Hindi Page 1013

ਅੰਤਰਿ ਅਗਨਿ ਨ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਬੂਝੈ ਬਾਹਰਿ ਪੂਅਰ ਤਾਪੈ ॥
अंतरि अगनि न गुर बिनु बूझै बाहरि पूअर तापै ॥
गुरु के बिना उसके अन्तर्मन में से तृष्णाग्नि नहीं बुझती किन्तु बाहर वह धूनेियों तापता है।

ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਬਿਨੁ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਵੀ ਕਿਉ ਕਰਿ ਚੀਨਸਿ ਆਪੈ ॥
गुर सेवा बिनु भगति न होवी किउ करि चीनसि आपै ॥
गुरु की सेवा के बिना भक्ति नहीं होती फिर वह अन्तरात्मा को कैसे पहचान सकता है।

ਨਿੰਦਾ ਕਰਿ ਕਰਿ ਨਰਕ ਨਿਵਾਸੀ ਅੰਤਰਿ ਆਤਮ ਜਾਪੈ ॥
निंदा करि करि नरक निवासी अंतरि आतम जापै ॥
अन्तरात्मा में ऐसे लगता है कि वह पराई निंदा कर-करके नरक में पड़ गया है।

ਅਠਸਠਿ ਤੀਰਥ ਭਰਮਿ ਵਿਗੂਚਹਿ ਕਿਉ ਮਲੁ ਧੋਪੈ ਪਾਪੈ ॥੩॥
अठसठि तीरथ भरमि विगूचहि किउ मलु धोपै पापै ॥३॥
अड़सठ तीर्थों पर भटक कर भ्रम में ही ख्वार होता है, उसके पापों की मैल कैसे उतर सकती है॥ ३॥

ਛਾਣੀ ਖਾਕੁ ਬਿਭੂਤ ਚੜਾਈ ਮਾਇਆ ਕਾ ਮਗੁ ਜੋਹੈ ॥
छाणी खाकु बिभूत चड़ाई माइआ का मगु जोहै ॥
वह खाक छानकर शरीर पर विभूति लगा लेता है किन्तु माया का मार्ग देखता रहता है।

ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਏਕੁ ਨ ਜਾਣੈ ਸਾਚੁ ਕਹੇ ਤੇ ਛੋਹੈ ॥
अंतरि बाहरि एकु न जाणै साचु कहे ते छोहै ॥
वह अन्दर बाहर ईश्वर को नहीं जानता परन्तु सच्चाई बताने पर क्रोधित होता है।

ਪਾਠੁ ਪੜੈ ਮੁਖਿ ਝੂਠੋ ਬੋਲੈ ਨਿਗੁਰੇ ਕੀ ਮਤਿ ਓਹੈ ॥
पाठु पड़ै मुखि झूठो बोलै निगुरे की मति ओहै ॥
उस निगुरे की मति ऐसी है कि वह पाठ भी पढ़ता है किन्तु मुँह से झूठ ही बोलता रहता है।

ਨਾਮੁ ਨ ਜਪਈ ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਉ ਸੋਹੈ ॥੪॥
नामु न जपई किउ सुखु पावै बिनु नावै किउ सोहै ॥४॥
वह प्रभु नाम का जाप नहीं करता तो फिर भला सुख कैसे पा सकता है, नाम विहीन कैसे सुन्दर लग सकता है॥ ४॥

ਮੂੰਡੁ ਮੁਡਾਇ ਜਟਾ ਸਿਖ ਬਾਧੀ ਮੋਨਿ ਰਹੈ ਅਭਿਮਾਨਾ ॥
मूंडु मुडाइ जटा सिख बाधी मोनि रहै अभिमाना ॥
किसी ने अपना सिर मुंडवा लिया है, किसी ने अपने सिर पर जटा को बाँध लिया है, कोई मौनी बनकर रहता है, परन्तु मन में अभिमान बना रहता है।

ਮਨੂਆ ਡੋਲੈ ਦਹ ਦਿਸ ਧਾਵੈ ਬਿਨੁ ਰਤ ਆਤਮ ਗਿਆਨਾ ॥
मनूआ डोलै दह दिस धावै बिनु रत आतम गिआना ॥
आत्म-ज्ञान में रंगे बिना मन विचलित होता है और दसों दिशाओं में भटकता है।

ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਛੋਡਿ ਮਹਾ ਬਿਖੁ ਪੀਵੈ ਮਾਇਆ ਕਾ ਦੇਵਾਨਾ ॥
अम्रितु छोडि महा बिखु पीवै माइआ का देवाना ॥
वह माया का दीवाना नामामृत को छोड़कर महाघातक माया रूपी विष पान करता रहता है।

