ਰਾਗੁ ਮਾਰੂ ਬਾਣੀ ਜੈਦੇਉ ਜੀਉ ਕੀ
रागु मारू बाणी जैदेउ जीउ की
रागु मारू बाणी जैदेउ जीउ की
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਚੰਦ ਸਤ ਭੇਦਿਆ ਨਾਦ ਸਤ ਪੂਰਿਆ ਸੂਰ ਸਤ ਖੋੜਸਾ ਦਤੁ ਕੀਆ ॥
चंद सत भेदिआ नाद सत पूरिआ सूर सत खोड़सा दतु कीआ ॥
चन्द्रमा स्वर द्वारा पूरक करके सातवाँ चक्र भेद दिया और सातवें चक्र में अनाहत नाद वज दिया, फिर सोलह बार ॐ का उच्चारण करके सूर्य स्वर द्वारा रेचक किया।
ਅਬਲ ਬਲੁ ਤੋੜਿਆ ਅਚਲ ਚਲੁ ਥਪਿਆ ਅਘੜੁ ਘੜਿਆ ਤਹਾ ਅਪਿਉ ਪੀਆ ॥੧॥
अबल बलु तोड़िआ अचल चलु थपिआ अघड़ु घड़िआ तहा अपिउ पीआ ॥१॥
जब मन के बल को तोड़कर उसे बलहीन कर दिया, भटकते मन को स्थिर किया और चंचल मन को सुन्दर बनाया तो ही मन ने नामामृत का पान किया।॥ १॥
ਮਨ ਆਦਿ ਗੁਣ ਆਦਿ ਵਖਾਣਿਆ ॥
मन आदि गुण आदि वखाणिआ ॥
हे मेरे मन ! जब जगत् के मूल परमेश्वर के गुणों का बखान किया तो
ਤੇਰੀ ਦੁਬਿਧਾ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਸੰਮਾਨਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तेरी दुबिधा द्रिसटि समानिआ ॥१॥ रहाउ ॥
तेरी दुविधा मिट गई और तेरी समदर्शी दृष्टि हो गई॥ १॥ रहाउ॥
ਅਰਧਿ ਕਉ ਅਰਧਿਆ ਸਰਧਿ ਕਉ ਸਰਧਿਆ ਸਲਲ ਕਉ ਸਲਲਿ ਸੰਮਾਨਿ ਆਇਆ ॥
अरधि कउ अरधिआ सरधि कउ सरधिआ सलल कउ सललि समानि आइआ ॥
जब आराधना योग्य परमेश्वर की आराधना की एवं श्रद्धेय प्रभु में श्रद्धा धारण की तो जैसे जल जल में विलीन हो जाता है, वैसे ही परम-सत्य में विलीन हो गया।
ਬਦਤਿ ਜੈਦੇਉ ਜੈਦੇਵ ਕਉ ਰੰਮਿਆ ਬ੍ਰਹਮੁ ਨਿਰਬਾਣੁ ਲਿਵ ਲੀਣੁ ਪਾਇਆ ॥੨॥੧॥
बदति जैदेउ जैदेव कउ रमिआ ब्रहमु निरबाणु लिव लीणु पाइआ ॥२॥१॥
जयदेव कहता है कि ब्रह्म का चिंतन करके निर्वाण पद पाया है और उसमें लिवलीन होकर उसे पा लिया है॥ २॥ १॥
ਕਬੀਰੁ ॥ ਮਾਰੂ ॥
कबीरु ॥ मारू ॥
कबीरु॥ मारू॥
ਰਾਮੁ ਸਿਮਰੁ ਪਛੁਤਾਹਿਗਾ ਮਨ ॥
रामु सिमरु पछुताहिगा मन ॥
हे मन ! राम का भजन-सुमिरन कर ले नहीं तो पछताएगा।
ਪਾਪੀ ਜੀਅਰਾ ਲੋਭੁ ਕਰਤੁ ਹੈ ਆਜੁ ਕਾਲਿ ਉਠਿ ਜਾਹਿਗਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
पापी जीअरा लोभु करतु है आजु कालि उठि जाहिगा ॥१॥ रहाउ ॥
पापी मन लोभ ही करता रहता है लेकिन आजकल में मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा॥ १॥ रहाउ॥
ਲਾਲਚ ਲਾਗੇ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ਮਾਇਆ ਭਰਮ ਭੁਲਾਹਿਗਾ ॥
लालच लागे जनमु गवाइआ माइआ भरम भुलाहिगा ॥
