दीपक सदैव प्रज्वलित रहता है।
ਹਰਿ ਤੁਠੈ ਢੁਲਿ ਢੁਲਿ ਮਿਲੀਆ ਜੀਉ ॥੧॥
हरि तुठै ढुलि ढुलि मिलीआ जीउ ॥१॥
अति प्रसन्न एवं दया से कोमल होकर प्रभु मुझे मिल गया है॥ १॥
ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਪ੍ਰੇਮੁ ਲਗਾ ਹਰਿ ਢੋਲੇ ਜੀਉ ॥
मेरै मनि तनि प्रेमु लगा हरि ढोले जीउ ॥
मेरे मन एवं तन में प्रियतम प्रभु का प्रेम लगा हुआ है।
ਮੈ ਮੇਲੇ ਮਿਤ੍ਰੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਵੇਚੋਲੇ ਜੀਉ ॥
मै मेले मित्रु सतिगुरु वेचोले जीउ ॥
मेरी यही कामना है कि मध्यस्थ सतिगुरु मुझे मेरे प्रिय मित्र प्रभु से मिला दे।
ਮਨੁ ਦੇਵਾਂ ਸੰਤਾ ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਲੇ ਜੀਉ ॥
मनु देवां संता मेरा प्रभु मेले जीउ ॥
मैं अपना मन उन संतो को अर्पण कर दूँगा जो मुझे मेरे प्रभु से मिला देंगे।
ਹਰਿ ਵਿਟੜਿਅਹੁ ਸਦਾ ਘੋਲੇ ਜੀਉ ॥੨॥
हरि विटड़िअहु सदा घोले जीउ ॥२॥
प्रभु पर मैं सदैव कुर्बान जाताहूँ ॥ २॥
ਵਸੁ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰਿਆ ਵਸੁ ਮੇਰੇ ਗੋਵਿਦਾ ਹਰਿ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਮਨਿ ਵਸੁ ਜੀਉ ॥
वसु मेरे पिआरिआ वसु मेरे गोविदा हरि करि किरपा मनि वसु जीउ ॥
हे मेरे प्रिय गोविन्द! मेरे मन में आकर निवास करो। हे प्रभु! कृपा करके मेरे मन में आकर निवास करो।
ਮਨਿ ਚਿੰਦਿਅੜਾ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ਮੇਰੇ ਗੋਵਿੰਦਾ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਵੇਖਿ ਵਿਗਸੁ ਜੀਉ ॥
मनि चिंदिअड़ा फलु पाइआ मेरे गोविंदा गुरु पूरा वेखि विगसु जीउ ॥
हे मेरे गोविन्द! मुझे मनोवांछित फल मिल गया है। पूर्ण गुरु के दर्शन करके मैं अत्यंत प्रसन्न हो गई हूँ।
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਮਿਲਿਆ ਸੋਹਾਗਣੀ ਮੇਰੇ ਗੋਵਿੰਦਾ ਮਨਿ ਅਨਦਿਨੁ ਅਨਦੁ ਰਹਸੁ ਜੀਉ ॥
हरि नामु मिलिआ सोहागणी मेरे गोविंदा मनि अनदिनु अनदु रहसु जीउ ॥
हे मेरे गोविन्द! मुझे गुरु से हरि-नाम मिल गया है और मैं सुहागिन बन गई हूँ। अब मेरे मन में दिन-रात प्रसन्नता एवं आनंद बना रहता है।
ਹਰਿ ਪਾਇਅੜਾ ਵਡਭਾਗੀਈ ਮੇਰੇ ਗੋਵਿੰਦਾ ਨਿਤ ਲੈ ਲਾਹਾ ਮਨਿ ਹਸੁ ਜੀਉ ॥੩॥
हरि पाइअड़ा वडभागीई मेरे गोविंदा नित लै लाहा मनि हसु जीउ ॥३॥
हे मेरे गोविन्द! बड़े भाग्य से मैंने प्रभु को पाया है और मैं नित्य ही नाम रूपी लाभ प्राप्त करके अपने मन में मुस्कराती रहती हूँ॥ ३ ॥
ਹਰਿ ਆਪਿ ਉਪਾਏ ਹਰਿ ਆਪੇ ਵੇਖੈ ਹਰਿ ਆਪੇ ਕਾਰੈ ਲਾਇਆ ਜੀਉ ॥
हरि आपि उपाए हरि आपे वेखै हरि आपे कारै लाइआ जीउ ॥
भगवान ने स्वयं ही जीवों को उत्पन्न किया है और वह स्वयं ही उनकी देखभाल करता है। भगवान ने स्वयं ही जीवों को कामकाज में लगाया है।
ਇਕਿ ਖਾਵਹਿ ਬਖਸ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਇਕਨਾ ਫਕਾ ਪਾਇਆ ਜੀਉ ॥
इकि खावहि बखस तोटि न आवै इकना फका पाइआ जीउ ॥
कई प्रभु की नियामतें सेवन करते हैं, जिनमें कभी कमी नहीं आती और कइयों को केवल मुट्ठी भर दानों की मिलती है।
