Hindi Page 1222

ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥

ਹਰਿ ਹਰਿ ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਜੀਵਨਿ ॥
हरि हरि संत जना की जीवनि ॥
परमात्मा ही भक्तजनों का जीवन है,

ਬਿਖੈ ਰਸ ਭੋਗ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਰਾਮ ਨਾਮ ਰਸੁ ਪੀਵਨਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
बिखै रस भोग अम्रित सुख सागर राम नाम रसु पीवनि ॥१॥ रहाउ ॥
वे अमृतमय सुखसागर राम नाम का ही रस पान करते हैं और इसी रस को भोगते हैं।॥१॥रहाउ॥।

ਸੰਚਨਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਧਨੁ ਰਤਨਾ ਮਨ ਤਨ ਭੀਤਰਿ ਸੀਵਨਿ ॥
संचनि राम नाम धनु रतना मन तन भीतरि सीवनि ॥
ये राम नाम धन को संचित करते हैं और मन तन में इसी में तल्लीन रहते हैं।

ਹਰਿ ਰੰਗ ਰਾਂਗ ਭਏ ਮਨ ਲਾਲਾ ਰਾਮ ਨਾਮ ਰਸ ਖੀਵਨਿ ॥੧॥
हरि रंग रांग भए मन लाला राम नाम रस खीवनि ॥१॥
उनका मन प्रभु के रंग में लाल रहता है और वे राम नाम का रस ही सेवन करते हैं।॥१॥

ਜਿਉ ਮੀਨਾ ਜਲ ਸਿਉ ਉਰਝਾਨੋ ਰਾਮ ਨਾਮ ਸੰਗਿ ਲੀਵਨਿ ॥
जिउ मीना जल सिउ उरझानो राम नाम संगि लीवनि ॥
ज्यों मछली जल में उलझी रहती है, वैसे ही वे राम नाम में लीन रहते हैं।

ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਚਾਤ੍ਰਿਕ ਕੀ ਨਿਆਈ ਹਰਿ ਬੂੰਦ ਪਾਨ ਸੁਖ ਥੀਵਨਿ ॥੨॥੬੮॥੯੧॥
नानक संत चात्रिक की निआई हरि बूंद पान सुख थीवनि ॥२॥६८॥९१॥
हे नानक ! संत चातक की तरह हरि-बूंद का पान करके सुख पाते हैं।॥२॥ ६८ ॥ ६१ ॥

ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥

ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮਹੀਨ ਬੇਤਾਲ ॥
हरि के नामहीन बेताल ॥
ईश्वर के नाम से विहीन मनुष्य प्रेत समान है।

ਜੇਤਾ ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਤੇਤਾ ਸਭਿ ਬੰਧਨ ਜੰਜਾਲ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जेता करन करावन तेता सभि बंधन जंजाल ॥१॥ रहाउ ॥
जितना भी वह (कर्मकाण्ड) करता करवाता है, उतने ही उसके लिए सभी बन्धन जंजाल बन जाते हैं।॥१॥रहाउ॥।

ਬਿਨੁ ਪ੍ਰਭ ਸੇਵ ਕਰਤ ਅਨ ਸੇਵਾ ਬਿਰਥਾ ਕਾਟੈ ਕਾਲ ॥
बिनु प्रभ सेव करत अन सेवा बिरथा काटै काल ॥
वह प्रभु सेवा की अपेक्षा अन्य (देवताओं) की सेवा करके समय बर्बाद करता है।

ਜਬ ਜਮੁ ਆਇ ਸੰਘਾਰੈ ਪ੍ਰਾਨੀ ਤਬ ਤੁਮਰੋ ਕਉਨੁ ਹਵਾਲ ॥੧॥
जब जमु आइ संघारै प्रानी तब तुमरो कउनु हवाल ॥१॥
हे प्राणी ! जब यम आकर मारेगा, तब तुम्हारा कौन ख्याल रखेगा ॥१॥

ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਦਾਸ ਅਪੁਨੇ ਕਉ ਸਦਾ ਸਦਾ ਕਿਰਪਾਲ ॥
राखि लेहु दास अपुने कउ सदा सदा किरपाल ॥
हे प्रभु ! अपने दास को बचा लो, तू सदैव कृपालु है।

