Hindi Page 1155

ਪ੍ਰਹਲਾਦੁ ਜਨੁ ਚਰਣੀ ਲਾਗਾ ਆਇ ॥੧੧॥
प्रहलादु जनु चरणी लागा आइ ॥११॥
तदन्तर भक्त प्रहलाद प्रभु के चरणों में लग गया॥ ११॥

ਸਤਿਗੁਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ॥
सतिगुरि नामु निधानु द्रिड़ाइआ ॥
सतगुरु ने हरि-नाम रूपी सुखों का भण्डार ही पक्का करवाया है।

ਰਾਜੁ ਮਾਲੁ ਝੂਠੀ ਸਭ ਮਾਇਆ ॥
राजु मालु झूठी सभ माइआ ॥
राज, सम्पदा एवं समूची माया झूठी है,

ਲੋਭੀ ਨਰ ਰਹੇ ਲਪਟਾਇ ॥
लोभी नर रहे लपटाइ ॥
मगर लोभी व्यक्ति इससे ही लिपटे रहते हैं।

ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਦਰਗਹ ਮਿਲੈ ਸਜਾਇ ॥੧੨॥
हरि के नाम बिनु दरगह मिलै सजाइ ॥१२॥
हरि-नाम स्मरण के बिना दरबार में दण्ड ही मिलता है॥ १२॥

ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਸਭੁ ਕੋ ਕਰੇ ਕਰਾਇਆ ॥
कहै नानकु सभु को करे कराइआ ॥
हे नानक ! ईश्वर ही सब करने एवं करवाने वाला है।

ਸੇ ਪਰਵਾਣੁ ਜਿਨੀ ਹਰਿ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ॥
से परवाणु जिनी हरि सिउ चितु लाइआ ॥
वही व्यक्ति मान्य हैं, जिन्होंने ईश्वर से मन लगाया है।

ਭਗਤਾ ਕਾ ਅੰਗੀਕਾਰੁ ਕਰਦਾ ਆਇਆ ॥
भगता का अंगीकारु करदा आइआ ॥
वह सदैव भवतों का साथ देता आया है,

ਕਰਤੈ ਅਪਣਾ ਰੂਪੁ ਦਿਖਾਇਆ ॥੧੩॥੧॥੨॥
करतै अपणा रूपु दिखाइआ ॥१३॥१॥२॥
अतः भक्तों के लिए कर्ता-प्रभु ने अपना रूप दिखाया है॥ १३॥१॥२॥

ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੩ ॥
भैरउ महला ३ ॥
भैरउ महला ५॥

ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ਹਉਮੈ ਤ੍ਰਿਸਨ ਬੁਝਾਈ ॥
गुर सेवा ते अम्रित फलु पाइआ हउमै त्रिसन बुझाई ॥
गुरु की सेवा से अमृत फल पाया जा सकता है और अहम् तथा तृष्णा निवृत्त हो जाती है।

ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਹ੍ਰਿਦੈ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਮਨਸਾ ਮਨਹਿ ਸਮਾਈ ॥੧॥
हरि का नामु ह्रिदै मनि वसिआ मनसा मनहि समाई ॥१॥
प्रभु का नाम हृदय में अवस्थित हो जाए तो मन की लालसाएँ दूर हो जाती हैं।॥१॥

ਹਰਿ ਜੀਉ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਹੁ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰੇ ॥
हरि जीउ क्रिपा करहु मेरे पिआरे ॥
हे प्यारे प्रभु ! कृपा करो,

ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਗੁਣ ਦੀਨ ਜਨੁ ਮਾਂਗੈ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਉਧਾਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
अनदिनु हरि गुण दीन जनु मांगै गुर कै सबदि उधारे ॥१॥ रहाउ ॥
दीन सेवक तुझसे तेरा गुणगान ही चाहता है, गुरु के उपदेश से उद्धार करो॥१॥ रहाउ॥

