Hindi Page 1033

ਸਭੁ ਕੋ ਬੋਲੈ ਆਪਣ ਭਾਣੈ ॥
सभु को बोलै आपण भाणै ॥
हर कोई अपनी इच्छा से ही बोलता है

ਮਨਮੁਖੁ ਦੂਜੈ ਬੋਲਿ ਨ ਜਾਣੈ ॥
मनमुखु दूजै बोलि न जाणै ॥
और स्वेछाचारी द्वैतभाव के कारन बोलना ही नहीं जनता।

ਅੰਧੁਲੇ ਕੀ ਮਤਿ ਅੰਧਲੀ ਬੋਲੀ ਆਇ ਗਇਆ ਦੁਖੁ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੧੧॥
अंधुले की मति अंधली बोली आइ गइआ दुखु ताहा हे ॥११॥
अंधे की बुद्धि एवं बोली अंधी है है इसीलिए वह जन्म-मरण का दु:ख भोगता है॥ ११॥

ਦੁਖ ਮਹਿ ਜਨਮੈ ਦੁਖ ਮਹਿ ਮਰਣਾ ॥
दुख महि जनमै दुख महि मरणा ॥
वह दुख में जन्म लेता और दुख में ही मृत्यु को प्राप्त होता है।

ਦੂਖੁ ਨ ਮਿਟੈ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਕੀ ਸਰਣਾ ॥
दूखु न मिटै बिनु गुर की सरणा ॥
गुरु की शरण के बिना उसका दुःख नहीं मिटता

ਦੂਖੀ ਉਪਜੈ ਦੂਖੀ ਬਿਨਸੈ ਕਿਆ ਲੈ ਆਇਆ ਕਿਆ ਲੈ ਜਾਹਾ ਹੇ ॥੧੨॥
दूखी उपजै दूखी बिनसै किआ लै आइआ किआ लै जाहा हे ॥१२॥
वह दुःख में ही पैदा होता है और दुख में ही नष्ट हो जाता है, वह क्या लेकर आया और क्या लेकर जाता है॥ १२॥

ਸਚੀ ਕਰਣੀ ਗੁਰ ਕੀ ਸਿਰਕਾਰਾ ॥
सची करणी गुर की सिरकारा ॥
जो कार्य गुरु ने जीव को सौंपा है, वही कार्य सत्यशील है,

ਆਵਣੁ ਜਾਣੁ ਨਹੀ ਜਮ ਧਾਰਾ ॥
आवणु जाणु नही जम धारा ॥
इससे जन्म-मरण नहीं होता और न ही यम के कानून की कोई धारा लागू होती है।

ਡਾਲ ਛੋਡਿ ਤਤੁ ਮੂਲੁ ਪਰਾਤਾ ਮਨਿ ਸਾਚਾ ਓਮਾਹਾ ਹੇ ॥੧੩॥
डाल छोडि ततु मूलु पराता मनि साचा ओमाहा हे ॥१३॥
वह जगत् रूपी पेड़ की डालियों अर्थात् देवी-देवताओं को छोड़कर मूल परमात्मा के चरणों में आ गया है और उसके मन में मिलन के लिए सच्ची उमंग पैदा हो गई है॥ १३॥

ਹਰਿ ਕੇ ਲੋਗ ਨਹੀ ਜਮੁ ਮਾਰੈ ॥
हरि के लोग नही जमु मारै ॥
ईश्वर के उपासक को यम नहीं मारता और

ਨਾ ਦੁਖੁ ਦੇਖਹਿ ਪੰਥਿ ਕਰਾਰੈ ॥
ना दुखु देखहि पंथि करारै ॥
न ही वह भयानक मार्ग के दुख को देखता है।

ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਪੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ਕਾਹਾ ਹੇ ॥੧੪॥
राम नामु घट अंतरि पूजा अवरु न दूजा काहा हे ॥१४॥
वह अपने हृदय में राम-नाम की पूजा करता रहता है और उसे अन्य कोई झंझट नहीं पड़ता॥ १४॥

