Hindi Page 994

ਏ ਮਨ ਹਰਿ ਜੀਉ ਚੇਤਿ ਤੂ ਮਨਹੁ ਤਜਿ ਵਿਕਾਰ ॥
ए मन हरि जीउ चेति तू मनहु तजि विकार ॥
हे मन ! तू विकारों को तज कर परमात्मा को याद कर;

ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਧਿਆਇ ਤੂ ਸਚਿ ਲਗੀ ਪਿਆਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुर कै सबदि धिआइ तू सचि लगी पिआरु ॥१॥ रहाउ ॥
सत्य से प्रेम एवं आस्था रखकर तू गुरु के शब्द द्वारा ध्यान कर॥ १॥ रहाउ॥

ਐਥੈ ਨਾਵਹੁ ਭੁਲਿਆ ਫਿਰਿ ਹਥੁ ਕਿਥਾਊ ਨ ਪਾਇ ॥
ऐथै नावहु भुलिआ फिरि हथु किथाऊ न पाइ ॥
यदि मानव-जन्म में हरि-नाम को भुला दिया तो फिर कहीं भी प्राप्त नहीं होगा।

ਜੋਨੀ ਸਭਿ ਭਵਾਈਅਨਿ ਬਿਸਟਾ ਮਾਹਿ ਸਮਾਇ ॥੨॥
जोनी सभि भवाईअनि बिसटा माहि समाइ ॥२॥
सब योनियों में तू भटकता रहेगा और विष्ठा में ही नष्ट हो जाएगा॥ २॥

ਵਡਭਾਗੀ ਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਮਾਇ ॥
वडभागी गुरु पाइआ पूरबि लिखिआ माइ ॥
हे माँ! अहोभाग्य से गुरु प्राप्त हुआ है परन्तु पूर्व लिखे भाग्य से ही मिला है।

ਅਨਦਿਨੁ ਸਚੀ ਭਗਤਿ ਕਰਿ ਸਚਾ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥੩॥
अनदिनु सची भगति करि सचा लए मिलाइ ॥३॥
रात-दिन भगवान् की भक्ति करता रहता हूँ, ताकि परम सत्य अपने साथ मिला ले॥ ३॥

ਆਪੇ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਸਭ ਸਾਜੀਅਨੁ ਆਪੇ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥
आपे स्रिसटि सभ साजीअनु आपे नदरि करेइ ॥
ईश्वर ने स्वयं ही सृष्टि रचना की है और वह स्वयं ही कृपा-दृष्टि करता है।

ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਵਡਿਆਈਆ ਜੈ ਭਾਵੈ ਤੈ ਦੇਇ ॥੪॥੨॥
नानक नामि वडिआईआ जै भावै तै देइ ॥४॥२॥
हे नानक ! नाम में ही सारी बड़ाई है, यदि उसे मंजूर हो तो ही वह देता है॥ ४॥ २॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
मारू महला ३ ॥
मारू महला ३॥

ਪਿਛਲੇ ਗੁਨਹ ਬਖਸਾਇ ਜੀਉ ਅਬ ਤੂ ਮਾਰਗਿ ਪਾਇ ॥
पिछले गुनह बखसाइ जीउ अब तू मारगि पाइ ॥
हे मानव ! पिछले गुनाह क्षमा करवा कर अब तू सन्मार्ग लग जा !

ਹਰਿ ਕੀ ਚਰਣੀ ਲਾਗਿ ਰਹਾ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ॥੧॥
हरि की चरणी लागि रहा विचहु आपु गवाइ ॥१॥
मन का अहम् दूर करके हरि-चरणों में रह॥ १॥

ਮੇਰੇ ਮਨ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਧਿਆਇ ॥
मेरे मन गुरमुखि नामु हरि धिआइ ॥
हे मेरे मन ! गुरुमुख बनकर प्रभु का चिंतन करो,

ਸਦਾ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਲਾਗਿ ਰਹਾ ਇਕ ਮਨਿ ਏਕੈ ਭਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सदा हरि चरणी लागि रहा इक मनि एकै भाइ ॥१॥ रहाउ ॥
एकाग्रचित होकर सदा प्रभु-चरणों में लीन रहो॥ १॥ रहाउ॥

ਨਾ ਮੈ ਜਾਤਿ ਨ ਪਤਿ ਹੈ ਨਾ ਮੈ ਥੇਹੁ ਨ ਥਾਉ ॥
ना मै जाति न पति है ना मै थेहु न थाउ ॥
न मेरी कोई ऊँची जाति है, न कोई शोभा है और न ही कोई ठौर-ठिकाना है परन्तु