लालच में फँसकर तूने अपना जन्म व्यर्थ गंवा लिया है और माया के भ्रम ने तुझे भुलाया हुआ है।
ਧਨ ਜੋਬਨ ਕਾ ਗਰਬੁ ਨ ਕੀਜੈ ਕਾਗਦ ਜਿਉ ਗਲਿ ਜਾਹਿਗਾ ॥੧॥
धन जोबन का गरबु न कीजै कागद जिउ गलि जाहिगा ॥१॥
धन एवं यौवन का घमण्ड मत करो, तू कागज की तरह गल जाएगा॥ १॥
ਜਉ ਜਮੁ ਆਇ ਕੇਸ ਗਹਿ ਪਟਕੈ ਤਾ ਦਿਨ ਕਿਛੁ ਨ ਬਸਾਹਿਗਾ ॥
जउ जमु आइ केस गहि पटकै ता दिन किछु न बसाहिगा ॥
जब यम आकर केशों से पकड़कर तुझे पटका कर मारेगा, उस दिन तेरा कुछ भी वश नहीं चलना ।
ਸਿਮਰਨੁ ਭਜਨੁ ਦਇਆ ਨਹੀ ਕੀਨੀ ਤਉ ਮੁਖਿ ਚੋਟਾ ਖਾਹਿਗਾ ॥੨॥
सिमरनु भजनु दइआ नही कीनी तउ मुखि चोटा खाहिगा ॥२॥
तूने कभी भगवान् का भजन-सिमरन नहीं किया और न ही कभी जीवों पर दया की है, तब तू अपने मुँह पर चोटें ही खाएगा॥ २॥
ਧਰਮ ਰਾਇ ਜਬ ਲੇਖਾ ਮਾਗੈ ਕਿਆ ਮੁਖੁ ਲੈ ਕੈ ਜਾਹਿਗਾ ॥
धरम राइ जब लेखा मागै किआ मुखु लै कै जाहिगा ॥
जब धर्मराज तेरे कर्मों का लेखा-जोखा माँगेगा, तो तू क्या मुँह लेकर उसके पास जाएगा।
ਕਹਤੁ ਕਬੀਰੁ ਸੁਨਹੁ ਰੇ ਸੰਤਹੁ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਤਰਿ ਜਾਂਹਿਗਾ ॥੩॥੧॥
कहतु कबीरु सुनहु रे संतहु साधसंगति तरि जांहिगा ॥३॥१॥
कबीर जी कहते हैं केि हे सज्जनो, जरा ध्यानपूर्वक सुनो; साधु-संगति में ही संसार-सागर से पार हो सकोगे॥ ३॥ १॥
ਰਾਗੁ ਮਾਰੂ ਬਾਣੀ ਰਵਿਦਾਸ ਜੀਉ ਕੀ
रागु मारू बाणी रविदास जीउ की
रागु मारू बाणी रविदास जीउ की
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਐਸੀ ਲਾਲ ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਕਉਨੁ ਕਰੈ ॥
ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै ॥
हे प्यारे प्रभु ! तेरे बिना ऐसी कृपा कौन कर सकता है,
ਗਰੀਬ ਨਿਵਾਜੁ ਗੁਸਈਆ ਮੇਰਾ ਮਾਥੈ ਛਤ੍ਰੁ ਧਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै ॥१॥ रहाउ ॥
हे गुँसाई ! तू गरीब-नवाज है और मुझ दीन पर तूने छत्र धर दिया है॥ १॥ रहाउ॥
ਜਾ ਕੀ ਛੋਤਿ ਜਗਤ ਕਉ ਲਾਗੈ ਤਾ ਪਰ ਤੁਹੀਂ ਢਰੈ ॥
जा की छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै ॥
जिसकी छूत जगत् को लग जाती है अर्थात् जिसे दुनिया अछूत समझती है, उस पर तू ही कृपा करता है।
ਨੀਚਹ ਊਚ ਕਰੈ ਮੇਰਾ ਗੋਬਿੰਦੁ ਕਾਹੂ ਤੇ ਨ ਡਰੈ ॥੧॥
नीचह ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै ॥१॥
मेरा गोबिंद नीच को भी ऊँचा बना देता है और वह किसी से नहीं डरता॥ १॥
ਨਾਮਦੇਵ ਕਬੀਰੁ ਤਿਲੋਚਨੁ ਸਧਨਾ ਸੈਨੁ ਤਰੈ ॥
नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै ॥
