ਜਿਸੁ ਨਾਮੈ ਕਉ ਤਰਸਹਿ ਬਹੁ ਦੇਵਾ ॥
जिसु नामै कउ तरसहि बहु देवा ॥
जिस नाम को पाने के लिए अनेक देवी-देवता भी तरसते हैं,”
ਸਗਲ ਭਗਤ ਜਾ ਕੀ ਕਰਦੇ ਸੇਵਾ ॥
सगल भगत जा की करदे सेवा ॥
सभी भक्त जिसकी उपासना करते हैं,”
ਅਨਾਥਾ ਨਾਥੁ ਦੀਨ ਦੁਖ ਭੰਜਨੁ ਸੋ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਇਣਾ ॥੩॥
अनाथा नाथु दीन दुख भंजनु सो गुर पूरे ते पाइणा ॥३॥
अनाथों का नाथ, दीनों का दुख नाश करने वाला वह प्रभु तो पूर्ण गुरु द्वारा ही पाया जा सकता है॥ ३॥
ਹੋਰੁ ਦੁਆਰਾ ਕੋਇ ਨ ਸੂਝੈ ॥
होरु दुआरा कोइ न सूझै ॥
“(गुरु के सिवाय) अन्य कोई भी द्वार नहीं सूझता,”
ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਧਾਵੈ ਤਾ ਕਿਛੂ ਨ ਬੂਝੈ ॥
त्रिभवण धावै ता किछू न बूझै ॥
जीव चाहे तीनों लोकों में दौड़ता रहे परन्तु उसे कुछ भी ज्ञान नहीं होता।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਾਹੁ ਭੰਡਾਰੁ ਨਾਮ ਜਿਸੁ ਇਹੁ ਰਤਨੁ ਤਿਸੈ ਤੇ ਪਾਇਣਾ ॥੪॥
सतिगुरु साहु भंडारु नाम जिसु इहु रतनु तिसै ते पाइणा ॥४॥
सतगुरु ही ऐसा साहूकार है, जिसके पास नाम का भण्डार है, यह नाम रूपी रत्न उससे ही प्राप्त होता है।॥ ४॥
ਜਾ ਕੀ ਧੂਰਿ ਕਰੇ ਪੁਨੀਤਾ ॥
जा की धूरि करे पुनीता ॥
जिसकी चरण-धूलि जीवों को पवित्र कर देती है,”
ਸੁਰਿ ਨਰ ਦੇਵ ਨ ਪਾਵਹਿ ਮੀਤਾ ॥
सुरि नर देव न पावहि मीता ॥
उसे देवता, मनुष्य एवं त्रिदेव भी नहीं पाते।
ਸਤਿ ਪੁਰਖੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਜਿਸੁ ਭੇਟਤ ਪਾਰਿ ਪਰਾਇਣਾ ॥੫॥
सति पुरखु सतिगुरु परमेसरु जिसु भेटत पारि पराइणा ॥५॥
सत्यपुरुष सतगुरु परमेश्वर का ही रूप है, जिसे मिलने से जीव संसार-सागर से पार हो जाते हैं।॥ ५॥
ਪਾਰਜਾਤੁ ਲੋੜਹਿ ਮਨ ਪਿਆਰੇ ॥
पारजातु लोड़हि मन पिआरे ॥
हे प्यारे मन ! यदि तू सर्व इच्छाएँ पूरी करने वाला स्वर्ग का पारिजात वृक्ष पाना चाहता है,”
ਕਾਮਧੇਨੁ ਸੋਹੀ ਦਰਬਾਰੇ ॥
कामधेनु सोही दरबारे ॥
अगर तेरी अभिलाषा है कि सब कामनाएँ पूरी करने वाली कामधेनु तेरे द्वार पर शोभा देती रहे तो
ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਸੰਤੋਖੁ ਸੇਵਾ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਨਾਮੁ ਕਮਾਇ ਰਸਾਇਣਾ ॥੬॥
त्रिपति संतोखु सेवा गुर पूरे नामु कमाइ रसाइणा ॥६॥
तू पूर्ण गुरु की सेवा में तल्लीन रह, रसायन रूप नाम की साधना कर, जिससे तुझे तृप्ति एवं संतोष मिल जाएगा॥ ६॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਮਰਹਿ ਪੰਚ ਧਾਤੂ ॥
गुर कै सबदि मरहि पंच धातू ॥
गुरु के शब्द द्वारा काम, क्रोध, इत्यादि पाँचों विकार मिट जाते हैं और
ਭੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਹੋਵਹਿ ਨਿਰਮਲਾ ਤੂ ॥
भै पारब्रहम होवहि निरमला तू ॥
