Hindi Page 1067

ਆਪੇ ਸਚਾ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਏ ॥
आपे सचा सबदि मिलाए ॥
वह स्वयं ही शब्द-गुरु से मिलाता है और

ਸਬਦੇ ਵਿਚਹੁ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ॥
सबदे विचहु भरमु चुकाए ॥
शब्द-गुरु मन के अहं को मिटा देता है।

ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਨਾਮੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੬॥੮॥੨੨॥
नानक नामि मिलै वडिआई नामे ही सुखु पाइदा ॥१६॥८॥२२॥
हे नानक ! परमात्मा के नाम से ही बड़ाई मिलती है और नाम से ही सुख हासिल होता है।॥१६॥ ८॥ २२॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
मारू महला ३ ॥
मारू महला ३॥

ਅਗਮ ਅਗੋਚਰ ਵੇਪਰਵਾਹੇ ॥
अगम अगोचर वेपरवाहे ॥
मन-वाणी से परे परमपिता परमेश्वर बे-परवाह है,”

ਆਪੇ ਮਿਹਰਵਾਨ ਅਗਮ ਅਥਾਹੇ ॥
आपे मिहरवान अगम अथाहे ॥
वह स्वयं ही मेहरवान, अगम्य एवं अथाह है।

ਅਪੜਿ ਕੋਇ ਨ ਸਕੈ ਤਿਸ ਨੋ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮੇਲਾਇਆ ॥੧॥
अपड़ि कोइ न सकै तिस नो गुर सबदी मेलाइआ ॥१॥
उस तक कोई पहुँच नहीं सकता और शब्द-गुरु द्वारा मिला लेता है॥ १॥

ਤੁਧੁਨੋ ਸੇਵਹਿ ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵਹਿ ॥
तुधुनो सेवहि जो तुधु भावहि ॥
हे परमेश्वर ! जो तुझे भाते हैं, वही तेरी उपासना करते हैं और

ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਸਚਿ ਸਮਾਵਹਿ ॥
गुर कै सबदे सचि समावहि ॥
गुरु के शब्द द्वारा सत्य में विलीन रहते हैं।

ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਣ ਰਵਹਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਰਸਨਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਭਾਇਆ ॥੨॥
अनदिनु गुण रवहि दिनु राती रसना हरि रसु भाइआ ॥२॥
वे नित्य तेरा गुणगान करते हैं और उनकी जिव्हा को हरि-नाम रस ही भाया है॥ २॥

ਸਬਦਿ ਮਰਹਿ ਸੇ ਮਰਣੁ ਸਵਾਰਹਿ ॥
सबदि मरहि से मरणु सवारहि ॥
जो शब्द-गुरु द्वारा अहम् को मार लेते हैं,”

ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਹਿਰਦੈ ਉਰ ਧਾਰਹਿ ॥
हरि के गुण हिरदै उर धारहि ॥
वे अपने मरण को सँवार लेते हैं और भगवान के गुणों को हृदय में धारण कर लेते हैं।

ਜਨਮੁ ਸਫਲੁ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਲਾਗੇ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਚੁਕਾਇਆ ॥੩॥
जनमु सफलु हरि चरणी लागे दूजा भाउ चुकाइआ ॥३॥
प्रभु -चरणों में लगकर उनका जन्म सफल हो गया है और द्वैतभाव मिट गया है॥ ३॥

ਹਰਿ ਜੀਉ ਮੇਲੇ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
हरि जीउ मेले आपि मिलाए ॥
ईश्वर स्वयं ही उन्हें अपने साथ मिला लेता है,”

ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
गुर कै सबदे आपु गवाए ॥
जो व्यक्ति गुरु के शब्द द्वारा अपने अहम् को दूर कर देते हैं,”

ਅਨਦਿਨੁ ਸਦਾ ਹਰਿ ਭਗਤੀ ਰਾਤੇ ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਲਾਹਾ ਪਾਇਆ ॥੪॥
अनदिनु सदा हरि भगती राते इसु जग महि लाहा पाइआ ॥४॥
ऐसे व्यक्ति सदा परमात्मा कां भक्ति में लीन रहते हैं और इस जगत् में उन्होंने लाभ प्राप्त किया है॥ ४॥

ਤੇਰੇ ਗੁਣ ਕਹਾ ਮੈ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥
तेरे गुण कहा मै कहणु न जाई ॥
हे प्रभु ! मैं तेरे गुण वर्णन करना चाहता हूँ लेकिन मुझ से वर्णन नहीं किए जा सकते।

ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥
अंतु न पारा कीमति नही पाई ॥
तेरा कोई अन्त नहीं है, न ही कोई आर पार है और किसी ने भी तेरी सही कीमत नहीं आँकी।

ਆਪੇ ਦਇਆ ਕਰੇ ਸੁਖਦਾਤਾ ਗੁਣ ਮਹਿ ਗੁਣੀ ਸਮਾਇਆ ॥੫॥
आपे दइआ करे सुखदाता गुण महि गुणी समाइआ ॥५॥
जब सुखदाता परमेश्वर स्वयं ही दया करता है तो जीव गुणनिधान के गुणों में लीन हो जाता है ॥५॥

ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਮੋਹੁ ਹੈ ਪਾਸਾਰਾ ॥
इसु जग महि मोहु है पासारा ॥
इस जगत् में चारों ओर मोह ही फैला हुआ है और

ਮਨਮੁਖੁ ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧੁ ਅੰਧਾਰਾ ॥
मनमुखु अगिआनी अंधु अंधारा ॥
अज्ञानी मनमुखी जीव अज्ञानता के अन्धकार में ही भटकता रहता है।

ਧੰਧੈ ਧਾਵਤੁ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੬॥
धंधै धावतु जनमु गवाइआ बिनु नावै दुखु पाइआ ॥६॥
संसार के धंधों में भागदौड़ करते हुए उसने अपना जन्म व्यर्थ गंवा लिया है और नाम के बिना दुख ही पाया है॥ ६॥

ਕਰਮੁ ਹੋਵੈ ਤਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਏ ॥
करमु होवै ता सतिगुरु पाए ॥
अगर प्रभु-कृपा हो जाए तो वह सतगुरु को पा लेता है और

ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਸਬਦਿ ਜਲਾਏ ॥
हउमै मैलु सबदि जलाए ॥
वह शब्द गुरु द्वारा अपने अहम् की मैल को साफ कर लेता है।

ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਗਿਆਨੁ ਰਤਨੁ ਚਾਨਣੁ ਅਗਿਆਨੁ ਅੰਧੇਰੁ ਗਵਾਇਆ ॥੭॥
मनु निरमलु गिआनु रतनु चानणु अगिआनु अंधेरु गवाइआ ॥७॥
उसका मन निर्मल हो जाता है, जिसमें ज्ञान-रत्न का आलोक हो जाता है और अज्ञानता का अंधेरा मिट जाता है॥ ७॥

ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਅਨੇਕ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥
तेरे नाम अनेक कीमति नही पाई ॥
तेरे नाम अनेक हैं और किसी ने भी उनकी सही कीमत नहीं आँकी।

ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਹਿਰਦੈ ਵਸਾਈ ॥
सचु नामु हरि हिरदै वसाई ॥
तेरे सत्य-नाम को अपने हृदय में बसा लिया है।

ਕੀਮਤਿ ਕਉਣੁ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੀ ਤੂ ਆਪੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਇਆ ॥੮॥
कीमति कउणु करे प्रभ तेरी तू आपे सहजि समाइआ ॥८॥
हे प्रभु ! तेरी सही कीमत कौन कर सकता है, तू स्वयं ही परमानंद में समाया हुआ है।॥ ८॥

ਨਾਮੁ ਅਮੋਲਕੁ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ॥
नामु अमोलकु अगम अपारा ॥
तेरा अमूल्य नाम अगम्य-अपार है और

ਨਾ ਕੋ ਹੋਆ ਤੋਲਣਹਾਰਾ ॥
ना को होआ तोलणहारा ॥
इसे तोलने वाला कोई नहीं हुआ है।

ਆਪੇ ਤੋਲੇ ਤੋਲਿ ਤੋਲਾਏ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮੇਲਿ ਤੋਲਾਇਆ ॥੯॥
आपे तोले तोलि तोलाए गुर सबदी मेलि तोलाइआ ॥९॥
तू खुद ही इसे तोलता है और जीवों से तौल कर तुलवाता है, तूने शब्द-गुरु से मिलाकर उनसे नाम को तुलवाया है॥ ९॥

ਸੇਵਕ ਸੇਵਹਿ ਕਰਹਿ ਅਰਦਾਸਿ ॥
सेवक सेवहि करहि अरदासि ॥
सेवक तेरी सेवा-भक्ति में रत होकर तुझसे ही प्रार्थना करते हैं और

ਤੂ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਬਹਾਲਹਿ ਪਾਸਿ ॥
तू आपे मेलि बहालहि पासि ॥
तू उन्हें मिलाकर अपने पास बिठाता है।

ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ਪੂਰੈ ਕਰਮਿ ਧਿਆਇਆ ॥੧੦॥
सभना जीआ का सुखदाता पूरै करमि धिआइआ ॥१०॥
सब जीवों को सुख देने वाला दाता केवल तू ही है और किसी विरले ने पूर्ण भाग्य से ही तेरा ध्यान किया है॥ १०॥

ਜਤੁ ਸਤੁ ਸੰਜਮੁ ਜਿ ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ॥
जतु सतु संजमु जि सचु कमावै ॥
यदि कोई सत्य का आचरण अपनाता है तो उसे तपश्चर्या, सदाचार एवं संयम इत्यादि शुभ कर्मों का फल मिल जाता है।

ਇਹੁ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਜਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥
इहु मनु निरमलु जि हरि गुण गावै ॥
यदि कोई परमात्मा के गुण गाता है तो उसका मन निर्मल हो जाता है और

ਇਸੁ ਬਿਖੁ ਮਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਵੈ ਹਰਿ ਜੀਉ ਮੇਰੇ ਭਾਇਆ ॥੧੧॥
इसु बिखु महि अम्रितु परापति होवै हरि जीउ मेरे भाइआ ॥११॥
माया रूपी विष में विचरन करते हुए ही उसे नामामृत प्राप्त हो जाता है, मेरे परमेश्वर को यही भाया है॥ ११॥

ਜਿਸ ਨੋ ਬੁਝਾਏ ਸੋਈ ਬੂਝੈ ॥
जिस नो बुझाए सोई बूझै ॥
जिसे वह ज्ञान देता है, वही बूझता है।

ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਅੰਦਰੁ ਸੂਝੈ ॥
हरि गुण गावै अंदरु सूझै ॥
वह परमात्मा के गुण गाता है, जिससे उसके मन में ज्ञान हो जाता है।

ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਠਾਕਿ ਰਹਾਏ ਸਹਜੇ ਹੀ ਸਚੁ ਪਾਇਆ ॥੧੨॥
हउमै मेरा ठाकि रहाए सहजे ही सचु पाइआ ॥१२॥
उसने अहम् एवं ममता को रोक कर सहज ही सत्य को पा लिया है॥ १२॥

ਬਿਨੁ ਕਰਮਾ ਹੋਰ ਫਿਰੈ ਘਨੇਰੀ ॥
बिनु करमा होर फिरै घनेरी ॥
कितने ही बदकिस्मत लोग भटकते रहते है,

ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਚੁਕੈ ਨ ਫੇਰੀ ॥
मरि मरि जमै चुकै न फेरी ॥
वे बार बार जन्मते मरते रहते है किन्तु उनका आवागमन ख़त्म नहीं होता।

ਬਿਖੁ ਕਾ ਰਾਤਾ ਬਿਖੁ ਕਮਾਵੈ ਸੁਖੁ ਨ ਕਬਹੂ ਪਾਇਆ ॥੧੩॥
बिखु का राता बिखु कमावै सुखु न कबहू पाइआ ॥१३॥
विषय-विकारों में लीन रहने वाला जीव विकारों का ही आचरण करता है और उसने जीवन में कभी सुख प्राप्त नहीं किया॥ १३॥

ਬਹੁਤੇ ਭੇਖ ਕਰੇ ਭੇਖਧਾਰੀ ॥
बहुते भेख करे भेखधारी ॥
वेष धारण करने वाला बहुरूपिया अनेक वेष बनाता रहता है लेकिन

ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਹਉਮੈ ਕਿਨੈ ਨ ਮਾਰੀ ॥
बिनु सबदै हउमै किनै न मारी ॥
शब्द-गुरु के बिना किसी का भी अहम् नहीं मिटा।

ਜੀਵਤੁ ਮਰੈ ਤਾ ਮੁਕਤਿ ਪਾਏ ਸਚੈ ਨਾਇ ਸਮਾਇਆ ॥੧੪॥
जीवतु मरै ता मुकति पाए सचै नाइ समाइआ ॥१४॥
यदि वह जीवित ही पापों की तरफ से मर जाए तो मुक्ति पा लेता है और सत्य-नाम में विलीन हो जाता है॥ १४॥

ਅਗਿਆਨੁ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਇਸੁ ਤਨਹਿ ਜਲਾਏ ॥
अगिआनु त्रिसना इसु तनहि जलाए ॥
अज्ञान एवं तृष्णाग्नि इस तन को जलाते रहते हैं,”

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