ਕਿਰਤੁ ਨ ਮਿਟਈ ਹੁਕਮੁ ਨ ਬੂਝੈ ਪਸੂਆ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨਾ ॥੫॥
किरतु न मिटई हुकमु न बूझै पसूआ माहि समाना ॥५॥
उसका कर्म नहीं मिटता, न ही ईश्वरेच्छा को बूझता है और पशु समान ही माना जाता है ॥५॥

ਹਾਥ ਕਮੰਡਲੁ ਕਾਪੜੀਆ ਮਨਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਉਪਜੀ ਭਾਰੀ ॥
हाथ कमंडलु कापड़ीआ मनि त्रिसना उपजी भारी ॥
कोई कापड़िया साधु बन गया है, हाथ में उसने कमण्डल पकड़ लिया है किन्तु मन में भारी तृष्णा पैदा हो गई है।

ਇਸਤ੍ਰੀ ਤਜਿ ਕਰਿ ਕਾਮਿ ਵਿਆਪਿਆ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ਪਰ ਨਾਰੀ ॥
इसत्री तजि करि कामि विआपिआ चितु लाइआ पर नारी ॥
अपनी स्त्री को छोड़कर कामवासना में फंस गया और पराई नारी में चित लगा लिया।

ਸਿਖ ਕਰੇ ਕਰਿ ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੈ ਲੰਪਟੁ ਹੈ ਬਾਜਾਰੀ ॥
सिख करे करि सबदु न चीनै ल्मपटु है बाजारी ॥
वह लोगों को शिक्षा तो देता है परन्तु खुद ब्रह्म-शब्द को नहीं पहचानता और ऐसा लम्पट बाजारी बन जाता है।

ਅੰਤਰਿ ਬਿਖੁ ਬਾਹਰਿ ਨਿਭਰਾਤੀ ਤਾ ਜਮੁ ਕਰੇ ਖੁਆਰੀ ॥੬॥
अंतरि बिखु बाहरि निभराती ता जमु करे खुआरी ॥६॥
मन में तो तृष्णा रूपी विष है पर बाहर से शान्ति धारण की हुई है अतः यम उसे ख्यार करता है॥ ६॥

ਸੋ ਸੰਨਿਆਸੀ ਜੋ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੈ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
सो संनिआसी जो सतिगुर सेवै विचहु आपु गवाए ॥
वास्तव में वही संन्यासी है, जो सतगुरु की सेवा करता है और मन से अभिमान को मिटा देता है।

ਛਾਦਨ ਭੋਜਨ ਕੀ ਆਸ ਨ ਕਰਈ ਅਚਿੰਤੁ ਮਿਲੈ ਸੋ ਪਾਏ ॥
छादन भोजन की आस न करई अचिंतु मिलै सो पाए ॥
वह वस्त्र-भोजन की आशा नहीं करता पर जो कुछ उसे बिना सोचे ही मिल जाता है, उसे ले लेता है।

ਬਕੈ ਨ ਬੋਲੈ ਖਿਮਾ ਧਨੁ ਸੰਗ੍ਰਹੈ ਤਾਮਸੁ ਨਾਮਿ ਜਲਾਏ ॥
बकै न बोलै खिमा धनु संग्रहै तामसु नामि जलाए ॥
वह व्यर्थ बकवास एवं बातें नहीं करता, वह क्षमा रूपी धन संचित करता है और नाम से अपने क्रोध को जला देता है।

ਧਨੁ ਗਿਰਹੀ ਸੰਨਿਆਸੀ ਜੋਗੀ ਜਿ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥੭॥
धनु गिरही संनिआसी जोगी जि हरि चरणी चितु लाए ॥७॥
जो भगवान के चरणों में मन लगाता है, वह गृहस्थी, संन्यासी एवं योगी प्रशंसा का पात्र है ॥७॥

ਆਸ ਨਿਰਾਸ ਰਹੈ ਸੰਨਿਆਸੀ ਏਕਸੁ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
आस निरास रहै संनिआसी एकसु सिउ लिव लाए ॥
संन्यासी वही है जो जीवन की आशाओं को छोड़ कर विरक्त रहता है और एक ईश्वर में ध्यान लगाता है।

ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਵੈ ਤਾ ਸਾਤਿ ਆਵੈ ਨਿਜ ਘਰਿ ਤਾੜੀ ਲਾਏ ॥
हरि रसु पीवै ता साति आवै निज घरि ताड़ी लाए ॥
जब वह हरिनामामृत का पान करता है तो ही उसे शान्ति प्राप्त होती है और अपने सच्चे घर में समाधि लगाता है।

ਮਨੂਆ ਨ ਡੋਲੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਧਾਵਤੁ ਵਰਜਿ ਰਹਾਏ ॥
मनूआ न डोलै गुरमुखि बूझै धावतु वरजि रहाए ॥
गुरमुख बनकर वह सच्चाई को बूझ लेता है, जिससे उसका मन नहीं डोलता और चंचल मन को काबू कर लेता है।

