ਮੇਰੇ ਮਨ ਹਰਿ ਭਜੁ ਸਭ ਕਿਲਬਿਖ ਕਾਟ ॥
मेरे मन हरि भजु सभ किलबिख काट ॥
हे मेरे मन ! ईश्वर का भजन समूचे पाप-दोष काटने वाला है।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਉਰ ਧਾਰਿਓ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਮੇਰਾ ਸੀਸੁ ਕੀਜੈ ਗੁਰ ਵਾਟ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हरि हरि उर धारिओ गुरि पूरै मेरा सीसु कीजै गुर वाट ॥१॥ रहाउ ॥
पूर्ण गुरु ने तो हृदय में ही ईश्वर को स्थित कर दिया है, अतः मैं अपना शीश पूर्ण गुरु के मार्ग पर अर्पण करना चाहता हूँ॥ १॥ रहाउ॥
ਮੇਰੇ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਮੈ ਬਾਤ ਸੁਨਾਵੈ ਤਿਸੁ ਮਨੁ ਦੇਵਉ ਕਟਿ ਕਾਟ ॥
मेरे हरि प्रभ की मै बात सुनावै तिसु मनु देवउ कटि काट ॥
जो मुझे मेरे प्रभु की बात सुनाए, उसे मैं अपना मन काट-काटकर भेंट कर दूँगा।
ਹਰਿ ਸਾਜਨੁ ਮੇਲਿਓ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਗੁਰ ਬਚਨਿ ਬਿਕਾਨੋ ਹਟਿ ਹਾਟ ॥੧॥
हरि साजनु मेलिओ गुरि पूरै गुर बचनि बिकानो हटि हाट ॥१॥
पूर्ण गुरु ने मुझे सज्जन-प्रभु से मिला दिया है, इसलिए गुरु के वचन पर हाट-बाजार में बिकने को भी तैयार हूँ॥ १॥
ਮਕਰ ਪ੍ਰਾਗਿ ਦਾਨੁ ਬਹੁ ਕੀਆ ਸਰੀਰੁ ਦੀਓ ਅਧ ਕਾਟਿ ॥
मकर प्रागि दानु बहु कीआ सरीरु दीओ अध काटि ॥
चाहे किसी व्यक्ति ने मकर संक्रान्ति के समय प्रयाग तीर्थ पर बहुत दान-पुण्य किया हो, चाहे उसने काशी में जाकर आरे से अपना आधा शरीर कटवा दिया हो परन्तु
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ਕੋ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਵੈ ਬਹੁ ਕੰਚਨੁ ਦੀਜੈ ਕਟਿ ਕਾਟ ॥੨॥
बिनु हरि नाम को मुकति न पावै बहु कंचनु दीजै कटि काट ॥२॥
हरि-नाम के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती, चाहे उसने निर्धनों को स्वर्ण दान ही किया हो॥ २॥
ਹਰਿ ਕੀਰਤਿ ਗੁਰਮਤਿ ਜਸੁ ਗਾਇਓ ਮਨਿ ਉਘਰੇ ਕਪਟ ਕਪਾਟ ॥
हरि कीरति गुरमति जसु गाइओ मनि उघरे कपट कपाट ॥
गुरु के उपदेश द्वारा हरि-कीर्ति का यशोगान करने से मन को लगे हुए कपट कपाट भी खुल गए हैं।
ਤ੍ਰਿਕੁਟੀ ਫੋਰਿ ਭਰਮੁ ਭਉ ਭਾਗਾ ਲਜ ਭਾਨੀ ਮਟੁਕੀ ਮਾਟ ॥੩॥
त्रिकुटी फोरि भरमु भउ भागा लज भानी मटुकी माट ॥३॥
त्रिकुटी को फोड़कर भ्रम-भय भाग गया है और लोक लाज रूपी मटकी भी टूट गई है॥ ३॥
ਕਲਜੁਗਿ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਤਿਨ ਪਾਇਆ ਜਿਨ ਧੁਰਿ ਮਸਤਕਿ ਲਿਖੇ ਲਿਲਾਟ ॥
कलजुगि गुरु पूरा तिन पाइआ जिन धुरि मसतकि लिखे लिलाट ॥
कलियुग में पूर्ण गुरु उसने ही पाया है, जिसके माथे पर उत्तम भाग्य लिखा हुआ है।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਰਸੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆ ਸਭ ਲਾਥੀ ਭੂਖ ਤਿਖਾਟ ॥੪॥੬॥ ਛਕਾ ੧ ॥
जन नानक रसु अम्रितु पीआ सभ लाथी भूख तिखाट ॥४॥६॥ छका १ ॥