ਓੜੁ ਨ ਕਥਨੈ ਸਿਫਤਿ ਸਜਾਈ ॥
ओड़ु न कथनै सिफति सजाई ॥
हे ईश्वर ! तेरी स्तुति करने का कोई अंत नहीं है,

ਜਿਉ ਤੁਧੁ ਭਾਵਹਿ ਰਹਹਿ ਰਜਾਈ ॥
जिउ तुधु भावहि रहहि रजाई ॥
जैसे तुझे उपयुक्त लगता है, वैसे ही तेरी इच्छा में रहते हैं,

ਦਰਗਹ ਪੈਧੇ ਜਾਨਿ ਸੁਹੇਲੇ ਹੁਕਮਿ ਸਚੇ ਪਾਤਿਸਾਹਾ ਹੇ ॥੧੫॥
दरगह पैधे जानि सुहेले हुकमि सचे पातिसाहा हे ॥१५॥
सच्चे प्रभु के हुक्म से सहज ही दरंबार में सुख की अनुभूति होती है॥ १५॥

ਕਿਆ ਕਹੀਐ ਗੁਣ ਕਥਹਿ ਘਨੇਰੇ ॥
किआ कहीऐ गुण कथहि घनेरे ॥
सभी गुण कथन करते हैं, मगर ईश्वर के गुणों के बारे में क्या कहा जाए;”

ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਵਹਿ ਵਡੇ ਵਡੇਰੇ ॥
अंतु न पावहि वडे वडेरे ॥
जब बड़े-बड़े देवी-देवता भी अन्त नहीं पा सके।

ਨਾਨਕ ਸਾਚੁ ਮਿਲੈ ਪਤਿ ਰਾਖਹੁ ਤੂ ਸਿਰਿ ਸਾਹਾ ਪਾਤਿਸਾਹਾ ਹੇ ॥੧੬॥੬॥੧੨॥
नानक साचु मिलै पति राखहु तू सिरि साहा पातिसाहा हे ॥१६॥६॥१२॥
नानक प्रार्थना करते हैं कि हे ईश्वर ! सत्य से मिलाकर हमारी लाज रखो, केवल तू ही बादशाहों का भी बादशाह है॥ १६॥ ६॥ १२॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ਦਖਣੀ ॥
मारू महला १ दखणी ॥
मारू महला १॥

ਕਾਇਆ ਨਗਰੁ ਨਗਰ ਗੜ ਅੰਦਰਿ ॥
काइआ नगरु नगर गड़ अंदरि ॥
नगर-किले में से मानव-शरीर भी एक नगर ही है और

ਸਾਚਾ ਵਾਸਾ ਪੁਰਿ ਗਗਨੰਦਰਿ ॥
साचा वासा पुरि गगनंदरि ॥
गगनंतर पुरी अर्थात् दसम द्वार में सत्यस्वरूप ईश्वर का निवास है।

ਅਸਥਿਰੁ ਥਾਨੁ ਸਦਾ ਨਿਰਮਾਇਲੁ ਆਪੇ ਆਪੁ ਉਪਾਇਦਾ ॥੧॥
असथिरु थानु सदा निरमाइलु आपे आपु उपाइदा ॥१॥
यह दसम द्वार रूपी स्थिर स्थान सदैव निर्मल रहता है और वह स्वयं अपने आपको उत्पन्न करता है॥ १॥

ਅੰਦਰਿ ਕੋਟ ਛਜੇ ਹਟਨਾਲੇ ॥
अंदरि कोट छजे हटनाले ॥
इस किले में छज्जे और बाजार हैं।

ਆਪੇ ਲੇਵੈ ਵਸਤੁ ਸਮਾਲੇ ॥
आपे लेवै वसतु समाले ॥
वह स्वयं ही वस्तु लेता और उसकी संभाल करता है।