ਸੰਤ ਜਨਾ ਕਉ ਜਮੁ ਜੋਹਿ ਨ ਸਾਕੈ ਰਤੀ ਅੰਚ ਦੂਖ ਨ ਲਾਈ ॥
संत जना कउ जमु जोहि न साकै रती अंच दूख न लाई ॥
संतजनों के पास यम नहीं फटकता और उन्हें किंचित मात्र भी दु:ख नहीं होता।

ਆਪਿ ਤਰਹਿ ਸਗਲੇ ਕੁਲ ਤਾਰਹਿ ਜੋ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ॥੨॥
आपि तरहि सगले कुल तारहि जो तेरी सरणाई ॥२॥
जो तेरी शरण में आ जाते हैं, वे स्वयं तो संसार-सागर से मुक्त होते ही हैं, अपनी समस्त वंशावलि को भी मुक्त करवाते हैं।॥२॥

ਭਗਤਾ ਕੀ ਪੈਜ ਰਖਹਿ ਤੂ ਆਪੇ ਏਹ ਤੇਰੀ ਵਡਿਆਈ ॥
भगता की पैज रखहि तू आपे एह तेरी वडिआई ॥
यह तेरा बड़प्पन है केि तू स्वयं ही भक्तों की लाज रखता है,

ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਵਿਖ ਦੁਖ ਕਾਟਹਿ ਦੁਬਿਧਾ ਰਤੀ ਨ ਰਾਈ ॥੩॥
जनम जनम के किलविख दुख काटहि दुबिधा रती न राई ॥३॥
तू जन्म-जन्मांतर के पाप-दुःख काट देता है और उन में रती भर दुविधा नहीं रहती॥३॥

ਹਮ ਮੂੜ ਮੁਗਧ ਕਿਛੁ ਬੂਝਹਿ ਨਾਹੀ ਤੂ ਆਪੇ ਦੇਹਿ ਬੁਝਾਈ ॥
हम मूड़ मुगध किछु बूझहि नाही तू आपे देहि बुझाई ॥
हम मूर्ख-नादान तो कुछ भी नहीं समझते, तू स्वयं ही समझा दे।

ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਕਰਸੀ ਅਵਰੁ ਨ ਕਰਣਾ ਜਾਈ ॥੪॥
जो तुधु भावै सोई करसी अवरु न करणा जाई ॥४॥
जो तू चाहता है, वही करता है और अन्य कुछ नहीं हो पाता॥४॥

ਜਗਤੁ ਉਪਾਇ ਤੁਧੁ ਧੰਧੈ ਲਾਇਆ ਭੂੰਡੀ ਕਾਰ ਕਮਾਈ ॥
जगतु उपाइ तुधु धंधै लाइआ भूंडी कार कमाई ॥
जगत को उत्पन्न कर तूने काम-धन्धे में लगा दिया, परन्तु लोग मन्दे काम करते रहते हैं।

ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਜੂਐ ਹਾਰਿਆ ਸਬਦੈ ਸੁਰਤਿ ਨ ਪਾਈ ॥੫॥
जनमु पदारथु जूऐ हारिआ सबदै सुरति न पाई ॥५॥
लोगों ने अमूल्य जीवन को जुए में पराजित कर दिया और शब्द को अन्तर्मन में नहीं बसाया॥ ५॥

ਮਨਮੁਖਿ ਮਰਹਿ ਤਿਨ ਕਿਛੂ ਨ ਸੂਝੈ ਦੁਰਮਤਿ ਅਗਿਆਨ ਅੰਧਾਰਾ ॥
मनमुखि मरहि तिन किछू न सूझै दुरमति अगिआन अंधारा ॥
स्वेच्छाचारी मर जाते हैं और दुर्मति एवं अज्ञान अंधेरे के कारण कोई सूझ नहीं होती।

ਭਵਜਲੁ ਪਾਰਿ ਨ ਪਾਵਹਿ ਕਬ ਹੀ ਡੂਬਿ ਮੁਏ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਿਰਿ ਭਾਰਾ ॥੬॥
भवजलु पारि न पावहि कब ही डूबि मुए बिनु गुर सिरि भारा ॥६॥
वे संसार-सागर से पार नहीं उतरते और गुरु के बिना पापों का बोझ लेकर डूब मरते हैं।॥६॥

