ਤੁਮ੍ਹ੍ਹ ਸਮਰਥਾ ਕਾਰਨ ਕਰਨ ॥
तुम्ह समरथा कारन करन ॥
हे गोविंद ! तू समर्थ एवं सर्वकर्ता है,
ਢਾਕਨ ਢਾਕਿ ਗੋਬਿਦ ਗੁਰ ਮੇਰੇ ਮੋਹਿ ਅਪਰਾਧੀ ਸਰਨ ਚਰਨ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ढाकन ढाकि गोबिद गुर मेरे मोहि अपराधी सरन चरन ॥१॥ रहाउ ॥
मेरे अवगुण ढंक ले, मैं अपराधी तेरे चरणों की शरण में आया हूँ॥ १ ॥ रहाउ ॥
ਜੋ ਜੋ ਕੀਨੋ ਸੋ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹ ਜਾਨਿਓ ਪੇਖਿਓ ਠਉਰ ਨਾਹੀ ਕਛੁ ਢੀਠ ਮੁਕਰਨ ॥
जो जो कीनो सो तुम्ह जानिओ पेखिओ ठउर नाही कछु ढीठ मुकरन ॥
जो कुछ भी मैंने किया है, उसे तूने देख जान लिया है और मुझ ढीठ को मुकरने के लिए भी कोई राह नहीं।
ਬਡ ਪਰਤਾਪੁ ਸੁਨਿਓ ਪ੍ਰਭ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹਰੋ ਕੋਟਿ ਅਘਾ ਤੇਰੋ ਨਾਮ ਹਰਨ ॥੧॥
बड परतापु सुनिओ प्रभ तुम्हरो कोटि अघा तेरो नाम हरन ॥१॥
हे प्रभु ! मैंने सुना है कि सारे जगत् में तेरा बड़ा प्रताप है और तेरा नाम करोड़ों पापों को नाश कर देता है॥ १ ॥
ਹਮਰੋ ਸਹਾਉ ਸਦਾ ਸਦ ਭੂਲਨ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹਰੋ ਬਿਰਦੁ ਪਤਿਤ ਉਧਰਨ ॥
हमरो सहाउ सदा सद भूलन तुम्हरो बिरदु पतित उधरन ॥
मेरा स्वभाव है कि मैं सदैव गलतियाँ करता रहता हूँ और तेरा धर्म पतितों का उद्धार करना है।
ਕਰੁਣਾ ਮੈ ਕਿਰਪਾਲ ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਿਧਿ ਜੀਵਨ ਪਦ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਦਰਸਨ ॥੨॥੨॥੧੧੮॥
करुणा मै किरपाल क्रिपा निधि जीवन पद नानक हरि दरसन ॥२॥२॥११८॥
नानक विनती करता है कि हे करुणामय, हे कृपालु, हे कृपानिधि, हे श्री हरि ! तेरे दर्शन ही जीवन देने वाले हैं।॥ २॥ २॥ ११८॥
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਐਸੀ ਕਿਰਪਾ ਮੋਹਿ ਕਰਹੁ ॥
ऐसी किरपा मोहि करहु ॥
हे ईश्वर ! मुझ पर ऐसी कृपा करो कि
ਸੰਤਹ ਚਰਣ ਹਮਾਰੋ ਮਾਥਾ ਨੈਨ ਦਰਸੁ ਤਨਿ ਧੂਰਿ ਪਰਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
संतह चरण हमारो माथा नैन दरसु तनि धूरि परहु ॥१॥ रहाउ ॥
मेरा माथा संतों के चरणों में पड़ा रहे, यह आँखें उनके दर्शन करें और तन पर उनकी चरण-धूलि पड़ी रहे॥ १॥ रहाउ॥
ਗੁਰ ਕੋ ਸਬਦੁ ਮੇਰੈ ਹੀਅਰੈ ਬਾਸੈ ਹਰਿ ਨਾਮਾ ਮਨ ਸੰਗਿ ਧਰਹੁ ॥
गुर को सबदु मेरै हीअरै बासै हरि नामा मन संगि धरहु ॥
गुरु का शब्द मेरे हृदय में बसा रहे और मन हरि-नाम में लीन रहे।
ਤਸਕਰ ਪੰਚ ਨਿਵਾਰਹੁ ਠਾਕੁਰ ਸਗਲੋ ਭਰਮਾ ਹੋਮਿ ਜਰਹੁ ॥੧॥
तसकर पंच निवारहु ठाकुर सगलो भरमा होमि जरहु ॥१॥
हे ठाकुर जी ! कामादिक पाँच तस्करों को मुझ से दूर कर दो और सारे भ्रम आग में जला दो ॥ १ ॥
ਜੋ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹ ਕਰਹੁ ਸੋਈ ਭਲ ਮਾਨੈ ਭਾਵਨੁ ਦੁਬਿਧਾ ਦੂਰਿ ਟਰਹੁ ॥
जो तुम्ह करहु सोई भल मानै भावनु दुबिधा दूरि टरहु ॥