ਇਕਿ ਰਾਜੇ ਤਖਤਿ ਬਹਹਿ ਨਿਤ ਸੁਖੀਏ ਇਕਨਾ ਭਿਖ ਮੰਗਾਇਆ ਜੀਉ ॥
इकि राजे तखति बहहि नित सुखीए इकना भिख मंगाइआ जीउ ॥
भगवान ने कई जीवों को राजा बनाया है, वे राजसिंघासन पर विराजमान होते हैं और सदा ही सुखी रहते हैं और भगवान कई जीवों को भिखारी बनाकर उनसे दर-दर से भीख मंगवाता है।
ਸਭੁ ਇਕੋ ਸਬਦੁ ਵਰਤਦਾ ਮੇਰੇ ਗੋਵਿਦਾ ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਜੀਉ ॥੪॥੨॥੨੮॥੬੬॥
सभु इको सबदु वरतदा मेरे गोविदा जन नानक नामु धिआइआ जीउ ॥४॥२॥२८॥६६॥
हे मेरे गोविन्द ! सर्वत्र एक तेरा ही नाम विद्यमान है। हे नानक ! प्रभु का सेवक प्रभु नाम का ही ध्यान करता है ॥४॥२॥२८॥६६॥
ਗਉੜੀ ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੪ ॥
गउड़ी माझ महला ४ ॥
गउड़ी माझ महला ४ ॥
ਮਨ ਮਾਹੀ ਮਨ ਮਾਹੀ ਮੇਰੇ ਗੋਵਿੰਦਾ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਰਤਾ ਮਨ ਮਾਹੀ ਜੀਉ ॥
मन माही मन माही मेरे गोविंदा हरि रंगि रता मन माही जीउ ॥
हे मेरे गोविन्द! मैं अपने मन में ही हरि-रंग में मग्न हो गया हूँ।
ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਨਾਲਿ ਨ ਲਖੀਐ ਮੇਰੇ ਗੋਵਿਦਾ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਅਲਖੁ ਲਖਾਹੀ ਜੀਉ ॥
हरि रंगु नालि न लखीऐ मेरे गोविदा गुरु पूरा अलखु लखाही जीउ ॥
हरि रंग प्रत्येक जीव के भीतर उसके साथ ही रहता है परन्तु उसे देखा नहीं जा सकता। हे मेरे गोविन्द! पूर्ण गुरु ने मुझे अदृश्य प्रभु के दर्शन करा दिए हैं।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪਰਗਾਸਿਆ ਮੇਰੇ ਗੋਵਿੰਦਾ ਸਭ ਦਾਲਦ ਦੁਖ ਲਹਿ ਜਾਹੀ ਜੀਉ ॥
हरि हरि नामु परगासिआ मेरे गोविंदा सभ दालद दुख लहि जाही जीउ ॥
हे मेरे गोविन्द! जब गुरु ने मेरे हृदय में हरि-परमेश्वर के नाम का प्रकाश कर दिया तो मेरी दरिद्रता के तमाम दुख निवृत्त हो गए।
ਹਰਿ ਪਦੁ ਊਤਮੁ ਪਾਇਆ ਮੇਰੇ ਗੋਵਿੰਦਾ ਵਡਭਾਗੀ ਨਾਮਿ ਸਮਾਹੀ ਜੀਉ ॥੧॥
हरि पदु ऊतमु पाइआ मेरे गोविंदा वडभागी नामि समाही जीउ ॥१॥
हे मेरे गोविन्द! मैंने हरि-मिलन की उच्च पदवी प्राप्त कर ली है और बड़े भाग्य से मैं हरि के नाम में लीन हो गया हूँ। ॥१॥
ਨੈਣੀ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰਿਆ ਨੈਣੀ ਮੇਰੇ ਗੋਵਿਦਾ ਕਿਨੈ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਡਿਠੜਾ ਨੈਣੀ ਜੀਉ ॥
नैणी मेरे पिआरिआ नैणी मेरे गोविदा किनै हरि प्रभु डिठड़ा नैणी जीउ ॥
हे मेरे प्रिय गोविन्द! हरि-प्रभु को किसी विरले पुरुष ने ही अपने नेत्रों से देखा है।
ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਤਨੁ ਬਹੁਤੁ ਬੈਰਾਗਿਆ ਮੇਰੇ ਗੋਵਿੰਦਾ ਹਰਿ ਬਾਝਹੁ ਧਨ ਕੁਮਲੈਣੀ ਜੀਉ ॥
मेरा मनु तनु बहुतु बैरागिआ मेरे गोविंदा हरि बाझहु धन कुमलैणी जीउ ॥
हे मेरे गोविन्द! मेरा मन एवं तन तेरे विरह में वैराग्यवान हो गया है। मालिक-प्रभु के बिना मैं जीव-स्त्री बहुत उदास हो गई हूँ।