हे नानक ! जिसने नामामृत का रस पान किया है, उसकी सारी भूख एवं तृष्णा मिट गई है॥ ४॥ ६॥ छका १॥
ਮਾਲੀ ਗਉੜਾ ਮਹਲਾ ੫
माली गउड़ा महला ५
माली गउड़ा महला ५
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਰੇ ਮਨ ਟਹਲ ਹਰਿ ਸੁਖ ਸਾਰ ॥
रे मन टहल हरि सुख सार ॥
हे मन ! ईश्वर की सेवा परमसुख देने वाली है,
ਅਵਰ ਟਹਲਾ ਝੂਠੀਆ ਨਿਤ ਕਰੈ ਜਮੁ ਸਿਰਿ ਮਾਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
अवर टहला झूठीआ नित करै जमु सिरि मार ॥१॥ रहाउ ॥
अन्य सेवाएँ झूठी हैं और यमदूतों का दण्ड नित्य सिर पर सवार रहता है॥ १॥ रहाउ॥
ਜਿਨਾ ਮਸਤਕਿ ਲੀਖਿਆ ਤੇ ਮਿਲੇ ਸੰਗਾਰ ॥
जिना मसतकि लीखिआ ते मिले संगार ॥
जिनके मस्तक पर भाग्य लिखा है, वही सुसंगति में मिले हैं।
ਸੰਸਾਰੁ ਭਉਜਲੁ ਤਾਰਿਆ ਹਰਿ ਸੰਤ ਪੁਰਖ ਅਪਾਰ ॥੧॥
संसारु भउजलु तारिआ हरि संत पुरख अपार ॥१॥
परमपुरुष हरि के संतजनों ने संसार के लोगों को भवसागर से पार करवा दिया है॥ १॥
ਨਿਤ ਚਰਨ ਸੇਵਹੁ ਸਾਧ ਕੇ ਤਜਿ ਲੋਭ ਮੋਹ ਬਿਕਾਰ ॥
नित चरन सेवहु साध के तजि लोभ मोह बिकार ॥
लोभ, मोह एवं विकारों को छोड़कर नित्य साधु के चरणों की सेवा करनी चाहिए।
ਸਭ ਤਜਹੁ ਦੂਜੀ ਆਸੜੀ ਰਖੁ ਆਸ ਇਕ ਨਿਰੰਕਾਰ ॥੨॥
सभ तजहु दूजी आसड़ी रखु आस इक निरंकार ॥२॥
अन्य सभी अभिलाषाओं को छोड़कर एक परमेश्वर पर पूर्ण आस्था रखो॥२॥
ਇਕਿ ਭਰਮਿ ਭੂਲੇ ਸਾਕਤਾ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਅੰਧ ਅੰਧਾਰ ॥
इकि भरमि भूले साकता बिनु गुर अंध अंधार ॥
कोई प्रभु से विमुख भ्रम में भटकता रहता है और गुरु के बिना (उसके लिए) अज्ञान रूपी अँधेरा बना रहता है।
ਧੁਰਿ ਹੋਵਨਾ ਸੁ ਹੋਇਆ ਕੋ ਨ ਮੇਟਣਹਾਰ ॥੩॥
धुरि होवना सु होइआ को न मेटणहार ॥३॥
विधाता ने जो लिखा है, वही हुआ है और कोई भी उसे टाल नहीं सकता॥ ३॥
ਅਗਮ ਰੂਪੁ ਗੋਬਿੰਦ ਕਾ ਅਨਿਕ ਨਾਮ ਅਪਾਰ ॥
अगम रूपु गोबिंद का अनिक नाम अपार ॥
भगवान का रूप अगम्य है और उसके अनेकों ही अपार नाम हैं।
ਧਨੁ ਧੰਨੁ ਤੇ ਜਨ ਨਾਨਕਾ ਜਿਨ ਹਰਿ ਨਾਮਾ ਉਰਿ ਧਾਰ ॥੪॥੧॥
धनु धंनु ते जन नानका जिन हरि नामा उरि धार ॥४॥१॥
हे नानक ! वे भक्तजन धन्य एवं खुशनसीब हैं जिन्होंने हरि-नाम को अपने हृदय में धारण कर लिया है॥ ४॥ १॥
ਮਾਲੀ ਗਉੜਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
माली गउड़ा महला ५ ॥
माली गउड़ा महला ५॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਕਉ ਨਮਸਕਾਰ ॥
राम नाम कउ नमसकार ॥
उस राम नाम को हमारा नमन है,
ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਹੋਵਤ ਉਧਾਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जासु जपत होवत उधार ॥१॥ रहाउ ॥
जिसका जाप करने मात्र से उद्धार हो जाता है॥ १॥ रहाउ॥
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਮਿਟਹਿ ਧੰਧ ॥
जा कै सिमरनि मिटहि धंध ॥
जिसके सिमरन से उलझनें मिट जाती हैं,
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਛੂਟਹਿ ਬੰਧ ॥
जा कै सिमरनि छूटहि बंध ॥
