ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਵਤ ਦੇਵ ਸਬੈ ਮੁਨਿ ਇੰਦ੍ਰ ਮਹਾ ਸਿਵ ਜੋਗ ਕਰੀ ॥
अंतु न पावत देव सबै मुनि इंद्र महा सिव जोग करी ॥
उस गुरु का अन्त सभी देवी-देवता, मुनि स्वर्गाधिपति इंद्र एवं योग-साधना में लीन महादेव शिव भी नहीं पा सके।
ਫੁਨਿ ਬੇਦ ਬਿਰੰਚਿ ਬਿਚਾਰਿ ਰਹਿਓ ਹਰਿ ਜਾਪੁ ਨ ਛਾਡੵਿਉ ਏਕ ਘਰੀ ॥
फुनि बेद बिरंचि बिचारि रहिओ हरि जापु न छाड्यिउ एक घरी ॥
ब्रह्मा वेदों का चिंतन करता रहा, लेकिन उसने भी परमात्मा का जाप एक घड़ी भर नहीं छोड़ा।
ਮਥੁਰਾ ਜਨ ਕੋ ਪ੍ਰਭੁ ਦੀਨ ਦਯਾਲੁ ਹੈ ਸੰਗਤਿ ਸ੍ਰਿਸ੍ਟਿ ਨਿਹਾਲੁ ਕਰੀ ॥
मथुरा जन को प्रभु दीन दयालु है संगति स्रिस्टि निहालु करी ॥
सेवक मथुरा का प्रभु गुरु अर्जुन दीनदयालु है, वह संगत-मण्डली सहित सम्पूर्ण सृष्टि को निहाल कर रहा है।
ਰਾਮਦਾਸਿ ਗੁਰੂ ਜਗ ਤਾਰਨ ਕਉ ਗੁਰ ਜੋਤਿ ਅਰਜੁਨ ਮਾਹਿ ਧਰੀ ॥੪॥
रामदासि गुरू जग तारन कउ गुर जोति अरजुन माहि धरी ॥४॥
दुनिया का उद्धार करने के लिए गुरु रामदास ने अपनी ज्योति गुरु अर्जुन देव में प्रविष्ट की है॥४॥
ਜਗ ਅਉਰੁ ਨ ਯਾਹਿ ਮਹਾ ਤਮ ਮੈ ਅਵਤਾਰੁ ਉਜਾਗਰੁ ਆਨਿ ਕੀਅਉ ॥
जग अउरु न याहि महा तम मै अवतारु उजागरु आनि कीअउ ॥
जगत् में पापों से बचाने वाला उसके अतिरिक्त कोई नहीं, अतः ईश्वर ने गुरु अर्जुन देव के रूप में संसार में आकर अवतार धारण किया है।
ਤਿਨ ਕੇ ਦੁਖ ਕੋਟਿਕ ਦੂਰਿ ਗਏ ਮਥੁਰਾ ਜਿਨੑ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਪੀਅਉ ॥
तिन के दुख कोटिक दूरि गए मथुरा जिन्ह अम्रित नामु पीअउ ॥
मथुरा भाट का कथन है कि जिन लोगों ने गुरु-संगत में हरिनामामृत का पान किया है, उनके करोड़ों दुख दूर हो गए हैं।
ਇਹ ਪਧਤਿ ਤੇ ਮਤ ਚੂਕਹਿ ਰੇ ਮਨ ਭੇਦੁ ਬਿਭੇਦੁ ਨ ਜਾਨ ਬੀਅਉ ॥
इह पधति ते मत चूकहि रे मन भेदु बिभेदु न जान बीअउ ॥
हे सज्जनो ! इस सच्चाई से मत चूकना, कहीं यह भेद न मान लेना कि गुरु अर्जुन ईश्वर से भिन्न हैं।
ਪਰਤਛਿ ਰਿਦੈ ਗੁਰ ਅਰਜੁਨ ਕੈ ਹਰਿ ਪੂਰਨ ਬ੍ਰਹਮਿ ਨਿਵਾਸੁ ਲੀਅਉ ॥੫॥
परतछि रिदै गुर अरजुन कै हरि पूरन ब्रहमि निवासु लीअउ ॥५॥
गुरु अर्जुन देव जी के हृदय में तो साक्षात् पूर्ण ब्रह्म ने निवास किया हुआ है।॥५॥
ਜਬ ਲਉ ਨਹੀ ਭਾਗ ਲਿਲਾਰ ਉਦੈ ਤਬ ਲਉ ਭ੍ਰਮਤੇ ਫਿਰਤੇ ਬਹੁ ਧਾਯਉ ॥
जब लउ नही भाग लिलार उदै तब लउ भ्रमते फिरते बहु धायउ ॥
जब तक माथे पर भाग्योदय नहीं हुआ, तब तक हम बहुत भटकते रहै।
ਕਲਿ ਘੋਰ ਸਮੁਦ੍ਰ ਮੈ ਬੂਡਤ ਥੇ ਕਬਹੂ ਮਿਟਿ ਹੈ ਨਹੀ ਰੇ ਪਛੁਤਾਯਉ ॥