ਸੁਖ ਨਿਧਾਨ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ਸਾਧਸੰਗਿ ਧਨ ਮਾਲ ॥੨॥੬੯॥੯੨॥
सुख निधान नानक प्रभु मेरा साधसंगि धन माल ॥२॥६९॥९२॥
नानक का कथन है कि मेरा प्रभु सुखों का घर है और साधु महापुरुषों की संगत ही मेरी धन-दौलत है॥२॥६६॥६२॥

ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥

ਮਨਿ ਤਨਿ ਰਾਮ ਕੋ ਬਿਉਹਾਰੁ ॥
मनि तनि राम को बिउहारु ॥
मन तन में राम स्मरण का व्यवहार बनाना चाहिए,

ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਗੁਨ ਗਾਵਨ ਗੀਧੇ ਪੋਹਤ ਨਹ ਸੰਸਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
प्रेम भगति गुन गावन गीधे पोहत नह संसारु ॥१॥ रहाउ ॥
वह तो प्रेम-भक्ति एवं गुणगान से ही प्रसन्न होता है और संसार के बन्धन प्रभावित नहीं करते॥१॥रहाउ॥।

ਸ੍ਰਵਣੀ ਕੀਰਤਨੁ ਸਿਮਰਨੁ ਸੁਆਮੀ ਇਹੁ ਸਾਧ ਕੋ ਆਚਾਰੁ ॥
स्रवणी कीरतनु सिमरनु सुआमी इहु साध को आचारु ॥
कानों से प्रभु का संकीर्तन सुनना एवं भजन करना ही साधु पुरुषों का जीवन-आचरण है।

ਚਰਨ ਕਮਲ ਅਸਥਿਤਿ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਪੂਜਾ ਪ੍ਰਾਨ ਕੋ ਆਧਾਰੁ ॥੧॥
चरन कमल असथिति रिद अंतरि पूजा प्रान को आधारु ॥१॥
उनका हृदय प्रभु के चरण-कमल में स्थिर रहता है और प्रभु की पूजा ही उनके प्राणों का आसरा है॥१॥

ਪ੍ਰਭ ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਸੁਨਹੁ ਬੇਨੰਤੀ ਕਿਰਪਾ ਅਪਨੀ ਧਾਰੁ ॥
प्रभ दीन दइआल सुनहु बेनंती किरपा अपनी धारु ॥
हे दीनदयाल प्रभु ! मेरी विनती सुनो; अपनी कृपा करो,

ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਉਚਰਉ ਨਿਤ ਰਸਨਾ ਨਾਨਕ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੁ ॥੨॥੭੦॥੯੩॥
नामु निधानु उचरउ नित रसना नानक सद बलिहारु ॥२॥७०॥९३॥
ताकि रसना से नित्य सुखों की निधि नाम का उच्चारण करूँ, नानक तुझ पर सदा बलिहारी जाता है॥२॥ ७० ॥ ६३॥

ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥

ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮਹੀਨ ਮਤਿ ਥੋਰੀ ॥
हरि के नामहीन मति थोरी ॥
ईश्वर के नाम से विहीन मनुष्य मंदबुद्धि कहलाता है।

ਸਿਮਰਤ ਨਾਹਿ ਸਿਰੀਧਰ ਠਾਕੁਰ ਮਿਲਤ ਅੰਧ ਦੁਖ ਘੋਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सिमरत नाहि सिरीधर ठाकुर मिलत अंध दुख घोरी ॥१॥ रहाउ ॥
वह श्रीधर ठाकुर जी का स्मरण नहीं करता और घोर दुख ही पाता है॥१॥रहाउ॥।

ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਲਾਗੀ ਅਨਿਕ ਭੇਖ ਬਹੁ ਜੋਰੀ ॥
हरि के नाम सिउ प्रीति न लागी अनिक भेख बहु जोरी ॥
वह ईश्वर के नाम से प्रीति नहीं लगाता और अनेक वेष धारण करता है।