ਬਜਰ ਕਪਾਟ ਜੜੇ ਜੜਿ ਜਾਣੈ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਖੋਲਾਇਦਾ ॥੨॥
बजर कपाट जड़े जड़ि जाणै गुर सबदी खोलाइदा ॥२॥
इस किले को वज कपाट जड़े हुए हैं, जिनको वह खुद ही जड़ित करना जानता है और इन कपाटों को शब्दगुरु द्वारा ही खोलता है॥ २॥

ਭੀਤਰਿ ਕੋਟ ਗੁਫਾ ਘਰ ਜਾਈ ॥
भीतरि कोट गुफा घर जाई ॥
शरीर रूपी किले में दसम द्वार रूपी गुफा है, जहाँ परम-सत्य का घर है।

ਨਉ ਘਰ ਥਾਪੇ ਹੁਕਮਿ ਰਜਾਈ ॥
नउ घर थापे हुकमि रजाई ॥
उसने हुक्म से ही शरीर रूपी नगर में आंख, नाक, कान, इत्यादि नौ घर बनाए हुए हैं।

ਦਸਵੈ ਪੁਰਖੁ ਅਲੇਖੁ ਅਪਾਰੀ ਆਪੇ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਦਾ ॥੩॥
दसवै पुरखु अलेखु अपारी आपे अलखु लखाइदा ॥३॥
दसम द्वार में अपरंपार, अलक्ष्य ईश्वर स्वयं रहता है और अदृश्य स्वयं ही अपने आपको प्रगट करता है॥ ३॥

ਪਉਣ ਪਾਣੀ ਅਗਨੀ ਇਕ ਵਾਸਾ ॥
पउण पाणी अगनी इक वासा ॥
पवन, पानी, अग्नि इत्यादि पंच तत्वों से बने हुए शरीर रूपी नगर में प्रभु ने ही वास किया हुआ है और

ਆਪੇ ਕੀਤੋ ਖੇਲੁ ਤਮਾਸਾ ॥
आपे कीतो खेलु तमासा ॥
समूचा खेल-तमाशा उसने स्वयं ही बनाया है।

ਬਲਦੀ ਜਲਿ ਨਿਵਰੈ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਆਪੇ ਜਲ ਨਿਧਿ ਪਾਇਦਾ ॥੪॥
बलदी जलि निवरै किरपा ते आपे जल निधि पाइदा ॥४॥
जो जलती हुई अग्नि पानी से बुझ जाती है, वह स्वयं ही अग्नि (बड़वाग्नि) समुद्र में डाल देता है॥ ४॥

ਧਰਤਿ ਉਪਾਇ ਧਰੀ ਧਰਮ ਸਾਲਾ ॥
धरति उपाइ धरी धरम साला ॥
धरती को उत्पन्न करके उसने जीवों को धर्म करने के लिए धर्मशाला बना दी है।

ਉਤਪਤਿ ਪਰਲਉ ਆਪਿ ਨਿਰਾਲਾ ॥
उतपति परलउ आपि निराला ॥
जगत् की उत्पति एवं प्रलय होता रहता है किन्तु वह स्वयं निराला ही रहता है।

ਪਵਣੈ ਖੇਲੁ ਕੀਆ ਸਭ ਥਾਈ ਕਲਾ ਖਿੰਚਿ ਢਾਹਾਇਦਾ ॥੫॥
पवणै खेलु कीआ सभ थाई कला खिंचि ढाहाइदा ॥५॥
उसने हर जगह पवन (प्राणों) का खेल रचा है और स्वयं ही अपनी शक्ति को खींचकर प्राणों का खेल नष्ट कर देता है ॥५॥

ਭਾਰ ਅਠਾਰਹ ਮਾਲਣਿ ਤੇਰੀ ॥
भार अठारह मालणि तेरी ॥
हे ईश्वर ! अठारह भार वाली यह वनस्पति तेरी मालिन है,”