परब्रह के श्रद्धा रूपी भय से जीव निर्मल हो जाता है।
ਪਾਰਸੁ ਜਬ ਭੇਟੈ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਤਾ ਪਾਰਸੁ ਪਰਸਿ ਦਿਖਾਇਣਾ ॥੭॥
पारसु जब भेटै गुरु पूरा ता पारसु परसि दिखाइणा ॥७॥
जब पारस रूपी पूर्ण गुरु मिल जाता है तो उसके चरण-स्पर्श से साधारण मनुष्य भी पारस रूप दिखाई देने लगता है।॥ ७॥
ਕਈ ਬੈਕੁੰਠ ਨਾਹੀ ਲਵੈ ਲਾਗੇ ॥
कई बैकुंठ नाही लवै लागे ॥
बैकुण्ठ के अनेक सुख भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते और
ਮੁਕਤਿ ਬਪੁੜੀ ਭੀ ਗਿਆਨੀ ਤਿਆਗੇ ॥
मुकति बपुड़ी भी गिआनी तिआगे ॥
ज्ञानी मनुष्य भी बेचारी मुक्ति को त्याग देते हैं अर्थात् उसकी लालसा नहीं करते।
ਏਕੰਕਾਰੁ ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈਐ ਹਉ ਬਲਿ ਬਲਿ ਗੁਰ ਦਰਸਾਇਣਾ ॥੮॥
एकंकारु सतिगुर ते पाईऐ हउ बलि बलि गुर दरसाइणा ॥८॥
एक परमेश्वर तो सतिगुरु के द्वारा ही पाया जाता है, अतः मैं गुरु-दर्शनों पर बलिहारी जाता हूँ॥ ८॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵ ਨ ਜਾਣੈ ਕੋਈ ॥
गुर की सेव न जाणै कोई ॥
गुरु की सेवा का भेद कोई नहीं जानता,”
ਗੁਰੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਅਗੋਚਰੁ ਸੋਈ ॥
गुरु पारब्रहमु अगोचरु सोई ॥
इन्द्रियातीत परब्रह्म ही गुरु है।
ਜਿਸ ਨੋ ਲਾਇ ਲਏ ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਜਿਸੁ ਵਡਭਾਗ ਮਥਾਇਣਾ ॥੯॥
जिस नो लाइ लए सो सेवकु जिसु वडभाग मथाइणा ॥९॥
उसका सेवक वही है, जिसे वह अपनी लगन में लगा लेता है और जिसके माथे पर अहोभाग्य होता है॥ ९॥
ਗੁਰ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਬੇਦ ਨ ਜਾਣਹਿ ॥
गुर की महिमा बेद न जाणहि ॥
गुरु की महिमा का रहस्य वेद भी नहीं जानते और
ਤੁਛ ਮਾਤ ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਵਖਾਣਹਿ ॥
तुछ मात सुणि सुणि वखाणहि ॥
सुन-सुनकर तुच्छ मात्र ही उपमा बयान करते हैं।
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਅਪਰੰਪਰ ਸਤਿਗੁਰ ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਮਨੁ ਸੀਤਲਾਇਣਾ ॥੧੦॥
पारब्रहम अपर्मपर सतिगुर जिसु सिमरत मनु सीतलाइणा ॥१०॥
सतिगुरु ही अपरंपार परब्रहा है, जिसे स्मरण करने से मन शीतल हो जाता है॥ १०॥
ਜਾ ਕੀ ਸੋਇ ਸੁਣੀ ਮਨੁ ਜੀਵੈ ॥
जा की सोइ सुणी मनु जीवै ॥
जिसकी महिमा सुनने से मन जी रहा है,”
ਰਿਦੈ ਵਸੈ ਤਾ ਠੰਢਾ ਥੀਵੈ ॥
रिदै वसै ता ठंढा थीवै ॥
जिसके हृदय में वास करने से शान्ति मिलती है,”
ਗੁਰੁ ਮੁਖਹੁ ਅਲਾਏ ਤਾ ਸੋਭਾ ਪਾਏ ਤਿਸੁ ਜਮ ਕੈ ਪੰਥਿ ਨ ਪਾਇਣਾ ॥੧੧॥
गुरु मुखहु अलाए ता सोभा पाए तिसु जम कै पंथि न पाइणा ॥११॥
जब मनुष्य मुँह से ‘गुरु गुरु’ जपता है तो ही शोभा का पात्र बनता है और उसे यम के मार्ग में नहीं डाला जाता॥ ११॥
ਸੰਤਨ ਕੀ ਸਰਣਾਈ ਪੜਿਆ ॥