कलि घोर समुद्र मै बूडत थे कबहू मिटि है नही रे पछुतायउ ॥
कलियुग के घोर समुद्र में डूब रहे थे और संसार समुद्र में डूबने का पश्चाताप कभी मिट नहीं रहा था।
ਤਤੁ ਬਿਚਾਰੁ ਯਹੈ ਮਥੁਰਾ ਜਗ ਤਾਰਨ ਕਉ ਅਵਤਾਰੁ ਬਨਾਯਉ ॥
ततु बिचारु यहै मथुरा जग तारन कउ अवतारु बनायउ ॥
भाट मथुरा का कथन है कि सच्ची बात यही है कि दुनिया का उद्धार करने के लिए ईश्वर ने गुरु अर्जुन देव के रूप में अवतार धारण किया।
ਜਪੵਉ ਜਿਨੑ ਅਰਜੁਨ ਦੇਵ ਗੁਰੂ ਫਿਰਿ ਸੰਕਟ ਜੋਨਿ ਗਰਭ ਨ ਆਯਉ ॥੬॥
जप्यउ जिन्ह अरजुन देव गुरू फिरि संकट जोनि गरभ न आयउ ॥६॥
जिन्होंने गुरु अर्जुन देव जी का जाप किया, वे पुनः गर्भ योनि के संकट में नहीं आए ॥६ ॥
ਕਲਿ ਸਮੁਦ੍ਰ ਭਏ ਰੂਪ ਪ੍ਰਗਟਿ ਹਰਿ ਨਾਮ ਉਧਾਰਨੁ ॥
कलि समुद्र भए रूप प्रगटि हरि नाम उधारनु ॥
कलियुग के समुद्र से संसार को मुक्त करने के लिए गुरु अर्जुन देव जी ईश्वर के रूप में प्रगट हुए हैं।
ਬਸਹਿ ਸੰਤ ਜਿਸੁ ਰਿਦੈ ਦੁਖ ਦਾਰਿਦ੍ਰ ਨਿਵਾਰਨੁ ॥
बसहि संत जिसु रिदै दुख दारिद्र निवारनु ॥
जिनके हृदय में शान्ति एवं सत्य का स्रोत बस रहा है, वे दुख-दारिद्रय का निवारण करने वाला है।
ਨਿਰਮਲ ਭੇਖ ਅਪਾਰ ਤਾਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
निरमल भेख अपार तासु बिनु अवरु न कोई ॥
वे निर्मल हरि रूप हैं, उनके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं।
ਮਨ ਬਚ ਜਿਨਿ ਜਾਣਿਅਉ ਭਯਉ ਤਿਹ ਸਮਸਰਿ ਸੋਈ ॥
मन बच जिनि जाणिअउ भयउ तिह समसरि सोई ॥
जिसने मन वचन से माना है, वह उस जैसा ही हो गया है।
ਧਰਨਿ ਗਗਨ ਨਵ ਖੰਡ ਮਹਿ ਜੋਤਿ ਸ੍ਵਰੂਪੀ ਰਹਿਓ ਭਰਿ ॥
धरनि गगन नव खंड महि जोति स्वरूपी रहिओ भरि ॥
धरती, आकाश, नौ खण्डों में ज्योति स्वरूप (गुरु अर्जुन) ही विद्यमान है।
ਭਨਿ ਮਥੁਰਾ ਕਛੁ ਭੇਦੁ ਨਹੀ ਗੁਰੁ ਅਰਜੁਨੁ ਪਰਤਖੵ ਹਰਿ ॥੭॥੧੯॥
भनि मथुरा कछु भेदु नही गुरु अरजुनु परतख्य हरि ॥७॥१९॥
मथुरा भाट का कथन है कि गुरु अर्जुन देव साक्षात् परमात्मा हैं, इसमें कोई फर्क नहीं ॥७ ॥१६ ॥
ਅਜੈ ਗੰਗ ਜਲੁ ਅਟਲੁ ਸਿਖ ਸੰਗਤਿ ਸਭ ਨਾਵੈ ॥
अजै गंग जलु अटलु सिख संगति सभ नावै ॥
गुरु अर्जुन देव जी के पास (हरिनामामृत रूप में) अटल एवं अजय गंगाजल बह रहा है, और समूची शिष्य मण्डली नित्य इसमें स्नान करती है।
ਨਿਤ ਪੁਰਾਣ ਬਾਚੀਅਹਿ ਬੇਦ ਬ੍ਰਹਮਾ ਮੁਖਿ ਗਾਵੈ ॥
नित पुराण बाचीअहि बेद ब्रहमा मुखि गावै ॥