ਗ੍ਰਿਹੁ ਸਰੀਰੁ ਗੁਰਮਤੀ ਖੋਜੇ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਏ ॥੮॥
ग्रिहु सरीरु गुरमती खोजे नामु पदारथु पाए ॥८॥
वह गुरु-मत द्वारा अपने शरीर-घर को खोजता है और नाम रूपी पदार्थ को पा लेता है॥ ८॥

ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸੁ ਸਰੇਸਟ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ब्रहमा बिसनु महेसु सरेसट नामि रते वीचारी ॥
ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवशंकर जैसे सर्वश्रेष्ठ देवते नाम का चिंतन करने में ही रत रहते हैं।

ਖਾਣੀ ਬਾਣੀ ਗਗਨ ਪਤਾਲੀ ਜੰਤਾ ਜੋਤਿ ਤੁਮਾਰੀ ॥
खाणी बाणी गगन पताली जंता जोति तुमारी ॥
हे अखिलेश्वर ! चारों स्रोतों, चारों वाणियों, आकाश, पाताल, सब में तेरी ही ज्योति व्याप्त है।

ਸਭਿ ਸੁਖ ਮੁਕਤਿ ਨਾਮ ਧੁਨਿ ਬਾਣੀ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਉਰ ਧਾਰੀ ॥
सभि सुख मुकति नाम धुनि बाणी सचु नामु उर धारी ॥
सर्व सुख एवं मुक्ति हरिनामोच्चारण में ही है, अतः सच्चा नाम हृदय में बसा लिया है।

ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਨਹੀ ਛੂਟਸਿ ਨਾਨਕ ਸਾਚੀ ਤਰੁ ਤੂ ਤਾਰੀ ॥੯॥੭॥
नाम बिना नही छूटसि नानक साची तरु तू तारी ॥९॥७॥
हे नानक ! ईश्वर के नाम बिना किसी का छुटकारा नहीं होता, सच्चे नाम से ही संसार-सागर से पार हुआ जा सकता है॥ ६॥ ७॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
मारू महला १ ॥
मारू महला १॥

ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੰਜੋਗਿ ਉਪਾਏ ਰਕਤੁ ਬਿੰਦੁ ਮਿਲਿ ਪਿੰਡੁ ਕਰੇ ॥
मात पिता संजोगि उपाए रकतु बिंदु मिलि पिंडु करे ॥
माता-पिता के संयोग द्वारा रक्त एवं वीर्य के मिलन से शरीर बना था।

ਅੰਤਰਿ ਗਰਭ ਉਰਧਿ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਾਰੇ ਦਾਤਿ ਕਰੇ ॥੧॥
अंतरि गरभ उरधि लिव लागी सो प्रभु सारे दाति करे ॥१॥
माँ के गर्भ में उलटे पड़े जीव की सत्य में लगन लगी हुई थी, वह परमात्मा ही देखभाल करता एवं देता है॥ १॥

ਸੰਸਾਰੁ ਭਵਜਲੁ ਕਿਉ ਤਰੈ ॥
संसारु भवजलु किउ तरै ॥
संसार रूपी सागर से कैसे पार हुआ जा सकता है?

ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਪਾਈਐ ਅਫਰਿਓ ਭਾਰੁ ਅਫਾਰੁ ਟਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुरमुखि नामु निरंजनु पाईऐ अफरिओ भारु अफारु टरै ॥१॥ रहाउ ॥
यदि गुरु के सान्निध्य में पावन-नाम प्राप्त हो जाए तो अभिमानी जीव का पापों का भार दूर हो जाता है।॥ १॥ रहाउ॥

ਤੇ ਗੁਣ ਵਿਸਰਿ ਗਏ ਅਪਰਾਧੀ ਮੈ ਬਉਰਾ ਕਿਆ ਕਰਉ ਹਰੇ ॥
ते गुण विसरि गए अपराधी मै बउरा किआ करउ हरे ॥
हे ईश्वर ! मैं बावला क्या करूँ? मुझ अपराधी को तेरे सब उपकार भूल गए हैं।

ਤੂ ਦਾਤਾ ਦਇਆਲੁ ਸਭੈ ਸਿਰਿ ਅਹਿਨਿਸਿ ਦਾਤਿ ਸਮਾਰਿ ਕਰੇ ॥੨॥
तू दाता दइआलु सभै सिरि अहिनिसि दाति समारि करे ॥२॥
तू दयालु दाता है और दिन-रात देते हुए देखभाल करता है॥ २॥

ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਲੈ ਜਗਿ ਜਨਮਿਆ ਸਿਵ ਸਕਤੀ ਘਰਿ ਵਾਸੁ ਧਰੇ ॥
चारि पदारथ लै जगि जनमिआ सिव सकती घरि वासु धरे ॥
मानव ने धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की इच्छा लेकर जन्म लिया था, पर जीव रूपी शिव ने माया रूपी शक्ति के घर में वास कर लिया।

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