जिसके स्मरण से बन्धनों से छुटकारा हो जाता है,
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਮੂਰਖ ਚਤੁਰ ॥
जा कै सिमरनि मूरख चतुर ॥
जिसे याद करने से मूर्ख भी चतुर बन जाता है,
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਕੁਲਹ ਉਧਰ ॥੧॥
जा कै सिमरनि कुलह उधर ॥१॥
जिसका मनन करने से सारी वंशावलि का उद्धार हो जाता है॥ १॥
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਭਉ ਦੁਖ ਹਰੈ ॥
जा कै सिमरनि भउ दुख हरै ॥
जिसके स्मरण से सारे भय-दुख नष्ट हो जाते हैं,
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਅਪਦਾ ਟਰੈ ॥
जा कै सिमरनि अपदा टरै ॥
जिसकी आराधना करने से विपत्ति टल जाती है,
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਮੁਚਤ ਪਾਪ ॥
जा कै सिमरनि मुचत पाप ॥
जिसके सिमरन से पाप नाश हो जाते हैं,
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਨਹੀ ਸੰਤਾਪ ॥੨॥
जा कै सिमरनि नही संताप ॥२॥
जिसका सिमरन करने से कोई दुख-संताप नहीं लगता॥ २॥
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਰਿਦ ਬਿਗਾਸ ॥
जा कै सिमरनि रिद बिगास ॥
जिसके स्मरण से हृदय प्रफुल्लित हो जाता है,”
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਕਵਲਾ ਦਾਸਿ ॥
जा कै सिमरनि कवला दासि ॥
जिसके स्मरण से धन की देवी लक्ष्मी दासी बन जाती है,
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਨਿਧਿ ਨਿਧਾਨ ॥
जा कै सिमरनि निधि निधान ॥
जिसके सिमरन से नौ निधियों के कोष मिल जाते हैं,
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਤਰੇ ਨਿਦਾਨ ॥੩॥
जा कै सिमरनि तरे निदान ॥३॥
जिसके सिमरन से जीव भवसागर से तैर जाता है।॥३॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨੁ ਨਾਮੁ ਹਰੀ ॥
पतित पावनु नामु हरी ॥
वह हरि-नाम पतितपावन है,
ਕੋਟਿ ਭਗਤ ਉਧਾਰੁ ਕਰੀ ॥
कोटि भगत उधारु करी ॥
जिसने करोड़ों भक्तों का उद्धार कर दिया है।
ਹਰਿ ਦਾਸ ਦਾਸਾ ਦੀਨੁ ਸਰਨ ॥ ਨਾਨਕ ਮਾਥਾ ਸੰਤ ਚਰਨ ॥੪॥੨॥
हरि दास दासा दीनु सरन ॥ नानक माथा संत चरन ॥४॥२॥
मुझ दीन ने भी हरि के दासों के दास की शरण ली है। नानक का कथन है कि हमारा माथा तो संतजनों के चरणों में ही रहता है।॥ ४॥ २॥
ਮਾਲੀ ਗਉੜਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
माली गउड़ा महला ५ ॥
माली गउड़ा महला ५॥
ਐਸੋ ਸਹਾਈ ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਮ ॥
ऐसो सहाई हरि को नाम ॥
हरि का नाम ऐसा मददगार है कि
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਭਜੁ ਪੂਰਨ ਕਾਮ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
साधसंगति भजु पूरन काम ॥१॥ रहाउ ॥
साधु-संगति में इसका भजन करने से सभी कार्य पूर्ण हो जाते हैं।॥ १॥ रहाउ॥
ਬੂਡਤ ਕਉ ਜੈਸੇ ਬੇੜੀ ਮਿਲਤ ॥
बूडत कउ जैसे बेड़ी मिलत ॥
जैसे डूब रहे आदमी को नैया मिल जाती है,