उसकी अनुकंपा से नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सधना एवं सैन इत्यादि भी संसार-समुद्र से पार हो गए हैं।
ਕਹਿ ਰਵਿਦਾਸੁ ਸੁਨਹੁ ਰੇ ਸੰਤਹੁ ਹਰਿ ਜੀਉ ਤੇ ਸਭੈ ਸਰੈ ॥੨॥੧॥
कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरि जीउ ते सभै सरै ॥२॥१॥
रविदास जी कहते हैं, हे सज्जनो ! मेरी बात जरा ध्यानपूर्वक सुनो, ईश्वर की रज़ा से सभी मनोरथ पूरे हो सकते हैं।॥ २॥ १॥
ਮਾਰੂ ॥
मारू ॥
मारू॥
ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਸੁਰਿਤਰੁ ਚਿੰਤਾਮਨਿ ਕਾਮਧੇਨ ਬਸਿ ਜਾ ਕੇ ਰੇ ॥
सुख सागर सुरितरु चिंतामनि कामधेन बसि जा के रे ॥
जिसके वश में सुखों का सागर कल्पवृक्ष, चिंतामणि एवं कामधेनु हैं;
ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਅਸਟ ਮਹਾ ਸਿਧਿ ਨਵ ਨਿਧਿ ਕਰ ਤਲ ਤਾ ਕੈ ॥੧॥
चारि पदारथ असट महा सिधि नव निधि कर तल ता कै ॥१॥
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूपी चार पदार्थ, आठ महासिद्धियों एवं नो निधियाँ भी उस ईश्वर के हाथ में ही हैं॥ १॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨ ਜਪਸਿ ਰਸਨਾ ॥ ਅਵਰ ਸਭ ਛਾਡਿ ਬਚਨ ਰਚਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हरि हरि हरि न जपसि रसना ॥ अवर सभ छाडि बचन रचना ॥१॥ रहाउ ॥
हे भाई ! जिह्मा से तुम भगवान् का नाम तो जपते ही नहीं, अन्य सभी वचन एवं व्यर्थ रचना को छोड़ कर प्रभु का भजन कर ले। १॥ रहाउ॥
ਨਾਨਾ ਖਿਆਨ ਪੁਰਾਨ ਬੇਦ ਬਿਧਿ ਚਉਤੀਸ ਅਛਰ ਮਾਹੀ ॥
नाना खिआन पुरान बेद बिधि चउतीस अछर माही ॥
अनेक आख्यान, पुराणों, वेदों एवं विधियों तथा चौंतीस अक्षरों में लिखे गए शास्त्रों का विचार करके
ਬਿਆਸ ਬੀਚਾਰਿ ਕਹਿਓ ਪਰਮਾਰਥੁ ਰਾਮ ਨਾਮ ਸਰਿ ਨਾਹੀ ॥੨॥
बिआस बीचारि कहिओ परमारथु राम नाम सरि नाही ॥२॥
व्यास जी ने यही बताया है कि राम नाम के बराबर कोई परमार्थ नहीं है॥ २॥
ਸਹਜ ਸਮਾਧਿ ਉਪਾਧਿ ਰਹਤ ਹੋਇ ਬਡੇ ਭਾਗਿ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
सहज समाधि उपाधि रहत होइ बडे भागि लिव लागी ॥
सहज-स्वभाव समाधि में रत होकर दुख-तकलीफों से रहित हो गए हैं और अहोभाग्य से ईश्वर में लगन लग गई है।
ਕਹਿ ਰਵਿਦਾਸ ਉਦਾਸ ਦਾਸ ਮਤਿ ਜਨਮ ਮਰਨ ਭੈ ਭਾਗੀ ॥੩॥੨॥੧੫॥
कहि रविदास उदास दास मति जनम मरन भै भागी ॥३॥२॥१५॥
रविदास जी कहते हैं कि दास की मति जग से विरक्त हो गई है, जिससे जन्म-मरण का भय भाग गया है।३॥ २॥ १५॥