गुरु दरबार में नित्य हरिनाम का जाप, वाणी रूप पुराणों का पठन हो रहा है और ब्रह्मा मुख से वेद गा रहा है अर्थात् गुरु की वाणी पुराण-वेद हैं।
ਅਜੈ ਚਵਰੁ ਸਿਰਿ ਢੁਲੈ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਮੁਖਿ ਲੀਅਉ ॥
अजै चवरु सिरि ढुलै नामु अम्रितु मुखि लीअउ ॥
गुरु के शीश पर अजय चैवर झूलता है और वे मुख से हरि-नामामृत का कीर्तन करते हैं।
ਗੁਰ ਅਰਜੁਨ ਸਿਰਿ ਛਤ੍ਰੁ ਆਪਿ ਪਰਮੇਸਰਿ ਦੀਅਉ ॥
गुर अरजुन सिरि छत्रु आपि परमेसरि दीअउ ॥
वस्तुतः गुरु अर्जुन देव के शीश पर यह छत्र स्वयं परमेश्वर ने ही सौंपा है।
ਮਿਲਿ ਨਾਨਕ ਅੰਗਦ ਅਮਰ ਗੁਰ ਗੁਰੁ ਰਾਮਦਾਸੁ ਹਰਿ ਪਹਿ ਗਯਉ ॥
मिलि नानक अंगद अमर गुर गुरु रामदासु हरि पहि गयउ ॥
श्री गुरु नानक देव जी, श्री गुरु अंगद देव जी, श्री गुरु अमरदास जी (तदन्तर) श्री गुरु रामदास ऑकार स्वरूप परमेश्वर में विलीन हो गए।
ਹਰਿਬੰਸ ਜਗਤਿ ਜਸੁ ਸੰਚਰੵਉ ਸੁ ਕਵਣੁ ਕਹੈ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੁ ਮੁਯਉ ॥੧॥
हरिबंस जगति जसु संचर्यउ सु कवणु कहै स्री गुरु मुयउ ॥१॥
हरिबंस का कथन है कि पूरे जगत में गुरु का यश फैल गया है, अतः कोई नहीं कह सकता कि गुरु (रामदास जी) संसार में नहीं ॥ १ ॥
ਦੇਵ ਪੁਰੀ ਮਹਿ ਗਯਉ ਆਪਿ ਪਰਮੇਸ੍ਵਰ ਭਾਯਉ ॥
देव पुरी महि गयउ आपि परमेस्वर भायउ ॥
श्री गुरु रामदास जी देवपुरी वैकुण्ठ में चले गए, यह स्वयं परमेश्वर की रज़ा से हुआ।
ਹਰਿ ਸਿੰਘਾਸਣੁ ਦੀਅਉ ਸਿਰੀ ਗੁਰੁ ਤਹ ਬੈਠਾਯਉ ॥
हरि सिंघासणु दीअउ सिरी गुरु तह बैठायउ ॥
ईश्वर ने सिंहासन देकर श्री गुरु रामदास जी को विराजमान किया।
ਰਹਸੁ ਕੀਅਉ ਸੁਰ ਦੇਵ ਤੋਹਿ ਜਸੁ ਜਯ ਜਯ ਜੰਪਹਿ ॥
रहसु कीअउ सुर देव तोहि जसु जय जय ज्मपहि ॥
देवताओं ने मंगलगान किया और यश गाते हुए वे जय-जयकार करने लगे।
ਅਸੁਰ ਗਏ ਤੇ ਭਾਗਿ ਪਾਪ ਤਿਨੑ ਭੀਤਰਿ ਕੰਪਹਿ ॥
असुर गए ते भागि पाप तिन्ह भीतरि क्मपहि ॥
असुर सब भाग गए और उनके पाप मन में कांपने लगे।
ਕਾਟੇ ਸੁ ਪਾਪ ਤਿਨੑ ਨਰਹੁ ਕੇ ਗੁਰੁ ਰਾਮਦਾਸੁ ਜਿਨੑ ਪਾਇਯਉ ॥
काटे सु पाप तिन्ह नरहु के गुरु रामदासु जिन्ह पाइयउ ॥
जिन्होंने श्री गुरु रामदास जी को प्राप्त किया है, उन लोगों के सब पाप कट गए हैं।
ਛਤ੍ਰੁ ਸਿੰਘਾਸਨੁ ਪਿਰਥਮੀ ਗੁਰ ਅਰਜੁਨ ਕਉ ਦੇ ਆਇਅਉ ॥੨॥੨੧॥੯॥੧੧॥੧੦॥੧੦॥੨੨॥੬੦॥੧੪੩॥
छत्रु सिंघासनु पिरथमी गुर अरजुन कउ दे आइअउ ॥२॥२१॥९॥११॥१०॥१०॥२२॥६०॥१४३॥
इस तरह श्री गुरु रामदास जी पृथ्वी का छत्र व सिंहासन गुरु अर्जुन देव जी को सौंप आए हैं।॥२॥२१॥ ६ ॥११ ॥१० ॥ १० ॥२२ ॥६० ॥१४३ ॥