ਸਾਚੈ ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਜਨ ਸਾਚੇ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
साचै सबदि रते जन साचे हरि प्रभि आपि मिलाए ॥
सच्चे शब्द में लीन व्यक्ति ही सत्यनिष्ठ हैं और प्रभु स्वयं ही उन्हें मिला लेता है।

ਗੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤੀ ਸਾਚਿ ਰਹੇ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥੭॥
गुर की बाणी सबदि पछाती साचि रहे लिव लाए ॥७॥
गुरु की वाणी द्वारा शब्द रहस्य को जानकर वे सत्य में लगन लगाए रखते हैं।॥७॥

ਤੂੰ ਆਪਿ ਨਿਰਮਲੁ ਤੇਰੇ ਜਨ ਹੈ ਨਿਰਮਲ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰੇ ॥
तूं आपि निरमलु तेरे जन है निरमल गुर कै सबदि वीचारे ॥
तू स्वयं तो निर्मल ही है, तेरे सेवक भी निर्मल हैं, गुरु के उपदेश द्वारा यह विचार किया है।

ਨਾਨਕੁ ਤਿਨ ਕੈ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੈ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਉਰਿ ਧਾਰੇ ॥੮॥੨॥੩॥
नानकु तिन कै सद बलिहारै राम नामु उरि धारे ॥८॥२॥३॥
नानक उन पर सदैव कुर्बान जाता है, जिन्होंने राम नाम को मन में धारण कर लिया है॥ ८॥२॥३॥

ਭੈਰਉ ਮਹਲਾ ੫ ਅਸਟਪਦੀਆ ਘਰੁ ੨
भैरउ महला ५ असटपदीआ घरु २
भैरउ महला ५ असटपदीआ घरु २

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥

ਜਿਸੁ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਸੋਈ ਵਡ ਰਾਜਾ ॥
जिसु नामु रिदै सोई वड राजा ॥
जिसके हृदय में हरि-नाम है, वही सबसे बड़ा बादशाह है,

ਜਿਸੁ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਤਿਸੁ ਪੂਰੇ ਕਾਜਾ ॥
जिसु नामु रिदै तिसु पूरे काजा ॥
जिसके हृदय में नाम है, उसके सभी कार्य सम्पन्न हो जाते हैं।

ਜਿਸੁ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਤਿਨਿ ਕੋਟਿ ਧਨ ਪਾਏ ॥
जिसु नामु रिदै तिनि कोटि धन पाए ॥
जिसके हृदय में राम नाम है, वही करोड़ों धन पाता है,

ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਜਨਮੁ ਬਿਰਥਾ ਜਾਏ ॥੧॥
नाम बिना जनमु बिरथा जाए ॥१॥
किन्तु प्रभु-नाम बिना जीवन व्यर्थ ही जाता है॥१॥

ਤਿਸੁ ਸਾਲਾਹੀ ਜਿਸੁ ਹਰਿ ਧਨੁ ਰਾਸਿ ॥
तिसु सालाही जिसु हरि धनु रासि ॥
जिसके पास प्रभु-नाम रूपी धन राशि है, उसकी ही प्रशंसा करता हूँ।

ਸੋ ਵਡਭਾਗੀ ਜਿਸੁ ਗੁਰ ਮਸਤਕਿ ਹਾਥੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सो वडभागी जिसु गुर मसतकि हाथु ॥१॥ रहाउ ॥
वही भाग्यशाली है, जिसके माथे पर गुरु का हाथ (आशीष) है॥१॥ रहाउ॥

ਜਿਸੁ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਤਿਸੁ ਕੋਟ ਕਈ ਸੈਨਾ ॥
जिसु नामु रिदै तिसु कोट कई सैना ॥
जिसके हृदय में राम नाम है, उसके पास अनेक किले एवं बेशुमार सेना है।

ਜਿਸੁ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਤਿਸੁ ਸਹਜ ਸੁਖੈਨਾ ॥
जिसु नामु रिदै तिसु सहज सुखैना ॥
जिसके हृदय में नाम है, वही परम सुखी है।

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