जो कुछ तुम करो, उसे ही मैं भला मानूं और मेरी दुविधा एवं लालसा को दूर कर दो।
ਨਾਨਕ ਕੇ ਪ੍ਰਭ ਤੁਮ ਹੀ ਦਾਤੇ ਸੰਤਸੰਗਿ ਲੇ ਮੋਹਿ ਉਧਰਹੁ ॥੨॥੩॥੧੧੯॥
नानक के प्रभ तुम ही दाते संतसंगि ले मोहि उधरहु ॥२॥३॥११९॥
हे प्रभु! तुम ही नानक के दाता हो, इसलिए संतों के संग मिलाकर मेरा उद्धार कर दो ॥ २ ॥ ३ ॥ ११६ ॥
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਐਸੀ ਦੀਖਿਆ ਜਨ ਸਿਉ ਮੰਗਾ ॥
ऐसी दीखिआ जन सिउ मंगा ॥
हे परमेश्वर ! तेरे संतजनों से ऐसी दीक्षा माँगता हूँ कि
ਤੁਮ੍ਹ੍ਹਰੋ ਧਿਆਨੁ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹਾਰੋ ਰੰਗਾ ॥
तुम्हरो धिआनु तुम्हारो रंगा ॥
मैं तेरे ही ध्यान एवं तेरे ही रंग में लीन रहूँ।
ਤੁਮ੍ਹ੍ਹਰੀ ਸੇਵਾ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹਾਰੇ ਅੰਗਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तुम्हरी सेवा तुम्हारे अंगा ॥१॥ रहाउ ॥
में तेरी ही भक्ति करता रहूँ और तेरे चरणों में ही लीन रहूँ॥ १॥ रहाउ॥
ਜਨ ਕੀ ਟਹਲ ਸੰਭਾਖਨੁ ਜਨ ਸਿਉ ਊਠਨੁ ਬੈਠਨੁ ਜਨ ਕੈ ਸੰਗਾ ॥
जन की टहल स्मभाखनु जन सिउ ऊठनु बैठनु जन कै संगा ॥
संतों की टहल-सेवा, उनके साथ संभाषण, उनके साथ मेल-मिलाप एवं साथ सदैव बना रहे।
ਜਨ ਚਰ ਰਜ ਮੁਖਿ ਮਾਥੈ ਲਾਗੀ ਆਸਾ ਪੂਰਨ ਅਨੰਤ ਤਰੰਗਾ ॥੧॥
जन चर रज मुखि माथै लागी आसा पूरन अनंत तरंगा ॥१॥
उनकी चरणरज मेरे मुँह एवं माथे पर लग गई है, जिससे अनेक तरंगें पैदा करने वाली कामनाएँ पूरी हो गई हैं।॥ १ ॥
ਜਨ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਜਾ ਕੀ ਨਿਰਮਲ ਮਹਿਮਾ ਜਨ ਕੇ ਚਰਨ ਤੀਰਥ ਕੋਟਿ ਗੰਗਾ ॥
जन पारब्रहम जा की निरमल महिमा जन के चरन तीरथ कोटि गंगा ॥
परब्रह्म के संतजनों की महिमा इतनी पावन है कि उनके चरण ही गंगा की तरह करोड़ों तीर्थ स्थान हैं।
ਜਨ ਕੀ ਧੂਰਿ ਕੀਓ ਮਜਨੁ ਨਾਨਕ ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਹਰੇ ਕਲੰਗਾ ॥੨॥੪॥੧੨੦॥
जन की धूरि कीओ मजनु नानक जनम जनम के हरे कलंगा ॥२॥४॥१२०॥
हे नानक ! उनकी चरण-धूलि में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के कलंक दूर हो जाते हैं॥ २॥ ४॥ १२०॥
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਮੋਹਿ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ॥
जिउ भावै तिउ मोहि प्रतिपाल ॥
जैसे तुझे भाता है, वैसे ही हमारा पालन-पोषण करो।
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪਰਮੇਸਰ ਸਤਿਗੁਰ ਹਮ ਬਾਰਿਕ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹ ਪਿਤਾ ਕਿਰਪਾਲ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
पारब्रहम परमेसर सतिगुर हम बारिक तुम्ह पिता किरपाल ॥१॥ रहाउ ॥
हे परब्रह्म परमेश्वर सतगुरु ! हम बालक हैं और तुम हमारे कृपालु पिता हो।॥ १॥ रहाउ॥