ਸਬਦਿ ਭੇਦਿ ਭ੍ਰਮੁ ਕਟਿਆ ਗੁਰਿ ਨਾਮੁ ਦੀਆ ਸਮਝਾਇ ॥੨॥
सबदि भेदि भ्रमु कटिआ गुरि नामु दीआ समझाइ ॥२॥
गुरु ने मुझे नाम प्रदान करके समझा दिया है और शब्द से भेद कर सारा भ्रम काट दिया है॥ २॥

ਇਹੁ ਮਨੁ ਲਾਲਚ ਕਰਦਾ ਫਿਰੈ ਲਾਲਚਿ ਲਾਗਾ ਜਾਇ ॥
इहु मनु लालच करदा फिरै लालचि लागा जाइ ॥
यह मन लालची है और लालच में ही इधर-उधर भटकता रहता है।

ਧੰਧੈ ਕੂੜਿ ਵਿਆਪਿਆ ਜਮ ਪੁਰਿ ਚੋਟਾ ਖਾਇ ॥੩॥
धंधै कूड़ि विआपिआ जम पुरि चोटा खाइ ॥३॥
यह दुनिया के झूठे धधों में लीन रहकर यमपुरी में दण्ड भोगता है॥ ३॥

ਨਾਨਕ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ਹੈ ਦੂਜਾ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥
नानक सभु किछु आपे आपि है दूजा नाही कोइ ॥
हे नानक ! परमेश्वर स्वयं ही सबकुछ करने वाला है, उसके अलावा अन्य कोई समर्थ नहीं।

ਭਗਤਿ ਖਜਾਨਾ ਬਖਸਿਓਨੁ ਗੁਰਮੁਖਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੪॥੩॥
भगति खजाना बखसिओनु गुरमुखा सुखु होइ ॥४॥३॥
वह अपनी भक्ति का खजाना गुरुमुखों को प्रदान करता है, जिससे वे सदैव सुखी रहते हैं।४॥ ३॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
मारू महला ३ ॥
मारू महला ३॥

ਸਚਿ ਰਤੇ ਸੇ ਟੋਲਿ ਲਹੁ ਸੇ ਵਿਰਲੇ ਸੰਸਾਰਿ ॥
सचि रते से टोलि लहु से विरले संसारि ॥
निःसंदेह खोज कर देख लो, दुनिया में ऐसे विरले ही हैं, जो सत्य की स्मृति में लीन रहते हैं।

ਤਿਨ ਮਿਲਿਆ ਮੁਖੁ ਉਜਲਾ ਜਪਿ ਨਾਮੁ ਮੁਰਾਰਿ ॥੧॥
तिन मिलिआ मुखु उजला जपि नामु मुरारि ॥१॥
उन्हें मिलकर भगवान् का नाम जपकर मुख उज्ज्वल हो जाता है॥ १॥

ਬਾਬਾ ਸਾਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਰਿਦੈ ਸਮਾਲਿ ॥
बाबा साचा साहिबु रिदै समालि ॥
हे बाबा ! सच्चे परमेश्वर को हृदय में स्मरण करो;

ਸਤਿਗੁਰੁ ਅਪਨਾ ਪੁਛਿ ਦੇਖੁ ਲੇਹੁ ਵਖਰੁ ਭਾਲਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सतिगुरु अपना पुछि देखु लेहु वखरु भालि ॥१॥ रहाउ ॥
अपने सतगुरु से पूछकर देख लों और सत्य नाम रूपी सौदा तलाश लो॥ १॥ रहाउ॥

ਇਕੁ ਸਚਾ ਸਭ ਸੇਵਦੀ ਧੁਰਿ ਭਾਗਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥
इकु सचा सभ सेवदी धुरि भागि मिलावा होइ ॥
चाहे सारी दुनिया एक ईश्वर की अर्चना करती है लेकिन भाग्य से ही उससे मिलाप होता है।

ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਿਲੇ ਸੇ ਨ ਵਿਛੁੜਹਿ ਪਾਵਹਿ ਸਚੁ ਸੋਇ ॥੨॥
गुरमुखि मिले से न विछुड़हि पावहि सचु सोइ ॥२॥
गुरुमुख सत्य को पा लेते हैं और वे प्रभु से मिलकर कभी जुदा नहीं होते॥ २॥