संतन की सरणाई पड़िआ ॥
मैं संतजनों की शरण में पड़ गया हूँ और
ਜੀਉ ਪ੍ਰਾਣ ਧਨੁ ਆਗੈ ਧਰਿਆ ॥
जीउ प्राण धनु आगै धरिआ ॥
अपना जीवन, प्राण एवं धन उनके समक्ष अर्पण कर दिया है।
ਸੇਵਾ ਸੁਰਤਿ ਨ ਜਾਣਾ ਕਾਈ ਤੁਮ ਕਰਹੁ ਦਇਆ ਕਿਰਮਾਇਣਾ ॥੧੨॥
सेवा सुरति न जाणा काई तुम करहु दइआ किरमाइणा ॥१२॥
हे भगवान् ! मुझे तेरी सेवा एवं नाम-स्मरण करने का कोई ज्ञान नहीं, अतः मुझ कीट पर तुम दया करो।॥ १२॥
ਨਿਰਗੁਣ ਕਉ ਸੰਗਿ ਲੇਹੁ ਰਲਾਏ ॥
निरगुण कउ संगि लेहु रलाए ॥
मुझ गुणविहीन को अपने संग मिला लो,”
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਮੋਹਿ ਟਹਲੈ ਲਾਏ ॥
करि किरपा मोहि टहलै लाए ॥
कृपा करके मुझे अपनी सेवा में संलग्न कर लो।
ਪਖਾ ਫੇਰਉ ਪੀਸਉ ਸੰਤ ਆਗੈ ਚਰਣ ਧੋਇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਣਾ ॥੧੩॥
पखा फेरउ पीसउ संत आगै चरण धोइ सुखु पाइणा ॥१३॥
मैं तेरे संतों को पंखा करता हूँ, उनके आगे आटा पीसता हूँ और उनके चरण धोकर सुख की अनुभूति करता हूँ॥ १३॥
ਬਹੁਤੁ ਦੁਆਰੇ ਭ੍ਰਮਿ ਭ੍ਰਮਿ ਆਇਆ ॥
बहुतु दुआरे भ्रमि भ्रमि आइआ ॥
मैं बहुत सारे द्वारों पर भटक-भटक कर तेरे पास आया हूँ,”
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਤੁਮ ਸਰਣਾਇਆ ॥
तुमरी क्रिपा ते तुम सरणाइआ ॥
तुम्हारी कृपा से तुम्हारी शरण में आया हूँ।
ਸਦਾ ਸਦਾ ਸੰਤਹ ਸੰਗਿ ਰਾਖਹੁ ਏਹੁ ਨਾਮ ਦਾਨੁ ਦੇਵਾਇਣਾ ॥੧੪॥
सदा सदा संतह संगि राखहु एहु नाम दानु देवाइणा ॥१४॥
मुझे सदा संतों की संगत में रखो और मुझे उनसे नाम का दान देलवा देना॥ १४॥
ਭਏ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਗੁਸਾਈ ਮੇਰੇ ॥
भए क्रिपाल गुसाई मेरे ॥
मेरा मालिक जब कृपालु हो गया तो ही
ਦਰਸਨੁ ਪਾਇਆ ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰੇ ॥
दरसनु पाइआ सतिगुर पूरे ॥
मुझे पूर्ण सतिगुरु के दर्शन प्राप्त हुए।
ਸੂਖ ਸਹਜ ਸਦਾ ਆਨੰਦਾ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਦਸਾਇਣਾ ॥੧੫॥੨॥੭॥
सूख सहज सदा आनंदा नानक दास दसाइणा ॥१५॥२॥७॥
हे नानक ! अब सदैव ही मेरे मन में सहज-सुख एवं आनंद बना रहता है और परमात्मा के दासों का दास बन गया हूँ॥ १५॥ २॥ ७॥
ਮਾਰੂ ਸੋਲਹੇ ਮਹਲਾ ੫
मारू सोलहे महला ५
मारू सोलहे महला ५
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਸਿਮਰੈ ਧਰਤੀ ਅਰੁ ਆਕਾਸਾ ॥
सिमरै धरती अरु आकासा ॥
धरती और आकाश ईश्वर का ही स्मरण करते हैं,”
ਸਿਮਰਹਿ ਚੰਦ ਸੂਰਜ ਗੁਣਤਾਸਾ ॥
सिमरहि चंद सूरज गुणतासा ॥
सूर्य-चाँद भी उस गुणनिधि की उपासना कर रहे हैं,”
ਪਉਣ ਪਾਣੀ ਬੈਸੰਤਰ ਸਿਮਰਹਿ ਸਿਮਰੈ ਸਗਲ ਉਪਾਰਜਨਾ ॥੧॥
पउण पाणी बैसंतर सिमरहि सिमरै सगल उपारजना ॥१॥
पवन, पानी एवं अग्नि भी उसका गुणानुवाद करते हैं,वास्तव में समस्त सृष्टि उसे ही स्मरण कर रही है॥ १॥