ਤੂਟਤ ਬਾਰ ਨ ਲਾਗੈ ਤਾ ਕਉ ਜਿਉ ਗਾਗਰਿ ਜਲ ਫੋਰੀ ॥੧॥
तूटत बार न लागै ता कउ जिउ गागरि जल फोरी ॥१॥
ऐसा प्रेम टूटते देरी नहीं लगती, ज्यों टूटी गागर में जल नहीं ठहरता ॥१॥

ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਭਗਤਿ ਰਸੁ ਦੀਜੈ ਮਨੁ ਖਚਿਤ ਪ੍ਰੇਮ ਰਸ ਖੋਰੀ ॥
करि किरपा भगति रसु दीजै मनु खचित प्रेम रस खोरी ॥
यदि भगवान कृपा करके भक्ति का रस प्रदान करे तो मन प्रेम-रस में तल्लीन रहे।

ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ਪ੍ਰਭ ਬਿਨੁ ਆਨ ਨ ਹੋਰੀ ॥੨॥੭੧॥੯੪॥
नानक दास तेरी सरणाई प्रभ बिनु आन न होरी ॥२॥७१॥९४॥
हे प्रभु! दास नानक तेरी शरण में आया है और तेरे सिवा मेरा कोई नहीं ॥२॥ ७१ ॥ ६४ ॥

ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥

ਚਿਤਵਉ ਵਾ ਅਉਸਰ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
चितवउ वा अउसर मन माहि ॥
मैं मन में उस शुभावसर का चिन्तन करता हूँ कि

ਹੋਇ ਇਕਤ੍ਰ ਮਿਲਹੁ ਸੰਤ ਸਾਜਨ ਗੁਣ ਗੋਬਿੰਦ ਨਿਤ ਗਾਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
होइ इकत्र मिलहु संत साजन गुण गोबिंद नित गाहि ॥१॥ रहाउ ॥
सज्जन संतों के साथ मिलकर परमात्मा का गुणगान किया जाए॥१॥रहाउ॥।

ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਜੇਤੇ ਕਾਮ ਕਰੀਅਹਿ ਤੇਤੇ ਬਿਰਥੇ ਜਾਂਹਿ ॥
बिनु हरि भजन जेते काम करीअहि तेते बिरथे जांहि ॥
परमात्मा के भजन बिना जितने कार्य हम करते हैं, सब बेकार ही जाते हैं।

ਪੂਰਨ ਪਰਮਾਨੰਦ ਮਨਿ ਮੀਠੋ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਦੂਸਰ ਨਾਹਿ ॥੧॥
पूरन परमानंद मनि मीठो तिसु बिनु दूसर नाहि ॥१॥
पूर्ण परमानंद ही मन को मधुर लगता है, उसके सिवा दूसरा कोई नहीं ॥१॥

ਜਪ ਤਪ ਸੰਜਮ ਕਰਮ ਸੁਖ ਸਾਧਨ ਤੁਲਿ ਨ ਕਛੂਐ ਲਾਹਿ ॥
जप तप संजम करम सुख साधन तुलि न कछूऐ लाहि ॥
मंत्रों का जप, तपस्या, संयम, कर्म तथा सभी सुख साधन प्रभु-भजन के मुकाबले शून्य हैं।

ਚਰਨ ਕਮਲ ਨਾਨਕ ਮਨੁ ਬੇਧਿਓ ਚਰਨਹ ਸੰਗਿ ਸਮਾਹਿ ॥੨॥੭੨॥੯੫॥
चरन कमल नानक मनु बेधिओ चरनह संगि समाहि ॥२॥७२॥९५॥
नानक फुरमाते हैं कि मन प्रभु के चरण-कमल में बिंध गया है और चरणों में ही विलीन है॥२॥७२॥६५॥

ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥

ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਸੰਗੇ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
मेरा प्रभु संगे अंतरजामी ॥
अन्तर्यामी मेरा प्रभु सदैव साथ है।

ਆਗੈ ਕੁਸਲ ਪਾਛੈ ਖੇਮ ਸੂਖਾ ਸਿਮਰਤ ਨਾਮੁ ਸੁਆਮੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
आगै कुसल पाछै खेम सूखा सिमरत नामु सुआमी ॥१॥ रहाउ ॥
स्वामी का नाम स्मरण करने से सदैव कुशल एवं सुख की लब्धि होती है।॥१॥रहाउ॥।

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