ਮੋਹਿ ਨਿਰਗੁਣ ਗੁਣੁ ਨਾਹੀ ਕੋਈ ਪਹੁਚਿ ਨ ਸਾਕਉ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹਰੀ ਘਾਲ ॥
मोहि निरगुण गुणु नाही कोई पहुचि न साकउ तुम्हरी घाल ॥
मैं तो निर्गुण हूँ, मुझ में कोई गुण नहीं और मैं तेरी साधना तक पहुँच नहीं सकता।
ਤੁਮਰੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਤੁਮ ਹੀ ਜਾਨਹੁ ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤੁਮਰੋ ਮਾਲ ॥੧॥
तुमरी गति मिति तुम ही जानहु जीउ पिंडु सभु तुमरो माल ॥१॥
अपनी गति तुम ही जानते हो, यह जीवन, शरीर सबकुछ तेरी संपत्ति है॥ १॥
ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਪੁਰਖ ਸੁਆਮੀ ਅਨਬੋਲਤ ਹੀ ਜਾਨਹੁ ਹਾਲ ॥
अंतरजामी पुरख सुआमी अनबोलत ही जानहु हाल ॥
हे अन्तर्यामी स्वामी ! बिना बोले ही तू सारा हाल जानता है।
ਤਨੁ ਮਨੁ ਸੀਤਲੁ ਹੋਇ ਹਮਾਰੋ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਜੀਉ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲ ॥੨॥੫॥੧੨੧॥
तनु मनु सीतलु होइ हमारो नानक प्रभ जीउ नदरि निहाल ॥२॥५॥१२१॥
नानक प्रार्थना करता है कि हे प्रभु जी ! यदि तेरी कृपा-दृष्टि हो जाए तो हमारा तन-मन शीतल शांत हो ॥२॥५॥१२१॥
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਰਾਖੁ ਸਦਾ ਪ੍ਰਭ ਅਪਨੈ ਸਾਥ ॥
राखु सदा प्रभ अपनै साथ ॥
हे प्रभु ! मुझे सदैव अपने साथ रखो।
ਤੂ ਹਮਰੋ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਮਨਮੋਹਨੁ ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਜੀਵਨੁ ਸਗਲ ਅਕਾਥ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तू हमरो प्रीतमु मनमोहनु तुझ बिनु जीवनु सगल अकाथ ॥१॥ रहाउ ॥
तू ही मेरा प्रियतम, मनमोहन है और तेरे बिना पूरा जीवन ही बेकार है॥ १॥ रहाउ॥
ਰੰਕ ਤੇ ਰਾਉ ਕਰਤ ਖਿਨ ਭੀਤਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰੋ ਅਨਾਥ ਕੋ ਨਾਥ ॥
रंक ते राउ करत खिन भीतरि प्रभु मेरो अनाथ को नाथ ॥
मेरा प्रभु अनाथों का नाथ है, यदि उसकी इच्छा हो तो वह क्षण में ही जीव को भिखारी से राजा बना देता है।
ਜਲਤ ਅਗਨਿ ਮਹਿ ਜਨ ਆਪਿ ਉਧਾਰੇ ਕਰਿ ਅਪੁਨੇ ਦੇ ਰਾਖੇ ਹਾਥ ॥੧॥
जलत अगनि महि जन आपि उधारे करि अपुने दे राखे हाथ ॥१॥
वह जलती आग में भी हाथ रखकर भक्तों की रक्षा करता आया है॥ १॥
ਸੀਤਲ ਸੁਖੁ ਪਾਇਓ ਮਨ ਤ੍ਰਿਪਤੇ ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਸ੍ਰਮ ਸਗਲੇ ਲਾਥ ॥
सीतल सुखु पाइओ मन त्रिपते हरि सिमरत स्रम सगले लाथ ॥
भगवान का सिमरन करने से सब दुख दूर होते हैं, मन तृप्त एवं बड़ा सुख प्राप्त होता है।
ਨਿਧਿ ਨਿਧਾਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਸੇਵਾ ਅਵਰ ਸਿਆਨਪ ਸਗਲ ਅਕਾਥ ॥੨॥੬॥੧੨੨॥
निधि निधान नानक हरि सेवा अवर सिआनप सगल अकाथ ॥२॥६॥१२२॥
हे नानक ! सर्व निधियों के भण्डार परमात्मा की भक्ति करो, शेष सब चतुराईयाँ व्यर्थ हैं॥ २॥ ६ ॥ १२२ ॥