ਚਉਰੁ ਢੁਲੈ ਪਵਣੈ ਲੈ ਫੇਰੀ ॥
चउरु ढुलै पवणै लै फेरी ॥
पवन का चक्कर तुझ पर चॅवर झूल रहा है।

ਚੰਦੁ ਸੂਰਜੁ ਦੁਇ ਦੀਪਕ ਰਾਖੇ ਸਸਿ ਘਰਿ ਸੂਰੁ ਸਮਾਇਦਾ ॥੬॥
चंदु सूरजु दुइ दीपक राखे ससि घरि सूरु समाइदा ॥६॥
सूर्य एवं चाँद रूपी दो दीपक आलोकित किए हुए हैं और चाँद के घर में सूर्य समा जाता है अर्थात् सूर्य से ही चन्द्रमा को प्रकाश मिलता है॥ ६॥

ਪੰਖੀ ਪੰਚ ਉਡਰਿ ਨਹੀ ਧਾਵਹਿ ॥
पंखी पंच उडरि नही धावहि ॥
गुरुमुख रूपी पेड़ से ज्ञानेन्द्रियों रूपी पक्षी उड़कर नहीं जाते।

ਸਫਲਿਓ ਬਿਰਖੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲੁ ਪਾਵਹਿ ॥
सफलिओ बिरखु अम्रित फलु पावहि ॥
शरीर रूपी पेड़ सुन्दर नाम रूपी फल से भरपूर है और वे पक्षी यह अमृतमयी फल पाते हैं।

ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਹਜਿ ਰਵੈ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਹਰਿ ਰਸੁ ਚੋਗ ਚੁਗਾਇਦਾ ॥੭॥
गुरमुखि सहजि रवै गुण गावै हरि रसु चोग चुगाइदा ॥७॥
गुरुमुख सहज ही गुणगान करते हैं और ज्ञानेन्द्रियाँ रूपी पक्षियों को हरि-नाम रूपी चोगा चुगाते रहते हैं।॥ ७॥

ਝਿਲਮਿਲਿ ਝਿਲਕੈ ਚੰਦੁ ਨ ਤਾਰਾ ॥
झिलमिलि झिलकै चंदु न तारा ॥
मन में सत्य की ज्योति चमक रही है।

ਸੂਰਜ ਕਿਰਣਿ ਨ ਬਿਜੁਲਿ ਗੈਣਾਰਾ ॥
सूरज किरणि न बिजुलि गैणारा ॥
न चन्द्रमा है, न कोई तारा है, न सूर्य की किरणे हैं और न आसमान वाली बिजली है।

ਅਕਥੀ ਕਥਉ ਚਿਹਨੁ ਨਹੀ ਕੋਈ ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਮਨਿ ਭਾਇਦਾ ॥੮॥
अकथी कथउ चिहनु नही कोई पूरि रहिआ मनि भाइदा ॥८॥
मैं अकथनीय अवस्था का कथन कर रहा हूँ, जिसका कोई चक्र-चिन्ह नहीं और मन भवन प्रभु सब में समां रहा है॥ ८॥

ਪਸਰੀ ਕਿਰਣਿ ਜੋਤਿ ਉਜਿਆਲਾ ॥
पसरी किरणि जोति उजिआला ॥
किरणों का प्रसार होने से सर्वत्र उजाला हो गया।

ਕਰਿ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਆਪਿ ਦਇਆਲਾ ॥
करि करि देखै आपि दइआला ॥
दयालु परमेश्वर स्वयं उत्पन्न करके देखता रहता है।

ਅਨਹਦ ਰੁਣ ਝੁਣਕਾਰੁ ਸਦਾ ਧੁਨਿ ਨਿਰਭਉ ਕੈ ਘਰਿ ਵਾਇਦਾ ॥੯॥
अनहद रुण झुणकारु सदा धुनि निरभउ कै घरि वाइदा ॥९॥
सुरीली ध्वनि वाला अनहद शब्द सदैव निर्भय प्रभु के द्वार रूपी घर में बजता रहता है ॥९॥

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