ਇਕਿ ਭਗਤੀ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣਨੀ ਮਨਮੁਖ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇ ॥
इकि भगती सार न जाणनी मनमुख भरमि भुलाइ ॥
कुछ व्यक्ति भक्ति का महत्व नहीं जानते, ऐसे स्वेच्छाचारी भ्रम में ही भटकते रहते हैं।

ਓਨਾ ਵਿਚਿ ਆਪਿ ਵਰਤਦਾ ਕਰਣਾ ਕਿਛੂ ਨ ਜਾਇ ॥੩॥
ओना विचि आपि वरतदा करणा किछू न जाइ ॥३॥
परन्तु उन में परमेश्वर ही क्रियाशील है और उन बेचारों से स्वयं कुछ भी नहीं किया जा सकता॥ ३॥

ਜਿਸੁ ਨਾਲਿ ਜੋਰੁ ਨ ਚਲਈ ਖਲੇ ਕੀਚੈ ਅਰਦਾਸਿ ॥
जिसु नालि जोरु न चलई खले कीचै अरदासि ॥
जिसके समक्ष कोई बल नहीं चलता, उसके आगे प्रार्थना करनी चाहिए।

ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਤਾ ਸੁਣਿ ਕਰੇ ਸਾਬਾਸਿ ॥੪॥੪॥
नानक गुरमुखि नामु मनि वसै ता सुणि करे साबासि ॥४॥४॥
हे नानक ! जिन के मन में गुरु के माध्यम से नाम का निवास हो जाता है, ईश्वर उनकी प्रार्थना सुनकर उन्हें शाबाश देता है॥ ४॥ ४॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
मारू महला ३ ॥
मारू महला ३॥

ਮਾਰੂ ਤੇ ਸੀਤਲੁ ਕਰੇ ਮਨੂਰਹੁ ਕੰਚਨੁ ਹੋਇ ॥
मारू ते सीतलु करे मनूरहु कंचनु होइ ॥
जो उग्र मन को शीतल एवं लोहे को कंचन बना देता है,

ਸੋ ਸਾਚਾ ਸਾਲਾਹੀਐ ਤਿਸੁ ਜੇਵਡੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥੧॥
सो साचा सालाहीऐ तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥१॥
उस सच्चे परमेश्वर का स्तुतिगान करो, उस जैसा अन्य कोई समर्थ नहीं है॥ १॥

ਮੇਰੇ ਮਨ ਅਨਦਿਨੁ ਧਿਆਇ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
मेरे मन अनदिनु धिआइ हरि नाउ ॥
हे मेरे मन ! नित्य हरि-नाम का मनन करो;

ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਅਰਾਧਿ ਤੂ ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सतिगुर कै बचनि अराधि तू अनदिनु गुण गाउ ॥१॥ रहाउ ॥
सतगुरु के वचन द्वारा उसकी आराधना करो और हर वक्त उसके ही गुण गाओ॥ १॥ रहाउ॥

ਗੁਰਮੁਖਿ ਏਕੋ ਜਾਣੀਐ ਜਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਦੇਇ ਬੁਝਾਇ ॥
गुरमुखि एको जाणीऐ जा सतिगुरु देइ बुझाइ ॥
जब सतगुरु सूझ प्रदान कर देता है तो गुरुमुख एक परमात्मा को समझ लेता है।

ਸੋ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਾਲਾਹੀਐ ਜਿਦੂ ਏਹ ਸੋਝੀ ਪਾਇ ॥੨॥
सो सतिगुरु सालाहीऐ जिदू एह सोझी पाइ ॥२॥
सो सतगुरु की प्रशंसा करो, जिससे यह सूझ प्राप्त होती है। २॥

ਸਤਿਗੁਰੁ ਛੋਡਿ ਦੂਜੈ ਲਗੇ ਕਿਆ ਕਰਨਿ ਅਗੈ ਜਾਇ ॥
सतिगुरु छोडि दूजै लगे किआ करनि अगै जाइ ॥
जो सतगुरु को छोड़कर द्वैतभाव में संलग्न हो गए हैं, वे परलोक में क्या करेंगे ?

ਜਮ ਪੁਰਿ ਬਧੇ ਮਾਰੀਅਹਿ ਬਹੁਤੀ ਮਿਲੈ ਸਜਾਇ ॥੩॥
जम पुरि बधे मारीअहि बहुती मिलै सजाइ ॥३॥
यमपुरी में बाँध कर उन्हें कठोर दण्ड मिलेगा।॥३॥

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